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Bihar Board 10th Hindi Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb 4 Comments

Bihar Board 10th Hindi Book 2026 PDF Download  (गोधूलि भाग-2)

Bihar Board 10th Hindi Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 10th के छात्रों के लिए “Hindi (गोधूलि भाग-2)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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Class X: Hindi (गोधूलि भाग-2) PDF Free Download

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❤️ प्रस्तावना (गद्यखंड)

यह पुस्तक ‘गोधूलि भाग-2’ बिहार राज्य के कक्षा 10 के छात्रों के लिए हिंदी की एक महत्वपूर्ण पाठ्यपुस्तक है। इसे राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT), बिहार द्वारा नवीन पाठ्यक्रम और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के आधार पर तैयार किया गया है।

पुस्तक का मुख्य उद्देश्य छात्रों के स्कूली जीवन को बाहरी दुनिया से जोड़ना और उनमें रचनात्मकता एवं जिज्ञासा विकसित करना है। इसमें गद्य और काव्य दोनों खंडों में 12-12 रचनाएँ शामिल की गई हैं।

गद्य खंड में भीमराव अंबेदकर, महात्मा गाँधी, मैक्समूलर और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान विचारकों के निबंध, कहानियाँ और भाषण शामिल हैं, जो श्रम विभाजन, शिक्षा, संस्कृति और लिपि के विकास जैसे विषयों पर प्रकाश डालते हैं। काव्य खंड में मध्यकालीन कवियों जैसे गुरु नानक और रसखान से लेकर आधुनिक काल के कवियों जैसे सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर और अज्ञेय की रचनाएँ संकलित हैं।

यह संकलन न केवल हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा से परिचित कराता है, बल्कि छात्रों के सौंदर्यबोध और मानवीय संवेदनाओं का भी परिष्कार करता है। पुस्तक में प्रयुक्त भाषा सरल और रोचक है ताकि विद्यार्थी आनंद के साथ ज्ञान का सृजन कर सकें।

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❤️ अध्याय 1 : भीमराव आंबेदकर (श्रम विभाजन और जाति प्रथा)

यह अध्याय बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर के प्रसिद्ध भाषण ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ का एक अंश है, जिसका शीर्षक ‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ है। इसमें लेखक ने भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद और उसके दुष्प्रभावों का तार्किक विश्लेषण किया है। लेखक का कहना है कि जाति प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि यह श्रमिकों का भी अस्वाभाविक विभाजन करती है, जो विश्व के अन्य समाजों में नहीं देखा जाता।

यह विभाजन मनुष्य की रुचि या क्षमता पर आधारित न होकर जन्म और वंशानुगत पेशे पर थोपा जाता है। इससे व्यक्ति को अपनी इच्छा अनुसार कार्य चुनने की स्वतंत्रता नहीं मिलती, जिसके परिणामस्वरूप समाज में बेरोजगारी, गरीबी और कार्य के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। लेखक का मानना है कि आदर्श समाज स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (भाईचारे) पर आधारित होना चाहिए।

लोकतंत्र केवल शासन की पद्धति नहीं, बल्कि सामूहिक जीवनचर्या और अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। समाज में गतिशीलता होनी चाहिए ताकि परिवर्तन सभी तक पहुँच सके। जाति प्रथा आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक क्षमताओं को कुचल देती है।

अंत में, अंबेदकर एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ सभी नागरिकों को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो।

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❤️ अध्याय 2 : नलिन विलोचन शर्मा (विष के दांत)

यह कहानी ‘विष के दाँत’ मध्यवर्गीय समाज के अंतर्विरोधों, लिंग-भेद और आर्थिक विषमता पर तीखा प्रहार करती है। सेन साहब एक रईस व्यक्ति हैं, जिनकी पाँच सुशिक्षित बेटियाँ और एक लाड़-प्यार में बिगड़ा हुआ बेटा ‘खोखा’ (काशू) है। सेन साहब खोखा को भविष्य का इंजीनियर मानते हैं और उसकी हर गलती को उसकी ‘प्रतिभा’ का लक्षण समझते हैं।

दूसरी ओर गिरधरलाल है, जो उन्हीं की फैक्ट्री में एक मामूली किरानी है और स्वाभिमानी मदन का पिता है। मदन और खोखा के बीच लट्टू खेलने को लेकर हुए विवाद में मदन, खोखा के दो दाँत तोड़ देता है। यह घटना केवल बच्चों की लड़ाई नहीं, बल्कि महलों के अहंकार और झोपड़ी के स्वाभिमान के बीच का संघर्ष है।

सेन साहब द्वारा नौकरी से निकाले जाने के बावजूद, गिरधरलाल अपने बेटे को दंडित करने के बजाय उसे ‘शाबाश’ कहता है क्योंकि उसने अमीर के अहंकार (विष के दाँत) को तोड़ दिया था। नलिन विलोचन शर्मा ने इस कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त दोहरे मापदंडों और गरीबों के दबे हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति की है। यह कहानी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक धरातल पर मध्यवर्ग की खोखली मर्यादाओं को उजागर करती है।

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❤️ अध्याय 3 : मैक्समूलर (भारत से हम क्या सीखें)

