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Bihar Board 10th Sanskrit Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 17, 2026 by bseb 3 Comments

Bihar Board 10th Sanskrit Book 2026 PDF Download  संस्कृत

Bihar Board 10th Sanskrit Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 10th के छात्रों के लिए “ Sanskrit (पीयूषम्)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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Class X: Sanskrit (पीयूषम्) PDF Free Download

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❤️ विषयानुक्रमणिका

यह ‘पीयूषम् (द्वितीय भाग)’ पुस्तक बिहार राज्य की दसवीं कक्षा के छात्रों के लिए निर्मित एक संस्कृत पाठ्यपुस्तक है। इस पुस्तक का निर्माण राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-२००५ (एनसीएफ 2005) के आधार पर हुआ है। इस पुस्तक में कुल चौदह (14) पाठ संकलित हैं।

ये पाठ गद्य, पद्य, नाटक, संवाद आदि विविध विधाओं में रचित हैं। ग्रंथ के आरंभ में ‘मङ्गलम्’ पाठ में उपनिषदों के मंत्र दिए गए हैं, जो आध्यात्मिकता का पोषण करते हैं। उसके बाद ‘पाटलिपुत्रवैभवम्’ निबंध में बिहार की राजधानी के ऐतिहासिक महत्व का वर्णन किया गया है।

विद्यापति की ‘अलसकथा’ मनुष्यों को आलस्य त्यागने का संदेश देती है। ‘संस्कृतसाहित्ये लेखिकाः’ पाठ में विदुषी महिलाओं के योगदान को रेखांकित किया गया है। ‘भारतमहिमा’ गीतों के द्वारा देशभक्ति जगाती है।

‘भारतीयसंस्काराः’ पाठ सोलह संस्कारों का वर्णन करता है। विदुरनीति के ‘नीतिश्लोकाः’ तथा ‘कर्मवीरकथा’ छात्रों में नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं। स्वामी दयानन्द, मन्दाकिनी के वर्णन तथा व्याघ्र और पथिक की कथा के पाठ भी अत्यंत शिक्षाप्रद हैं।

अंत में ‘विश्वशान्तिः’ तथा ‘शास्त्रकाराः’ पाठ ज्ञानवर्धक हैं। इस पुस्तक की भूमिका में स्पष्ट किया गया है कि संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति की वाहिका है। अतः इसका अध्ययन छात्रों के लिए अनिवार्य है।

पुस्तक में रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर समझ को महत्व दिया गया है। छात्र अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त करें, यही इसका लक्ष्य है। पाठ्य सामग्री छात्रों के दैनिक जीवन से जुड़ी हुई है, जिससे उनकी रुचि बढ़े।

यह पुस्तक छात्रों के लिए सरल, रोचक तथा जीवनोपयोगी है।

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❤️ प्रथमः पाठ: – मङ्गलम्

‘मङ्गलम्’ शीर्षक वाला यह पाठ वैदिक वाङ्मय के सारभूत उपनिषदों के पद्यात्मक मंत्रों का संग्रह है। इस पाठ में पाँच मंत्र हैं जो ईशावास्य, कठ, मुण्डक, तथा श्वेताश्वतर उपनिषदों से लिए गए हैं। ये मंत्र मंगलाचरण के रूप में पढ़े जाते हैं।

प्रथम मंत्र ईशावास्योपनिषद् से है। इसमें सत्य के स्वरूप का निरूपण किया गया है। सत्य का मुख सुवर्णमय पात्र से ढका हुआ है। इसलिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है कि वह उस आवरण को दूर करे ताकि सत्य धर्म का दर्शन हो सके। द्वितीय मंत्र कठोपनिषद् से है। इसमें आत्मा के विलक्षण स्वरूप का वर्णन किया गया है। आत्मा अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है। वह प्राणियों के हृदय में निवास करती है। केवल शोकरहित निष्काम व्यक्ति ईश्वर की कृपा से उसे देख पाता है।

तृतीय मंत्र मुण्डकोपनिषद् से है। इसमें सत्य की महिमा का गुणगान किया गया है। लोक में सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही वह दिव्य मार्ग (देवयान) प्राप्त होता है जिससे ऋषि परमात्मा को प्राप्त करते हैं। चतुर्थ मंत्र भी मुण्डकोपनिषद् से ही है। इसमें अद्वैत भावना दिखाई गई है। जैसे बहती हुई नदियाँ अपना नाम और रूप छोड़कर समुद्र में एकाकार हो जाती हैं, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी विद्वान भी नाम-रूप से मुक्त होकर परम दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।

