Bihar Board 7th History Book 2026 PDF Download (अतीत से वर्त्तमान)
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BSEB Class 7 History (अतीत से वर्त्तमान) Textbook PDF Free Download
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❤️ 1. कब, कहाँ और कैसे
यह अध्याय ‘कहाँ, कब और कैसे’ भारतीय इतिहास के मध्यकालीन काल (750 ई. से 1750 ई.) के दौरान हुए विविध और महत्वपूर्ण परिवर्तनों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
इसमें विस्तार से बताया गया है कि समय के बीतने के साथ भौगोलिक सीमाओं, विभिन्न स्थानों के नाम और प्रचलित शब्दों के अर्थों में किस प्रकार क्रमिक बदलाव आए, जैसे कि ‘हिंदुस्तान’ और ‘बिहार’ जैसे शब्दों का ऐतिहासिक उद्भव। यह अध्याय कृषि क्षेत्र में सिंचाई हेतु उन्नत प्रौद्योगिकी के विकास (जैसे रहट का उपयोग), वस्त्र उद्योग में चरखे का आगमन, लेखन के लिए कागज का प्रसार और युद्ध नीति में लोहे की रकाब एवं नाल जैसे आविष्कारों द्वारा हुए सुधारों को प्रमुखता से रेखांकित करता है।
यह विशिष्ट कालखंड व्यापक सामाजिक और धार्मिक बदलावों का भी साक्षी रहा है, जिसमें इस्लाम धर्म का भारत में आगमन, साझी ‘गंगा-जमुनी’ संस्कृति का क्रमिक विकास और भक्ति एवं सूफी आंदोलनों का उदय अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेखक ने ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में पांडुलिपियों, सिक्कों, शिलालेखों और विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों के महत्व पर विस्तृत चर्चा की है।
साथ ही, यह इतिहासकारों के समक्ष आने वाली जटिल चुनौतियों, जैसे कि एक ही घटना के विरोधाभासी ऐतिहासिक विवरणों (जैसे मुहम्मद बिन तुगलक के राजधानी परिवर्तन), को भी स्पष्ट रूप से उजागर करता है। अंततः, यह कालखंड विभाजन के वैज्ञानिक आधार पर आठवीं शताब्दी को मध्यकाल का विधिवत आरंभ और अठारहवीं शताब्दी को उसका अंत स्वीकार करता है।
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❤️ 2. नए राज्य एवं राजाओं का उदय
यह अध्याय ‘नये राज्य एवं राजाओं का उदय’ सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में हुए महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलावों का विवरण देता है। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर और दक्षिण भारत में कई छोटे क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पाल और चौहान जैसे प्रमुख राजवंश शामिल थे।
अध्याय ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ की व्याख्या करता है, जहाँ पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट राजाओं ने कन्नौज पर नियंत्रण के लिए लंबे समय तक युद्ध किया। प्रशासनिक स्तर पर, राजा सर्वशक्तिमान थे लेकिन वे सामंतों, ब्राह्मणों और व्यापारियों के साथ सत्ता साझा करते थे। सामंतवादी व्यवस्था के उदय ने स्थानीय शासकों को शक्तिशाली बनाया।
अध्याय महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के प्रभाव पर भी प्रकाश डालता है, जिसने बाद में दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। दक्षिण में चोल राजवंश की उपलब्धियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। चोल शासकों ने न केवल विशाल साम्राज्य बनाया, बल्कि ‘ग्राम स्वशासन’ की एक उन्नत प्रणाली भी विकसित की, जिसमें ‘उर’ और ‘सभा’ जैसी संस्थाएं शामिल थीं।
उन्होंने भव्य मंदिरों और सिंचाई की उन्नत प्रणालियों का निर्माण कराया। अंत में, बिहार और बंगाल के पाल शासकों द्वारा शिक्षा और मूर्तिकला के क्षेत्र में दिए गए योगदान की चर्चा की गई है।
