Students of Bihar Board Class 11 can find complete details about the Bihar Board 11th Business Studies Book 2026 PDF Download on this page. The Business Studies textbook prescribed by the Bihar Board helps students understand the basics of business, management, and entrepreneurship.
| Details | Information |
|---|---|
| Board | Bihar Board (BSEB) |
| Class | 11th |
| Subject | Business Studies |
| Academic Year | 2025–26 |
| Material Type | Textbook / Study Material |
| Syllabus | Latest Bihar Board Syllabus |
| Format | |
| Availability | PDF Download Links Available |
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Bihar Board 11th Business Studies Book 2026 PDF Download (व्यवसाय अध्ययन)
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Class XI: Business Studies (व्यवसाय अध्ययन) PDF Free Download
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Bihar Board 12th Business Studies Book in Hindi
प्रस्तावना
यह पाठ्यपुस्तक कक्षा 11 के विद्यार्थियों के लिए ‘व्यवसाय अध्ययन’ विषय पर आधारित है, जिसे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह पुस्तक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) के सिद्धांतों का व्यापक पालन करती है, जिसका मुख्य और प्राथमिक उद्देश्य बच्चों के स्कूली जीवन को बाहरी वास्तविक जीवन से जोड़ना और पारंपरिक शिक्षा को रटंत प्रणाली के बोझ से पूरी तरह मुक्त करना है।
यह पुस्तक मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में विभाजित है और इसमें कुल 12 विस्तृत अध्याय शामिल किए गए हैं। पहले भाग ‘व्यवसाय के आधार’ के अंतर्गत व्यवसाय की प्रकृति, उद्देश्य, व्यावसायिक संगठन के विभिन्न स्वरूप, निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम, व्यावसायिक सेवाएँ, व्यवसाय की आधुनिक उभरती पद्धतियाँ और व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा की गई है।
पुस्तक का दूसरा भाग ‘व्यावसायिक संगठन, वित्त एवं व्यापार’ कंपनी निर्माण की प्रक्रिया, व्यावसायिक वित्त के विभिन्न स्रोतों, लघु व्यवसाय, आंतरिक व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के जटिल पहलुओं को सरल भाषा में समझाने का प्रयास करता है। यह पुस्तक केवल सैद्धांतिक जानकारी प्रदान करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विद्यार्थियों की व्यावहारिक समझ को बढ़ाने के लिए वास्तविक व्यावसायिक उदाहरणों, प्रासंगिक केस अध्ययनों और रचनात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है।
इसका अंतिम उद्देश्य विद्यार्थियों में व्यावसायिक वातावरण के प्रति एक गहरी समझ विकसित करना और उन्हें भविष्य की आधुनिक आर्थिक एवं व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना है। यह शिक्षकों को भी निरंतर प्रेरित करती है कि वे विद्यार्थियों को मात्र सूचनाओं का निष्क्रिय ग्राहक मानने के बजाय उन्हें ज्ञान के सक्रिय निर्माता बनने में भरपूर सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान करें।
अध्याय 1: व्यवसाय, व्यापार और वाणिज्य
यह अध्याय ‘व्यवसाय की प्रकृति एवं उद्देश्य’ व्यवसाय की बुनियादी अवधारणाओं, इसके विकास और आधुनिक समाज में इसकी भूमिका का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। व्यवसाय को एक ऐसी निरंतर आर्थिक क्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन, क्रय-विक्रय या विनिमय किया जाता है। इसकी मुख्य विशेषताओं में आर्थिक उद्देश्य, प्रतिफल की अनिश्चितता, और जोखिम का तत्व प्रमुखता से शामिल हैं।
