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Bihar Board 11th Economics Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 17, 2026 by bseb 7 Comments

Students studying in Bihar Board Class 11 can use this page to get complete details about the Bihar Board 11th Economics Book 2026 PDF Download. The Economics textbook prescribed by the Bihar Board helps students understand basic economic concepts and builds a strong foundation for higher studies.

Details Information
Board Bihar Board (BSEB)
Class 11th
Subject Economics
Academic Year 2025–26
Material Type Textbook / Study Material
Syllabus Latest Bihar Board Syllabus
Format PDF
Availability PDF Download Links Available

This page provides study materials (Economics books) in PDF format with direct download links, prepared according to the latest Bihar Board syllabus. These books are useful for regular study as well as exam preparation.

Bihar Board 11th Economics Book 2026 PDF Download  (भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास)

इस पेज पर बिहार बोर्ड के छात्रों के लिए “Class XI: Economics (भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास)” दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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Bihar Board 12th Economics Book in Hindi

प्रस्तावना

यह पुस्तक ‘भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास’ कक्षा 11 के छात्रों के लिए एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं, चुनौतियों और विकास की नीतियों से परिचित कराना है। पुस्तक में स्वतंत्रता के समय की आर्थिक स्थिति से लेकर 1991 के आर्थिक सुधारों तक का विस्तृत वर्णन है।

इसमें दस अध्याय हैं जो चार इकाइयों में विभाजित हैं। पहली इकाई में 1947-90 के बीच की विकास नीतियों और अनुभवों पर चर्चा की गई है, जिसमें स्वतंत्रता पूर्व संध्या की अर्थव्यवस्था और पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्यों को समझाया गया है। दूसरी इकाई आर्थिक सुधारों (1991 से) पर केंद्रित है।

तीसरी इकाई वर्तमान चुनौतियों जैसे निर्धनता, मानव पूँजी निर्माण, ग्रामीण विकास, रोजगार और पर्यावरण पर प्रकाश डालती है। अंतिम इकाई में भारत और उसके पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) के विकास अनुभवों की तुलना की गई है। यह पुस्तक न केवल सैद्धांतिक जानकारी देती है बल्कि क्रियात्मक गतिविधियों के माध्यम से छात्रों को आंकड़ों के विश्लेषण और आर्थिक घटनाओं के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास करती है।

यह छात्रों को देश के आर्थिक संसाधनों, कृषि, उद्योग और व्यापार नीतियों को समझने में मदद करती है, जिससे वे भविष्य के आर्थिक घटनाक्रमों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकें।

प्रस्तावना – PDF Download


अध्याय 1: स्वतंत्रता के पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

यह अध्याय 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति का विस्तृत विश्लेषण करता है। ब्रिटिश शासन के लगभग दो सौ वर्षों के दौरान, भारत की आर्थिक नीतियां केवल ब्रिटेन के हितों को साधने के लिए बनाई गई थीं। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का प्रदायक और उनके निर्मित उत्पादों के लिए एक विशाल बाजार बनाना था।

कृषि क्षेत्र, जो देश की 85% जनसंख्या की आजीविका का स्रोत था, पूरी तरह गतिहीन था। जमींदारी व्यवस्था ने किसानों का शोषण किया और निवेश के अभाव में उत्पादकता अत्यंत निम्न रही। औद्योगिक स्तर पर, भारत के विश्वविख्यात हस्तशिल्प उद्योगों का पतन कर दिया गया और टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी जैसी कुछ अपवादों को छोड़कर आधुनिक उद्योगों का आधार बहुत कमजोर था।

विदेशी व्यापार पूरी तरह इंग्लैंड के नियंत्रण में था और ‘निर्यात अधिशेष’ का उपयोग भारत के विकास के बजाय ब्रिटिश खर्चों को पूरा करने में किया गया। जनांकिकीय रूप से, भारत अत्यधिक गरीबी, उच्च शिशु मृत्यु दर और मात्र 16% साक्षरता दर से जूझ रहा था। हालांकि रेलवे और डाक-तार जैसी आधारभूत संरचनाओं की शुरुआत हुई, लेकिन इनका उद्देश्य जनहित के बजाय औपनिवेशिक सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण को सुदृढ़ करना था।

