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Bihar Board Books

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Bihar Board 8th Hindi Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb 3 Comments

Bihar Board 8th Hindi Book 2026 PDF Download

Bihar Board 8th Hindi Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 8th के छात्रों के लिए “ Hindi (किसलय)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 8 Hindi (किसलय) Book PDF Free Download

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❤️ 1. तू ज़िंदा तो है

यह कविता ‘तू ज़िन्दा है तो………’ सुप्रसिद्ध गीतकार शंकर शैलेन्द्र द्वारा रचित है। यह कविता पाठकों में जीवन के प्रति गहरा उत्साह और उमंग भरती है। कवि मनुष्य को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि यदि तुम जीवित हो, तो तुम्हें जीवन की जीत में पूरा विश्वास रखना चाहिए।

जीवन में आने वाले दुख और कष्ट केवल कुछ समय के लिए होते हैं; जैसे अतीत के हजारों दिन बीत गए, वैसे ही ये कठिन समय भी गुजर जाएगा। कवि का मानना है कि यदि स्वर्ग कहीं है, तो हमें अपने परिश्रम और संकल्प से उसे इस धरती पर उतार लाना चाहिए। कविता में मनुष्य को आशावादी बनने का संदेश दिया गया है।

कवि कहते हैं कि मौत ने कई बार मनुष्य को छला, लेकिन मनुष्य की जिजीविषा हमेशा विजयी रही है। नई सुबह हमेशा एक नई उम्र और नई ऊर्जा लेकर आती है। हमें मुसीबतों का डटकर सामना करना चाहिए और अपने कारवां को मंजिल की ओर ले जाना चाहिए।

जुल्म और अत्याचार के महल एक दिन ढह जाएंगे और फिर से नई दुनिया का निर्माण होगा। यह कविता भूख, रोग और गरीबी के खिलाफ संघर्ष करने और समाज में क्रांति (इंकलाब) लाने की प्रेरणा देती है। अंततः, यह संघर्षशील जीवन की जयगाथा है।

 

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❤️ 2. ईदगाह

प्रेमचंद द्वारा रचित कालजयी कहानी ‘ईदगाह’ बाल मनोविज्ञान, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं का एक मार्मिक चित्रण है। यह कहानी एक चार-पाँच साल के निर्धन अनाथ बालक हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के इर्द-गिर्द बुनी गई है। ईद के पावन अवसर पर गाँव में चारों ओर उल्लास का वातावरण है, लेकिन अमीना अपने घर की दरिद्रता को लेकर दुखी है।

हामिद के पास मेले में खर्च करने के लिए केवल तीन पैसे हैं। मेले में उसके मित्र महमूद, मोहसिन और नूरे मिट्टी के आकर्षक खिलौने खरीदते हैं और मिठाइयों का आनंद लेते हैं। हामिद भी ललचाता है, परंतु वह अपनी इच्छाओं का दमन करते हुए अपने विवेक का परिचय देता है।

उसे याद आता है कि तवे से रोटियाँ उतारते समय उसकी दादी की उंगलियाँ जल जाती हैं। वह खिलौने और मिठाई छोड़कर अपनी दादी के लिए एक लोहे का चिमटा खरीदता है। हामिद का यह निःस्वार्थ त्याग उसके चरित्र की महानता को उजागर करता है।

हालाँकि उसके साथी उसके चिमटे का उपहास करते हैं, लेकिन हामिद अपने तर्कपूर्ण संवादों से चिमटे को ‘रुस्तमे-हिंद’ और सभी खिलौनों का राजा साबित कर देता है। जब वह घर पहुँचता है, तो दादी अमीना पहले तो उसकी नासमझी पर क्रोधित होती हैं, किंतु चिमटा खरीदने का कारण जानकर उनका हृदय पिघल जाता है। वे रोते हुए हामिद को गले लगा लेती हैं।

यह कहानी बखूबी दिखाती है कि कैसे अभावग्रस्त जीवन एक बच्चे को समय से पहले वयस्क और संवेदनशील बना देता है।

 

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❤️ 3. कर्मवीर

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित कविता ‘कर्मवीर’ व्यक्ति के जीवन में परिश्रम और संकल्प के महत्व को रेखांकित करती है। कवि के अनुसार, एक सच्चा कर्मवीर वह है जो जीवन की विविध बाधाओं और कठिन परिस्थितियों को देखकर कभी घबराता नहीं है। वह भाग्य के भरोसे बैठकर दुःख नहीं भोगता और न ही पछताता है, बल्कि अपने पुरुषार्थ से अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करता है।

कर्मवीर व्यक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आज के कार्य को कल पर कभी नहीं टालता। उसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता। वह सबकी सुनता है, लेकिन अपने मन की प्रेरणा से कार्य करता है।

ऐसे व्यक्ति चिलचिलाती धूप को भी चाँदनी बनाने का सामर्थ्य रखते हैं और कठिन चुनौतियों को हँसते-हँसते स्वीकार करते हैं। वे अपनी बुद्धि और कठिन परिश्रम से मरुभूमि में नदियाँ बहाने और घने जंगलों में भी खुशहाली लाने की क्षमता रखते हैं। वे असंभव को भी संभव कर दिखाते हैं।

