Bihar Board Class 8th Science Book PDF Download (विज्ञान)
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BSEB Class 8 Science (विज्ञान) Book PDF Free Download
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❤️ 1. दहन और ज्वाला : चीजों का जलना
यह अध्याय ‘दहन और ज्वाला: चीजों का जलना’ दहन की वैज्ञानिक प्रक्रिया और आग के विभिन्न पहलुओं का गहराई से वर्णन करता है। दहन एक रासायनिक अभिक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया कर ऊष्मा और प्रकाश उत्पन्न करता है। पाठ के अनुसार, दहन के लिए तीन मुख्य कारक आवश्यक हैं: ज्वलनशील पदार्थ, ऑक्सीजन की निरंतर आपूर्ति, और पदार्थ का उसके विशिष्ट ‘ज्वलन ताप’ तक पहुँचना।
ज्वलन ताप वह न्यूनतम तापमान है जिस पर कोई वस्तु जलना प्रारंभ करती है। उदाहरण के लिए, पेट्रोल का ज्वलन ताप मिट्टी के तेल से कम होता है। अध्याय में माचिस के विकास की रोचक कहानी बताई गई है, जिसमें सफेद फास्फोरस के खतरों और आधुनिक समय में सुरक्षित लाल फास्फोरस के उपयोग का उल्लेख है।
मोमबत्ती की ज्वाला का विश्लेषण करते हुए इसे तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है: बाहरी नीला क्षेत्र (पूर्ण दहन), मध्य पीला क्षेत्र (अपूर्ण दहन), और आंतरिक काला क्षेत्र। इसके अतिरिक्त, आग बुझाने के उपायों और अग्निशामक यंत्रों की कार्यप्रणाली को भी समझाया गया है। पाठ यह भी चेतावनी देता है कि बिजली या तेल से लगी आग को पानी से नहीं बुझाना चाहिए।
अंत में, ईंधन के जलने से होने वाले वायु प्रदूषण और अम्ल वर्षा के पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा की गई है, जो हमें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार होने की सीख देती है।
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❤️ 2. तड़ित और भूकंप : प्रकृति के दो भयानक रूप
यह अध्याय ‘तड़ित और भूकम्प: प्रकृति के दो भयानक रूप’ मुख्य रूप से दो प्रमुख विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं—बिजली गिरने (तड़ित) और भूकंप—के वैज्ञानिक आधार और उनसे बचाव के प्रभावी तरीकों पर विस्तृत चर्चा करता है। पाठ की शुरुआत में तड़ित की भौतिक प्रक्रिया को बादलों के बीच रगड़ के कारण उत्पन्न विद्युत आवेशों के संचय और विसर्जन के रूप में विस्तार से समझाया गया है। प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन के योगदान का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि किस प्रकार उन्होंने पतंग के प्रयोग द्वारा बिजली की विद्युत प्रकृति को सिद्ध किया।
अध्याय में विद्युत आवेश के दो प्रकारों, धनावेश और ऋणावेश, तथा उनके मध्य होने वाले आकर्षण एवं विकर्षण के व्यवहार को विभिन्न सरल स्कूली प्रयोगों और क्रियाकलापों द्वारा स्पष्ट किया गया है। इसके अतिरिक्त, ऊँची इमारतों को आकाशीय बिजली के घातक प्रभाव से सुरक्षित रखने हेतु ‘तड़ित चालक’ की बनावट और उसकी कार्यप्रणाली पर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकाश डाला गया है। अध्याय का दूसरा महत्वपूर्ण खंड भूकंप को समर्पित है, जिसमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना, टेक्टोनिक प्लेटों की गति और उनके आपस में टकराने या रगड़ने से उत्पन्न होने वाले कंपन की व्याख्या की गई है।
भूकंप की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर पैमाने और सीस्मोग्राफ यंत्र के ऐतिहासिक विकास और महत्व को भी बताया गया है। अंततः, पाठकों को भूकंप जैसी आपदा के समय स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं, जैसे कि किसी मजबूत मेज या पलंग के नीचे शरण लेना, भारी वस्तुओं से दूर रहना या खुले मैदान में चले जाना, ताकि जान-माल की संभावित क्षति को न्यूनतम किया जा सके। यह पाठ छात्रों को प्राकृतिक परिघटनाओं के प्रति वैज्ञानिक समझ विकसित करने और आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक रहने की महत्वपूर्ण शिक्षा देता है।
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❤️ 3. फसल उत्पादन एवं प्रबंधन कृषि वैज्ञानिक रेवण
