Bihar Board 11th EVS Book 2026 PDF Download (भारत :भौतिक पर्यावरण)
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❤️ अध्याय 1: भारत-स्थिति
यह अध्याय ‘भारत – स्थिति’ भारत के भौगोलिक विस्तार और विश्व में इसके स्थान का विस्तृत वर्णन करता है। भारत की मुख्य भूमि उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से पश्चिम में गुजरात तक फैली हुई है। इसका अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार लगभग 30 डिग्री है।
भारत का कुल क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4 प्रतिशत है, जिससे यह विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश बनता है। अध्याय में मानक समय के महत्व को समझाया गया है, जहाँ 82°30′ पूर्व देशांतर को भारत का मानक याम्योत्तर माना गया है, जो ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। भारत की विशिष्ट भौतिक विविधता, जैसे उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर, और विभिन्न नदियाँ इसे एक अद्वितीय क्षेत्रीय पहचान प्रदान करती हैं।
इसे ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश शामिल हैं। भारत की लंबी तटरेखा जो कि लगभग 7,517 किलोमीटर है और इसके पड़ोसी द्वीपीय देशों, जैसे श्रीलंका और मालदीव के साथ इसके संबंधों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह अध्याय भारत की रणनीतिक स्थिति और इसकी भौगोलिक सीमाओं के वैश्विक महत्व को प्रभावी ढंग से रेखांकित करता है।
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❤️ अध्याय 2: संरचना तथा भूआकृति विज्ञान
यह अध्याय ‘संरचना तथा भूआकृति विज्ञान’ भारत की भूवैज्ञानिक संरचना और उसके विविध भौतिक स्वरूपों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पुस्तक ‘भारत: भौतिक पर्यावरण’ का यह द्वितीय अध्याय बताता है कि भारत की वर्तमान भू-आकृति करोड़ों वर्षों के भूवैज्ञानिक विकास, प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics), और अंतर्जात व बहिर्जात बलों की अंतःक्रिया का परिणाम है। करोड़ों वर्ष पूर्व इंडियन प्लेट के भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर खिसकने से इस उपमहाद्वीप का निर्माण हुआ।
अध्याय में भारत को तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक खंडों—प्रायद्वीपीय खंड, हिमालय पर्वतमाला और सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान में विभाजित किया गया है। इसके पश्चात, देश को छह भू-आकृतिक प्रदेशों में वर्गीकृत किया गया है। हिमालय पर्वतमाला को कश्मीर, हिमाचल-उत्तराखंड, दार्जिलिंग-सिक्किम, अरुणाचल और पूर्वी पहाड़ियों के रूप में क्षेत्रीय स्तर पर समझाया गया है।
उत्तर भारत के विशाल मैदानों में भाभर, तराई, बाँगर और खादर जैसी जलोढ़ संरचनाओं का विवरण है। प्रायद्वीपीय पठार, जो भारत का सबसे प्राचीन और स्थिर भाग है, को दक्कन पठार, मध्य उच्च भूभाग और उत्तर-पूर्वी पठार में बाँटा गया है। इसके अतिरिक्त, भारतीय मरुस्थल की शुष्क स्थलाकृतियाँ, पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों की विशेषताएँ तथा लक्षद्वीप एवं अंडमान-निकोबार द्वीप समूहों के प्रवाल और ज्वालामुखी उद्गम का भी वर्णन किया गया है।
यह अध्याय भारत की भौगोलिक विविधता और पारिस्थितिक तंत्र को समझने हेतु एक आधार प्रदान करता है।
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❤️ अध्याय 3: अपवाह तंत्र
यह अध्याय ‘अपवाह तंत्र’ भारत की महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों का एक विस्तृत भौगोलिक विवरण प्रस्तुत करता है। भूगोल की दृष्टि से, निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से होने वाले जल प्रवाह को ‘अपवाह’ और इनके संगठित जाल को ‘अपवाह तंत्र’ कहा जाता है। भारतीय नदियों को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है: हिमालयी अपवाह और प्रायद्वीपीय अपवाह।
हिमालयी नदियाँ, जिनमें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र शामिल हैं, बारहमासी हैं क्योंकि इन्हें वर्षा के साथ-साथ बर्फ पिघलने से भी जल प्राप्त होता है। ये नदियाँ पहाड़ों में गहरे महाखड्ड (gorges) बनाती हैं और मैदानों में आकर सर्पाकार मार्ग अपनाती हैं। इसके विपरीत, प्रायद्वीपीय नदियाँ जैसे गोदावरी, कृष्णा और कावेरी अधिक पुरानी हैं और मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर होने के कारण मौसमी हैं।
नर्मदा और तापी जैसी नदियाँ भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं और ज्वारनदमुख (estuaries) बनाती हैं। अध्याय में नदी बहाव प्रवृत्ति (River regime) के माध्यम से जल के मौसमी वितरण को भी समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, यह नदियों के बढ़ते प्रदूषण, जल प्रबंधन की चुनौतियों और नदी जोड़ो जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर प्रकाश डालता है।
लेख का मुख्य संदेश नदियों के संरक्षण और उनके जल के कुशल उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करना है, ताकि बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
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❤️ अध्याय 4: जलवायु
यह अध्याय भारत की जलवायु, उसके विविध कारकों और मानसूनी तंत्र का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जलवायु का तात्पर्य लंबे समय की मौसमी दशाओं के औसत से होता है, जबकि मौसम क्षणिक अवस्था है। भारत की जलवायु ‘उष्ण मानसूनी’ है, जिसे अक्षांश, हिमालय पर्वत, समुद्र से दूरी और उच्चावच जैसे कारक प्रभावित करते हैं।