अध्याय में मानवीय आर्थिक क्रियाओं को तीन श्रेणियों—व्यवसाय, पेशा और रोजगार—में विभाजित कर उनके बीच अंतर स्पष्ट किया गया है। व्यावसायिक गतिविधियों का व्यापक वर्गीकरण ‘उद्योग’ और ‘वाणिज्य’ के रूप में किया गया है। उद्योग को प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण, प्रसंस्करण और निर्माण कार्यों (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) में बांटा गया है।
वहीं, वाणिज्य के अंतर्गत व्यापार और व्यापार के सहायकों जैसे बैंकिंग, परिवहन, बीमा और विज्ञापन की भूमिका समझाई गई है, जो व्यवसाय के सुचारू संचालन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। व्यवसाय के उद्देश्यों के संदर्भ में, लाभार्जन को व्यवसाय की निरंतरता के लिए अनिवार्य बताया गया है, लेकिन साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्व, नवप्रवर्तन और कुशल प्रबंधन पर भी समान बल दिया गया है। व्यावसायिक जोखिमों की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उनके प्राकृतिक, मानवीय और आर्थिक कारणों का विश्लेषण किया गया है।
अंत में, एक नया उद्यम स्थापित करते समय ध्यान रखने योग्य मूलभूत कारकों, जैसे व्यवसाय के स्वरूप का चयन, संयंत्र का स्थान, पूंजी की व्यवस्था और कुशल कार्यबल के नियोजन पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया गया है। यह अध्याय विद्यार्थियों को व्यावसायिक जगत की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने में मदद करता है।
अध्याय 1: व्यवसाय, व्यापार और वाणिज्य – PDF Download
अध्याय 2: व्यावसायिक संगठन के स्वरुप
यह अध्याय ‘व्यावसायिक संगठन के स्वरूप’ विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक संगठनों के ढाँचों का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। इसमें मुख्य रूप से पाँच प्रमुख स्वरूपों की विस्तार से चर्चा की गई है: एकल स्वामित्व, संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय, साझेदारी, सहकारी समिति और संयुक्त पूंजी कंपनी। एकल स्वामित्व व्यवसाय का सबसे सरल और सुलभ स्वरूप है जहाँ एक ही व्यक्ति व्यवसाय की पूँजी लगाता है, उसका प्रबंधन करता है और सारा जोखिम उठाता है।
हालाँकि यह त्वरित निर्णय लेने में सक्षम है, लेकिन स्वामी का असीमित दायित्व इसकी एक प्रमुख सीमा है। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय भारत की एक विशिष्ट प्रणाली है, जहाँ परिवार के सदस्य जन्म से ही व्यवसाय के सदस्य बन जाते हैं और ‘कर्ता’ प्रबंधन संभालता है। साझेदारी के अंतर्गत दो या अधिक व्यक्ति मिलकर पूँजी लगाते हैं और लाभ-हानि साझा करते हैं, जो सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।
सहकारी समितियाँ सदस्यों के पारस्परिक सहयोग और कल्याण के लिए गठित की जाती हैं, जिसका उद्देश्य बिचौलियों को हटाना होता है। संयुक्त पूंजी कंपनी एक विशाल व्यावसायिक इकाई है जो कानून द्वारा एक कृत्रिम व्यक्ति के रूप में पहचानी जाती है; इसका शाश्वत अस्तित्व होता है और यह बड़े स्तर पर संसाधनों को जुटाने में सक्षम है। अंततः, यह अध्याय इन सभी स्वरूपों के लक्षणों, गुणों और सीमाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
यह छात्रों और उद्यमियों को उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं, वित्तीय संसाधनों और जोखिम वहन क्षमता के अनुसार सर्वोत्तम विकल्प चुनने में मार्गदर्शन करता।
अध्याय 2: व्यावसायिक संगठन के स्वरुप – PDF Download
अध्याय 3: निजी, सार्वजानिक एवं भूमंडलीय उपक्रम