यह अध्याय कृषि और फसल प्रबंधन की बुनियादी प्रक्रियाओं का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें विस्तार से बताया गया है कि भोजन सभी जीवित प्राणियों के लिए अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता है और बड़े पैमाने पर उगाए जाने वाले उपयोगी पौधों को ‘फसल’ की संज्ञा दी जाती है। फसलों को उनके उत्पादन के मौसम के आधार पर तीन मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है: खरीफ (वर्षा ऋतु), रबी (शीत ऋतु) और जायद (ग्रीष्म ऋतु)।
अध्याय फसल उत्पादन के विभिन्न चरणों को क्रमानुसार और वैज्ञानिक ढंग से समझाता है। यह प्रक्रिया मिट्टी की तैयारी से प्रारंभ होती है, जिसमें जुताई, समतलीकरण और मिट्टी को पलटना शामिल है। इसके पश्चात, स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन किया जाता है और उन्हें सही गहराई पर बोया जाता है।
मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने के लिए कम्पोस्ट जैसी जैविक खाद और विशिष्ट पोषक तत्वों के लिए रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग का सुझाव दिया गया है। सिंचाई के आधुनिक तरीकों जैसे ‘छिड़काव तंत्र’ और ‘ड्रिप तंत्र’ के लाभों पर विशेष प्रकाश डाला गया है, जो जल के अपव्यय को रोककर खेती को अधिक कुशल बनाते हैं। खरपतवार नियंत्रण (निराई), फसल की समय पर कटाई और कटाई के साथ मनाए जाने वाले पारंपरिक उत्सवों का भी रोचक वर्णन है।
अंत में, अनाज को नमी, चूहों और सूक्ष्म जीवों से बचाने के लिए उचित भंडारण विधियों (जैसे साइलो और एफ.सी.आई. गोदाम) की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। साथ ही, प्राचीन भारतीय कृषि वैज्ञानिक रेवण के योगदान का उल्लेख किया गया है, जिनके कृषि सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं।
यह पाठ विद्यार्थियों को कृषि की वैज्ञानिक पद्धतियों, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के प्रति जागरूक करता है।
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❤️ 4.कपड़े तरह-तरह के : रेशे तरह तरह के
यह अध्याय ‘कपड़े तरह-तरह के : रेशे तरह-तरह के’ विज्ञान की पाठ्यपुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो वस्त्रों और उनके निर्माण में प्रयुक्त होने वाले रेशों की विस्तृत जानकारी देता है। पाठ का आरंभ ऋचा और उसके दादाजी के संवाद से होता है, जहाँ वे सूती कपड़ों के गुणों जैसे शीतलता, आराम और स्वास्थ्य के लिए उनके महत्व पर चर्चा करते हैं। साथ ही, सूती कपड़ों की समस्याओं जैसे सिलवटें पड़ना और फफूँद लगने का भी उल्लेख है।
अध्याय वस्त्रों के ऐतिहासिक विकास की यात्रा कराता है, जिसमें आदिम युग के घास-फूस और खालों से लेकर आधुनिक विद्युत चालित करघों तक की प्रगति शामिल है। भारत में कपास के प्राचीन इतिहास (मोहनजोदड़ो) और रेशम के चीनी मूल का रोचक विवरण दिया गया है। मुख्य आकर्षण संश्लेषित या कृत्रिम रेशे हैं, जिन्हें ‘जादुई रेशे’ कहा गया है।
रेयॉन (नकली रेशम), नाइलॉन, पॉलिएस्टर और ऐक्रिलिक जैसे मानव-निर्मित रेशों के निर्माण की प्रक्रिया और उनके लाभों, जैसे अधिक टिकाऊपन, कम कीमत और आसान रख-रखाव को स्पष्ट किया गया है। नाइलॉन की अद्वितीय मजबूती को पैराशूट और पहाड़ पर चढ़ने वाली रस्सियों के उदाहरण से समझाया गया है। अंत में, विभिन्न रेशों की पहचान के लिए ‘दहन परीक्षण’ का तरीका बताया गया है।
यह अध्याय छात्रों को न केवल वस्त्रों की विविधता से परिचित कराता है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण हमारे दैनिक जीवन में आए बदलावों को भी दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि कैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम विकल्पों की खोज की है और वे हमारे जीवन को सुगम बनाते हैं।
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❤️ 5. बल से ज़ोर आजमाइश
