Students of Bihar Board Class 11 can use this page to get complete information about the Bihar Board 11th Political Science / Civics 2026 PDF Download. The Political Science (Civics) textbook prescribed by the Bihar Board helps students understand the basics of politics, constitution, and governance.
| Details | Information |
|---|---|
| Board | Bihar Board |
| Class | 11th |
| Subject | Political Science / Civics |
| Academic Year | 2025–26 |
| Material Type | Textbook / Study Material |
| Syllabus | Latest Bihar Board Syllabus |
| Format | |
| Availability | PDF Download Links Available |
This section provides Political Science / Civics study materials in PDF format with direct download links, prepared according to the latest Bihar Board syllabus. These books are useful for regular study as well as exam preparation.
Bihar Board 11th Political Science/Civics 2026 PDF Download (भारत का संविधान : सिध्दान्त और व्यवहार)
इस पेज पर बिहार बोर्ड के छात्रों के लिए “Class XI: political science/Civics (भारत का संविधान : सिध्दान्त और व्यवहार)” दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |
सभी बुक्स का डाउनलोड लिंक नीचे पेज पर दिया गया है |
☞ बुक्स डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए डाउनलोड लिंक पर क्लिक करें |
Bihar Board 12th Political Science Book in Hindi
प्रस्तावना
‘भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ कक्षा 11 के लिए राजनीति विज्ञान की एक आधारभूत पाठ्यपुस्तक है, जो विद्यार्थियों को भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक नींव और उसकी कार्यप्रणाली से परिचित कराती है। यह पुस्तक पारंपरिक रटने की शिक्षा पद्धति के स्थान पर ‘सामाजिक-आर्थिक और अवधारणागत समझ’ विकसित करने के आधुनिक उद्देश्य से तैयार की गई है।
इसमें न केवल संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का तकनीकी विवरण है, बल्कि यह भी विस्तार से बताया गया है कि ये संस्थाएँ वास्तविक राजनीति और सत्ता के जमा-जोड़ से कैसे आकार लेती हैं। पाठ्यपुस्तक में कुल दस अध्याय शामिल हैं, जो संविधान की आवश्यकता, उसकी निर्माण प्रक्रिया, मौलिक अधिकारों, चुनाव प्रणाली, और सरकार के तीनों प्रमुख अंगों—कार्यपालिका, विधायिका, तथा न्यायपालिका—पर गहराई से केंद्रित हैं।
यह संघवाद, स्थानीय शासन और संविधान के अंतर्निहित राजनीतिक दर्शन जैसे महत्वपूर्ण विषयों को भी अत्यंत सरल और सुबोध भाषा में समझाती है। पुस्तक की अनूठी प्रस्तुति शैली, जिसमें ‘उन्नी’ और ‘मुन्नी’ के बीच के संवाद, व्यंग्यात्मक राजनीतिक कार्टून और संविधान सभा की ऐतिहासिक बहसों के उद्धरण शामिल हैं, इसे छात्रों के लिए अत्यंत आकर्षक और जीवंत बनाती है।
यह छात्रों को निरंतर प्रोत्साहित करती है कि वे संविधान को केवल एक निर्जीव कानूनी दस्तावेज न मानकर एक ‘जीवंत दस्तावेज’ के रूप में देखें, जो बदलती परिस्थितियों के साथ विकसित होता रहता है। वैश्विक तुलनाओं और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से, यह पुस्तक छात्रों में आलोचनात्मक सोच पैदा करती है।
अध्याय 1: संविधान : क्यों और कैसे?