‘भारत से हम क्या सीखें’ प्रसिद्ध जर्मन विद्वान फ्रेडरिक मैक्समूलर द्वारा दिया गया एक ऐतिहासिक भाषण है। इस पाठ में लेखक ने भारत की प्राचीनता, संपन्नता और सांस्कृतिक विलक्षणता का अत्यंत प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है। मैक्समूलर का मानना है कि यदि कोई ऐसा देश है जहाँ मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियों का साक्षात्कार हुआ है, तो वह भारत है।

उन्होंने नवागंतुक अंग्रेज अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान की एक महान प्रयोगशाला है। लेखक ने भू-विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, पुरातत्त्व, नृवंश विद्या और विशेष रूप से भाषाविज्ञान के क्षेत्र में भारत के महत्त्व को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा ने किस प्रकार विश्व की अन्य आर्य भाषाओं के बीच एक सेतु का कार्य किया और मानव इतिहास की गुत्थियों को सुलझाया।

मैक्समूलर वारेन हेस्टिंग्स के समय की ‘दारिस’ मुद्राओं वाली घटना के माध्यम से भारत की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, सच्चे भारत के दर्शन शहरों के बजाय गाँवों में होते हैं, जहाँ प्राचीन परंपराएँ और नैतिकता आज भी जीवित हैं। अंत में, वे सर विलियम जोन्स के उदाहरण से प्रेरित करते हुए कहते हैं कि भारत का अध्ययन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था।

यह पाठ हमें अपने गौरवशाली अतीत को पहचानने और उसे आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।

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❤️ अध्याय 4 : हजारी प्रसाद दिव्वेदी (नाख़ून क्यों बढ़ते हैं)

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित यह ललित निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ मानवीय सभ्यता के विकास और पशुता बनाम मनुष्यता के द्वंद्व को दर्शाता है। लेखक अपनी छोटी बेटी के एक सरल प्रश्न से प्रभावित होकर नाखूनों के बढ़ने के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की व्याख्या करते हैं।

वे बताते हैं कि नाखून मनुष्य की आदिम पाशविक वृत्ति और संघर्ष चेतना के प्रतीक हैं, जिनकी कभी आत्मरक्षा के लिए अस्त्र के रूप में आवश्यकता थी। यद्यपि आज मनुष्य ने एटम बम जैसे विनाशकारी अस्त्र बना लिए हैं, फिर भी प्रकृति उसे उसके भीतर की पशुता (नाखून) की याद दिलाती रहती है।

लेखक का मानना है कि नाखूनों को काटना मनुष्यता, संयम और सांस्कृतिक चेतना का परिचायक है। वे भारतीय संस्कृति के ‘स्व’ के बंधन और स्वाधीनता के महत्व पर बल देते हैं।

निबंध में स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक सफलता मारणास्त्रों के संचयन में नहीं, बल्कि प्रेम, मैत्री और त्याग की चरितार्थता में है। अंततः, लेखक यह संदेश देते हैं कि भले ही पाशविक प्रवृत्तियाँ बढ़ें, लेकिन मनुष्य अपने विवेक और आत्म-संयम से उन्हें परास्त कर मानवता का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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❤️ अध्याय 5 : गुणाकर मुले (नागरी लिपि)

प्रस्तुत निबंध ‘नागरी लिपि’ प्रख्यात विद्वान गुणाकर मुले द्वारा रचित है, जो उनकी पुस्तक ‘भारतीय लिपियों की कहानी’ से संकलित है। इसमें लेखक ने हिंदी की लिपि ‘देवनागरी’ के ऐतिहासिक विकास, प्राचीनता और व्यापकता का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। लेखक बताते हैं कि करीब दो सदी पहले इस लिपि के टाइप बनने से इसके अक्षरों में स्थिरता आई।

देवनागरी केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि मराठी, नेपाली और नेवारी जैसी भाषाओं की भी लिपि है। निबंध के अनुसार, नागरी लिपि के आरंभिक लेख दक्षिण भारत से ‘नंदिनागरी’ के रूप में मिले हैं। ग्यारहवीं सदी के चोळ राजाओं और सुदूर दक्षिण के शासकों के सिक्कों पर भी नागरी अक्षर अंकित थे।

उत्तर भारत में भी अनेक हिंदू शासकों सहित महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी और अकबर जैसे इस्लामी शासकों ने अपने सिक्कों पर नागरी लिपि का प्रयोग किया। ईसा की आठवीं-नौवीं सदी में यह एक सार्वदेशिक लिपि बन चुकी थी। लेखक ने ‘नागरी’ नाम की उत्पत्ति के विभिन्न मतों की चर्चा की है, जिसमें इसे पटना (देवनगर) से भी जोड़ा गया है।

अंततः, यह निबंध नागरी लिपि को भारतीय संस्कृति और इतिहास के एक नए युग के सूत्रधार के रूप में रेखांकित करता है।

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❤️ अध्याय 6 : अमरकांत (बहदुर)

यह कहानी अमरकांत द्वारा रचित है, जो ‘बहादुर’ नामक एक नेपाली लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है। बहादुर अपने घर से अपनी माँ की पिटाई से तंग आकर भाग जाता है और एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर बन जाता है। शुरुआत में घर के सभी सदस्य, विशेषकर लेखक और उसकी पत्नी निर्मला, उसके प्रति बहुत स्नेही रहते हैं और उसकी मेहनत की सराहना करते हैं।