यह अध्याय ‘निजी, सार्वजनिक एवं भूमंडलीय उपक्रम’ भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न व्यावसायिक संगठनों के ढाँचे और उनके महत्त्व को गहराई से स्पष्ट करता है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद एक ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ को अपनाया है, जहाँ राष्ट्र के समग्र विकास के लिए निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
इस अध्याय में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: पहला, विभागीय उपक्रम जो सीधे सरकारी मंत्रालय के नियंत्रण में होते हैं; दूसरा, वैधानिक निगम जो संसद के विशेष अधिनियम द्वारा गठित किए जाते हैं; और तीसरा, सरकारी कंपनियाँ जिनमें सरकार की चुकता पूँजी कम से कम 51 प्रतिशत होती है। अध्याय में 1991 की नई औद्योगिक नीति के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की बदलती भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें विनिवेश, निजीकरण और उदारीकरण जैसी प्रक्रियाओं को महत्त्व दिया गया है।
इसके साथ ही, यह भूमंडलीय उपक्रमों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) की कार्यप्रणाली का वर्णन करता है, जो अपनी विशाल पूँजी, उन्नत तकनीक और आक्रामक विपणन रणनीतियों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करती हैं। संयुक्त उपक्रम (Joint Ventures) की अवधारणा को भी समझाया गया है, जहाँ दो या दो से अधिक व्यावसायिक इकाइयाँ संसाधनों, तकनीकी विशेषज्ञता और जोखिमों को साझा करने के लिए गठबंधन करती हैं।
इससे न केवल उत्पादन लागत में कमी आती है, बल्कि नए वैश्विक बाज़ारों तक पहुँच भी सुगम होती है। यह अध्याय विद्यार्थियों को वर्तमान प्रतिस्पर्धी युग में विभिन्न उद्यमों के अंतर्संबंधों और देश के आर्थिक उत्थान में उनके योगदान को समझने में मदद करता है।
अध्याय 3: निजी, सार्वजानिक एवं भूमंडलीय उपक्रम – PDF Download
अध्याय 4: व्यावसायिक सेवाएँ
यह अध्याय ‘व्यावसायिक सेवाएँ’ आधुनिक व्यवसाय के संचालन में सहायक सेवाओं के महत्व पर प्रकाश डालता है। पेट्रोल पंप के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि व्यवसाय परिवहन, भंडारण, संप्रेषण, बैंकिंग और बीमा के बिना कार्य नहीं कर सकता।
सेवाओं की प्रकृति को पांच विशेषताओं: अमूर्तता, विभिन्नरूपता, अभिन्नता, इन्वेंट्री का अभाव और ग्राहक संबद्धता के माध्यम से समझाया गया है। अध्याय बैंकिंग सेवाओं के तहत वाणिज्यिक, सहकारी, विशिष्ट और केंद्रीय बैंकों के कार्यों को विस्तार से बताता है और ई-बैंकिंग के फायदों पर जोर देता है।
बीमा अनुभाग जीवन, अग्नि और समुद्री बीमा के सिद्धांतों जैसे पूर्ण सद्विश्वास, बीमायोग्य हित और क्षतिपूर्ति की व्याख्या करता है। संप्रेषण सेवाओं में डाक और दूरसंचार सेवाओं जैसे मोबाइल, वी-सैट और डीटीएच के महत्व को रेखांकित किया गया है।
परिवहन को व्यवसाय की ‘जीवन रेखा’ बताया गया है जो स्थान की बाधा दूर करती है, जबकि भंडारण के प्रकारों (निजी, सार्वजनिक, बंधक माल गोदाम) को वस्तुओं के सुरक्षित संग्रहण और मूल्य वर्धन के लिए आवश्यक बताया गया है। समग्र रूप से, यह अध्याय व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने वाली इन सेवाओं का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है और छात्रों को आधुनिक व्यावसायिक वातावरण समझने में मदद करता है।
अध्याय 4: व्यावसायिक सेवाएँ – PDF Download
अध्याय 5: व्यवसाय की उभरती पद्यतियाँ