यह अध्याय ‘संविधान – क्यों और कैसे?’ भारतीय संविधान की मूलभूत अवधारणाओं और उसके ऐतिहासिक निर्माण की विस्तृत व्याख्या करता है। संविधान किसी भी देश के लिए वह सर्वोच्च कानून है जो समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए आवश्यक बुनियादी नियम निर्धारित करता है। इसके मुख्य कार्यों में समाज के विभिन्न समूहों के बीच तालमेल बढ़ाना, निर्णय लेने की शक्तियों का वितरण करना और सरकार द्वारा लागू किए जाने वाले कानूनों पर न्यायपूर्ण सीमाएँ तय करना शामिल है।
भारतीय संविधान की एक अद्वितीय विशेषता यह है कि यह सरकार को सकारात्मक कार्य करने और गरीबी व भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए सशक्त भी बनाता है। संविधान के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत लोकतांत्रिक और व्यापक थी। 9 दिसंबर 1946 को पहली बार बैठी संविधान सभा ने विभाजन की विभीषिका के बावजूद एक समावेशी भारत की कल्पना की।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे दूरदर्शी नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि संविधान जनता की आशाओं का प्रतीक बने।
भारत ने विश्व के विभिन्न सफल संविधानों से श्रेष्ठ प्रावधानों को अपनाया, लेकिन उन्हें भारतीय संदर्भ में ढाला। यह अध्याय हमें बताता है कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह प्रत्येक नागरिक को उसे मानने का ठोस कारण देता है। अंततः, भारतीय संविधान एक ‘जीवंत दस्तावेज़’ है जो समय के साथ विकसित होता रहता है।
अध्याय 1: संविधान : क्यों और कैसे? – PDF Download
अध्याय 2: भारतीय संविधान में अधिकार
यह अध्याय ‘भारतीय संविधान में अधिकार’ भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में मौलिक अधिकारों के महत्त्व और उनके क्रियान्वयन पर प्रकाश डालता है। अध्याय की शुरुआत एशियाई खेलों के मजदूरों के शोषण और मचल लालुंग के मामले से होती है, जो यह दर्शाते हैं कि वास्तविक जीवन में अधिकारों का होना और उनका संरक्षण कितना अनिवार्य है। संविधान के तीसरे भाग में वर्णित ‘अधिकारों का घोषणापत्र’ न केवल नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि सरकार की शक्तियों को भी सीमित करता है।
मुख्य रूप से, इसमें समता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, और सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकारों का सविस्तार वर्णन किया गया है। अनुच्छेद 32 के तहत ‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’ अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने ‘संविधान का हृदय और आत्मा’ कहा है, क्योंकि यह अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे न्यायपालिका जाने की अनुमति देता है।
अध्याय में ‘राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों’ की भी चर्चा की गई है, जो सरकार के लिए नीतिगत मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। हालांकि ये न्यायलय द्वारा अनिवार्य रूप से लागू नहीं कराए जा सकते, लेकिन ये देश के शासन में बुनियादी महत्व रखते हैं। मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों के बीच संतुलन, निवारक नजरबंदी और संपत्ति के अधिकार जैसे विवादित विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।
अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू बनाते हैं।
अध्याय 2: भारतीय संविधान में अधिकार – PDF Download
अध्याय 3: चुनाव और प्रतिनिधित्व
यह अध्याय भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘चुनाव और प्रतिनिधित्व’ की व्यवस्था का अत्यंत विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें मुख्य रूप से दो प्रमुख चुनाव प्रणालियों के बीच तुलना की गई है: ‘जो सबसे आगे वही जीते’ (First-Past-The-Post) और ‘समानुपातिक प्रतिनिधित्व’ (Proportional Representation)। भारत में लोक सभा और विधान सभा चुनावों के लिए सरल ‘सर्वाधिक वोट से जीत’ वाली प्रणाली को अपनाया गया है, जो मतदाताओं को अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेही तय करने की शक्ति देती है।
वहीं, राज्य सभा और राष्ट्रपति जैसे पदों के लिए ‘एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’ का उपयोग किया जाता है। अध्याय में सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण (SC/ST के लिए) के महत्त्व को समझाया गया है, ताकि समाज के वंचित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। साथ ही, ‘भारतीय निर्वाचन आयोग’ की स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला गया है, जो मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव परिणामों की घोषणा तक की पूरी प्रक्रिया का अधीक्षण करता है।