यह अध्याय ‘बल’ की मूलभूत अवधारणा, उसके प्रकारों और दैनिक जीवन में उसके प्रभावों का विस्तृत वर्णन करता है। बल का सरल अर्थ है किसी वस्तु को धक्का देना या खींचना। विज्ञान की भाषा में, बल वह प्रभाव है जो किसी वस्तु की विराम अवस्था या गति की अवस्था में परिवर्तन लाता है।
अध्याय स्पष्ट करता है कि बल हमेशा दो वस्तुओं की अन्योन्य क्रिया (interaction) के कारण उत्पन्न होता है। इसके मुख्य प्रभावों में वस्तु की आकृति बदलना, स्थिर वस्तु को गतिशील करना, गतिशील वस्तु की गति को बढ़ाना, घटाना या उसे शून्य करना और गति की दिशा बदलना शामिल है। बल को उसकी प्रबलता या परिमाण और दिशा के आधार पर पहचाना जाता है, इसलिए यह एक सदिश राशि है।
बल को मापने की इकाई ‘न्यूटन’ है। अध्याय बलों को ‘सम्पर्क बल’ (जैसे पेशीय बल और घर्षण बल) और ‘असम्पर्क बल’ (जैसे गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय और विद्युत बल) में वर्गीकृत करता है। पेशीय बल हमारे शरीर की मांसपेशियों द्वारा लगाया जाता है, जबकि घर्षण बल दो सतहों के बीच गति का विरोध करता है।
गुरुत्वाकर्षण बल ब्रह्मांड के सभी पिंडों के बीच उनके द्रव्यमान के कारण लगता है, जिसके कारण पृथ्वी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। अंत में, यह अध्याय विभिन्न प्रयोगों और उदाहरणों जैसे रस्साकशी, क्रिकेट और गिरते हुए सेब के माध्यम से बल के विज्ञान को समझाता है।
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❤️ 6.घर्षण के कारण
यह अध्याय घर्षण बल की अवधारणा, इसके कारणों और दैनिक जीवन में इसके महत्व की विस्तार से व्याख्या करता है। घर्षण वह विरोधी बल है जो दो वस्तुओं की परस्पर संपर्क वाली सतहों के बीच सापेक्ष गति का विरोध करता है।
जब हम किसी गतिशील वस्तु जैसे गेंद या साइकिल पर बाह्य बल लगाना बंद कर देते हैं, तो सतहों के बीच घर्षण के कारण ही उसकी गति धीरे-धीरे कम होकर शून्य हो जाती है। यह बल हमेशा गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है और सतहों की सूक्ष्म अनियमितताओं के आपस में फँसने के कारण उत्पन्न होता है।
अध्याय में घर्षण के विभिन्न प्रकारों जैसे स्थैतिक घर्षण और सर्पी घर्षण का वर्णन किया गया है, साथ ही यह भी बताया गया है कि सर्पी घर्षण का मान स्थैतिक घर्षण से कम होता है। घर्षण को एक ‘अनिवार्य बुराई’ माना गया है क्योंकि यह जहाँ एक ओर ऊर्जा का अपव्यय करता है और मशीनों के पुर्जों को घिस देता है, वहीं दूसरी ओर इसके बिना हमारा चलना, लिखना या वाहनों का रुकना संभव नहीं होता।
घर्षण को आवश्यकतानुसार कम करने के लिए स्नेहक (तेल, ग्रीज) और बॉल बेयरिंग का उपयोग किया जाता है, जबकि इसे बढ़ाने के लिए टायरों और जूतों में खाँचे बनाए जाते हैं। अंत में, तरल पदार्थों (गैस और द्रव) द्वारा लगाए जाने वाले घर्षण बल जिसे ‘कर्षण’ कहते हैं, और वस्तुओं की धारा रेखीय आकृति के लाभों पर भी चर्चा की गई है।
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❤️ 7. सूक्ष्म जीवों का संसार : सूक्ष्मदर्शी द्वारा आँखों देखा
यह अध्याय सूक्ष्मजीवों के अद्भुत और अदृश्य संसार का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। सूक्ष्मजीव वे छोटे जीव हैं जिन्हें हम अपनी नंगी आँखों से नहीं देख सकते और जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) की आवश्यकता होती है। सूक्ष्मजीवों को मुख्य रूप से चार वर्गों में बाँटा गया है: जीवाणु, प्रोटोजोआ, कवक और शैवाल।
इसके अतिरिक्त विषाणु (वायरस) भी होते हैं, जो सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी माने जाते हैं। अध्याय में सूक्ष्मजीवों की हमारे जीवन में भूमिका को ‘मित्र’ और ‘शत्रु’ के रूप में समझाया गया है। मित्रवत सूक्ष्मजीव दही, पनीर, ब्रेड और शराब बनाने में मदद करते हैं।
वे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और कचरे के अपघटन द्वारा पर्यावरण को साफ रखने में भी सहायक होते हैं। पेनिसिलिन जैसे प्रतिजैविक और विभिन्न टीकों का निर्माण भी इन्हीं से होता है। दूसरी ओर, हानिकारक सूक्ष्मजीव मनुष्य, पौधों और जानवरों में हैजा, क्षय रोग, मलेरिया और पोलियो जैसी बीमारियाँ फैलाते हैं।