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❤️ 3. तुर्क अफगान शासक
यह अध्याय ‘तुर्क-अफगान शासक’ दिल्ली सल्तनत के उद्भव, विस्तार और प्रशासनिक ढांचे का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसकी शुरुआत 13वीं शताब्दी के आरंभ में तुर्कों द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना से होती है। पाठ में प्रमुख राजवंशों जैसे प्रारंभिक तुर्क शासक (ममलुक), खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंशों के शासनकाल का वर्णन है।
इसमें इल्तुतमिश को वास्तविक संस्थापक के रूप में, रजिया सुल्तान को एकमात्र महिला शासिका के रूप में और बलबन को राज्य सुदृढ़ करने वाले शासक के रूप में दर्शाया गया है। अध्याय में अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत विजय अभियानों और उसकी प्रसिद्ध ‘मूल्य नियंत्रण प्रणाली’ तथा बाजार सुधारों पर विशेष प्रकाश डाला गया है, जो मध्यकालीन आर्थिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके विपरीत, मुहम्मद बिन तुगलक के प्रयोगधर्मी स्वभाव की चर्चा है, जिसमें राजधानी परिवर्तन, सांकेतिक मुद्रा का असफल प्रयोग और खुरासान अभियान शामिल हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था में ‘अक्ता प्रणाली’ की भूमिका और स्थानीय प्रशासन की इकाइयों (शिक, परगना और गाँव) को भी समझाया गया है। अंत में, फिरोज शाह तुगलक द्वारा कृषि के लिए बनवाई गई नहरों और उस समय के किसानों के सामाजिक-आर्थिक जीवन का विश्लेषण किया गया है। यह पाठ मध्यकालीन भारतीय इतिहास की राजनीतिक जटिलताओं और प्रशासनिक नवाचारों को समझने के लिए एक संपूर्ण आधार प्रदान करता है।
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❤️ 4. मुगल साम्राज्य
यह अध्याय ‘मुगल साम्राज्य’ के भारत में उदय, सुदृढ़ीकरण और क्रमिक पतन का एक व्यापक ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसकी यात्रा 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध से शुरू होती है, जहाँ बाबर ने अपनी उन्नत सैन्य तकनीक और तोपखाने के बल पर इब्राहिम लोदी को पराजित कर मुगल वंश की नींव रखी। पुस्तक में बिहार के शेरशाह सूरी के योगदान को विशेष महत्व दिया गया है, जिन्होंने हुमायूँ को चुनौती दी और भूमि राजस्व तथा सड़क निर्माण (जैसे जी.टी.
रोड) के क्षेत्र में क्रांतिकारी प्रशासनिक सुधार किए। अकबर के काल को साम्राज्य का आधार स्तंभ माना गया है; उनकी ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति, राजपूतों के साथ वैवाहिक व सैन्य संबंध और मनसबदारी व्यवस्था ने एक धर्मनिरपेक्ष और संगठित राज्य की स्थापना की। जहाँगीर की न्यायप्रियता और शाहजहाँ के स्थापत्य वैभव (जैसे ताजमहल) के बाद औरंगजेब का शासनकाल आया, जिसमें साम्राज्य का विस्तार सुदूर दक्षिण तक हुआ।
परंतु, औरंगजेब की धार्मिक कठोरता, मराठों के साथ निरंतर युद्ध, जागीरदारी संकट और योग्य उत्तराधिकारियों के अभाव ने अंततः साम्राज्य की नींव हिला दी। 1739 में नादिरशाह के विनाशकारी आक्रमण और आंतरिक गुटबाजी ने एक विशाल मुगल साम्राज्य को निर्णायक पतन की ओर धकेल दिया। यह अध्याय मुगलों की जटिल प्रशासनिक कुशलता, सामाजिक जीवन और उनके वैभवशाली युग के अंत के कारणों का सूक्ष्म चित्रण करता है।
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❤️ 5. शक्ति के प्रतीक के रूप में वास्तुकला : किले एवं धार्मिक स्थल