निष्कर्षतः, स्वतंत्रता के समय विरासत में मिली अर्थव्यवस्था अत्यंत जर्जर और चुनौतीपूर्ण थी।

अध्याय 1: स्वतंत्रता के पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था – PDF Download


अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-90)

यह अध्याय 1950 से 1990 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के क्रमिक विकास और नीतिगत परिवर्तनों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय नेताओं, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू ने समाजवाद से प्रेरित होकर ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ के मॉडल को अपनाया। 1950 में योजना आयोग की स्थापना के साथ ही पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश के विकास का खाका तैयार किया गया।

इन योजनाओं के चार प्रमुख उद्देश्य थे: संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता। कृषि क्षेत्र में पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बिचौलियों का अंत, भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण और काश्तकारों को मालिकाना हक देने जैसे भू-सुधार किए गए। 1960 के उत्तरार्ध में आई ‘हरित क्रांति’ ने उच्च पैदावार वाले बीजों और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया।

औद्योगिक क्षेत्र में 1956 के प्रस्ताव ने सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुखता दी, जबकि निजी क्षेत्र को लाइसेंस राज के जरिए नियंत्रित किया गया। व्यापार में ‘आयात प्रतिस्थापन’ की अंतर्मुखी नीति अपनाई गई ताकि घरेलू उद्योग सशक्त हो सकें। हालांकि 1990 तक भारत ने औद्योगिक विविधता और कृषि में सफलता हासिल की, लेकिन सरकारी उद्यमों की अकुशलता और अत्यधिक लालफीताशाही ने आर्थिक विकास को बाधित किया।

इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से 1991 में नई आर्थिक नीति को लागू किया गया।

अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-90) – PDF Download


अध्याय 3: उदारीकरण, निजीकरण और वैशवीकरण: एक समीक्षा

यह अध्याय 1991 में भारत में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों, जिन्हें ‘नई आर्थिक नीति’ के रूप में जाना जाता है, का विस्तृत विश्लेषण करता है। 1980 के दशक के अंत में, भारत एक गंभीर राजकोषीय संकट और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रहा था, जिसके कारण सरकार को विश्व बैंक और आई.एम.एफ. से ऋण लेना पड़ा।

बदले में, भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) की नीतियों को अपनाया। उदारीकरण के तहत औद्योगिक लाइसेंसिंग व्यवस्था को समाप्त किया गया और वित्तीय, कर तथा व्यापारिक क्षेत्रों में नियंत्रण कम किए गए। निजीकरण के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी कम की गई (विनिवेश) ताकि कार्यकुशलता बढ़ सके।

वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को शेष विश्व के साथ एकीकृत किया, जिससे ‘बाह्य प्रापण’ (आउटसोर्सिंग) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि हुई। सुधारों के सकारात्मक परिणामों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की उच्च संवृद्धि दर, विदेशी मुद्रा भंडार का बढ़ना और भारत का एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरना शामिल है। हालांकि, इन सुधारों की आलोचना भी हुई है क्योंकि इन्होंने कृषि क्षेत्र और रोजगार सृजन पर ध्यान नहीं दिया।

सार्वजनिक व्यय में कमी और विदेशी स्पर्धा के कारण लघु उद्योगों और किसानों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा। निष्कर्षतः, सुधारों ने आर्थिक विकास को तो गति दी, लेकिन समावेशी विकास और सामाजिक कल्याण के लक्ष्यों में विषमताएं भी पैदा कीं।

अध्याय 3: उदारीकरण, निजीकरण और वैशवीकरण: एक समीक्षा – PDF Download


अध्याय 4: निर्धनता

यह अध्याय ‘निर्धनता’ भारत में आर्थिक विकास की वर्तमान चुनौतियों का गहन विश्लेषण करता है। निर्धनता को एक बहुआयामी समस्या के रूप में देखा गया है, जहाँ व्यक्ति न केवल न्यूनतम आय, बल्कि बुनियादी स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छ पेयजल जैसी सुविधाओं से भी वंचित रहता है। निर्धनता का वर्गीकरण चिरकालिक, अल्पकालिक और गैर-निर्धन समूहों में किया गया है।