अंतिम पंचम मंत्र श्वेताश्वतरोपनिषद् से है। इसमें वेद परमात्मा को आदित्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे घोषित करता है। उस परमात्मा को जानकर ही मनुष्य मृत्यु के बंधन को पार करता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञान ही एक उपाय है, कोई अन्य मार्ग नहीं है। इस प्रकार इस पाठ में सत्यनिष्ठा, आत्मज्ञान और ईश्वरभक्ति का प्रतिपादन किया गया है।

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❤️ द्वितीयः पाठ: – पाटलिपुत्रवैभवम्

बिहार राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र प्राचीन काल से ही महत्व रखती है। यह नगर गंगा के पवित्र तट पर स्थित है। इसका इतिहास साढ़े दो हजार वर्ष पुराना है। यहाँ धार्मिक, राजनैतिक तथा औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से ध्यानाकर्षक है।

इतिहास ग्रंथों में वर्णित है कि भगवान बुद्ध पाटलिग्राम में बहुत बार आए। उन्होंने कहा कि समय के साथ यह गाँव महानगर बनेगा परंतु कलह, अग्नि और जल के भय से सदा पीड़ित रहेगा। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त के शासनकाल में इस नगर की शोभा और रक्षा व्यवस्था अत्यंत उत्कृष्ट थी, जिसका वर्णन यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपने संस्मरणों में किया है। प्रियदर्शी अशोक के समय में पाटलिपुत्र का वैभव और अधिक समृद्ध था।

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में इसका नाम ‘पुष्पपुर’ या ‘कुसुमपुर’ मिलता है, जिससे ज्ञात होता है कि यहाँ फूलों का भरपूर उत्पादन होता था। गुप्त वंश के शासनकाल में यहाँ शरद ऋतु में ‘कौमुदी महोत्सव’ नामक महान समारोह आयोजित किया जाता था। तब सभी जन आनंदमग्न हो जाते थे। मध्यकाल में पाटलिपुत्र ‘पटना’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह शब्द ‘पत्तन’ शब्द से निकला है।

वर्तमान में पाटलिपुत्र बिहार की राजधानी है तथा एक अति विशाल महानगर है। नगर के उत्तर दिशा में गंगा नदी बहती है, जिस पर एशिया महादेश का सबसे लंबा गाँधी सेतु विराजमान है। यहाँ गोलघर, तारामंडल, संग्रहालय, उच्च न्यायालय, सचिवालय, महावीर मंदिर, तथा सिख सम्प्रदाय के दसवें गुरु गोविन्द सिंह का जन्मस्थान गुरुद्वारा आदि दर्शनीय स्थल हैं। इस प्रकार पाटलिपुत्र अपना प्राचीन गौरव आज भी धारण किए हुए है।

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❤️ तृतीयः पाठ: – अलसकथा

यह ‘अलसकथा’ पाठ सुप्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति के ‘पुरुषपरीक्षा’ नामक कथाग्रंथ से संकलित है। इस पाठ में आलस्य के दोष को दिखाने के लिए व्यंग्यात्मक कथा वर्णित है। नीतिकार आलस्य को शत्रु मानते हैं।

मिथिला में वीरेश्वर नाम का एक मंत्री था, जो स्वभाव से दानशील और दयालु था। वह निर्धनों और अनाथों को प्रतिदिन भोजन देता था। वह आलसियों को भी अन्न-वस्त्र देता था, क्योंकि निर्गुणों में आलसी प्रथम माना जाता है। मंत्री की दानशीलता सुनकर बहुत से धूर्त भी कृत्रिम आलस्य दिखाकर भोजन लेने के लिए वहाँ सम्मिलित हो गए। इस प्रकार आलसशाला में धन खर्च देखकर नियोगी पुरुषों ने सच्चे आलसियों की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने आलसशाला में आग लगा दी। आग देखकर सभी धूर्त भाग गए। किंतु चार पुरुष वहीं सोए रहे। वे आपस में बोले – एक ने कहा ‘अरे, यह कोलाहल क्यों है?’। दूसरे ने कहा ‘ऐसा लगता है इस घर में आग लगी है’। तीसरे ने कहा ‘कोई ऐसा धार्मिक नहीं है जो अभी गीले कपड़ों से हमें ढँक दे?’। चौथे ने कहा ‘अरे बातूनी लोग! कितनी बातें कर सकते हो? चुपचाप क्यों नहीं रहते?’।