बहादुर हँसमुख और सेवाभावी है, जो घर के कार्यों को बखूबी निभाता है। हालाँकि, समय बीतने के साथ परिवार का व्यवहार बदल जाता है। लेखक का पुत्र किशोर और निर्मला छोटी-छोटी बातों पर बहादुर के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार करने लगते हैं।

स्थिति तब और बिगड़ जाती है जब एक रिश्तेदार के घर आने पर बहादुर पर ग्यारह रुपये की चोरी का झूठा आरोप लगाया जाता है। इस अपमान और निरंतर हो रही मार-पीट से आहत होकर बहादुर बिना अपनी तनख्वाह या सामान लिए घर छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद परिवार को अपनी गलती का गहरा एहसास होता है और वे उसकी ईमानदारी और निश्छल स्वभाव को याद कर पछताते हैं।

यह कहानी मध्यमवर्ग की संवेदनहीनता और एक गरीब बच्चे की गरिमा को मार्मिक ढंग से दर्शाती है।

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❤️ अध्याय 7 : रामविलास शर्मा (परंपरा का मुल्यांकन)

यह निबंध डॉ॰ रामविलास शर्मा द्वारा लिखित है, जिसमें उन्होंने साहित्य, समाज और परम्परा के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण किया है। लेखक के अनुसार, जो लोग समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन करना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान अनिवार्य है।

वे स्पष्ट करते हैं कि साहित्य मात्र विचारधारा नहीं है, बल्कि इसमें मनुष्य की आदिम भावनाएँ और इंद्रिय बोध भी सुरक्षित रहते हैं, जो इसे सापेक्ष रूप में स्वाधीन बनाते हैं। लेखक का तर्क है कि सामाजिक विकास की तरह साहित्य का विकास सीधा और रैखिक नहीं होता; पुरानी कलाकृतियों का सौंदर्य आज भी अद्वितीय है।

उन्होंने जातीय और राष्ट्रीय अस्मिता के निर्माण में साहित्य की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। भारत जैसे बहुजातीय राष्ट्र के लिए व्यास और वाल्मीकि जैसे कवियों की विरासत ही उसकी आंतरिक एकता का आधार है।

अंत में, शर्मा जी कहते हैं कि पूर्ण क्षमता का विकास और परम्परा का वास्तविक मूल्यांकन केवल समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, जहाँ शिक्षा और संसाधनों के प्रसार से आम जनता अपनी सांस्कृतिक धरोहर को अपना सकेगी और भारतीय साहित्य वैश्विक स्तर पर अपना गौरवशाली योगदान दे पाएगा।

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❤️ अध्याय 8 : पं० बिरजू महाराज (जित-जित मैं निरखत हूँ)

यह अध्याय प्रसिद्ध कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज के जीवन और कला पर आधारित एक साक्षात्कार है, जिसे उनकी शिष्या रश्मि वाजपेयी ने लिया है। बिरजू महाराज का जन्म 1938 में लखनऊ में हुआ था। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही अपने पिता (बाबूजी) से नृत्य की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी।

उनके जीवन में संघर्ष का दौर तब आया जब मात्र साढ़े नौ साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया। उस समय घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि पिता के क्रिया-कर्म के लिए उन्होंने दो कार्यक्रमों में नाचकर पैसे जुटाए। महाराज ने रामपुर के नवाब के यहाँ भी काम किया और बाद में दिल्ली के ‘संगीत भारती’ तथा ‘भारतीय कला केंद्र’ जैसी संस्थाओं से जुड़े।

उन्होंने कथक को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया और इसे समकालीन बनाया। वे केवल एक महान नर्तक ही नहीं, बल्कि सितार, तबला और बाँसुरी जैसे वाद्ययंत्रों के भी शौकीन थे। उन्होंने अपनी माँ को ही अपना सबसे बड़ा जज और गुरु माना।

बिरजू महाराज का मानना है कि कला में समर्पण और त्याग की आवश्यकता होती है। आज वे कथक के पर्याय माने जाते हैं, जिन्होंने अपनी साधना से इस शास्त्रीय नृत्य को विश्व भर में पहचान दिलाई।

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❤️ अध्याय 9 : अशोक वाजपेयी (आविन्यों)

यह अध्याय प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी द्वारा लिखित उनके गद्य एवं कविता संग्रह ‘आविन्यों’ से संकलित है। इसमें लेखक ने दक्षिणी फ्रांस की रोन नदी के किनारे बसे ऐतिहासिक शहर आविन्यों और वहां के ‘ला शत्रूज़’ मठ में बिताए अपने उन्नीस दिनों के रचनात्मक प्रवास का सजीव चित्रण किया है।

लेखक बताते हैं कि आविन्यों कभी पोप की राजधानी थी और अब यह एक प्रमुख कला केंद्र है, जहाँ विश्व प्रसिद्ध रंग-समारोह आयोजित होते हैं। ला शत्रूज़, जो कभी एक ईसाई मठ था, अब एक कला केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है, जहाँ दुनिया भर के कलाकार आकर एकांत में सृजन करते हैं।

लेखक ने यहाँ के ‘मौन के स्थापत्य’ का अनुभव किया और अपने प्रवास के दौरान पैंतीस कविताएँ और सत्ताईस गद्य रचनाएँ लिखीं। अध्याय में ‘प्रतीक्षा करते हैं पत्थर’ और ‘नदी के किनारे भी नदी है’ जैसी सुंदर रचनाओं के माध्यम से लेखक ने पत्थर की सहनशीलता और नदी की कविता के साथ समानता को दर्शाया है।