भारत में ‘निर्धनता रेखा’ का निर्धारण न्यूनतम कैलोरी उपभोग के आधार पर होता है—ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी। निर्धनता के ऐतिहासिक कारणों में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ वि-औद्योगीकरण और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन प्रमुख है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, निम्न पूंजी निर्माण, जनसंख्या का तीव्र दबाव, मुद्रास्फीति और संसाधनों का असमान वितरण इस समस्या को निरंतर बनाए रखते हैं।

सरकार ने इसे हल करने हेतु त्रि-आयामी नीति अपनाई है: प्रथम, जीडीपी में वृद्धि हेतु संवृद्धि आधारित रणनीति; द्वितीय, स्वरोजगार और मजदूरी आधारित कार्यक्रम जैसे मनरेगा और स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना; और तृतीय, सार्वजनिक व्यय के माध्यम से न्यूनतम आधारभूत सुविधाएं प्रदान करना। समीक्षा के अनुसार, यद्यपि निर्धनों के अनुपात में 1973 से 2012 के बीच महत्वपूर्ण गिरावट आई है, किंतु भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और संसाधनों के कुप्रबंधन के कारण ये लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँच पाए हैं। वास्तविक सुधार हेतु निर्धनों का सामाजिक सशक्तिकरण और उनकी सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

अध्याय 4: निर्धनता – PDF Download


अध्याय 5: भारत में मानव पूंजी का निर्माण

यह अध्याय ‘भारत में मानव पूँजी का निर्माण’ मानव संसाधनों को एक उत्पादक परिसंपत्ति में परिवर्तित करने की प्रक्रिया और उसके महत्व को गहराई से रेखांकित करता है। इसमें बताया गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल प्रशिक्षण, प्रवसन और सूचना के माध्यम से मानव पूँजी का प्रभावी निर्माण होता है। शिक्षा न केवल व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और आय उपार्जन की क्षमता बढ़ाती है, बल्कि यह देश की समग्र आर्थिक संवृद्धि में भी निर्णायक योगदान देती है।

इसी प्रकार, स्वस्थ श्रमिक अधिक कुशलता और बिना किसी व्यवधान के कार्य कर सकते हैं, जिससे राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है। अध्याय ‘मानव पूँजी’ और ‘मानव विकास’ के सूक्ष्म अंतर को भी स्पष्ट करता है, जहाँ मानव विकास व्यक्ति के कल्याण को ही अंतिम साध्य मानता है। भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि यद्यपि साक्षरता दर में सराहनीय सुधार हुआ है, परंतु 6 प्रतिशत जीडीपी लक्ष्य की प्राप्ति अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

राइट टू एजुकेशन और शिक्षा उपकर जैसी सरकारी पहलों के बावजूद भारत में शिक्षित युवाओं के बीच बेरोजगारी और उच्च शिक्षा संस्थानों में कम नामांकन चिंता का विषय है। अंततः, भारत के पास वैज्ञानिक और तकनीकी जनशक्ति का जो विशाल भंडार है, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सही निवेश नीतियों द्वारा एक सुदृढ़ ज्ञान अर्थव्यवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है। यह विकास प्रक्रिया में समता और संवृद्धि दोनों के लिए अनिवार्य है।

अध्याय 5: भारत में मानव पूंजी का निर्माण – PDF Download


अध्याय 6: ग्रामीण विकास

यह अध्याय भारत के सर्वांगीण विकास में ग्रामीण विकास के महत्व और उसकी चुनौतियों पर गहराई से प्रकाश डालता है। महात्मा गांधी के इस विचार को रेखांकित किया गया है कि ‘भारत की वास्तविक प्रगति गांवों के विकास से है’। चूंकि देश की दो-तिहाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और एक बड़ा हिस्सा निर्धनता में रहता है, इसलिए ग्रामीण विकास राष्ट्रीय प्रगति का केंद्र है।

अध्याय ग्रामीण विकास को एक व्यापक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करता है जिसमें साक्षरता, स्वास्थ्य, भूमि सुधार और बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है। अध्याय के मुख्य केंद्र बिंदु ‘ग्रामीण साख’ और ‘कृषि विपणन’ हैं। किसानों को ऋण जाल से निकालने के लिए 1982 में नाबार्ड की स्थापना और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है।