इनके संवाद सुनकर नियोगी पुरुषों ने उन चारों को बालों से पकड़कर बाहर निकाल दिया। बाद में मंत्री वीरेश्वर ने उन आलसियों को अधिक सामान देकर उनका सम्मान किया। पाठ का निष्कर्ष है कि आलसियों की गति दयालुता के बिना नहीं है।

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❤️ चतुर्थः पाठ: – संस्कृतसहित्ये लेखिकाः

इस पाठ में संस्कृत साहित्य के विकास में महिलाओं के योगदान का वर्णन किया गया है। समाज की प्रगति में स्त्री और पुरुष दोनों का समान महत्व है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक संस्कृत साहित्य की समृद्धि में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

वैदिक युग में न केवल ऋषि बल्कि ऋषिकाएँ भी मंत्रों की द्रष्टा थीं। ऋग्वेद में चौबीस तथा अथर्ववेद में पाँच ऋषिकाओं का उल्लेख है, जैसे यमी, अपाला, उर्वशी, इंद्राणी, वागाम्भृणी आदि। उपनिषद् काल में याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी दार्शनिक रुचि वाली थीं। जनक की सभा में गार्गी वाचक्नवी शास्त्रार्थ में कुशल खड़ी रहती थीं।

लौकिक संस्कृत साहित्य में विजयाङ्का, शीला भट्टारिका, देवकुमारिका, रामभद्राम्बा आदि कवयित्रियाँ प्रसिद्ध हुईं। विजयाङ्का तो ‘सर्वशुक्ला सरस्वती’ कहकर दंडी द्वारा प्रशंसित की गईं। विजयनगर राज्य की रानी गंगादेवी ने ‘मधुराविजयम्’ नामक महाकाव्य तथा तिरुमलाम्बा ने ‘वरदाम्बिकापरिणयम्’ नामक चंपूकाव्य की रचना की। आधुनिक काल में पंडिता क्षमाराव एक महान विदुषी थीं। उन्होंने ‘शंकरचरितम्’, ‘सत्याग्रहगीता’, ‘मीरालहरी’ आदि ग्रंथों की रचना की। वे गांधी दर्शन से प्रभावित थीं। वर्तमान काल में पुष्पादीक्षित, वनमाला भवालकर, मिथिलेशकुमारी मिश्र आदि लेखिकाएँ संस्कृत साहित्य की धारा को प्रवाहित कर रही हैं। इस प्रकार संस्कृत साहित्य में नारियों का योगदान बहुमूल्य और प्रेरणादायक है।

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❤️ पंचमः पाठ: – भारतमहिमा

प्रस्तुत ‘भारतमहिमा’ पाठ हमारी मातृभूमि भारतवर्ष के गौरव और महत्व को प्रतिपादित करता है। इस पाठ में पाँच श्लोक हैं, जिनमें पहला विष्णुपुराण से और दूसरा भागवतपुराण से उद्धृत है। शेष पद्य आधुनिक कवियों द्वारा रचित हैं।

इस पाठ में वर्णन किया गया है कि भारतभूमि स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग की भूमिका निभाने वाली है। देवता भी इस भूमि की यशोगाथा गाते हैं तथा यहाँ जन्म लेने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे कहते हैं कि भारतवर्ष में जन्म पाकर मनुष्य धन्य हो जाते हैं क्योंकि उन्हें हरि की सेवा का सुयोग प्राप्त होता है।

यह भारतमाता निर्मल, वात्सल्यपूर्ण और ममतामयी है। यहाँ धर्म और जाति के भेदों के साथ रहने वाले लोग एकत्व के भाव से निवास करते हैं। इसका प्राकृतिक सौंदर्य अनुपम है; यह भूमि सागरों, पर्वतों, झरनों, रमणीय नदियों से सुशोभित है। भारतवर्ष जगत का गौरव है तथा हमारे लिए सदा पूजनीय है। हम सभी भारतीयों की देशभक्ति आदर्श और आकर्षक हो। हम मन, वचन और कर्म से राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्य करें तथा अपने देश के प्रति निष्ठावान बनें – यही इस पाठ का मुख्य संदेश है।