वे भोजन को विषाक्त (फूड पॉइजनिंग) भी कर सकते हैं। अध्याय में खाद्य परिरक्षण की विधियों जैसे नमक, चीनी, तेल, सिरका और पॉश्चरीकरण के बारे में बताया गया है। अंत में, नाइट्रोजन स्थिरीकरण और नाइट्रोजन चक्र की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की गई है, जो वायुमंडल में नाइट्रोजन के संतुलन को बनाए रखता है।
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❤️ 8. दाब और बल का आपसी संबंध
यह अध्याय ‘दाब और बल का आपसी सम्बंध’ भौतिक विज्ञान की आधारभूत अवधारणाओं – दाब (Pressure) और बल (Force) – के बीच के गहरे अंतर्संबंधों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है। पाठ की शुरुआत बहुत ही सरल और व्यावहारिक उदाहरणों से होती है, जैसे खाट पर लेटने और खड़े होने की स्थितियों के बीच शारीरिक भार और क्षेत्रफल के प्रभाव का अंतर। वैज्ञानिक रूप से, दाब को प्रति एकांक क्षेत्रफल पर आरोपित होने वाले बल के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका गणितीय सूत्र ‘दाब = बल / क्षेत्रफल’ है।
इसका एस.आई. मात्रक पास्कल (Pascal) है। अध्याय विस्तार से समझाता है कि यदि बल का मान समान रहे, तो संपर्क क्षेत्रफल कम होने पर दाब बढ़ जाता है, यही कारण है कि सुई की नोक नुकीली और चाकू की धार तेज बनाई जाती है।
इसके विपरीत, क्षेत्रफल बढ़ाने पर दाब का मान कम हो जाता है, जिससे ट्रैक्टर के चौड़े टायर और भवनों की नींव चौड़ी बनाई जाती है। अध्याय में केवल ठोस ही नहीं, बल्कि तरल पदार्थों (द्रव और गैस) द्वारा लगाए जाने वाले दाब का भी विस्तृत विवेचन है। पास्कल के नियम के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि तरल पदार्थ सभी दिशाओं में समान रूप से दाब आरोपित करते हैं।
द्रवों के संदर्भ में गहराई बढ़ने के साथ दाब में होने वाली वृद्धि और ‘उत्प्लावन बल’ (Buoyancy) के प्रभाव को विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा समझाया गया है। अंत में, वायुमंडलीय दाब की अवधारणा, इसकी विशालता और हमारे दैनिक जीवन में इसके महत्व की चर्चा की गई है। यह अध्याय प्रयोगों और चित्रों के माध्यम से विज्ञान के इन आधारभूत नियमों को समझने के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शन प्रदान करता है।
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❤️ 9. ईंधन हमारी ज़रूरत
यह अध्याय ‘ईंधन : हमारी जरूरत’ मानव जीवन में ईंधन की महत्ता, उनके विभिन्न प्रकारों और स्रोतों का व्यापक विवरण प्रदान करता है। विज्ञान की दृष्टि से ईंधन वे पदार्थ हैं जो दहन के पश्चात ऊष्मा और प्रकाश के रूप में ऊर्जा मुक्त करते हैं। पाठ में ईंधनों का वर्गीकरण उनकी भौतिक अवस्था (ठोस, द्रव, गैस) और उनकी उत्पत्ति (प्राथमिक जैसे लकड़ी, कोयला और द्वितीयक जैसे कोक, एलपीजी) के आधार पर किया गया है।
इसमें कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के लाखों वर्षों में बनने की जटिल प्रक्रिया, जिसे कार्बनीकरण कहा जाता है, को विस्तार से समझाया गया है। कोयले के शोधन से प्राप्त महत्वपूर्ण उत्पादों जैसे कोक, कोलतार और कोयला गैस के औद्योगिक उपयोगों की चर्चा की गई है। पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन द्वारा प्राप्त पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और पैराफिन मोम जैसे घटकों के महत्व को भी रेखांकित किया गया है।
अध्याय पर्यावरण संरक्षण हेतु संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) के उपयोग को बढ़ावा देता है क्योंकि यह एक स्वच्छ ईंधन है। अंततः, यह लेख पाठकों को सचेत करता है कि जीवाश्म ईंधन सीमित हैं और उनके अत्यधिक उपयोग से ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ता है। इसलिए, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय संसाधनों को अपनाने और ईंधन की बचत करने के व्यावहारिक तरीकों पर विशेष बल दिया गया है ताकि भविष्य की पीढ़ियों का जीवन सुरक्षित रहे।
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❤️ 10. विधुत धारा के रसायनिक प्रभाव