कृषि विपणन में सुधार के लिए सरकार द्वारा विनियमित मंडियों, भंडारण सुविधाओं और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियों पर चर्चा की गई है। इसके अलावा, आजीविका में स्थिरता लाने हेतु कृषि विविधीकरण जैसे पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी और जैविक कृषि को भविष्य के धारणीय विकास के लिए अनिवार्य माना गया है।

निष्कर्षतः, ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक गतिविधियों और आधुनिक संचार माध्यमों के समन्वय से ही एक समृद्ध भारत का निर्माण संभव है।

अध्याय 6: ग्रामीण विकास – PDF Download


अध्याय 7: रोजगार संवृद्धि अनौपचारीकरण अवं अन्य मुद्दे

यह अध्याय भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दों’ पर व्यापक प्रकाश डालता है। कार्य न केवल व्यक्तिगत आजीविका का साधन है, बल्कि यह देश की राष्ट्रीय आय में सक्रिय योगदान और व्यक्ति को सामाजिक सार्थकता का अनुभव कराने का माध्यम भी है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाली समस्त आर्थिक क्रियाओं में संलग्न व्यक्तियों को ‘श्रमिक’ की संज्ञा दी गई है।

भारत में श्रमबल की प्रकृति बहुमुखी है, जिसमें स्वरोजगार आजीविका का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। अध्याय में ‘श्रमबल के अनियतीकरण’ और ‘अनौपचारीकरण’ जैसी महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया गया है। वर्तमान में देश का लगभग 94% श्रमबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जो सामाजिक सुरक्षा और नियमित आय से वंचित है।

इसके अतिरिक्त, कृषि क्षेत्र में ‘प्रच्छन्न’ और ‘मौसमी’ बेरोजगारी की समस्या अत्यंत गंभीर है। आर्थिक विकास के बावजूद, भारत ‘रोजगारहीन संवृद्धि’ (jobless growth) की स्थिति का सामना कर रहा है, जहाँ सकल घरेलू उत्पाद तो बढ़ रहा है परंतु पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं हो रहे हैं। सरकार ने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) जैसी कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन योजनाएँ शुरू की हैं।

निष्कर्षतः, बदलते आर्थिक परिवेश और सेवा क्षेत्र के विस्तार के बावजूद, श्रमिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भविष्य की मुख्य चुनौती है।

अध्याय 7: रोजगार संवृद्धि अनौपचारीकरण अवं अन्य मुद्दे – PDF Download


अध्याय 8: आधारिक संरचना

यह अध्याय ‘आधारिक संरचना’ (Infrastructure) के महत्व और भारत में इसकी वर्तमान स्थिति का विस्तृत विश्लेषण करता है। आधारिक संरचना किसी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास की रीढ़ होती है, जो कृषि, उद्योग और व्यापार को सहयोगी सेवाएं प्रदान करती है। इसमें सड़क, रेल, ऊर्जा और दूरसंचार जैसे आर्थिक घटकों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे सामाजिक घटकों को शामिल किया गया है।

भारत के समृद्ध राज्यों जैसे पंजाब और महाराष्ट्र की प्रगति का मुख्य आधार उनकी सुदृढ़ आधारिक संरचना ही है। अध्याय में ऊर्जा के स्रोतों—व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक—के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है। भारत में बिजली क्षेत्र उत्पादन क्षमता की कमी, चोरी और वितरण हानि जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र की चर्चा करते हुए लेखक बताते हैं कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था (प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक) मौजूद है। यद्यपि देश ने चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों पर विजय प्राप्त की है, किंतु ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी असंतुलन बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक उपकरणों और डॉक्टरों की उपलब्धता अत्यंत सीमित है।

इसके अलावा, महिलाओं में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और चिकित्सा पर्यटन की उभरती संभावनाएं भी चर्चा का विषय हैं। निष्कर्षतः, एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के कुशल संचालन और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार के लिए व्यापक निवेश और सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता है।