इसके अलावा, परिसीमन आयोग की कार्यप्रणाली और वयस्क मताधिकार के ऐतिहासिक महत्त्व पर भी चर्चा की गई है। अंत में, चुनाव सुधारों जैसे कि महिलाओं के लिए आरक्षण, राजनीति में धन और आपराधिक तत्वों के प्रभाव को रोकने जैसे सुझावों पर संवाद किया गया है। यह अध्याय निष्कर्ष निकालता है कि भारतीय चुनाव व्यवस्था ने न केवल लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है, बल्कि मतदाताओं के भीतर व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास भी पैदा किया है।
अध्याय 3: चुनाव और प्रतिनिधित्व – PDF Download
अध्याय 4: कार्यपालिका
यह अध्याय भारतीय शासन व्यवस्था में ‘कार्यपालिका’ की भूमिका, शक्तियों और संरचना का विस्तृत विश्लेषण करता है। कार्यपालिका सरकार का वह प्रमुख अंग है जिसका मुख्य दायित्व विधायिका द्वारा निर्मित नीतियों और कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना है। अध्याय में कार्यपालिका के विभिन्न प्रकारों, जैसे अध्यक्षात्मक, संसदीय और अर्द्ध-अध्यक्षात्मक प्रणालियों के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है।
भारत में संसदीय कार्यपालिका को अपनाया गया है, जहाँ राष्ट्रपति राष्ट्र के औपचारिक प्रधान होते हैं, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद के पास होती हैं। अध्याय में राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति, निर्वाचन प्रक्रिया और उनके विशेष विवेकाधीन अधिकारों, जैसे ‘पॉकेट वीटो’ का महत्व समझाया गया है। प्रधानमंत्री को शासन की ‘केंद्रीय धुरी’ के रूप में चित्रित किया गया है, जो मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करते हैं और राष्ट्रपति व संसद के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
इसके साथ ही, ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत पर बल दिया गया है, जिसके अनुसार सरकार लोकसभा के प्रति जवाबदेह होती है। अध्याय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘स्थायी कार्यपालिका’ यानी नौकरशाही (सिविल सेवा) पर केंद्रित है, जो नीतियों के क्रियान्वयन में विशेषज्ञता और निरंतरता प्रदान करती है। निष्कर्षतः, यह पाठ स्पष्ट करता है कि एक जीवंत लोकतंत्र में कार्यपालिका पर विधायिका का नियमित नियंत्रण आवश्यक है ताकि शासन पारदर्शी, उत्तरदायी और जन-उन्मुख बना रहे।
अध्याय 4: कार्यपालिका – PDF Download
अध्याय 5: विधायिका
यह अध्याय ‘विधायिका’ भारतीय संविधान के सिद्धांतों और व्यवहारों के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण करता है। विधायिका केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक शासन का वह मंच है जहाँ जनता के प्रतिनिधि कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। अध्याय में भारतीय संसद की द्विसदनात्मक संरचना—लोक सभा और राज्य सभा—पर विशेष जोर दिया गया है।
राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और यह एक स्थायी सदन है, जबकि लोक सभा प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से जनता की आकांक्षाओं को स्वर देती है। अध्याय कानून बनाने की तकनीकी और राजनीतिक प्रक्रिया को विस्तार से समझाता है, जिसमें विधेयक के प्रारूप से लेकर राष्ट्रपति की अंतिम सहमति तक के विभिन्न चरण शामिल हैं। इसके साथ ही, यह स्पष्ट किया गया है कि संसद किस प्रकार प्रश्नकाल, शून्यकाल और विभिन्न समितियों के माध्यम से सरकार पर वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखती है।
‘अविश्वास प्रस्ताव’ को कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाने का सबसे सशक्त हथियार बताया गया है। अध्याय में दलबदल निरोधक कानून के महत्व और उसकी सीमाओं पर भी चर्चा की गई है, जो सदन के भीतर अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। अंततः, यह अध्याय दर्शाता है कि संसद किस प्रकार देश की विविध सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय लोकतंत्र को जीवंत और संवेदनशील बनाए रखती है।
अध्याय 5: विधायिका – PDF Download
अध्याय 6: न्यायपालिका
यह अध्याय भारतीय न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका, उसकी स्वतंत्रता और विस्तृत संरचना का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें विस्तार से स्पष्ट किया गया है कि एक जीवंत लोकतंत्र में ‘कानून के शासन’ को प्रभावी ढंग से बनाए रखने और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की पूर्ण रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना अत्यंत आवश्यक है। संविधान ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की विशेष प्रक्रिया, उनके निश्चित कार्यकाल और वेतन-भत्तों की वित्तीय सुरक्षा के माध्यम से इसकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता सुनिश्चित की है।