यह अध्याय ‘व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ’ आधुनिक युग में व्यापार करने के बदलते तरीकों, विशेष रूप से ई-व्यवसाय और बाह्यस्रोतीकरण (आउटसोर्सिंग) की गहराई से व्याख्या करता है। ई-व्यवसाय केवल इंटरनेट पर वस्तुओं के क्रय-विक्रय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उत्पादन, वित्त और मानव संसाधन जैसी आंतरिक व्यावसायिक प्रक्रियाओं का इलेक्ट्रॉनिक प्रबंधन भी शामिल है। अध्याय विभिन्न मॉडलों जैसे बी2बी, बी2सी, सी2सी और इंट्रा-बी कॉमर्स के माध्यम से इसके व्यापक कार्यक्षेत्र को स्पष्ट करता है।
ई-व्यवसाय के प्रमुख लाभों में इसकी वैश्विक पहुँच, कम परिचालन लागत, और ग्राहकों के लिए 24 घंटे की उपलब्धता शामिल है। हालाँकि, इसमें मानवीय स्पर्श की कमी, डेटा गोपनीयता और सुरक्षा जोखिम जैसी कुछ सीमाएँ भी हैं। अध्याय का दूसरा मुख्य भाग बाह्यस्रोतीकरण पर केंद्रित है, जहाँ फर्में अपनी गैर-प्रमुख गतिविधियों, जैसे कॉल सेंटर सेवाएँ या डेटा प्रविष्टि, को विशेषज्ञ बाहरी प्रदाताओं को सौंप देती हैं।
इससे कंपनियों को अपनी मुख्य क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करने और लागत कम करने में मदद मिलती है। अंत में, यह अध्याय ऑनलाइन लेन-देनों की प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों जैसे डिजिटल हस्ताक्षर और कूटलेखन (क्रिप्टोग्राफी) के महत्व पर प्रकाश डालता है। कुल मिलाकर, यह अध्याय छात्रों को डिजिटल अर्थव्यवस्था में व्यवसाय की नई संभावनाओं और चुनौतियों से अवगत कराता है।
अध्याय 5: व्यवसाय की उभरती पद्यतियाँ – PDF Download
अध्याय 6: व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता
यह अध्याय ‘व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता’ पर केंद्रित है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि व्यवसाय केवल लाभ कमाने का साधन नहीं है, बल्कि समाज का एक अभिन्न अंग है। सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ उन नीतियों को अपनाने से है जो समाज के लक्ष्यों और मूल्यों के अनुरूप हों।
अध्याय में सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए गए हैं। पक्ष में कहा गया है कि समाज की सेवा व्यवसाय के दीर्घकालीन अस्तित्व के लिए आवश्यक है, जिससे इसकी सार्वजनिक छवि सुधरती है और सरकारी हस्तक्षेप कम होता है। विपक्ष में तर्क है कि यह व्यवसाय के मुख्य लाभ-अर्जन के उद्देश्य को बाधित कर सकता है और उपभोक्ताओं पर आर्थिक भार डाल सकता है।
अध्याय में अंशधारियों, कर्मचारियों, उपभोक्ताओं और सरकार के प्रति व्यवसाय की जिम्मेदारियों की व्याख्या की गई है। पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया गया है, जिसमें प्रदूषण के विभिन्न रूपों के कारणों और उन्हें नियंत्रित करने में व्यवसाय की भूमिका पर चर्चा की गई है। अंत में, व्यावसायिक नैतिकता के महत्व को रेखांकित किया गया है, जो निर्णयों में ‘सही’ और ‘गलत’ के बीच भेद करती है।
नैतिक आचरण व्यवसाय को विश्वसनीय बनाता है और उसकी दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करता है।
अध्याय 6: व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता – PDF Download
अध्याय 7: कंपनी निर्माण
अध्याय 7: कंपनी निर्माण – PDF Download
अध्याय 8: व्यावसायिक वित्त के स्रोत
यह अध्याय ‘व्यावसायिक वित्त के स्रोत’ व्यवसाय के सफल संचालन के लिए वित्तीय संसाधनों के महत्व और उनके विभिन्न प्रकारों पर विस्तृत प्रकाश डालता है। वित्त को व्यवसाय का ‘जीवन रक्षक’ कहा गया है क्योंकि इसके बिना किसी भी व्यवसाय की कल्पना करना असंभव है।