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❤️ षष्टः पाठ: – भारतीयसंस्काराः

भारतीय संस्कृति का परिचय संस्कारों से ही मिलता है। ‘भारतीयसंस्काराः’ पाठ में संस्कारों का व्यापक वर्णन किया गया है। हमारे ऋषियों ने विचार किया कि जीवन के सभी मुख्य अवसरों पर वेदमंत्रों का पाठ, बड़ों का आशीर्वाद, हवन और परिवारों का मिलन होना चाहिए। संस्कारों का मूल प्रयोजन गुणों का आरोपण और दोषों का अपनयन है। विदेशों में रहने वाले भारतीय भी संस्कारों के प्रति उत्सुक रहते हैं।

शास्त्रों में संस्कार मुख्य रूप से पाँच वर्गों में विभक्त हैं – जन्मपूर्व, शैशव, शैक्षणिक, गृहस्थ और मरणोत्तर। कुल मिलाकर सोलह संस्कार होते हैं। जन्मपूर्व संस्कारों में गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन हैं, जिनमें गर्भरक्षा, शिशु संस्कार और गर्भवती की प्रसन्नता उद्देश्य हैं। शैशव संस्कारों में जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध आते हैं।

शिक्षा संस्कारों में अक्षरारम्भ में शिशु लेखन-पठन आरंभ करता है। उपनयन संस्कार से गुरु शिष्य को अपने घर ले जाता है, जहाँ शिष्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करता है। केशान्त संस्कार में गुरुगृह में पहली बार मुंडन कर्म होता है, जिसे गोदान संस्कार भी कहा जाता है। समावर्तन संस्कार से शिक्षा समाप्ति पर शिष्य गुरुगृह से अपने घर लौटता है। वहाँ गुरु शिष्य को ‘सत्य बोलो, धर्म का पालन करो’ का उपदेश देते हैं। विवाह संस्कार पवित्र है, जिसमें वाग्दान, मंडप निर्माण, कन्यादान, सप्तपदी, सिंदूरदान आदि प्रमुख विधियाँ हैं। इससे मनुष्य वास्तव में गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। अंत में मरणोपरांत दाह संस्कार या अन्त्येष्टि संस्कार किया जाता है। इस प्रकार संस्कार भारतीय जीवन को उल्लासमय और व्यवस्थित बनाते हैं।

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❤️ सप्तमः पाठ: – नीतिश्लोकाः

यह ‘नीतिश्लोकाः’ पाठ सुप्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत के उद्योगपर्व के ३३-४० अध्यायों से संकलित है, जो ‘विदुरनीति’ नाम से प्रसिद्ध है। युद्ध निकट आता देख धृतराष्ट्र अपने चित्त की शांति के लिए विदुर से नीति विषयक प्रश्न पूछते हैं। विदुर उनकी शंकाओं का समाधान करते हुए राजनीति और व्यवहारनीति का उपदेश देते हैं।

इस पाठ में पंडित के लक्षण वर्णित हैं कि जिसके कार्यों को शीत, उष्ण, भय, रति, समृद्धि या असमृद्धि विचलित नहीं करती, वह पंडित है। जो बिना बुलाए प्रवेश करता है, बिना पूछे बहुत बोलता है, वह नराधम है। नरक के तीन द्वार हैं – काम, क्रोध और लोभ, इसलिए इन्हें त्याग देना चाहिए। कल्याण चाहने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता – ये छह दोष छोड़ने चाहिए। सत्य से धर्म, योग से विद्या, स्वच्छता से रूप और आचरण से कुल की रक्षा होती है। स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी, पूजनीय और गृह की दीप्ति हैं, इसलिए उनकी विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए। विनय से अपकीर्ति, पराक्रम से अनर्थ, क्षमा से क्रोध और सदाचार से कुलक्षण नष्ट होता है। ये श्लोक मनुष्यों के लिए नैतिकता और सदाचार का श्रेष्ठ मार्ग दिखाते हैं।

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❤️ अष्टमः पाठ: – कर्मवीरकथा

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❤️ नवमः पाठ: – स्वामि दयानन्दः