यह अध्याय ‘शक्ति के प्रतीक के रूप में वास्तुकला, किले एवं धार्मिक स्थल’ मध्यकालीन भारतीय इतिहास में वास्तुकला के महत्व को गहराई से उजागर करता है। पाठ की शुरुआत बोधगया के महाबोधि मंदिर के शैक्षणिक परिभ्रमण से होती है, जहाँ छात्र मंदिर निर्माण की विभिन्न शैलियों के बारे में व्यावहारिक जानकारी प्राप्त करते हैं। मध्यकालीन शासकों ने अपनी राजनैतिक शक्ति, अपार धन-वैभव और धार्मिक अटूट विश्वास को प्रदर्शित करने के लिए भव्य मंदिरों, अभेद्य किलों और सुंदर मस्जिदों का निर्माण करवाया।
अध्याय में मंदिर स्थापत्य की दो मुख्य शैलियों, ‘नागर’ और ‘द्रविड़’, का विस्तृत विवरण तुलनात्मक रूप में दिया गया है। उत्तर भारतीय नागर शैली में आधार से शीर्ष तक आयताकार और शंक्वाकार शिखर की प्रधानता थी, जबकि दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली में कई मंजिलों वाला ‘विमान’ और विशाल अलंकृत ‘गोपुरम’ मुख्य विशेषताएँ थीं। तुर्क-अफगान शासन के दौरान भारतीय स्थापत्य कला में ‘मेहराब’ और ‘गुम्बद’ जैसी नई और मजबूत शैलियों का प्रवेश हुआ, जिसने निर्माण की गति और ढाँचे को बदल दिया।
मुगल काल में, विशेषकर शाहजहाँ के शासन में, वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। ताजमहल में संगमरमर और ‘पितरा दूरा’ की जड़ाई का अद्भुत संतुलन है। बिहार के विशिष्ट संदर्भ में, सासाराम स्थित शेरशाह का मकबरा अफगान और मुगल शैलियों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु के रूप में वर्णित है।
अंततः, यह अध्याय हमें सिखाता है कि मध्यकालीन इमारतें केवल ईंट-पत्थर के ढाँचे नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन राजाओं की सत्ता को वैध बनाने और उनके गौरवशाली इतिहास को स्थायी बनाने के महत्वपूर्ण माध्यम थे।
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❤️ 6. शहर, व्यापारी एवं कारीगर
यह अध्याय मध्यकालीन भारत के शहरों, व्यापारियों और शिल्पकारों के विकास का विस्तृत वर्णन करता है। उस समय चार प्रमुख प्रकार के शहर अस्तित्व में थे: प्रशासनिक नगर (जैसे दिल्ली, आगरा), मंदिर नगर (जैसे तंजावूर, कांचीपुरम), वाणिज्यिक नगर और बंदरगाह नगर (जैसे सूरत, मसूलीपटनम)। प्रशासनिक नगर शासकों के सत्ता केंद्र थे, जबकि मंदिर नगरों का विकास धार्मिक श्रद्धा और मंदिरों की आर्थिक गतिविधियों के कारण हुआ।
व्यापार की दृष्टि से बंजारे महत्वपूर्ण घुमंतू व्यापारी थे जो अनाज और अन्य वस्तुओं का परिवहन करते थे। व्यापारियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए ‘नानादेशी’ और ‘मनीग्रामम्’ जैसे शक्तिशाली व्यापार संघ बनाए। शिल्पकारी के क्षेत्र में भारत अत्यंत समृद्ध था; चोल कालीन कांस्य मूर्तियाँ ‘लुप्तमोम’ तकनीक से बनाई जाती थीं और ढाका का मलमल अपनी बारीकी के लिए विश्व प्रसिद्ध था।
15वीं से 17वीं शताब्दी के दौरान पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज व्यापारी भारत आए। यूरोपीय कंपनियों ने ‘दादनी’ व्यवस्था के जरिए कारीगरों को अग्रिम राशि देकर उनके उत्पादन पर नियंत्रण बढ़ाया। अध्याय में पटना (अजीमाबाद) के ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्व का भी उल्लेख है, जो शोरा, सूती वस्त्र और रेशम का प्रमुख केंद्र था।
अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक प्रभाव से कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे नए महानगरों का उदय हुआ।
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❤️ 7. सामाजिक सांस्कृतिक विकास