हीरा और काँच के उदाहरण के माध्यम से कवि ने उनके व्यक्तित्व की निखार को दर्शाया है। अंततः, कवि का मानना है कि जिस देश या समाज में ऐसे परिश्रमी और निष्ठावान सपूत जन्म लेते हैं, उस देश की उन्नति और गौरव में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। यह कविता हमें बाधाओं से न डरने और निरंतर कर्मरत रहने की शिक्षा देती है, क्योंकि कर्मनिष्ठा ही उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है।

 

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❤️ 4. बालगोबिन भगत

रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘बालगोबिन भगत’ एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक रेखाचित्र है। इस पाठ का मुख्य पात्र, बालगोबिन भगत, एक ऐसा गृहस्थ है जो साधु की वास्तविक परिभाषा को चरितार्थ करता है। वे कबीरपंथी विचारधारा के अनुयायी थे और कबीर को ही अपना ‘साहब’ मानते थे।

उनकी भक्ति बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके शुद्ध आचरण और निस्वार्थ जीवन शैली में झलकती थी। भगत का संगीत जादुई था, जो गाँव के लोगों को हर मौसम में स्फूर्ति और आध्यात्मिकता से भर देता था। उनकी खँजड़ी की थाप और मधुर स्वर गाँव के वातावरण को जीवंत बना देते थे।

लेखक ने भगत के चरित्र के माध्यम से समाज की संकीर्ण रूढ़िवादी परंपराओं पर गहरी चोट की है। जब उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु हुई, तो उन्होंने विलाप करने के स्थान पर इसे ‘आत्मा का परमात्मा से मिलन’ कहा और उत्सव मनाने का संदेश दिया। उन्होंने स्वयं अपनी पुत्रवधू से पुत्र की चिता को अग्नि दिलवाई और बाद में उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए उसके भाई को उसे साथ ले जाकर दूसरी शादी कराने का कठोर निर्देश दिया।

बालगोबिन भगत का संपूर्ण जीवन और उनकी संगीतपूर्ण मृत्यु यह संदेश देती है कि सच्चा सन्यास मन की पवित्रता, लोक-मंगल की भावना और सामाजिक सुधार के प्रति अटूट समर्पण में निहित है।

 

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❤️ 5. हुंड्रू का जलप्रपात

‘हुंडरू का जलप्रपात’ कामता प्रसाद सिंह ‘काम’ द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली यात्रा वृतांत है, जो छोटानागपुर की बेमिसाल प्राकृतिक छटा और आदिवासी संस्कृति को प्रदर्शित करता है। लेखक ने छोटानागपुर को ‘स्वर्ग का एक टुकड़ा’ कहा है, जहाँ की धरती खनिज संपदा और नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। इस पाठ में मुख्य रूप से स्वर्णरेखा नदी पर स्थित प्रसिद्ध हुंडरू जलप्रपात का वर्णन किया गया है, जिसकी ऊँचाई 243 फुट है।

लेखक के अनुसार, मंजिल तक पहुँचने वाला रास्ता भी उतना ही पवित्र और सुंदर होना चाहिए जितनी की मंजिल। राँची से हुंडरू की यात्रा के दौरान मिलने वाले जंगल, पहाड़ और लहलहाते खेत मुसाफिरों का मन मोह लेते हैं। झरने का गिरता हुआ सफेद पानी ऐसा प्रतीत होता है जैसे पत्थर का चूर्ण गिर रहा हो या इंद्रधनुष की छटा बिखर रही हो।

लेखक ने झरने की भयंकरता और उसकी चपलता की तुलना साँप, हरिण और बाघ से की है। यहाँ प्रकृति और मनुष्य के श्रम का अनोखा संगम है, जहाँ एक ओर कोयले की खदानें हैं तो दूसरी ओर मनमोहक घाटियाँ। यह पाठ हमें सामासिक संस्कृति और प्राकृतिक संपदा के प्रति संवेदनशील बनाता है और प्रकृति की इस अलौकिक देन के प्रति हमारे मन में आदर भाव जगाता है।

यह पाठ न केवल झरने की सुंदरता का बखान करता है बल्कि पाठकों को प्रकृति की रक्षा करने और उसके सौंदर्य को सहेजने के लिए भी प्रेरित करता है।

 

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❤️ 6. बिहारी के दोहे

प्रस्तुत पाठ ‘बिहारी के दोहे’ रीतिकाल के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय कवि बिहारी लाल की काव्य प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगार रस के कवि के रूप में विख्यात हैं, परंतु उनके दोहों में भक्ति, वैराग्य और नीतिपरक उपदेशों का भी बहुत सुंदर समावेश है। कवि ने संक्षिप्त दोहों में गहरे भावों को अभिव्यक्त किया है, जिसके कारण उनकी रचनाओं को ‘गागर में सागर’ की संज्ञा दी गई है।

पाठ में संकलित दोहों में बिहारी ने ईश्वर भक्ति के सच्चे स्वरूप को स्पष्ट किया है। वे बाह्याडंबरों, जैसे माला जपना या तिलक लगाने की आलोचना करते हुए कहते हैं कि यदि मन में सच्चाई नहीं है, तो ये सब व्यर्थ हैं; राम तो केवल सच्चे मन से प्रसन्न होते हैं। कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि किस प्रकार गोपियाँ कृष्ण से बातचीत करने के आनंद के लिए उनकी मुरली छिपा देती हैं।