स्वामी दयानन्द आधुनिक भारत में समाज और शिक्षा के महान उद्धारक थे। उनका जन्म गुजरात प्रदेश के टंकारा ग्राम में १८२४ ईस्वी में हुआ था। उनका बचपन का नाम मूलशंकर था। एक बार शिवरात्रि पर्व की रात्रि जागरण के समय उन्होंने देखा कि एक चूहा शिव विग्रह के ऊपर चढ़कर नैवेद्य खा रहा है। यह देखकर उनके मन में विचार आया कि यह विग्रह निरर्थक है। इस कारण से उनकी मूर्तिपूजा के प्रति अनास्था हो गई।

इसके बाद अपनी बहन के निधन को देखकर उनके मन में वैराग्य भाव उत्पन्न हुआ। सत्य की खोज में उन्होंने घर त्यागकर अनेक स्थानों में भ्रमण किया। अंत में वे मथुरा में प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द के पास गए। उनसे उन्होंने आर्ष ग्रंथों का अध्ययन कर वैदिक धर्म के प्रचार की प्रतिज्ञा की।

स्वामी दयानन्द ने समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे जातिवाद, अस्पृश्यता, बालविवाह, स्त्रीशिक्षा का अभाव, विधवा विवाह का निषेध आदि का प्रखर विरोध किया। उनका मानना था कि वेद ही सत्य विद्या के मूल हैं। अपने विचारों के प्रसार के लिए उन्होंने ‘सत्यार्थप्रकाश’ नामक ग्रंथ राष्ट्रभाषा में रचा तथा वेद भाष्य भी लिखे। १८७५ ईस्वी में मुम्बई नगर में उन्होंने ‘आर्यसमाज’ संस्था की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने समाज और शिक्षा का सुधार किया। उनके अनुयायियों ने देश-विदेश में गुरुकुलों तथा डी.ए.वी. विद्यालयों का जाल फैलाया। १८८३ ईस्वी में उनका देहांत हुआ। परंतु उनके कार्य आज भी समाज को मार्गदर्शन दे रहे हैं। वे निश्चय ही भारत के एक युगपुरुष थे।

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❤️ दशमः पाठ: – मन्दाकिनीवर्णनम्

यह ‘मन्दाकिनीवर्णनम्’ पाठ आदिकवि वाल्मीकि प्रणीत रामायण के अयोध्याकाण्ड के पंचनवतितम (९५वें) सर्ग से उद्धृत है। इसमें चित्रकूट पर्वत के समीप बहने वाली पवित्र मन्दाकिनी नदी का अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य चित्रित किया गया है। जब श्रीराम वनवास काल में सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट पहुँचते हैं, तब वे मन्दाकिनी की रमणीयता देखकर विस्मित होते हैं।

वे अपनी प्रिय सीता को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे सीते! देखो इस मन्दाकिनी नदी को जो विचित्र रेत के तटों से सुशोभित, हंसों और सारसों से सेवित है। इसके तट पर उपस्थित अनेक वृक्ष फल-पुष्पों से लदे हुए हैं, जिनसे यह नदी कुबेर की नलिनी (कमलिनी) की भाँति सर्वत्र शोभा पा रही है। यद्यपि अभी मृग समूहों द्वारा पिया गया जल कुछ कलुषित हो गया है, तथापि इसके रमणीय तीर्थ मन में प्रसन्नता उत्पन्न करते हैं। यहाँ समय-समय पर जटा और वल्कल धारण किए ऋषि स्नान करते हैं तथा ऊर्ध्वबाहु, संकल्प दृढ़ मुनि सूर्य की उपासना करते हैं। वायु से हिले हुए शिखर वाला पर्वत नाचता हुआ सा प्रतीत होता है। नदी के चारों ओर स्थित पेड़-पौधे पुष्प-पत्र उत्पन्न कर रहे हैं। कहीं जल मणि के समान निर्मल है, कहीं रेत के तट शोभा दे रहे हैं, कहीं सिद्धजन विचरण कर रहे हैं। वायु से हिले हुए पुष्पसमूह जल पर तैर रहे हैं। मधुर स्वर वाले चक्रवाक पक्षी यहाँ कूज रहे हैं।

श्रीराम सीता से कहते हैं कि चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन उन्हें अयोध्या के निवास से भी अधिक प्रिय लगता है। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने यहाँ प्रकृति का यथार्थ और मनोहर वर्णन किया है।