यह अध्याय मध्यकालीन भारत में हुए सामाजिक-सांस्कृतिक विकास और विभिन्न संस्कृतियों के पारस्परिक मेल-जोल का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पुस्तक के अनुसार, भारत में प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा रही है, जहाँ आर्यों और कुषाणों जैसे बाहरी लोग यहीं की संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गए। मध्यकाल में इस्लाम के आगमन ने इस समन्वयवादी प्रक्रिया को एक नया और महत्वपूर्ण आयाम दिया।
तुर्कों और मुगलों के शासनकाल में भारतीय और इस्लामी परंपराओं के मिलन से समाज में व्यापक परिवर्तन आए, जो आज भी हमारे खान-पान, पहनावे (जैसे ‘कुर्ता-पायजामा’, ‘समोसा’) और वास्तुकला में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त, कागज निर्माण और चरखे जैसी नई तकनीकों ने भी इसी दौर में भारतीय जनजीवन में प्रवेश किया। अध्याय का एक प्रमुख हिस्सा भक्ति और सूफी आंदोलनों के क्रांतिकारी प्रभाव को दर्शाता है।
दक्षिण भारत के अलवार और नयनार संतों द्वारा प्रारंभ की गई भक्ति की धारा को उत्तर भारत में रामानंद, कबीर, गुरुनानक और तुलसीदास जैसे संतों ने व्यापक बनाया। इन संतों ने जाति-पाति के बंधनों, धार्मिक आडंबरों और सामाजिक ऊँच-नीच को सिरे से नकारते हुए ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, सादगी और मानवीय समानता का उपदेश दिया। दूसरी ओर, सूफी संतों ने रहस्यवाद और प्रेम के माध्यम से अल्लाह की इबादत और सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव पर जोर दिया।
बिहार में हजरत मखदूम शराफुद्दीन मनेरी और संत दरिया साहब जैसे महापुरुषों ने क्षेत्रीय स्तर पर सांप्रदायिक सद्भाव और आपसी भाईचारे की जड़ों को सींचा। इन विविध वैचारिक धाराओं के अद्भुत समन्वय से ही एक समृद्ध और साझी भारतीय संस्कृति का उदय हुआ, जिसका सबसे सुंदर प्रतीक उर्दू भाषा का जन्म माना जाता है। यह अध्याय विद्यार्थियों को भारत की ‘गंगा-जमुनी’ विरासत और उसकी सांस्कृतिक गहराई से आत्मसात कराता है।
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❤️ 8. क्षेत्रीय संस्कृतियों का उत्कर्ष
यह अध्याय ‘क्षेत्रीय संस्कृतियों का उत्कर्ष’ मध्यकालीन भारत में क्षेत्रीय भाषाओं, साहित्य, चित्रकला और संगीत के विकास का एक विस्तृत और ज्ञानवर्धक विवरण प्रस्तुत करता है। आठवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य, जब गुप्त साम्राज्य का विघटन हुआ, तब पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट जैसे क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को विशेष महत्व दिया। इस कालक्रम में उत्तर भारत में हिंदी, उर्दू, बंगाली, असमिया, मैथिली और अवधी जैसी भाषाओं का अभूतपूर्व विकास हुआ।
उर्दू भाषा का उदय सैन्य शिविरों और सूफी संतों की उदार परंपराओं से हुआ, जिसे अमीर खुसरो ने ‘रेख्ता’ या ‘हिन्दवी’ का नाम दिया। मुग़ल काल में कला और साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर था। अकबर के संरक्षण में जहाँ गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में कालजयी कृति ‘रामचरितमानस’ की रचना की, वहीं रहीम के नीतिपरक दोहे आज भी समाज में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
चित्रकला के क्षेत्र में मुग़ल शैली के अतिरिक्त पहाड़ी चित्रकारी और बिहार की विशिष्ट ‘पटना कलम’ शैली का उदय हुआ, जिसने आम जनजीवन और प्राकृतिक दृश्यों को कला के केंद्र में रखा। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने कव्वाली और गजल जैसी नई गायन शैलियों को जन्म दिया और तानसेन ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई दिशा प्रदान की। बिहार का योगदान भी इस काल में अतुलनीय रहा, जहाँ विद्यापति जैसे कवियों ने मैथिली साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं।