यह अध्याय ‘विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव’ पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि न केवल ठोस, बल्कि कुछ द्रव भी विद्युत के सुचालक होते हैं। अध्याय की शुरुआत द्रवों की चालकता परीक्षण से होती है, जिसमें नींबू के रस, सिरके और नल के पानी जैसे द्रवों का उपयोग किया गया है।
यह स्पष्ट किया गया है कि आसुत जल (distilled water) विद्युत का अल्प चालक होता है, लेकिन नमक या अन्य लवण मिलाने पर यह सुचालक बन जाता है। अध्याय में मुख्य रूप से दो प्रक्रियाओं का वर्णन है: विद्युत अपघटन और विद्युत लेपन। विलियम निकलसन के प्रयोग के माध्यम से समझाया गया है कि पानी से विद्युत धारा गुजारने पर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के बुलबुले बनते हैं।
यह विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव है। इसके अलावा, विद्युत लेपन (electroplating) की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है, जिसके द्वारा किसी धातु पर दूसरी धातु की परत चढ़ाई जाती है, जैसे लोहे पर क्रोमियम या जिंक की परत चढ़ाना ताकि जंग न लगे। यह तकनीक गहनों और साइकिल के हिस्सों को चमकदार बनाने के लिए भी उपयोगी है।
अंत में, सर हम्फ्री डेवी द्वारा पोटेशियम और सोडियम जैसी धातुओं की खोज का उल्लेख है। यह पाठ विद्यार्थियों को विद्युत के व्यावहारिक और वैज्ञानिक अनुप्रयोगों को समझने में मदद करता है।
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❤️ 11. प्रकाश का खेल
‘प्रकाश के खेल’ अध्याय प्रकाश के भौतिक सिद्धांतों और मानव नेत्र की जटिल कार्यप्रणाली का एक विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें मुख्य रूप से प्रकाश के परावर्तन के नियमों को विस्तार से समझाया गया है, जिसके अनुसार आपतन कोण और परावर्तन कोण सदैव समान होते हैं, तथा आपतित किरण, परावर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलम्ब एक ही समतल में स्थित होते हैं।
पाठ में दर्पणों के माध्यम से नियमित परावर्तन और खुरदरी सतहों से होने वाले विसरित परावर्तन के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है। अध्याय में बहु-परावर्तन की रोचक अवधारणा के माध्यम से बहुमूर्तिदर्शी (कैलिडोस्कोप) के निर्माण और उसके द्वारा बनने वाले आकर्षक एवं बदलते हुए पैटर्नों का वर्णन किया गया है।
मानव नेत्र की जटिल आंतरिक संरचना, जिसमें कॉर्निया, आइरिस, पुतली, लेंस और रेटिना जैसे महत्वपूर्ण भाग शामिल हैं, की कार्यविधि को बहुत ही सरलता से समझाया गया है। आँखों की सुरक्षा के लिए उचित दूरी पर पढ़ना, तेज रोशनी के सीधे प्रभाव से बचाव और विटामिन ‘ए’ युक्त आहार के महत्व पर विशेष बल दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, दृष्टिबाधित लोगों की सहायता के लिए लुई ब्रेल द्वारा विकसित ‘ब्रेल लिपि’ के महत्व और समाज के कल्याण के लिए नेत्रदान जैसे नेक मानवीय योगदान की चर्चा की गई है। यह पाठ न केवल विद्यार्थियों का वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ाता है, बल्कि उन्हें सामाजिक संवेदनशीलता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने के लिए भी प्रेरित करता है।
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❤️ 12. पौधों और जंतुओं का संरक्षण : जैव विविधता
यह अध्याय ‘पौधों और जन्तुओं का संरक्षण : जैव विविधता’ प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में विभिन्न जीवों और वनस्पतियों के अपरिहार्य महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालता है। एक संवादात्मक कहानी के माध्यम से बच्चों को जैव विविधता की बुनियादी अवधारणा समझाई गई है, जो पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विविध प्रजातियों, उनके आपसी संबंधों और पर्यावरण के साथ उनके जुड़ाव को परिभाषित करती है।