यह पाठ हमें बताता है कि रचना की प्रक्रिया में स्थान, परिवेश और लेखक की अंतरात्मा का गहरा संबंध होता है। अंततः, लेखक आविन्यों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

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❤️ अध्याय 10 : विनोद कुमार शुक्ल (मछली)

विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित ‘मछली’ कहानी एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बच्चों की संवेदनाओं और उनके बचपन की स्मृतियों को खूबसूरती से दर्शाती है। कहानी की शुरुआत दो भाइयों, लेखक और संतू से होती है, जो बाजार से पिता द्वारा खरीदी गई तीन मछलियों को लेकर उत्साहपूर्वक घर दौड़ते हैं। उनका इरादा एक मछली को कुएँ में डालकर पालने का है, ताकि वे उसके साथ खेल सकें।

घर पहुँचने पर वे मछलियों को नहानघर की बाल्टी में रखते हैं। उन्हें पता चलता है कि एक मछली मर चुकी है। दीदी ने उन्हें बताया था कि मरी हुई मछली की आँखों में परछाईं नहीं दिखती, जिसकी वे जाँच करने की कोशिश करते हैं।

जैसे ही नौकर भग्गू मछलियों को काटने की तैयारी करता है, संतू एक मछली लेकर भाग जाता है ताकि उसे कुएँ में डालकर बचा सके। कहानी में दीदी का चरित्र अत्यंत मार्मिक है; वह घर में मछली कटने से दुखी है और सिसक-सिसक कर रोती है, जो उसे मछली की तड़प से जोड़ता है। अंततः, मछलियाँ काट दी जाती हैं और घर में उनकी गंध फैल जाती है, जो बच्चों के मासूम सपनों और संवेदनाओं के टूटने का प्रतीक है।

यह कहानी लिंग भेद, मध्यवर्गीय जीवन के यथार्थ और मनुष्य की क्रूरता को बच्चों के नजरिए से प्रस्तुत करती है।

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❤️ अध्याय 11 : यतीन्द्र मिश्र (नौबतखाने में इबादत)

यह अध्याय प्रसिद्ध शहनाई वादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और उनकी संगीत साधना पर आधारित एक संवेदनात्मक व्यक्तिचित्र है। लेखक यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ के बचपन, उनके शुरुआती संघर्षों और काशी की सांस्कृतिक विरासत के साथ उनके अटूट संबंध को खूबसूरती से उकेरा है।

बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव में हुआ था, लेकिन उनका संगीत का सफर काशी के पंचगंगा घाट और बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी से शुरू हुआ। वे एक सच्चे साधक थे, जिनके लिए संगीत और धर्म एक-दूसरे के पूरक थे।

वे पाँचों वक्त की नमाज में खुदा से केवल एक ‘सच्चे सुर’ की दुआ माँगते थे। पाठ में उनके सरल स्वभाव का वर्णन है, जहाँ वे ‘भारतरत्न’ मिलने के बाद भी फटी हुई लुंगी पहनने में संकोच नहीं करते थे, क्योंकि उनका मानना था कि सम्मान उनकी शहनाई को मिला है, उनके पहनावे को नहीं।

वे काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक थे और मुहर्रम के शोक से लेकर मंदिर की मंगलध्वनि तक, उनकी शहनाई हर जगह गूँजती थी। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कला और कलाकार किसी धर्म या सीमा में नहीं बँधे होते, बल्कि वे मानवीय एकता और निरंतर अभ्यास के जीवंत उदाहरण होते हैं।

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❤️ अध्याय 12 : महात्मा गाँधी (शिक्षा और संस्कृति)

यह अध्याय महात्मा गाँधी के शिक्षा दर्शन और संस्कृति पर उनके विचारों का सार प्रस्तुत करता है। गाँधीजी के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता या किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और आत्मा का विकास होना चाहिए। वे ‘अहिंसक प्रतिरोध’ को सबसे उदात्त शिक्षा मानते हैं, जो अक्षर-ज्ञान से पहले दी जानी चाहिए।

उनके अनुसार, सच्ची शिक्षा शरीर की इंद्रियों के बुद्धिपूर्वक उपयोग से शुरू होती है, जिससे मस्तिष्क और आत्मा का सर्वांगीण विकास संभव है। गाँधीजी दस्तकारी या उद्योगों के माध्यम से शिक्षा देने के पक्षधर थे, ताकि बच्चे तालीम के साथ-साथ स्वावलंबी और उत्पादक बन सकें। संस्कृति के विषय में उनका मानना था कि हमें अपनी संस्कृति की गहरी समझ होनी चाहिए, लेकिन हमें कूपमंडूक नहीं बनना चाहिए।

वे चाहते थे कि दुनिया भर की संस्कृतियों की हवा उनके घर के आसपास बहती रहे, पर वे किसी के झोंके में उड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति को विभिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक बताया, जो कृत्रिम एकता के बजाय स्वाभाविक और स्वदेशी ढंग के मेल पर आधारित है। अंततः, उनका संदेश है कि शिक्षा मनुष्य को नैतिक, साहसी और समाज के प्रति समर्पित बनाने का साधन होनी चाहिए।