नैतिक शिक्षा देते हुए बिहारी कहते हैं कि मनुष्य की गति नल के पानी के समान होनी चाहिए; व्यक्ति जितना अधिक विनम्र होकर झुकता है, वह समाज में उतना ही ऊँचा और सम्मानित स्थान प्राप्त करता है। वे यह भी समझाते हैं कि व्यक्ति अपने गुणों से बड़ा होता है, केवल बड़े नाम या प्रशंसा से नहीं। उदाहरण के तौर पर, धतूरे को ‘कनक’ (सोना) कहने मात्र से उससे आभूषण नहीं गढ़े जा सकते।

अंत में, वे संदेश देते हैं कि मनुष्य को सुख और दुःख दोनों स्थितियों में ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए और विपत्ति में धैर्य नहीं खोना चाहिए।

 

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❤️ 7. ठेस

‘ठेस’ फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी आंचलिक कहानी है, जो मिथिलांचल की लोकसंस्कृति और एक स्वाभिमानी कलाकार ‘सिरचन’ के जीवन पर आधारित है। सिरचन गाँव का एक ऐसा विलक्षण कारीगर है, जिसकी कुशलता की मिसाल पूरे इलाके में दी जाती है। वह शीतलपाटी, चिक और मूँज की रस्सियाँ बनाने में माहिर है, परंतु गाँव के लोग उसे कामचोर और चटोर समझते हैं क्योंकि वह बेगार में काम करना पसंद नहीं करता और अपनी शर्तों पर जीता है।

कहानी का मुख्य मोड़ तब आता है जब लेखक की छोटी बहन मानू की विदाई के लिए सिरचन को विशेष चीजें बनाने के लिए बुलाया जाता है। काम के दौरान घर की महिलाओं द्वारा उसे तिरस्कृत और अपमानित किया जाता है, जिससे उसके संवेदनशील कलाकार मन को गहरी ‘ठेस’ लगती है। वह काम अधूरा छोड़कर चला जाता है और कसम खाता है कि वह अब कभी हाथ में कूची नहीं उठाएगा।

परंतु, मानू के प्रति उसके निस्वार्थ स्नेह और अपनी कला के प्रति समर्पण के कारण, वह स्टेशन पर मानू के जाने से पहले स्वयं द्वारा तैयार की गई सुंदर भेंटें लेकर पहुँचता है। वह मानू से उन चीजों का मूल्य लेने से साफ इनकार कर देता है, जो उसके उच्च चरित्र और कलात्मक गौरव को दर्शाता है। यह कहानी कलाकार के सम्मान, मानवीय संवेदनाओं और समाज में शिल्पकारों की स्थिति का सजीव चित्रण करती है।

यह दर्शाती है कि एक कलाकार के लिए उसकी प्रतिष्ठा और स्वाभिमान भौतिक वस्तुओं से कहीं अधिक मूल्यवान होते हैं।

 

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❤️ 8. बच्चे की दुआ

‘बच्चे की दुआ’ प्रसिद्ध कवि मोहम्मद इकबाल द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रेरणादायक प्रार्थना गीत है। इस कविता के माध्यम से एक बच्चा ईश्वर के सम्मुख अपनी पवित्र इच्छाओं को प्रकट करता है।

वह प्रार्थना करता है कि उसका जीवन एक जलती हुई शम्अ (मोमबत्ती) के समान हो, जो अज्ञानता और दुनिया के अंधेरे को मिटाकर चारों ओर ज्ञान का प्रकाश फैला सके। बच्चा अपने देश और वतन के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त करता है और उसकी शोभा बढ़ाने की कामना करता है, जिस प्रकार एक सुंदर फूल से पूरे चमन की रौनक बढ़ जाती है।

कविता में परोपकार की भावना पर विशेष बल दिया गया है; बच्चा इल्म (शिक्षा) से प्रेम करने और गरीबों, दुखियों तथा वृद्धों की सेवा और सहायता करने का संकल्प लेता है। वह ईश्वर से विनती करता है कि उसे जीवन की तमाम बुराइयों और गलत रास्तों से बचाकर रखा जाए और उसे केवल उसी मार्ग पर चलाया जाए जो नेक, सच्चा और कल्याणकारी हो।

यह रचना हमें निस्वार्थ सेवा, सहानुभूति, और नैतिकता के मार्ग पर चलने की महत्वपूर्ण शिक्षा देती है और समाज के वंचित वर्गों के प्रति संवेदनशीलता जगाती है।

 

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❤️ 9. अशोक का शस्त्रत्याग

‘अशोक का शस्त्र-त्याग’ वंशीधर श्रीवास्तव द्वारा लिखित एक अत्यंत प्रभावशाली एकांकी है, जो सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन की ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। चार वर्षों के भीषण कलिंग युद्ध के बाद भी जब अशोक विजय प्राप्त नहीं कर पाते, तब वे स्वयं युद्ध का नेतृत्व करने का निर्णय लेते हैं। युद्धभूमि में उनका सामना राजकुमारी पद्मा से होता है, जो स्त्रियों की सेना का नेतृत्व कर रही हैं।

पद्मा अशोक को युद्ध के लिए ललकारती हैं और उन्हें उनके द्वारा किए गए रक्तपात की याद दिलाती हैं। अशोक स्त्रियों पर शस्त्र उठाने से इनकार कर देते हैं, लेकिन पद्मा के तर्कों ने उन्हें युद्ध की निरर्थकता और हिंसा की विभीषिका का गहराई से अहसास कराया। अशोक का हृदय ग्लानि से भर जाता है और वे सदा के लिए शस्त्र त्यागने की घोषणा करते हैं।