न्यायाधीशों को पद से हटाने के लिए महाभियोग की अत्यंत कठिन प्रक्रिया का प्रावधान है, ताकि वे किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप या अनुचित दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष न्याय कर सकें। अध्याय भारत की पिरामिडनुमा एकीकृत न्यायिक प्रणाली को गहराई से समझाता है, जिसके शीर्ष पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्थित है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न क्षेत्राधिकारों—जैसे प्रारंभिक, अपीली, सलाहकारी और रिट संबंधी शक्तियों—का पूर्ण विवरण दिया गया है।
विशेष रूप से, ‘न्यायिक सक्रियता’ और ‘जनहित याचिकाओं’ (PIL) ने हाल के वर्षों में न्यायपालिका की भूमिका को और अधिक क्रांतिकारी तथा जनोन्मुखी बना दिया है, जिससे समाज के गरीब और पिछड़े वर्गों को सीधे न्याय मिलना सरल हुआ है। इसके अतिरिक्त, पाठ में न्यायपालिका और संसद के बीच के संवेदनशील संबंधों तथा ‘संविधान के मूल ढांचे’ के सिद्धांत की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। यह अध्याय अंततः यह निष्कर्ष निकालता है कि न्यायपालिका न केवल विवादों का निपटारा करने वाला एक कानूनी मंच है, बल्कि यह संविधान की अंतिम व्याख्याकार और नागरिकों के अधिकारों की एक सजग प्रहरी के रूप में भी राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभाती है।
अध्याय 6: न्यायपालिका – PDF Download
अध्याय 7: संघवाद
यह अध्याय ‘संघवाद’ भारतीय संवैधानिक ढांचे और केंद्र-राज्य संबंधों की एक विस्तृत और गहन व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसमें संघवाद को एक ऐसी संस्थागत प्रणाली के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ दो स्तर की राजनीतिक व्यवस्थाएँ—केंद्रीय और प्रांतीय—स्वतंत्र और समन्वित रूप से कार्य करती हैं।
भारतीय संदर्भ में, संविधान का अनुच्छेद 1 भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहता है, जो देश की अखंडता और विविधता को संतुलित करता है। अध्याय में शक्तियों के स्पष्ट विभाजन पर चर्चा की गई है, जिसे संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची और अवशिष्ट शक्तियों के माध्यम से रेखांकित किया गया है।
भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता एक अत्यंत सशक्त केंद्रीय सरकार की स्थापना है, जिसके पास आपातकालीन शक्तियाँ, महत्वपूर्ण वित्तीय संसाधन और राज्यों के नाम या सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार है। यह पाठ केंद्र और राज्यों के बीच उपजे तनाव के विभिन्न पहलुओं, जैसे राज्यों द्वारा अधिक स्वायत्तता की मांग, राज्यपाल की अक्सर विवादास्पद रहने वाली भूमिका और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के राजनीतिक दुरुपयोग पर भी गंभीर प्रकाश डालता है।
इसके साथ ही, भाषाई आधार पर नए राज्यों के गठन की प्रक्रिया, अंतर्राज्यीय सीमा और जल विवादों जैसे ज्वलंत मुद्दों का भी विश्लेषण किया गया है। अंत में, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए किए गए विशेष संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भारतीय संघवाद की सफलता केवल संवैधानिक प्रावधानों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और जनता के बीच परस्पर विश्वास, सहयोग और सहनशीलता की संस्कृति पर निर्भर करती है।
अध्याय 7: संघवाद – PDF Download
अध्याय 8: स्थानीय शासन
यह अध्याय भारतीय लोकतंत्र में स्थानीय शासन के महत्त्व और उसकी संरचना पर प्रकाश डालता है। स्थानीय शासन का अर्थ है गाँव और जिला स्तर का शासन, जो आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान के लिए सबसे निकटतम निकाय है। भारत में इसका इतिहास प्राचीन ‘सभाओं’ से लेकर आधुनिक समय के लॉर्ड रिपन के सुधारों और महात्मा गांधी के सत्ता के विकेंद्रीकरण के विजन तक फैला है।
अध्याय मुख्य रूप से 1992 में पारित 73वें और 74वें संविधान संशोधनों पर केंद्रित है। 73वाँ संशोधन ग्रामीण स्थानीय शासन (पंचायती राज) से संबंधित है, जबकि 74वाँ शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिका) से। इन संशोधनों ने स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, त्रि-स्तरीय ढांचा (ग्राम, मंडल, जिला) अनिवार्य बनाया और नियमित चुनावों को सुनिश्चित किया।