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❤️ एकादशः पाठ: – व्याघ्रपथिककथा

यह पाठ नारायण पंडित रचित ‘हितोपदेश’ नामक नीतिकथा ग्रंथ के मित्रलाभ खंड से संकलित है। इस कथा में लोभ के दुष्परिणाम का वर्णन किया गया है। एक वृद्ध व्याघ्र स्नान करके कुश हाथ में लिए सरोवर के तट पर बैठा हुआ था। वह पथिकों को संबोधित करके कह रहा था – “अरे पथिको! यह सुवर्ण कंगन ले लो”। तब लोभ से आकर्षित होकर एक पथिक वहाँ आता है।

उसने सोचा कि भाग्य से यह मिल रहा है, किंतु हिंसक जंतु पर विश्वास नहीं करना चाहिए। तब व्याघ्र उसे विश्वास दिलाने के लिए कहता है कि “मैं यौवन में बहुत दुर्वृत्त था, परंतु अब मेरी पत्नी और पुत्र मर चुके हैं। मैं धार्मिक, दानी और झड़े हुए नाखून-दाँत वाला हूँ। इसलिए मुझ पर विश्वास करो। तुम यहाँ सरोवर में स्नान करके यह सुवर्ण कंगन ले लो।” व्याघ्र के वचनों से मोहित होकर वह पथिक लोभवश स्नान करने सरोवर में प्रवेश करता है। वहाँ वह गहरे कीचड़ में फँस गया और भागने में असमर्थ हो गया। कीचड़ में गिरे हुए उसे देखकर व्याघ्र ने “मैं तुम्हें उठाता हूँ” कहकर उसे पकड़ लिया और खा गया।

इस कथा से ज्ञात होता है कि लोभ विनाश का कारण है तथा दुष्ट पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। ज्ञान आचरण के बिना भार ही होता है।

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❤️ द्वादशः पाठ: – कर्णस्य दानवीरता

यह ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ भास कवि द्वारा रचित ‘कर्णभारम्’ नामक नाटक के एकांकी रूपक से संकलित है। इसमें महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष के वीर कर्ण अपनी दानवीरता का प्रदर्शन करते हैं। अर्जुन की सहायता के लिए इंद्र छलपूर्वक ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास आते हैं।

वे कर्ण से बड़ी भिक्षा माँगते हैं। दानवीर कर्ण उन्हें हजारों गायों, असंख्य घोड़ों, हाथियों के झुंड, अपरिमित सोना, जीती हुई पृथ्वी, अग्निष्टोम यज्ञ का फल और अपना शीश भी देने के लिए तैयार हो जाते हैं। परंतु शक्र (इंद्र) इन वस्तुओं को स्वीकार नहीं करते, ‘नहीं चाहिए, नहीं चाहिए’ कहते हैं। अंत में जब कर्ण अपने शरीर के साथ जन्मा हुआ, देहरक्षक कवच-कुंडल भी देने की इच्छा करते हैं, तब इंद्र प्रसन्न होते हैं। कर्ण के सारथि शल्यराज उन्हें रोकते हैं कि यह नहीं देना चाहिए। परंतु कर्ण उन्हें समझाते हैं कि समय के साथ शिक्षा, वृक्ष और जल नष्ट हो जाते हैं, किंतु दिया हुआ दान और हवन में डाला हुआ हवि कभी नष्ट नहीं होता।

तत्पश्चात कर्ण निष्कपट भाव से अपना जीवनरक्षक कवच-कुंडल इंद्र को दे देते हैं। इससे उनकी अनुपम दानशीलता सिद्ध होती है।

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❤️ त्रयोदशः पाठ: – विश्वशान्तिः

प्रस्तुत पाठ ‘विश्वशान्तिः’ शीर्षक में लेखक ने संसार की वर्तमान समय में व्याप्त अशांति का यथार्थ चित्रण किया है। आजकल प्रायः सभी देशों में उपद्रव या अशांति दिखाई देती है। कहीं शांत वातावरण मिलता है। देशों में आंतरिक समस्या है, जिसे देखकर शत्रु राज्य प्रसन्न होते हैं और कलह बढ़ाते हैं। कहीं अनेक राज्यों के बीच परस्पर शीतयुद्ध चल रहा है। वास्तव में अब संसार अशांति सागर के तट पर बैठा हुआ सा प्रतीत होता है।