वे अपनी तलवार फेंक देते हैं और अपने सैनिकों को भी ऐसा ही करने का आदेश देते हैं। अंत में, सम्राट अशोक एक बौद्ध भिक्षु के समक्ष अहिंसा, करुणा और जनकल्याण की शपथ लेते हैं। वे बौद्ध धर्म की शरण में जाकर शांति का संदेश फैलाने का संकल्प लेते हैं।

यह एकांकी यह संदेश देती है कि वास्तविक विजय शस्त्रों से नहीं, बल्कि प्रेम और अहिंसा से हृदय जीतने में है।

 

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❤️ 10. ईर्ष्या

‘ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित एक प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक निबंध है। इस निबंध में लेखक ने ईर्ष्या की प्रकृति, उसके कारणों और मानव जीवन पर पड़ने वाले उसके विनाशकारी प्रभावों का गहराई से विश्लेषण किया है। दिनकर जी के अनुसार, ईर्ष्या एक ऐसा दोष है जो मनुष्य को अपने पास उपलब्ध सुख-सुविधाओं का आनंद लेने से रोकता है और उसे दूसरों की उपलब्धियों को देखकर दुखी रहने के लिए विवश करता है।

लेखक एक वकील साहब का उदाहरण देते हैं, जो सब कुछ होने के बावजूद अपने पड़ोसी बीमा एजेंट की उन्नति से जलते रहते हैं। निबंध में ईर्ष्या को एक ‘अनोखा वरदान’ कहा गया है, क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से करता है और अभावों के दंश को झेलता है। ईर्ष्या की ‘बड़ी बेटी’ निंदा है, जिसका सहारा लेकर व्यक्ति दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है।

दिनकर जी स्पष्ट करते हैं कि ईर्ष्या सबसे पहले उसी को जलाती है जिसके हृदय में इसका जन्म होता है। यह मनुष्य के मौलिक गुणों को कुंठित कर देती है और उसके आनंद में बाधा डालती है। लेखक ने ईर्ष्या से बचने का उपाय ‘मानसिक अनुशासन’ बताया है।

वे सुझाव देते हैं कि व्यक्ति को फालतू बातों के बजाय अपने अभावों को रचनात्मक तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। जब मनुष्य में उन्नति की जिज्ञासा जागेगी, तभी वह ईर्ष्या के चंगुल से मुक्त हो पाएगा।

 

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❤️ 11. कबीर के पद

प्रस्तुत अध्याय ‘कबीर के पद’ भक्तिकाल के महान निर्गुण कवि कबीरदास की अनमोल रचनाओं का संकलन है। कबीर ने अपनी कविताओं के माध्यम से मध्यकालीन समाज में व्याप्त बाह्य आडंबरों, व्यर्थ के अनुष्ठानों और धार्मिक संकीर्णता पर कड़ा प्रहार किया है। उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रभावशाली और प्रासंगिक है जितनी वह उनके समय में थी।

पाठ में दिए गए प्रथम पद में कबीर ‘कागद की लेखी’ अर्थात शास्त्रीय ज्ञान और किताबी बातों के बजाय ‘आँखिन देखी’ यानी प्रत्यक्ष अनुभव और सत्य के सीधे साक्षात्कार पर बल देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि गुरु के सान्निध्य में ही व्यक्ति अपने भ्रमों को दूर कर सहज मार्ग पर चल सकता है। दूसरे पद में कबीर ने ईश्वर या अल्लाह के वास्तविक निवास स्थान का बोध कराया है।

उनके अनुसार, मनुष्य ईश्वर को देवालयों, मस्जिदों और कठिन योग-साधनाओं में खोजता फिरता है, जबकि वह तो स्वयं मनुष्य के भीतर ही समाया हुआ है। वे कहते हैं कि परमात्मा न तो किसी कर्मकांड में है और न ही वैराग्य धारण करने में; वह तो ‘सब साँसों की साँस’ में अर्थात प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व में विद्यमान है। यदि मनुष्य अपने अंतर्मन में झाँके, तो उसे ईश्वर पल भर में प्राप्त हो सकता है।

यह पाठ हमें सिखाता है कि सत्य और ईश्वर की प्राप्ति बाह्य प्रदर्शन से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और प्रत्यक्ष अनुभव से ही संभव है। कबीर का यह संदेश न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि समाज में भाईचारे और समानता का भाव भी जाग्रत करता है।

 

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❤️ 12. विक्रमशिला

यह निबंध प्राचीन भारत के प्रसिद्ध बौद्धकालीन शिक्षा केंद्र, विक्रमशिला विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास, उसकी समृद्ध ज्ञान परंपरा और उसकी विशिष्टताओं पर व्यापक प्रकाश डालता है। आठवीं शताब्दी के मध्य पाल वंश के सबसे प्रतापी राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित यह विश्वविद्यालय आधुनिक बिहार के भागलपुर जिले के अंतीचक गाँव में स्थित था। विक्रमशिला अपने समय का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र था, जहाँ आर्यभट और अतिश दीपंकर जैसे विश्वविख्यात विद्वान हुए, जिन्होंने विज्ञान और धर्म के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया।