अध्याय मुख्य रूप से वित्त की आवश्यकताओं को दो श्रेणियों में विभाजित करता है: स्थायी पूँजी, जो भूमि, मशीनरी और भवन जैसी अचल संपत्तियों के लिए आवश्यक है, और कार्यशील पूँजी, जो दिन-प्रतिदिन के खर्चों जैसे कच्चा माल खरीदने और वेतन भुगतान के लिए उपयोग की जाती है। वित्त के स्रोतों का वर्गीकरण तीन आधारों पर किया गया है: अवधि (दीर्घ, मध्यम और अल्पकालिक), स्वामित्व (स्वामीगत कोष जैसे समता अंश और संचित आय, तथा ऋणगत कोष जैसे ऋणपत्र और बैंक ऋण), और स्रोत (आंतरिक एवं बाह्य)।
अध्याय में संचित आय, व्यापार साख, फैक्टरिंग, लीज वित्तीयन, सार्वजनिक जमा, और वाणिज्यिक पत्रों जैसे विविध विकल्पों के लाभों और सीमाओं का गहन विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, वैश्वीकरण के दौर में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीयन के साधनों जैसे GDR, ADR और FCCB की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया है।
अंत में, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी भी व्यवसाय को वित्त के स्रोत का चयन उसकी लागत, जोखिम, वित्तीय शक्ति और प्रबंधकीय नियंत्रण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
अध्याय 8: व्यावसायिक वित्त के स्रोत – PDF Download
अध्याय 9: लघु व्यवसाय एवं उघमिता
‘लघु व्यवसाय’ शीर्षक वाला यह अध्याय भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में छोटे उद्योगों के महत्व और उनकी कार्यप्रणाली का विस्तृत विश्लेषण करता है। अध्याय की शुरुआत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम 2006 की व्याख्या से होती है, जो निवेश सीमाओं के आधार पर विनिर्माण और सेवा उद्यमों को परिभाषित करता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ श्रम की प्रचुरता है, लघु व्यवसाय रोजगार सृजन का एक अत्यंत सशक्त माध्यम हैं, जो कृषि के पश्चात सर्वाधिक अवसर प्रदान करते हैं।
ये इकाइयाँ देश के औद्योगिक उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत और कुल निर्यात में 45 प्रतिशत का महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। अध्याय उन प्रमुख भूमिकाओं पर प्रकाश डालता है जो ये व्यवसाय देश के संतुलित क्षेत्रीय विकास और स्थानीय संसाधनों के इष्टतम उपयोग में निभाते हैं। इसके साथ ही, यह उन गंभीर समस्याओं का भी परीक्षण करता है जिनसे लघु इकाइयाँ जूझती हैं, जैसे कि वित्त का अभाव, कच्चे माल की प्राप्ति में कठिनाई, पेशेवर प्रबंधन कौशल की कमी और तकनीकी पिछड़ापन।
वैश्वीकरण के दौर में इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों से निपटने हेतु सरकार नाबार्ड, एनएसआईसी, सिडबी और जिला उद्योग केंद्रों जैसी विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से वित्तीय, तकनीकी और विपणन सहायता प्रदान करती है। अंततः, अध्याय इस बात पर जोर देता है कि भविष्य में सफलता के लिए इन व्यवसायों को गुणवत्ता में सुधार करते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप ढलना होगा।
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अध्याय 10: आंतरिक व्यापार
यह अध्याय ‘आंतरिक व्यापार’ (Internal Trade) के अर्थ, स्वरूप और इसके विभिन्न घटकों का एक विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आंतरिक व्यापार वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय एक ही देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर संपन्न किया जाता है। मुख्य रूप से इसे दो श्रेणियों, थोक व्यापार और फुटकर व्यापार, में वर्गीकृत किया गया है।