भारतीय मानसून की क्रियाविधि में ‘अंतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र’ (ITCZ), जेट प्रवाह और एल-निनो जैसी वायुमंडलीय परिघटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्याय के अनुसार, भारतीय वर्ष को चार मुख्य ऋतुओं में बाँटा गया है: शीत, ग्रीष्म, दक्षिण-पश्चिमी मानसून और मानसून का निवर्तन। ग्रीष्म ऋतु में ‘लू’ और ‘काल बैसाखी’ जैसे स्थानीय तूफान चलते हैं, जबकि वर्षा ऋतु में देश के अधिकांश भागों में मूसलाधार बारिश होती है।
मानसून की दो शाखाएं—अरब सागर और बंगाल की खाड़ी—भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण सुनिश्चित करती हैं। अध्याय में कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की भी व्याख्या की गई है, जो तापमान और वर्षा पर आधारित है। अंततः, इसमें भूमंडलीय तापन के गंभीर प्रभावों, जैसे हिमानियों का पिघलना और समुद्र तल का बढ़ना, के प्रति चेतावनी दी गई है।
संक्षेप में, मानसून भारत के आर्थिक जीवन और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था का आधार है।
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❤️ अध्याय 5: प्राकृतिक वनस्पति
यह अध्याय ‘प्राकृतिक वनस्पति’ भारत में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के वनों और वन्य जीवन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें मुख्य रूप से पाँच प्रकार की वनस्पतियों की चर्चा की गई है: उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्ध-सदाबहार वन, उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती (मानसून) वन, उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन, पर्वतीय वन और वेलांचली व अनूप (मैंग्रोव) वन। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि भारत की जलवायु और मिट्टी की विविधता के कारण वनस्पति में क्षेत्रीय भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
अध्याय वनों के आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें 1988 की संशोधित वन संरक्षण नीति के प्रमुख उद्देश्यों, जैसे 33% वन क्षेत्र का लक्ष्य और जैव विविधता का संरक्षण, का विस्तृत वर्णन है। साथ ही, सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी और फार्म वानिकी जैसी योजनाओं के माध्यम से वन क्षेत्र के विस्तार की आवश्यकता को समझाया गया है।
वन्य जीव संरक्षण के संदर्भ में ‘वन्य प्राणी अधिनियम 1972’, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ जैसी महत्वपूर्ण सरकारी पहलों का उल्लेख किया गया है। अंत में, भारत के प्रमुख ‘जीव मंडल निचय’ (जैसे नीलगिरी, नंदा देवी, सुंदर वन और मन्नार की खाड़ी) की विशेषताओं और उनके महत्व पर बल दिया गया है। यह अध्याय सिखाता है कि पारिस्थितिक संतुलन के लिए वनों और वन्य जीवों का संरक्षण अनिवार्य है।
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❤️ अध्याय 6: मृदा
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❤️ अध्याय 7: प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ
यह अध्याय ‘प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ’ भारत में होने वाली विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं, उनके मूल कारणों, व्यापक परिणामों और उनके प्रभावी प्रबंधन का एक विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आपदाओं को ऐसी अनपेक्षित, तीव्र और विध्वंसक घटनाओं के रूप में परिभाषित किया गया है जो मानव नियंत्रण से सर्वथा बाहर होती हैं और बड़े पैमाने पर जान-माल की अपूरणीय क्षति पहुँचाती हैं। पुस्तक के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं को मुख्य रूप से चार विस्तृत श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: वायुमंडलीय (जैसे चक्रवात, सूखा और बर्फानी तूफान), भौमिक (भूकंप, ज्वालामुखी और भू-स्खलन), जलीय (बाढ़, सुनामी और ज्वार), तथा जैविक (कीट ग्रसन और संक्रमण)।
भारत की विशाल भौगोलिक स्थिति, पर्यावरणीय विविधता और सघन जनसंख्या इसे भूकंप, भीषण बाढ़, लंबे सूखे और विनाशकारी चक्रवातों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। विशेष रूप से हिमालयी राज्य भूकंप और भू-स्खलन के लिए, जबकि तटीय राज्य चक्रवात और सुनामी के लिए सुभेद्य हैं। अध्याय में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों, जैसे 1994 की ‘यॉकोहामा रणनीति’ का विशेष उल्लेख किया गया है, जो एक सुरक्षित संसार के लिए आपदा न्यूनीकरण के वैश्विक संकल्प को दर्शाती है।
भारत ने भी इस दिशा में ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ पारित किया और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की स्थापना की। आपदा प्रबंधन के तीन निर्णायक चरण स्पष्ट किए गए हैं: आपदा पूर्व की तैयारी, आपदा के दौरान बचाव कार्य, तथा आपदा के पश्चात पुनर्वास। अंततः, यह अध्याय निष्कर्ष निकालता है कि यद्यपि प्राकृतिक प्रकोपों को रोकना हमारे वश में नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक नियोजन, उन्नत चेतावनी प्रणालियों और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से उनके घातक प्रभाव को न्यूनतम किया जा सकता है।
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