इस विश्वविद्यालय की शैक्षिक कठोरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि नवागत छात्रों को प्रवेश पाने के लिए द्वारपंडितों की कठिन मौखिक परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ता था। यहाँ के छह महाविद्यालयों में तंत्र, तर्क, व्याकरण, चिकित्सा, दर्शन और शिल्प-विद्या जैसे विविध विषयों की शिक्षा दी जाती थी, जिसका मुख्य माध्यम संस्कृत भाषा थी। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय अत्यंत विशाल और दुर्लभ पांडुलिपियों से सुसज्जित था।

१०वीं-११वीं सदी तक यह संपूर्ण पूर्वी एशिया का बौद्धिक मार्गदर्शक बन चुका था। दुर्भाग्यवश, १३वीं सदी की शुरुआत में तुर्क आक्रमणकारियों ने इसे एक सैनिक दुर्ग समझकर नष्ट कर दिया। वर्तमान में, सरकारी प्रयासों और पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त अवशेष इसके प्राचीन वैभव और अलौकिक गौरव को पुनः सिद्ध कर रहे हैं।

यह पाठ हमें अपनी महान और समृद्ध शैक्षणिक विरासत से गहराई से जुड़ने और उस पर गर्व करने का अवसर प्रदान करता है।

 

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❤️ 13. दीदी की डायरी

‘दीदी की डायरी’ संजू नाम की एक नन्हीं और हँसमुख लड़की की कहानी है जो आठवीं कक्षा में पढ़ती है। संजू को पढ़ने का बहुत शौक है और वह अक्सर कहानियाँ, कविताएँ और कॉमिक्स पढ़ती रहती है। उसे डायरी लिखने की प्रेरणा महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ने से मिली।

जब उसने यह इच्छा अपने परिवार को बताई, तो उसके पिता ने उसे एक सुंदर डायरी उपहार में दी। डायरी लिखने की शुरुआत करने के लिए उसने अपनी बड़ी दीदी की डायरी पढ़ी, जिसके कुछ अंश इस पाठ में संकलित किए गए हैं। इन प्रविष्टियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक वास्तविकताओं का गहरा चित्रण किया गया है।

डायरी में एक ओर पिकनिक के आनंद और ‘तोतो-चान’ जैसी प्रेरणादायक पुस्तक का उल्लेख है, तो दूसरी ओर समाज में व्याप्त कड़वी सच्चाइयों को भी दर्शाया गया है। उदाहरण के लिए, संजू की सहेली नीलू की पढ़ाई बीच में ही रुकवाकर उसकी शादी तय कर दी जाती है, जो बाल विवाह की समस्या को उजागर करता है। साथ ही, समाज में प्रचलित अंधविश्वासों जैसे ‘छींक’ को अपशकुन मानने की धारणा को भी चुनौती दी गई है जब दीदी छींक के बावजूद स्कूल जाती हैं और अपने अभिनय के लिए पुरस्कार जीतती हैं।

यह पाठ न केवल डायरी लेखन की कला सिखाता है, बल्कि बालिकाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता भी पैदा करता है। संजू की यह यात्रा जीवन के विविध अनुभवों का साक्षात्कार कराती है।

 

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❤️ 14. पीपल

प्रस्तुत कविता ‘पीपल’, प्रसिद्ध छायावादी कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’ द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने प्रकृति के मनमोहक और सजीव रूप का अत्यंत सुंदरता से चित्रण किया है। कविता के मुख्य बिंदु पर एक विशाल और प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जो कई युगों से इस संसार में स्थिर और अटल खड़ा है।

यह वृक्ष प्रकृति में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों का मूक साक्षी है। पीपल के वृक्ष के चारों ओर का वातावरण अत्यंत शांत और रमणीय है। कवि ने वर्णन किया है कि कैसे नीले आकाश के नीचे पृथ्वी पर नदियाँ और झीलें प्रवाहित हो रही हैं।

पीपल के आस-पास जामुन, इमली, करील और तमाल जैसे विविध प्रकार के पेड़-पौधे मौजूद हैं। तालाब के पानी में कमल खिलते हैं और पक्षी विहार करते हैं। पहाड़ों से झरते झरनों की मधुर ध्वनि और बहती शीतल बयार वातावरण को सुखद बनाती है।

पीपल के पत्ते, जो गोल-गोल हैं, हवा के साथ हिलते हुए ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वे कुछ कह रहे हों। यह वृक्ष अनेक पक्षियों और गिलहरियों का घर भी है, जो इसके कोटरों में सुरक्षित रहते हैं। जैसे ही संध्या होती है, सूरज डूब जाता है और पक्षी अपने निवास की ओर लौट आते हैं।

संपूर्ण वन्य प्रान्त में शांति छा जाती है और सभी जीव निद्रा में मग्न हो जाते हैं। कवि यह संदेश देते हैं कि प्रकृति का यह एकांत और शांत रूप मनुष्य को आत्मिक शांति प्रदान करता है। यह पीपल का वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की जीवंतता का प्रतीक है।

 