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❤️ प्रस्तावना (कव्यखंड)

यह पुस्तक ‘गोधूलि भाग-2’ बिहार राज्य के कक्षा 10 के छात्रों के लिए निर्धारित हिंदी की पाठ्यपुस्तक है। इसे राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT), बिहार द्वारा नवीन पाठ्यक्रम के आधार पर तैयार किया गया है।

पुस्तक दो मुख्य खंडों में विभाजित है: गद्यखंड और काव्यखंड। गद्यखंड में निबंध, कहानी, भाषण, साक्षात्कार और ललित निबंध जैसी कुल बारह रचनाएँ शामिल हैं।

इनमें भीमराव अंबेदकर का ‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’, महात्मा गाँधी का ‘शिक्षा और संस्कृति’ तथा मैक्समूलर का ‘भारत से हम क्या सीखें’ जैसे महत्वपूर्ण पाठ शामिल हैं। काव्यखंड में मध्यकालीन और आधुनिक काल के प्रमुख कवियों की बारह रचनाएँ दी गई हैं, जिनमें गुरु नानक, रसखान, घनानंद, और रामधारी सिंह दिनकर जैसे कवियों की कविताएँ प्रमुख हैं।

इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य छात्रों की कल्पनाशक्ति का विकास करना, उन्हें अपनी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से परिचित कराना तथा उनके भीतर नैतिक मूल्यों और सौंदर्यबोध का संचार करना है। यह पाठ्यचर्या 2005 के सिद्धांतों के अनुरूप स्कूली शिक्षा को बाहरी जीवन से जोड़ने का प्रयास करती है और भाषा एवं साहित्य के प्रति छात्रों में गहरी रुचि पैदा करने का लक्ष्य रखती है।

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❤️ अध्याय 1 : गुरु नानक

यह अध्याय सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव जी के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है। गुरु नानक का जन्म 1469 ई० में तलवंडी (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उन्होंने निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का प्रचार किया और वर्णाश्रम व्यवस्था व कर्मकांडों का कड़ा विरोध किया।

प्रस्तुत पाठ में नानक के दो महत्वपूर्ण पद संकलित हैं। प्रथम पद ‘राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा’ में कवि ने बाहरी दिखावे, जैसे जटा बढ़ाना, भस्म लगाना और तीर्थ यात्रा करने के बजाय सच्चे मन से राम-नाम के कीर्तन पर बल दिया है। उनके अनुसार ईश्वर के नाम के बिना मनुष्य सांसारिक मायाजाल में उलझकर रह जाता है।

द्वितीय पद ‘जो नर दुख में दुख नहिं मानै’ में एक ऐसे संतुलित व्यक्तित्व का वर्णन है जो सुख-दुख, मान-अपमान और लोभ-मोह से ऊपर उठ चुका है। नानक देव जी के अनुसार, जो व्यक्ति काम-क्रोध का त्याग कर देता है, उसके हृदय में साक्षात ब्रह्म का निवास होता है। अंत में वे कहते हैं कि गुरु की कृपा से भक्त ईश्वर (गोविंद) में उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे पानी के साथ पानी मिलकर एकाकार हो जाता है।

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❤️ अध्याय 2 : रसखान

प्रस्तुत पाठ हिंदी के लोकप्रिय कृष्णभक्त कवि रसखान द्वारा रचित है। इसमें कवि के दो प्रमुख ग्रंथ ‘प्रेमवाटिका’ और ‘सुजान रसखान’ के अंश संकलित हैं। प्रथम अंश ‘प्रेम-अयनि श्री राधिका’ में दोहे और सोरठा के माध्यम से राधा-कृष्ण के प्रेममय युगल रूप का वर्णन किया गया है।

कवि ने राधा और कृष्ण को प्रेम रूपी वाटिका के ‘माली-मालिन’ के रूप में चित्रित किया है। वे बताते हैं कि श्री कृष्ण की मनमोहक छवि को देखने के बाद उनकी आँखें उनके नियंत्रण में नहीं रही हैं और कृष्ण ने उनके ‘माणिक’ रूपी मन को चुरा लिया है। दूसरे अंश ‘करील के कुंजन ऊपर वारौं’ सवैया छंद में है, जहाँ रसखान का ब्रजभूमि और कृष्ण के प्रति अनन्य समर्पण भाव प्रकट होता है।

कवि कृष्ण की लाठी और कंबल के लिए तीनों लोकों का राज्य त्यागने को तैयार हैं। वे नंद की गायों को चराने के सुख के आगे आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी विस्मृत कर देना चाहते हैं। रसखान की इच्छा केवल ब्रज के वनों, बागों और तालाबों को निहारते रहने की है।

वे ब्रज की कंटीली झाड़ियों (करील के कुंजन) पर सोने के करोड़ों महलों को न्योछावर करने की उत्कट अभिलाषा रखते हैं। संपूर्ण पाठ में कवि की कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति और ब्रज के प्रति गहरा लगाव मुखरित हुआ है।

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❤️ अध्याय 3 : घनानंद

प्रस्तुत पाठ रीतियुगीन रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि घनानंद द्वारा रचित है। इसमें उनके दो प्रसिद्ध सवैये संकलित हैं। प्रथम छंद ‘अति सूधो सनेह को मारग है’ में कवि ने प्रेम के मार्ग को अत्यंत सीधा और सरल बताया है, जहाँ चतुराई या टेढ़ेपन की कोई जगह नहीं होती।