लेखक चिंता व्यक्त करते हैं कि वनों की अंधाधुंध कटाई से जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनेक अनमोल प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। अध्याय में वन्य जीवन की सुरक्षा के लिए अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका को स्पष्ट किया गया है, जहाँ जीवों को शिकार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाती है।
भारत को विश्व के समृद्ध जैव-विविधता वाले देशों में गिनाते हुए, यहाँ के प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों जैसे उत्तराखंड के जिम कार्बेट, असम के काजीरंगा और बिहार के वाल्मिकी अभयारण्य का विशेष उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त, बाघों के लिए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और गांगेय डॉल्फिन को ‘राष्ट्रीय जलीय जीव’ घोषित करने जैसे सरकारी प्रयासों की जानकारी दी गई है।
पाठ में डोडो और डायनासोर जैसे विलुप्त जीवों के उदाहरणों और संकटापन्न प्रजातियों के रिकॉर्ड वाली ‘रेड डाटा बुक’ के महत्व पर भी चर्चा की गई है। अंततः, पर्यावरण असंतुलन को रोकने हेतु वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी को एकमात्र स्थायी समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हुए, यह पाठ विद्यार्थियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा देता है।
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❤️ 13. तारे और सूर्य का परिवार
यह अध्याय ‘तारे और सूर्य का परिवार’ खगोलीय पिंडों और सौर मंडल की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। इसमें प्राचीन मान्यताओं से लेकर आधुनिक खगोलीय अवधारणाओं के विकास की चर्चा की गई है, जैसे निकोलस कॉपरनिकस का सूर्य केंद्रित मॉडल और गैलीलियो के दूरबीन द्वारा किए गए प्रेक्षण।
अध्याय में पृथ्वी के घूर्णन, दिन-रात की प्रक्रिया और चंद्रमा की कलाओं (पूर्णिमा से अमावस्या तक) को सरल क्रियाकलापों के माध्यम से समझाया गया है। मुख्य रूप से यह सौर मंडल के सभी आठ ग्रहों—बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून—की विशेषताओं का वर्णन करता है।
इसमें बताया गया है कि सूर्य ऊर्जा का मुख्य स्रोत है और पृथ्वी एकमात्र ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन संभव है। इसके अतिरिक्त, तारों के समूह जिन्हें ‘तारामंडल’ (जैसे सप्तऋषि और ओरायन) कहा जाता है, और ध्रुव तारे की स्थिति पहचानने के तरीके बताए गए हैं।
अध्याय में अन्य आकाशीय पिंडों जैसे क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं, उल्काओं और कृत्रिम उपग्रहों (जैसे आर्यभट्ट और एडुसेट) के महत्व और उनके कार्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। अंत में, यह ब्रह्मांड की विशालता और आकाशगंगा (मिल्की-वे) की अवधारणा को स्पष्ट करता है, जिससे विद्यार्थियों को अंतरिक्ष विज्ञान की आधारभूत समझ मिलती है।
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❤️ 14. कोशिकाएं : हर जीव की आधारभूत संरचना
यह पाठ ‘कोशिकाएँ : हर जीव की आधारभूत संरचना’ सजीवों की मूलभूत इकाई, कोशिका, के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। जिस प्रकार एक भवन का निर्माण ईंटों से होता है, उसी प्रकार सभी सजीवों का शरीर कोशिकाओं से बना होता है। कोशिका सजीवों की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है।
इसकी खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने 1665 में कॉर्क की पतली काट का सूक्ष्मदर्शी से अध्ययन करते समय की थी। सजीवों को उनके शरीर में मौजूद कोशिकाओं की संख्या के आधार पर एककोशिकीय (जैसे अमीबा, पैरामीशियम) और बहुकोशिकीय (जैसे मनुष्य, पेड़-पौधे) जीवों में वर्गीकृत किया जा सकता है। कोशिकाएँ इतनी सूक्ष्म होती हैं कि उन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही देखा जा सकता है।
कोशिका के मुख्य तीन भाग होते हैं: कोशिका झिल्ली, कोशिका द्रव्य और केन्द्रक। पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर एक अतिरिक्त परत होती है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो उन्हें सुरक्षा और दृढ़ता प्रदान करती है। केन्द्रक कोशिका की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है और आनुवंशिक गुणों का वाहक होता है।