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❤️ 15. दीनबंधु निराला

यह पाठ आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रेरक जीवन और उनके उदार व्यक्तित्व का एक मार्मिक चित्रण है, जिसे आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा है। निराला जी को ‘दीनबन्धु’ की संज्ञा दी गई है क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन दीन-दुखियों की सेवा और सहायता में समर्पित कर दिया था। रहीम के दोहे ‘जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होय’ को उन्होंने अपने जीवन में पूरी तरह चरितार्थ किया।

लेखक ने उनके बहुमुखी व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए बताया है कि वे न केवल एक उत्कृष्ट साहित्यकार थे, बल्कि एक करुणामयी इंसान भी थे। कलकत्ता के प्रवास के दौरान, उन्होंने रामकृष्ण मिशन के माध्यम से दरिद्रनारायणों की सेवा की और ‘मतवाला’ पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे। उनकी उदारता ऐसी थी कि उनके पास जो भी धन आता, वे उसे संचित करने के बजाय तुरंत भिखारियों और गरीबों में बाँट देते थे।

वे स्वयं फटे-पुराने कपड़ों में रह लेते थे, लेकिन दूसरों की मदद के लिए अपने नए वस्त्र तक दान कर देते थे। उन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी एक संन्यासी की तरह वैराग्य का पालन किया। निराला जी का जीवन त्याग, संघर्ष और मानवता के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है।

उनकी लोकप्रियता और सार्वजनिक सम्मान उनके इसी पवित्र आचरण का परिणाम है, जो उन्हें समकालीन साहित्यकारों में विशिष्ट बनाता है।

 

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❤️ 16. खेमा

यह कहानी ‘खेमा’ बाल-मजदूरी की हृदयविदारक वास्तविकता को दर्शाती है। आठ-नौ साल का छोटा बच्चा खेमा, कसारा के ‘मुक्ताकाशी’ होटल में काम करता है। वह सुबह से रात तक ग्राहकों को चाय पिलाने, गिलास धोने और कसारा के आदेशों का पालन करने में व्यस्त रहता है।

नंगे पैर जलती हुई ज़मीन पर काम करते हुए जब वह चप्पल मांगता है, तो कसारा उसे झिड़क देता है। खेमा के पिता ने गरीबी और मजबूरी के कारण अपने चार बेटों को बेच दिया था, जिनमें खेमा सबसे छोटा था। कहानी में मोड़ तब आता है जब एक शिक्षक खेमा की स्थिति देखकर द्रवित हो जाते हैं।

वे खेमा के गाँव जाकर उसके पिता से मिलते हैं और उसे पढ़ाने का जिम्मा लेते हैं। अंततः खेमा को उस नारकीय जीवन से मुक्ति मिलती है। हालाँकि, कहानी यह गंभीर प्रश्न छोड़ जाती है कि खेमा जैसे अनगिनत बच्चों का क्या होगा जो आज भी शोषण का शिकार हैं।

यह कहानी बाल अधिकारों और समाज की संवेदनशीलता पर चोट करती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे मासूम बचपन को मजदूरी की भट्टी में झोंक दिया जाता है। यह कहानी न केवल एक बच्चे के संघर्ष को बयां करती है, बल्कि बाल-मजदूरी जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ एक सशक्त आवाज भी उठाती है।

खेमा का पात्र उन लाखों बच्चों का प्रतीक है जिनका बचपन अभावों और शोषण की भेंट चढ़ जाता है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो इन बच्चों को एक नया जीवन और उज्ज्वल भविष्य प्रदान कर सकती है।

 

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❤️ 17. खुशबू रचते हाथ

अरुण कमल द्वारा रचित कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ समाज के वंचित और श्रमजीवी वर्ग के जीवन की गहरी विडंबनाओं और उनके अमूल्य योगदान को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। यह कविता उस अदृश्य श्रम की गरिमा का उद्घाटन करती है जो समाज को सुगंध और सौंदर्य प्रदान करता है, लेकिन स्वयं उपेक्षा और अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में रहने को विवश है।

कवि चित्र खींचते हैं कि देश की सबसे प्रसिद्ध और सुगंधित अगरबत्तियाँ उन संकरी गलियों, नालों के किनारे और कूड़े-करकट के ढेरों के बीच बसे गंदे मोहल्लों में बनाई जाती हैं जहाँ सांस लेना भी दूभर होता है। इन अगरबत्तियों का निर्माण करने वाले हाथों में विविधता है – यहाँ बुजुर्गों के उभरी नसों वाले हाथ हैं, तो वहीं बच्चों के पीपल के कोमल पत्तों जैसे नए हाथ भी श्रम में लगे हैं।

कुछ हाथ काम की अधिकता से घिस चुके हैं और कुछ जख्मों से फटे हुए हैं। ये लोग केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी जैसी खुशबुओं का सृजन करते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि दुनिया को महकाने वाले ये हाथ स्वयं नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

कविता सामाजिक और आर्थिक विषमता के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ सृजनकर्ता स्वयं अपने सृजन के आनंद से वंचित रहता है। यह पाठकों को श्रम के पीछे की पीड़ा और उसकी गरिमा को समझने के लिए प्रेरित करती है।

 

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❤️ 18. हौसले की उड़ान

‘हौसले की उड़ान’ शीर्षक वाला यह पाठ आधुनिक बिहार की उन बेटियों के अदम्य साहस और संघर्ष की कहानियों को रेखांकित करता है, जिन्होंने सामाजिक रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार किया है। यह अध्याय यह संदेश देता है कि शिक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर कोई भी व्यक्ति समाज में बदलाव ला सकता है। इसमें गुड़िया, सोनी, कदम और जैनब खानम जैसी बेटियों के उदाहरण दिए गए हैं।