अध्याय 8: आधारिक संरचना – PDF Download


अध्याय 9: पर्यावरण और धारणीय विकास

यह अध्याय ‘पर्यावरण और धारणीय विकास’ भारत की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में पर्यावरणीय चुनौतियों और भविष्य की विकास रणनीतियों का गहन विश्लेषण करता है। पर्यावरण को उन सभी जैविक और अजैविक घटकों की समग्रता के रूप में परिभाषित किया गया है जो जीवन को सहारा देते हैं। इसके मुख्य कार्यों में संसाधनों की आपूर्ति, अपशिष्ट का समावेशन, जीवन का पोषण और सौंदर्य सेवाएं प्रदान करना शामिल है।

अध्याय बताता है कि कैसे जनसंख्या विस्फोट और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण ने पर्यावरण की ‘धारण क्षमता’ पर दबाव डाला है। पूर्व में संसाधनों की मांग उनकी पुनर्जनन दर से कम थी, लेकिन अब यह स्थिति उलट गई है, जिससे वैश्विक उष्णता और ओजोन क्षय जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हुई हैं। भारत में मृदा अपरदन, वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

धारणीय विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना वर्तमान जरूरतों को पूरा करे। इसके लिए सौर ऊर्जा, पवन शक्ति, ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस और शहरों में सीएनजी जैसे ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों को अपनाने की आवश्यकता है। साथ ही, जैविक खेती और पारंपरिक ज्ञान का पुनरुद्धार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं ताकि संसाधनों का संरक्षण हो सके और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ ग्रह प्राप्त हो सके।

अध्याय 9: पर्यावरण और धारणीय विकास – PDF Download


अध्याय 10: भारत और उसके पड़ोसी देशो के तुलनात्मक विकास अनुभव

यह अध्याय भारत और उसके प्रमुख पड़ोसी देशों, चीन और पाकिस्तान, के तुलनात्मक विकास अनुभवों का एक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। तीनों देशों ने 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध में अपनी विकास यात्रा शुरू की और नियोजित विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाया। आर्थिक सुधारों की समयरेखा अलग रही है: चीन ने 1978 में, पाकिस्तान ने 1988 में और भारत ने 1991 में सुधार प्रक्रिया शुरू की।

अध्याय जनांकिकीय संकेतकों, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की संवृद्धि और मानव विकास सूचकांकों के आधार पर तीनों राष्ट्रों की तुलना करता है। चीन ने अपनी ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ जैसी नीतियों और बाद में बाजार-आधारित सुधारों के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की, जिससे वह मानव विकास संकेतकों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी निवारण में भारत और पाकिस्तान से काफी आगे निकल गया है। दूसरी ओर, पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी ऋणों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण विकास की गति में गिरावट देखी गई।

भारत ने अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ सेवा क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाई है, लेकिन गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी अब भी बड़ी चुनौतियां हैं। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि आर्थिक सफलता के लिए न केवल सही नीतियों का चुनाव आवश्यक है, बल्कि उनका कुशल कार्यान्वयन और राजनीतिक स्थिरता भी अनिवार्य है। यह तुलना विकासशील देशों को एक-दूसरे की रणनीतियों से सीखने का अवसर प्रदान करती है।

अध्याय 10: भारत और उसके पड़ोसी देशो के तुलनात्मक विकास अनुभव – PDF Download

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Comments

  1. BHANNUKUMARSINGH says

    June 9, 2023 at 3:54 am

    I am arts ki Sabhi kitaben chahie

    Reply
    • bseb says

      September 10, 2023 at 10:09 am

      hey @Bhanu, You can find all subjects’ books on this site.

      Reply
    • Aarif Khan says

      August 15, 2024 at 1:24 pm

      Main iski hardcover kaise le sakta hu ??

      Reply
      • bseb says

        September 15, 2024 at 3:53 am

        hey @Aarif, aap inko print kara sakte hain

        Reply
  2. Amit Yadav says

    August 4, 2023 at 9:49 am

    Bahot badiya thanks dear

    Reply
    • bseb says

      August 26, 2023 at 11:21 am

      Welcome @Yadav Ji💖

      Reply
  3. Kajal says

    June 15, 2025 at 12:39 am

    l find economic unit 1,2 books class -11 in English language

    Reply

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