इस अशांति से मानवता के विनाश का भय उत्पन्न हो गया है। आज विश्वविध्वंसक अनेक अस्त्र निर्मित हैं, जिनसे मानवता का नाश हो सकता है। इस अशांति का मूल कारण दो हैं – द्वेष और असहिष्णुता। जब एक देश दूसरे देश की उन्नति देखकर ईर्ष्या करता है, तब द्वेष पैदा होता है। वही द्वेष असहिष्णुता उत्पन्न करता है। स्वार्थ भी वैरभाव को दृढ़ करता है। राजनीतिज्ञ भी यहाँ विशेष रूप से प्रेरक होते हैं।

इसके निवारण के लिए लेखक ने कहा है कि ज्ञान क्रिया के बिना भार होता है। अतः केवल शुष्क उपदेश पर्याप्त नहीं है, उसका जीवन में पालन भी आवश्यक है। भगवान बुद्ध ने प्राचीन काल में ही कहा था कि वैर से वैर की शांति कभी संभव नहीं है। क्षमा, दया और मैत्री भाव से ही वैर का नाश होता है। भारतीय नीतिकारों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान विचार प्रतिपादित किया है। परोपकार ही शांति का साधन है। संयुक्त राष्ट्र संघ आदि संस्थाएँ भी विश्वयुद्ध रोकने के लिए प्रयत्नशील हैं। आज भी जब एक देश के संकटकाल में दूसरे देश सहायता करते हैं, तब विश्वशांति का सूर्योदय दिखाई देता है। यदि हम सभी परोपकार भाव धारण करें, तो निश्चय ही विश्व में शांति होगी।

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❤️ चतुर्दशः पाठ: – शस्त्रकाराः

इस ‘शास्त्रकाराः’ शीर्षक पाठ में भारतवर्ष की अति प्राचीन और महान शास्त्र परंपरा का वर्णन किया गया है। यह पाठ प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है, जिसमें शिक्षक छात्रों को संस्कृत शास्त्रों का महत्व और उनके रचयिताओं का परिचय देते हैं। आरंभ में शास्त्र की परिभाषा बताई गई – शास्त्र ज्ञान का शासक है जो मनुष्यों को कर्तव्य और अकर्तव्य का बोध कराता है। पश्चिमी देशों में इसे अनुशासन (Discipline) भी कहा जाता है।

तत्पश्चात वेदांगों की चर्चा की गई। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष – ये छह वेदांग हैं। इनके प्रवर्तक ऋषि थे। जैसे – शिक्षा के पाणिनि, कल्प के बौधायन, व्याकरण के पाणिनि, निरुक्त के यास्क, छन्द के पिंगल, ज्योतिष के लगध। इसके अलावा छह भारतीय दर्शनों का भी उल्लेख किया गया है। सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल, योग के पतंजलि, न्याय के गौतम, वैशेषिक के कणाद, मीमांसा के जैमिनि और वेदान्त के बादरायण हैं।

न केवल अध्यात्म, बल्कि वैज्ञानिक विषय भी यहाँ चर्चित हैं। आयुर्वेद शास्त्र में चरक-सुश्रुत का योगदान, खगोल विज्ञान में आर्यभट की ‘आर्यभटीयम्’ और वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं। वास्तुशास्त्र और कृषि विज्ञान प्राचीन भारत के समृद्ध ज्ञान को प्रमाणित करते हैं। अंत में यह स्पष्ट होता है कि भारत के शास्त्रकारों की संख्या अल्प नहीं है, उनकी ज्ञान परंपरा विश्व कल्याण के लिए है।

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Reader Interactions

Comments

  1. Prince Kumar says

    February 22, 2023 at 6:29 am

    Reading book

    Reply
  2. ayush kumar says

    July 21, 2025 at 3:00 am

    hindi me do subject hai godhuli aur varnika godhuli ka pdf hai lekin varnika ka pdf nahi hai kya aap humko varnika ka pdf de sakte hai

    Reply
    • bseb says

      August 9, 2025 at 2:54 pm

      hey @Ayush, you can download Varnika book from this link – https://biharboardbooks.com/bihar-board-10th-hindi-varnika-book/

      Reply

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