रोहतास की गुड़िया ने शिक्षा के प्रति अपने जुनून को साबित करने के लिए तेरह किलोमीटर पैदल चलकर अपना नामांकन कराया। कैमूर की सोनी ने एथलेटिक्स में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व किया। मुंगेर की कदम ने बाल संसद की प्रधानमंत्री के रूप में बाल श्रम के विरुद्ध आवाज़ उठाई और अपनी निर्भीकता का परिचय दिया।

शिवहर की जैनब खानम ने पर्दा प्रथा की जकड़न से निकलकर न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त की, बल्कि अब वह अन्य लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए कराटे का प्रशिक्षण भी दे रही है। ये सभी बेटियाँ समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं और उनकी ये कहानियाँ साबित करती हैं कि हौसलों की उड़ान के आगे हर बाधा छोटी है। यह पाठ हमें शोषितों और वंचितों के प्रति संवेदनशील होने और न्यायप्रिय समाज के निर्माण में सहयोग करने का आह्वान करता है।

इसके अतिरिक्त, यह अध्याय यह भी स्पष्ट करता है कि जब समाज की उपेक्षित बेटियाँ ज्ञान और स्वाधीनता प्राप्त करती हैं, तो वे न केवल अपना जीवन बदलती हैं बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन जाती हैं।

 

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❤️ 19. जननायक

यह पाठ बिहार की महान विभूति जननायक कर्पूरी ठाकुर की प्रेरणादायक जीवन यात्रा पर आधारित है। कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1921 को समस्तीपुर के पितौंझिया गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही नेतृत्व क्षमता और सेवा भाव से ओत-प्रोत थे।

1942 की अगस्त क्रांति के दौरान उन्होंने देश की स्वाधीनता के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी और ‘आज़ाद दस्ता’ के सक्रिय सदस्य बने। स्वतंत्रता के पश्चात, 1952 से 1988 तक वे निरंतर बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की सेवा की।

उन्हें ‘गरीबों का मसीहा’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हमेशा वंचितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएँ उनके मानवीय मूल्यों और सादगी को दर्शाती हैं, जैसे किसी हैज़ा पीड़ित को कंधे पर उठाकर अस्पताल पहुँचाना या सचिवालय की लिफ्ट को आम कर्मचारियों के लिए खुलवाना। वे सादगी की मिसाल थे और विधायक बनने के बाद भी अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक कुरीतियों और सामंती प्रथा के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। 17 फरवरी 1988 को इस जननायक का निधन हो गया, लेकिन उनके आदर्श आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं। यह पाठ उनके संघर्षपूर्ण जीवन, राजनैतिक विवेक और अटूट जन-प्रतिबद्धता का सजीव चित्रण करता है।

 

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❤️ 20. झांसी की रानी

सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘झाँसी की रानी’ 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान नायिका रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और बलिदान की गौरवगाथा है। यह कविता बताती है कि कैसे गुलाम भारत की सोई हुई चेतना को रानी की वीरता ने फिर से जगा दिया। लक्ष्मीबाई बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र चलाने और युद्ध कला में निपुण थीं।

उनका विवाह झाँसी के राजा के साथ हुआ, परंतु राजा की मृत्यु और झाँसी को लावारिस घोषित कर अँग्रेजों द्वारा उसे हड़पने की कुटिल नीति ने रानी को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। रानी ने डलहौजी और वॉकर जैसे अँग्रेज अधिकारियों को युद्ध के मैदान में धूल चटाई। कविता में उनके अदम्य साहस का वर्णन है, जहाँ वे अकेले ही शत्रुओं से लड़ती रहीं और अंततः वीरगति को प्राप्त हुईं।

‘बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ पंक्तियाँ उनकी वीरता का अमर गान करती हैं। यह कविता केवल एक ऐतिहासिक वर्णन नहीं, बल्कि देशभक्ति और स्वाभिमान का जीवंत दस्तावेज है, जो हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत करती है। रानी का जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्ची मानवता है।

 

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❤️ 21. चिकित्सा का चक्कर

यह पाठ ‘चिकित्सा का चक्कर’ बेढब बनारसी द्वारा लिखित एक अत्यंत रोचक और प्रसिद्ध व्यंग्य है। लेखक ने अपने स्वस्थ जीवन और बीमार पड़ने की विचित्र इच्छा का इसमें वर्णन किया है। वे चाहते थे कि बीमार पड़ने पर उन्हें घर पर ‘हंटले बिस्कुट’ और ‘मलाई’ जैसे पकवान मिलें।

उनकी यह इच्छा तब पूरी हुई जब एक रात अधिक भोजन (रसगुल्ले और मलाई) करने के कारण उनके पेट में तीव्र शूल उठा। इसके बाद, लेखक विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के जाल में फँस गए। उन्होंने एलोपैथी डॉक्टर, आयुर्वेदिक वैद्य और यूनानी हकीम से बारी-बारी इलाज कराया।