इस मार्ग पर वही चल सकते हैं जो अपने अहंकार को त्याग देते हैं। कवि अपनी प्रियतमा सुजान को उलाहना देते हुए कहते हैं कि वे मन भर (ज्यादा) लेते तो हैं, पर छटाँक भर (थोड़ा भी) देते नहीं। द्वितीय छंद ‘मो अँसुवानिहिं लै बरसौ’ में कवि बादलों को संबोधित करते हुए परोपकार की भावना व्यक्त करते हैं।

वे चाहते हैं कि बादल उनके विरह की वेदना और आँसुओं को लेकर सुजान के आँगन में बरसा दें, ताकि उनकी पीड़ा प्रियतमा तक पहुँच सके। घनानंद को ‘प्रेम की पीर’ का कवि कहा जाता है, जिन्होंने वियोग श्रृंगार का अत्यंत मार्मिक चित्रण ब्रजभाषा में किया है। उनकी कविता में विरह की अग्नि और हृदय की व्याकुलता का सजीव वर्णन मिलता है, जो पाठक के मन को गहराई से छू लेता है।

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❤️ अध्याय 4 : प्रेमघन (स्वदेशी)

‘स्वदेशी’ कविता भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध कवि बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त दास-वृत्ति और विदेशी सभ्यता के प्रति बढ़ते आकर्षण पर तीखा प्रहार किया है। कवि दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं कि आज भारत में कहीं भी भारतीयता दिखाई नहीं देती।

लोगों का खान-पान, वेशभूषा, चाल-चलन और भाषा सब कुछ विदेशी हो गया है। यहाँ तक कि लोग अपनी मातृभाषा हिन्दी बोलने में भी शर्म महसूस करते हैं और अंग्रेजी का गुणगान करते हैं। भारतीय लोग अब विदेशी वस्तुओं और अंग्रेजी जीवनशैली के इतने आदी हो गए हैं कि वे अपनी पहचान खो चुके हैं।

कवि उन नेताओं की भी आलोचना करते हैं जो स्वयं अपनी ढीली-ढाली धोती तक नहीं सम्हाल सकते, उनसे देश की व्यवस्था सुधारने की उम्मीद करना व्यर्थ है। समाज के चारों वर्णों में खुशामद और चाटुकारिता बढ़ गई है, जिसे कवि ने ‘डफाली’ की संज्ञा दी है। संक्षेप में, यह कविता स्वदेशी की भावना को जगाने और विदेशी मानसिक गुलामी से मुक्त होने का आह्वान करती है, जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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❤️ अध्याय 5 : सुमित्रानंदन पंत (भारतमाता)

यह अध्याय सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता ‘भारतमाता’ पर आधारित है, जो उनके काव्य संग्रह ‘ग्राम्या’ से ली गई है। कविता में कवि ने तत्कालीन पराधीन भारत का एक यथार्थवादी और मार्मिक चित्रण किया है। पंत जी भारतमाता को ‘ग्रामवासिनी’ कहते हैं, जिनका आँचल धूल से भरा और मैला है।

वे गंगा और यमुना के जल को भारतमाता के आँसुओं के रूप में देखते हैं, जो देश की दयनीय स्थिति पर उनके दुख को प्रकट करते हैं। कविता भारतवासियों की गरीबी, निरक्षरता और शोषण का वर्णन करती है, जहाँ तीस करोड़ संतानें नग्न तन और भूखी रहने को विवश हैं। देश की स्वर्ण जैसी फसलें दूसरों के पैरों तले रौंदी जा रही हैं और भारतमाता अपने ही घर में एक प्रवासिनी की तरह अपमानित महसूस कर रही हैं।

हालाँकि, अंत में कवि आशा व्यक्त करते हैं कि भारतमाता का तप और संयम सफल होगा। वे अहिंसा रूपी अमृत पिलाकर जन-मन के भय और अज्ञानता के अंधकार को दूर करेंगी। यह कविता अतीत के गौरवशाली भारत और वर्तमान के संघर्षपूर्ण यथार्थ के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए राष्ट्रवाद और मानवतावाद की भावना को जागृत करती है।

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❤️ अध्याय 6 : रामधारी सिंह दिनकर (जनतंत्र का जन्म)

यह पाठ सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित कविता ‘जनतंत्र का जन्म’ पर आधारित है। इस कविता में कवि ने आधुनिक भारत में जनतंत्र के उदय का गौरवशाली जयघोष किया है। सदियों की गुलामी और अंधकार के बाद जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो दिनकर जी ने जनता की शक्ति को रेखांकित करते हुए सिंहासन खाली करने का आह्वान किया।

कवि बताते हैं कि भारत की जनता, जो अब तक मिट्टी की अबोध मूरत की तरह चुपचाप कष्ट सहती रही है, अब जागृत हो चुकी है। कविता में स्पष्ट किया गया है कि जनतंत्र में असली राजा कोई व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि देश की तैंतीस करोड़ जनता है। कवि ने परंपरागत देवताओं को मंदिरों के बजाय खेतों और खलिहानों में काम करने वाले मजदूरों और किसानों के रूप में देखा है।