कोशिका द्रव्य में विभिन्न अंगक जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, रिक्तिकाएँ और लवक (प्लास्टिड) पाए जाते हैं। पौधों में हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) प्रकाश संश्लेषण के लिए जिम्मेदार होता है। यह पाठ जंतु और पादप कोशिकाओं के बीच मुख्य अंतरों को भी स्पष्ट करता है।
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❤️ 15. जंतुओं में प्रजनन
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❤️ 16. धातु और आधातु
यह अध्याय ‘धातु और अधातु’ हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले विभिन्न पदार्थों के वैज्ञानिक वर्गीकरण और उनके विशिष्ट गुणों पर विस्तार से प्रकाश डालता है। मानव विकास में धातुओं का इतिहास अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण रहा है, जहाँ शुरूआती दौर में पत्थर और लकड़ी के बाद ताँबा और लोहा जैसी धातुओं की खोज ने औजारों के निर्माण में क्रांति ला दी थी। अध्याय में धातुओं के मुख्य भौतिक गुणों का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी विशिष्ट चमक, कठोरता, आघातवर्ध्यता (पीटकर पतली चादर में बदलना) और तन्यता (खींचकर तार बनाना)।
धातुएँ ऊष्मा और विद्युत की उत्कृष्ट सुचालक होती हैं, जिसके कारण इनका उपयोग बिजली के तारों और खाना पकाने के बर्तनों में किया जाता है। अपवाद स्वरूप पारा सामान्य तापमान पर द्रव अवस्था में पाया जाता है। इसके विपरीत, अधातुएँ चमकहीन, भंगुर होती हैं और विद्युत की कुचालक होती हैं।
रासायनिक दृष्टि से, धातुएँ ऑक्सीजन के साथ क्रिया कर क्षारीय ऑक्साइड बनाती हैं (जैसे लोहे में जंग लगना), जबकि अधातुएँ अम्लीय ऑक्साइड का निर्माण करती हैं। अध्याय में विस्थापन अभिक्रियाओं के सिद्धांतों को भी विस्तार से समझाया गया है, जिसके अनुसार एक अधिक सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु को उसके यौगिक से विस्थापित कर देती है। अंत में, धातुओं और अधातुओं की दैनिक जीवन में व्यापक उपयोगिता जैसे कृषि यंत्रों, मशीनरी, आभूषणों, उर्वरकों और यहाँ तक कि मानव शरीर में हीमोग्लोबिन के रूप में उनके महत्वपूर्ण योगदान को विस्तार से रेखांकित किया गया है।
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❤️ 17. किशोरावस्था की ओर : अब आप बड़ी हो रही हैं / बड़े हो रहे हैं
‘किशोरावस्था की ओर’ नामक यह अध्याय विज्ञान की पुस्तक से लिया गया है, जो 11 से 19 वर्ष की आयु के बीच होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों पर केंद्रित है। इसे ‘टीनएज’ भी कहा जाता है, जो बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के बीच का एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल है। इस दौरान किशोर-किशोरियों में तीव्र शारीरिक वृद्धि होती है, विशेषकर लंबाई में।
लड़कों में मूँछ-दाढ़ी निकलना और लड़कियों में स्तनों का विकास होना ‘द्वितीयक लैंगिक लक्षण’ कहलाते हैं। ये परिवर्तन अंतःस्रावी ग्रंथियों से निकलने वाले हारमोंस, जैसे टेस्टेस्टोरान और एस्ट्रोजेन, द्वारा नियंत्रित होते हैं। अध्याय में स्वर में बदलाव, स्वेद एवं तैल ग्रंथियों की सक्रियता से मुँहासे निकलना और मानसिक विकास जैसे पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है।
प्रजनन परिपक्वता के साथ ही लड़कियों में ऋतुस्राव चक्र (M.C.) का प्रारंभ होता है, जिसे रजोदर्शन कहते हैं। यह अध्याय किशोरों को संतुलित पोषण और व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति जागरूक करता है, क्योंकि इस अवस्था में शरीर को अधिक ऊर्जा और देखरेख की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, इसमें सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तनों तथा भारत में विवाह के लिए निर्धारित कानूनी आयु के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है ताकि युवा पीढ़ी स्वस्थ और जिम्मेदार बन सके।