थोक विक्रेता निर्माताओं और फुटकर विक्रेताओं के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं, जो बड़ी मात्रा में माल का संग्रह, जोखिम वहन और बाजार की सूचनाओं को साझा करने जैसी महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान करते हैं। दूसरी ओर, फुटकर विक्रेता अंतिम उपभोक्ताओं की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और उन्हें चयन के व्यापक अवसर प्रदान करते हैं। अध्याय में फुटकर विक्रेताओं के विभिन्न प्रकारों, जैसे भ्रमणशील विक्रेता (फेरीवाले, पटरी विक्रेता) और स्थायी दुकानों (जनरल स्टोर, विशिष्ट भंडार) का सविस्तार वर्णन किया गया है।
इसके साथ ही, विभागीय भंडार, श्रृंखला भंडार और सुपर बाजार जैसे बड़े पैमाने के व्यापारिक संस्थानों की कार्यप्रणाली, उनके लाभ और सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। आधुनिक व्यापार प्रणालियों जैसे डाक आदेश गृह और स्वचालित विक्रय मशीनों (Vending Machines) की प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डाला गया है। अंत में, आंतरिक व्यापार के संवर्धन में ‘चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री’ (जैसे FICCI और CII) की भूमिका पर चर्चा की गई है, जो कर सुधारों, परिवहन नीतियों और सुदृढ़ बुनियादी ढाँचे के विकास में सरकार के साथ सहयोग करते हैं।
अध्याय 10: आंतरिक व्यापार – PDF Download
अध्याय 11: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 1
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अध्याय 12: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 2
यह अध्याय ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 2’ मुख्य रूप से निर्यात और आयात की जटिल प्रक्रियाओं, उनके संचालन के लिए आवश्यक प्रलेखों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन देने वाले संगठनात्मक ढांचे पर केंद्रित है। निर्यात प्रक्रिया के अंतर्गत पूछताछ प्राप्त करने से लेकर अंतिम भुगतान तक के विभिन्न महत्वपूर्ण चरणों, जैसे कि साख पत्र (Letter of Credit) की प्राप्ति, निर्यात लाइसेंस (IEC), जहाज लदान पूर्व निरीक्षण, कस्टम निकासी और जहाजी बिल्टी (Bill of Lading) तैयार करने का विस्तार से वर्णन किया गया है।
इसी प्रकार, आयात प्रक्रिया में विदेशी मुद्रा का प्रबंधन, इंडेंट भेजना, प्रलेखों को छुड़ाना और सीमा शुल्क की औपचारिकताओं को समझाया गया है। अध्याय में भारत सरकार द्वारा निर्यातकों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए दी जाने वाली विभिन्न प्रोत्साहनों जैसे शुल्क वापसी योजना, अग्रिम लाइसेंस योजना और 100% निर्यात परक इकाइयों (EOU) की भूमिका का भी उल्लेख है।
व्यापारिक सहायता प्रदान करने वाले प्रमुख संगठनों जैसे निर्यात प्रोन्नति परिषद (EPC), भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान (IIFT) और भारतीय व्यापार प्रोन्नति संगठन (ITPO) के कार्यों पर प्रकाश डाला गया है। अंत में, यह अध्याय विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे वैश्विक संस्थानों की भूमिका और उनके प्रमुख समझौतों (GATT, TRIPS, GATS) का विस्तृत विश्लेषण करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करते हैं।
यह अध्याय अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय के व्यावहारिक और संस्थागत पहलुओं की गहरी समझ प्रदान करता है।
अध्याय 12: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 2 – PDF Download
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Sir
12th ka commerce subject ka pdf nhi hai .
And
11th ka accountancy book ka pdf
Sir please upload the pdf .