उनके अनुसार, फावड़े और हल ही अब राजदंड हैं। यह कविता जनता के सामूहिक संकल्प और उनकी अजेय शक्ति का प्रतीक है, जो समय की धारा को भी मोड़ने का सामर्थ्य रखती है। दिनकर जी की यह कृति ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो एक नवीन और सशक्त भारत के निर्माण का शिलान्यास करती है।

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❤️ अध्याय 7 : स० ही० वात्स्यायन अज्ञेय हिरोशिमा

प्रस्तुत पाठ ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय’ द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है, जो उनके कविता संग्रह ‘सदानीरा’ से ली गई है। इस कविता में कवि ने आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी मानवीय विभीषिका, यानी हिरोशिमा पर हुए परमाणु बम विस्फोट का चित्रण किया है।

कवि कहते हैं कि एक दिन क्षितिज के बजाय नगर के बीचों-बीच एक नया ‘सूरज’ (परमाणु बम) निकला, जिसकी गर्मी अंतरिक्ष से नहीं बल्कि धरती के फटने से आई थी। इस कृत्रिम सूरज ने कुछ ही क्षणों में दृश्य को सोख लेने वाली प्रज्वलित दोपहरी पैदा कर दी।

विस्फोट इतना भयानक था कि मनुष्यों की छायाएँ भी दिशाहीन हो गईं और मनुष्य स्वयं भाप बनकर उड़ गए। पत्थरों और सड़कों पर बनी काली छायाएँ आज भी उस विनाश की गवाही देती हैं।

अज्ञेय जी ने इस कविता के माध्यम से चेतावनी दी है कि मानव द्वारा बनाया गया विज्ञान ही जब मानव को नष्ट करने लगे, तो वह अत्यंत घातक सिद्ध होता है। यह कविता आज की आणविक हथियारों की होड़ और वैश्विक राजनीति के संकट के प्रति एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

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❤️ अध्याय 8 : कुँवर नारायण (एक वृक्ष की हत्या)

कुँवर नारायण द्वारा रचित यह कविता ‘एक वृक्ष की हत्या’ आधुनिक सभ्यता के विकास की अंधी दौड़ में लुप्त होते पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण है। कवि अपने घर के सामने स्थित एक पुराने नीम या चौकीदार रूपी वृक्ष के कट जाने पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं।

वे उस वृक्ष को एक बूढ़े चौकीदार के रूप में देखते हैं जो हर मौसम में घर की रक्षा के लिए तत्पर रहता था। कवि वृक्ष के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि पर्यावरण का विनाश केवल पेड़ों की कमी नहीं है, बल्कि यह पूरी सभ्यता और मनुष्यता के लिए खतरा है।

कविता में घर, शहर और देश को लुटेरों से बचाने के साथ-साथ नदियों को नाला होने से, हवा को धुआं होने से और अंततः मनुष्य को जंगल (हिंसक) होने से बचाने की चिंता प्रकट की गई है। यह रचना आज के वैश्विक संकट, जैसे जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक असंतुलन, की ओर संकेत करती है और पाठकों को सचेत करती है कि यदि हमने प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो मानव अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

कवि के अनुसार, वृक्ष केवल लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग है जिसे बचाना अनिवार्य है।

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❤️ अध्याय 9 : वीरेन डंगवाल (हमारी नींद)

यह अध्याय समकालीन कवि वीरेन डंगवाल द्वारा रचित कविता ‘हमारी नींद’ पर आधारित है। यह कविता ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ काव्य संग्रह से ली गई है। इसमें कवि ने सुविधाभोगी और बेपरवाह जीवन के साथ-साथ विपरीत परिस्थितियों में भी निरंतर संघर्षरत जीवन का सजीव चित्रण किया है।

कवि बताते हैं कि जब हम अपनी नींद में मग्न होते हैं, तब भी प्रकृति और जीवन का चक्र थमता नहीं है; पेड़ कुछ इंच बढ़ जाते हैं और बीज अंकुरित होकर मिट्टी को धकेलने लगते हैं। कविता में मक्खी के जीवन-क्रम के माध्यम से जीवन की नश्वरता और संघर्ष को दर्शाया गया है, जहाँ दंगों और बमबारी के बीच भी जीवन चलता रहता है। कवि गरीब बस्तियों में लाउडस्पीकर पर होने वाले देवी जागरण के जरिए सामाजिक विरोधाभासों पर कटाक्ष करते हैं।

अत्याचारियों द्वारा दमन के तमाम साधन जुटाने के बावजूद ‘हठीला जीवन’ अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है। अंत में, कवि उन लोगों की प्रशंसा करते हैं जो आज भी अन्याय के विरुद्ध साफ और मजबूत ‘इनकार’ करना नहीं भूले हैं। यह कविता मानवीय आलस्य और सामाजिक बुराइयों के बीच जीवन की अपराजेय शक्ति और प्रतिरोध की चेतना को जागृत करती है।

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❤️ अध्याय 10 : अनामिका (अक्षर-ज्ञान)

प्रस्तुत पाठ ‘अक्षर-ज्ञान’ समकालीन हिंदी कवयित्री अनामिका द्वारा रचित है, जो उनकी चर्चित श्रृंखला ‘कवि ने कहा’ से ली गई है । इस कविता में बच्चों के अक्षर सीखने की प्रारंभिक और कौतुकपूर्ण शिक्षण-प्रक्रिया का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है ।