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❤️ 18. ध्वनियाँ तरह-तरह की
यह अध्याय ‘ध्वनियाँ तरह-तरह की’ ध्वनि के मूलभूत सिद्धांतों और उसके व्यावहारिक पहलुओं का विस्तृत वर्णन करता है। पाठ की शुरुआत इस तथ्य से होती है कि ध्वनि का जन्म वस्तुओं के कंपन (vibration) से होता है। उदाहरण के लिए, जब हम किसी थाली पर प्रहार करते हैं या रबर बैंड को खींचकर छोड़ते हैं, तो उत्पन्न कंपन ही हमें ध्वनि के रूप में सुनाई देता है।
मनुष्य के संदर्भ में, ध्वनि कंठ में स्थित वाक्-तंतुओं के कंपन द्वारा पैदा होती है। अध्याय यह भी स्पष्ट करता है कि ध्वनि के संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस जैसे किसी भौतिक माध्यम की अनिवार्य आवश्यकता होती है। ध्वनि निर्वात में यात्रा नहीं कर सकती।
मानव कान की संरचना का वर्णन करते हुए बताया गया है कि कैसे कर्ण पल्लव कंपनों को ग्रहण करता है और वे मस्तिष्क तक संकेतों के रूप में पहुँचते हैं। ध्वनि के मुख्य गुणों में आयाम, आवर्तकाल और आवृत्ति शामिल हैं। आयाम ध्वनि की प्रबलता (loudness) को और आवृत्ति उसके तारत्व (pitch) को निर्धारित करती है।
मानव कान की श्रव्य सीमा 20 Hz से 20,000 Hz तक होती है। अप्रिय ध्वनियों को ‘शोर’ की श्रेणी में रखा गया है, जिससे ध्वनि प्रदूषण होता है। यह प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और अनिद्रा, तनाव या स्थायी श्रवण दोष जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
अतः, ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने और शांत वातावरण बनाए रखने के लिए सचेत प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।
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❤️ 19. वायु और जल प्रदूषण की समस्या
यह अध्याय ‘वायु एवं जल प्रदूषण की समस्या’ पृथ्वी पर जीवन के लिए अनिवार्य वायु और जल की शुद्धता बनाए रखने के महत्व पर बल देता है। लेखक वायुमंडल के संघटन की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि कैसे औद्योगिक विकास, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि और मानवीय हस्तक्षेप ने प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ दिया है।
वायु प्रदूषण के प्रमुख कारकों के रूप में कल-कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ, वाहनों के जहरीले उत्सर्जन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों के हानिकारक प्रभावों का विस्तृत वर्णन किया गया है। अध्याय में ‘भोपाल गैस कांड’ और ‘अम्ल वर्षा’ (Acid Rain) जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से प्रदूषण की भयावहता को रेखांकित किया गया है, जिसके कारण ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध धरोहरों की सफेदी फीकी पड़ रही है और स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
इसके अतिरिक्त, पाठ में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) द्वारा ओजोन परत के क्षरण और हरित गृह प्रभाव (Greenhouse Effect) के कारण बढ़ते भू-तापन (Global Warming) की चुनौतियों के प्रति सचेत किया गया है। जल प्रदूषण के खंड में नदियों, विशेषकर गंगा, में कचरे, मलमूत्र और औद्योगिक अपशिष्टों के विसर्जन से होने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा है।
यह स्पष्ट किया गया है कि पृथ्वी पर उपलब्ध स्वच्छ पेयजल की मात्रा अत्यंत सीमित है। अंत में, प्रदूषण कम करने के लिए सीएनजी (CNG) का उपयोग, व्यापक वृक्षारोपण, सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को अपनाने और जन-जागरूकता के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
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VILL-MAFI,POST+p s -warisaliganj , district Nawada
hey @Rahul, how can I help you?
Science ki book download nahi ho pa rahi hai
Download Nahin ho raha hai book
hey @Bittu, Sorry for the inconvenience.
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