एक क्रांतिकारी कदम के रूप में, महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण लागू किया गया, जिससे स्थानीय नेतृत्व में सामाजिक विविधता आई है। हालाँकि, स्थानीय शासन के सामने चुनौतियाँ भी हैं, जैसे कि वित्तीय संसाधनों के लिए राज्य और केंद्र पर निर्भरता और शक्तियों का वास्तविक हस्तांतरण न होना। निष्कर्षतः, स्थानीय शासन लोकतंत्र को अधिक सार्थक और सहभागी बनाता है जिससे जनता अपने विकास के निर्णय स्वयं ले पाती है।
अध्याय 8: स्थानीय शासन – PDF Download
अध्याय 9: संविधान : एक जीवन्त दस्तावेज
यह अध्याय भारतीय संविधान को एक ‘जीवंत दस्तावेज़’ के रूप में व्याख्यायित करता है, जिसका अर्थ है कि यह समय की बदलती परिस्थितियों और सामाजिक आकांक्षाओं के अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम है। संविधान निर्माताओं ने इस बात को स्वीकार किया था कि भविष्य में बदलाव आवश्यक होंगे, इसलिए उन्होंने संशोधन की एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जो न तो बहुत आसान है और न ही बहुत कठिन। अध्याय में संविधान संशोधन के तीन तरीकों—साधारण बहुमत, विशेष बहुमत और राज्यों की सहमति—का विस्तृत विवरण दिया गया है।
लेखक बताते हैं कि पिछले दशकों में भारतीय संविधान में कई संशोधन हुए हैं, जिनमें से कुछ तकनीकी थे, कुछ न्यायिक व्याख्याओं का परिणाम थे, तो कुछ राजनीतिक सहमति पर आधारित थे। विशेष रूप से, आपातकाल के दौरान किए गए 42वें संशोधन और उसके बाद के सुधारों की चर्चा की गई है। अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘बुनियादी संरचना का सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) है, जिसे 1973 के केशवानंद भारती मामले में न्यायपालिका द्वारा प्रतिपादित किया गया था।
यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि संसद संविधान के मूल दर्शन और लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट न कर सके। अंततः, यह अध्याय यह संदेश देता है कि संविधान की सफलता केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि न्यायपालिका की व्याख्याओं, राजनीतिक दलों की परिपक्वता और जनता के विश्वास में निहित है। यह दस्तावेज़ एक जीवित प्राणी की तरह अनुभव से सीखता है और लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
अध्याय 9: संविधान : एक जीवन्त दस्तावेज – PDF Download
अध्याय 10: संविधान का राजनीतिक दर्शन
यह अध्याय ‘संविधान का राजनीतिक दर्शन’ भारतीय संविधान के मूल आदर्शों और नैतिक बुनियाद का गहन विश्लेषण करता है। लेखक के अनुसार, संविधान केवल नियमों की पुस्तक नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो देश की राजनीतिक और सामाजिक आकांक्षाओं को दिशा देता है। इसका दर्शन स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों पर आधारित है।
भारतीय संविधान की विशिष्टता यह है कि यह व्यक्तिगत अधिकारों के साथ सामुदायिक हितों का भी संतुलन बनाता है। यहाँ धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव नहीं, बल्कि ‘सिद्धांतगत दूरी’ है, जो राज्य को धार्मिक सुधारों हेतु हस्तक्षेप की अनुमति देती है। अध्याय में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण के माध्यम से सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयासों को रेखांकित किया गया है।
इसके अतिरिक्त, भारतीय संघवाद को ‘असमतोल’ बताया गया है क्योंकि यह विभिन्न राज्यों की विशेष जरूरतों (जैसे अनुच्छेद 370 और 371) का सम्मान करता है। संविधान सभा की बहसों के महत्व पर ज़ोर देते हुए यह बताया गया है कि कैसे सर्वानुमति और तर्कबुद्धि के माध्यम से निर्णय लिए गए। यद्यपि संविधान की कुछ सीमाएँ हैं, जैसे लिंगगत न्याय की कमी और केंद्रीकृत राष्ट्रीय एकता, फिर भी यह समाज के वंचित वर्गों के सशक्तिकरण का एक प्रभावी साधन बना हुआ है।
अंततः, यह अध्याय यह संदेश देता है कि संविधान का दर्शन एक साझा भविष्य की दृष्टि है जिसे जीवित रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
अध्याय 10: संविधान का राजनीतिक दर्शन – PDF Download
🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯
⚠️ अगर उपर दी गयी कोई भी बुक डाउनलोड करने में किसी प्रकार की समस्या हो रही हो तो कमेंट करके हमें बताएं | 
Thanks! 🙏🏽
⚠️ इस पेज पर दी गयी बुक्स “Bihar Education Project” द्वारा पब्लिश की गई हैं | ऑफिसियल साईट से इन बुक्स को डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

Good
thank you @Sunny
hii
hello, how can I help you?