कवयित्री बताती हैं कि कैसे एक छोटा बच्चा अक्षरों को सीखने का प्रयास करता है, जहाँ उसका ‘क’ चौखटे में नहीं समाता और कबूतर की तरह फुदक जाता है । ‘ख’ लिखते समय वह खरगोश की बेचैनी जैसा महसूस करता है, जबकि ‘ग’ गमले की तरह टूटता और ‘घ’ घड़े की तरह लुढ़कता प्रतीत होता है ।

सबसे अधिक कठिनाई उसे ‘ङ’ लिखने में होती है, जहाँ वह ‘ड’ को माँ और उसके बिंदु को गोदी में बैठा बेटा समझता है । जब वह इन्हें सही ढंग से नहीं लिख पाता, तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं ।

अनामिका जी इन आँसुओं को विफलता नहीं, बल्कि सृष्टि की विकास-कथा का ‘प्रथमाक्षर’ मानती हैं, जो सीखने की निरंतर कोशिश और संघर्ष को दर्शाता है । यह कविता बाल मनोविज्ञान और शिक्षा के प्रारंभिक संघर्ष को बहुत ही मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है ।

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❤️ अध्याय 11 : जीवनानंद दास (लौटकर आऊँगा फिर)

यह अध्याय सुप्रसिद्ध बाँग्ला कवि जीवनानंद दास की कविता ‘लौटकर आऊँगा फिर’ पर आधारित है। कविता में कवि का अपनी मातृभूमि, बंगाल के प्रति गहरा प्रेम और लगाव व्यक्त हुआ है। कवि की यह इच्छा है कि मृत्यु के पश्चात भी वे इसी बंगाल की धरती पर पुनर्जन्म लें।

वे अगले जीवन में मनुष्य न सही, पर एक अबाबील, कौवा, हंस या फिर सारस के रूप में इसी हरियाली और धान के खेतों वाली भूमि पर वापस आना चाहते हैं। कवि बंगाल की प्राकृतिक सुंदरता, जैसे बहती नदियाँ, धान के खेत, कुहरा और कपास के पेड़ों का सजीव वर्णन करते हैं। वे शाम की हवा में उड़ते उल्लू और गंदले पानी में नाव खेते लड़के जैसे दृश्यों के माध्यम से बंगाल की मिट्टी से अपनी आत्मीयता प्रकट करते हैं।

यह कविता केवल मातृभूमि के प्रति मोह नहीं, बल्कि उस परिवेश के साथ एकाकार होने की व्याकुलता है जहाँ कवि ने जन्म लिया। अंततः, कवि को विश्वास है कि वे रंगीन बादलों के बीच उड़ते सारसों के झुंड में शामिल होकर अपनी प्रिय भूमि पर अवश्य लौटेंगे। प्रयाग शुक्ल द्वारा अनूदित यह कविता अपनी बिंब-योजना और भावुकता के कारण आधुनिक साहित्य की एक विशिष्ट रचना मानी जाती है।

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❤️ अध्याय 12 : रेनर मारिया रिल्के (मेरे बिना तुम प्रभु)

प्रस्तुत अध्याय जर्मन कवि रेनर मारिया रिल्के द्वारा रचित कविता ‘मेरे बिना तुम प्रभु’ पर आधारित है। इस कविता का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध कवि धर्मवीर भारती ने किया है। यह कविता भक्त और भगवान के बीच के अटूट और परस्पर निर्भर संबंध को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

कवि का मानना है कि भक्त के बिना भगवान का अस्तित्व भी अधूरा है। वह स्वयं को भगवान का जलपात्र, मदिरा और वेश बताता है। यदि भक्त का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो ईश्वर का अर्थ और उनकी महत्ता भी संकट में पड़ जाएगी।

कवि कहता है कि भक्त ईश्वर की पादुका के समान है; उसके बिना ईश्वर के चरणों में छाले पड़ जाएँगे और वे लहूलुहान होकर भटकेंगे। कविता यह गहरा संदेश देती है कि विराट सत्य (ईश्वर) और व्यक्ति (भक्त) एक-दूसरे के पूरक हैं। भक्त की आस्था ही ईश्वर की सत्ता को गरिमा प्रदान करती है।

अंत में कवि एक गहरी आशंका व्यक्त करता है कि यदि वह (भक्त) नहीं रहेगा, तो प्रभु का क्या होगा? यह कविता आधुनिक विश्व साहित्य में रहस्यवाद और भक्ति के पावन प्रेम का एक अनूठा उदाहरण पेश करती है।

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Comments

  1. SANJEEV KUMAR PANDEY says

    April 16, 2023 at 7:58 am

    10th Hindi aur Sanskrit ka pdf Sahi nahi hai. Lagta Hai book ka photo kheech kar pdf me convert kiya gaya hai. Smart Board pe padhate Hai to Blur ho jata Hai.
    Ek Baat aur 10th History ka 8th chapter ka Hindi midium kyon Nahi dala gaya Hai.

    Reply
  2. Harsh Raj says

    December 7, 2023 at 7:44 am

    I want to download Hindi book

    Reply
    • bseb says

      December 11, 2023 at 4:45 pm

      hey @Harsh, It’s already given on this page.

      Reply

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