यह अध्याय भारतीय संस्कृति की विविधता और उसकी ऐतिहासिक जड़ों को बखूबी उजागर करता है।
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❤️ 9. अट्ठारहवि शताब्दी में नई राजनैतिक संरचनाएं
यह अध्याय 18वीं शताब्दी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में हुए महत्वपूर्ण राजनैतिक परिवर्तनों का विवरण प्रस्तुत करता है। 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुग़ल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी, जिससे कई स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: मुग़ल प्रांतों से अलग हुए राज्य (बंगाल, अवध, हैदराबाद), स्वायत्त राजपूत राज्य, और मुग़लों से संघर्ष करने वाले राज्य (मराठा, सिक्ख और जाट)।
अध्याय में मराठा शक्ति के उदय और छत्रपति शिवाजी के योगदान पर विशेष बल दिया गया है। शिवाजी ने मुग़लों को चुनौती दी और एक कुशल ‘अष्टप्रधान’ प्रशासनिक ढांचा तैयार किया। उन्होंने राजस्व हेतु ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ जैसी प्रणालियाँ अपनाईं।
बाद में पेशवाओं के अधीन मराठा साम्राज्य का विस्तार हुआ, परंतु पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) ने उनकी प्रगति को रोक दिया। साथ ही, सिक्खों और जाटों के राजनैतिक उत्कर्ष का भी वर्णन है। निष्कर्षतः, इन क्षेत्रीय शक्तियों के आपसी संघर्ष और राजनैतिक बिखराव ने अंग्रेजों के लिए भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।
यह कालखंड मुग़ल सत्ता के पतन और नई राजनैतिक संरचनाओं के उद्भव का साक्षी रहा है।
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❤️ 10. हमारे इतिहासकार : सर यदुनाथ सरकार, सय्यद हसन आस्करी
यह अध्याय ‘हमारे इतिहासकार’ बिहार के दो महान इतिहासकारों, सर यदुनाथ सरकार और प्रोफेसर सैयद हसन अस्करी के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डालता है। सर यदुनाथ सरकार (1870-1958) को आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक इतिहास लेखन का जनक माना जाता है। उन्होंने मुगलकालीन इतिहास, विशेषकर औरंगजेब, शिवाजी और मुगल साम्राज्य के पतन पर प्रामाणिक कार्य किया।
उन्होंने उपलब्ध स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन कर इतिहास की सच्चाई तक पहुँचने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘शिवाजी एंड हिज टाइम्स’ और ‘फॉल ऑफ द मुगल एम्पायर’ शामिल हैं। उन्होंने पटना कॉलेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी सेवा दी।
दूसरे प्रमुख इतिहासकार प्रोफेसर सैयद हसन अस्करी (1901-1990) अपनी सादगी और मध्यकालीन इतिहास के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने फारसी पाण्डुलिपियों और अभिलेखों की खोज और विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अस्करी साहब ने 200 से अधिक लेख लिखे और ‘कम्प्रीहेंसिव हिस्ट्री ऑफ बिहार’ के संपादन में योगदान दिया।
उन्हें ‘बिहार रत्न’ और ‘पद्म श्री’ जैसे सम्मानों से नवाजा गया। वे न केवल एक विद्वान थे, बल्कि मानवता के सच्चे प्रेमी भी थे, जिन्होंने गरीबों की सहायता और शिक्षा पर जोर दिया। इन दोनों इतिहासकारों के योगदान ने भारतीय इतिहास और विशेष रूप से बिहार के मध्यकालीन इतिहास की समझ को समृद्ध किया है।
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