हर चिकित्सक ने अपनी पद्धति को श्रेष्ठ बताया और डरावने रोगों के नाम गिनाए। किसी ने उन्हें कड़वी दवा दी, किसी ने इंजेक्शन लगाया, तो किसी ने पायरिया बताकर दाँत निकलवाने की सलाह दी। यहाँ तक कि उनकी नानी की मौसी ने इसे किसी चुड़ैल का साया तक कह डाला।

अंत में लेखक की पत्नी ने उन्हें समझाया कि यह सब केवल डॉक्टरों की लूट है और केवल संतुलित खान-पान ही स्वास्थ्य का असली समाधान है। यह कहानी चिकित्सा जगत की विसंगतियों और समाज की मूर्खताओं पर तीखा प्रहार करती है।

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❤️ 22. सुदामा चरित

‘सुदामा चरित’ नरोत्तमदास द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण काव्य है जो भगवान श्रीकृष्ण और उनके निर्धन बाल-सखा सुदामा की अटूट एवं निस्वार्थ मित्रता का जीवंत वर्णन करता है। सुदामा एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण थे जो भिक्षा मांगकर अपना जीवन व्यतीत करते थे, परंतु उनकी भक्ति में अनन्य श्रद्धा थी।

अपनी पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर, सुदामा अपनी दीन-हीन अवस्था में द्वारका के राजा श्रीकृष्ण से मिलने जाते हैं। सुदामा की फटी हुई धोती और दयनीय स्थिति देखकर अंतर्यामी श्रीकृष्ण इतने भाव-विह्वल हो जाते हैं कि वे बिना पानी छुए केवल अपने प्रेमपूर्ण आंसुओं से ही सुदामा के पैरों को धोते हैं।

श्रीकृष्ण सुदामा द्वारा भेंट स्वरूप लाए गए कच्चे चावलों (तंदुल) की पोटली को बड़े चाव से स्वीकार करते हैं और सुदामा को उनकी भक्ति के फलस्वरुप बिना मांगे ही अपार धन-संपत्ति और वैभव प्रदान करते हैं। जब सुदामा वापस अपने गाँव लौटते हैं, तो वे अपनी पुरानी टूटी हुई झोपड़ी के स्थान पर सोने के विशाल महल और राजसी ठाट-बाट देखकर चकित रह जाते हैं।

यह अध्याय हमें शिक्षा देता है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी का कोई स्थान नहीं होता और ईश्वर अपने भक्त की पीड़ा को बिना कहे ही समझ लेते हैं। यह कविता ब्रज भाषा की सुंदरता और भक्ति रस के अनुपम संगम को प्रस्तुत करती है।

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❤️ 23. राह भटके हिरण के बच्चे को

यह कविता ‘राह भटके हिरन के बच्चे को’ एक अत्यंत भावुक और करुणामयी रचना है, जो पाठक के हृदय में गहरी संवेदना उत्पन्न करती है। इस कविता में कवि वियतनामी कवि डॉ. नि. की भावनाओं को व्यक्त करता है। चित्रण एक ऐसे छोटे और मासूम हिरन के बच्चे का है जो खेल की मस्ती में मग्न होकर अपनी राह भटक गया है। कड़ाके की ठंड वाली रात में वह नन्हा जीव पहाड़ी पर अकेला खड़ा होकर रो रहा है और व्याकुल होकर अपनी माँ को खोज रहा है।

उसकी मासूम आँखों में जो दुःख और वेदना झलक रही है, उसे देखकर कवि का हृदय अत्यंत द्रवित हो उठता है और वह उसके प्रति सहानुभूति प्रकट करता है। कवि उस डरे हुए हिरन के छौने को एक स्नेही अभिभावक के समान सांत्वना देता है और उसे धैर्य रखने को कहता है। वह कहता है कि बाँस, पाइन और ऑक के घने जंगल तथा रात की बहती शीतल हवाएँ उसे लोरी सुनाकर सुलाने का निरंतर प्रयास कर रही हैं।

आकाश में चमकते तारे और ज़मीन पर बिछे नरम पत्ते उसके लिए एक आरामदायक और सुरक्षित बिस्तर का काम करते हैं। कवि उसे पूर्ण विश्वास और आशा दिलाता है कि जैसे ही सुबह होगी और सूरज की पहली सुनहरी किरणें जंगल के पत्तों पर पड़ेंगी, वह अपनी माँ से ज़रूर मिल जाएगा। यह कविता हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने और हर मूक जीव के प्रति दया और प्रेम का भाव रखने की अनमोल शिक्षा देती है।

यह एक सुंदर आशावादी संदेश भी देती है कि अंधकार भरी रात के बाद सफलता और मिलन का सवेरा अवश्य आता है।

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Filed Under: Class 8th Books

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Comments

  1. Ratnesh says

    July 2, 2025 at 6:20 am

    क्या यह वही किताब हैं जो अभी कक्षा 8 में संचालित है? नये और वर्तमान सिलेबस के अनुसार।
    क्योंकि अभी बच्चों को किताबें नहीं मिली हैं और उनको पढ़ाने के लिए किताबों को डाउनलोड करना आवश्यक है।

    Reply
    • bseb says

      July 3, 2025 at 3:23 am

      hey @Ratnesh, these books are based on the latest syllabus. You can download and use them without any problem.

      Reply
    • Hardev kumar says

      September 28, 2025 at 6:40 pm

      ha ye wahi kitab hai jise hum or aap sab log padh ke aage badhe hai ye wahi kitab hai

      Reply

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