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Bihar Board Class 7th Geography Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb Leave a Comment

Bihar Board 7th Geography Book 2026 PDF Download (हमारी दुनिया)

Bihar Board Class 7th Geography Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 7th के छात्रों के लिए “Geography (हमारी दुनिया)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 7 Geography (हमारी दुनिया) Textbook PDF Free Download

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❤️ 1. पृथ्वी के अंदर तांक झांक

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❤️ 2. चट्टान एवं खनिज

यह अध्याय ‘चट्टान एवं खनिज’ स्कूली बच्चों और उनके शिक्षक के बीच एक रोचक संवाद के माध्यम से पृथ्वी की संरचना के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाता है। कहानी तब शुरू होती है जब बच्चे सड़क निर्माण के लिए सड़क के किनारे लगे पत्थरों के टुकड़ों को उठाते हैं। उनके शिक्षक बताते हैं कि ये पत्थर विभिन्न स्थानों जैसे शेखपुरा, राजगीर और गया की पहाड़ियों से मँगवाए जाते हैं।

मुख्य रूप से चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं: आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित। आग्नेय चट्टानें पृथ्वी के अंदर से निकलने वाले पिघले पदार्थ के ठंडा होकर जमने से बनती हैं, जैसे ग्रेनाइट और बेसाल्ट। अवसादी चट्टानें पानी के अंदर या धरातल पर परतों के जमाव और अत्यधिक दबाव के कारण बनती हैं, जैसे चूना पत्थर और बलुआ पत्थर।

रूपांतरित चट्टानें वह होती हैं जो आग्नेय या अवसादी चट्टानों में अत्यधिक ताप और दबाव के कारण अपने स्वरूप और गुणों में बदलाव आने से बनती हैं, जैसे संगमरमर। अध्याय खनिजों के महत्व और उनके वर्गीकरण पर भी प्रकाश डालता है। खनिज धात्विक और अधात्विक दो प्रकार के होते हैं।

धात्विक खनिजों में लोहा, सोना और चाँदी शामिल हैं, जबकि अधात्विक में कोयला और अभ्रक आते हैं। अंत में, छात्र सीखते हैं कि हमारे दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं से लेकर ऐतिहासिक इमारतों तक में इन चट्टानों और खनिजों का बहुमूल्य योगदान है। यह पाठ बच्चों को प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक और उनके सदुपयोग के लिए प्रेरित करता है।

 

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❤️ 3. आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू – आकृतियाँ

यह अध्याय ‘आंतरिक बल एवं उससे बननेवाली भू-आकृतियाँ’ मुख्य रूप से पृथ्वी की उन आंतरिक शक्तियों का विवरण देता है जो धरातल पर विभिन्न स्थलाकृतियों के निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं। पाठ की शुरुआत भूकंप की घटना से होती है, जहाँ शंभू नामक पात्र के माध्यम से भूकंप के प्रभावों और उससे जुड़ी सावधानियों को समझाया गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बताया गया है कि पृथ्वी की भू-पर्पटी कई गतिशील प्लेटों में बँटी हुई है।

इन प्लेटों की आपसी हलचल, टकराहट या उनके दूर जाने से पृथ्वी में कंपन पैदा होता है, जिसे ‘भूकंप’ कहा जाता है। इसके मापन के लिए सीस्मोग्राफ और रिक्टर पैमाने का उपयोग होता है। अध्याय में भारत के विभिन्न जोखिम वाले भूकंपीय क्षेत्रों को भी वर्गीकृत किया गया है।

भूकंप के अलावा, पाठ में ज्वालामुखी की क्रियाविधि का उल्लेख है, जिसमें पृथ्वी के आंतरिक ताप और दाब के कारण पिघला हुआ मैग्मा धरातल पर प्रकट होता है। इसके उपरांत, पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों से बनने वाले पर्वतों के चार प्रमुख प्रकारों—वलित, भ्रंशोत्थ, संचयन और अवशिष्ट पर्वत—का उदाहरणों (जैसे हिमालय, सतपुड़ा, फ्यूजियामा और अरावली) के साथ वर्णन किया गया है। पाठ पठार और मैदानों की परिभाषा और उनके निर्माण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डालता है।

अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि आंतरिक बलों के दीर्घकालिक और आकस्मिक संचलन के कारण ही महाद्वीपों, पर्वतों और अन्य जटिल भू-आकृतियों का अस्तित्व संभव हुआ है।

 

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❤️ 4. वायुमंडल एवं इसका संघटन

यह अध्याय ‘वायुमंडल एवं इसका संघटन’ पृथ्वी के चारों ओर स्थित वायु के घेरे, इसकी संरचना और महत्व पर प्रकाश डालता है। वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण इससे टिका हुआ है।

इसमें गैसों का मिश्रण है, जिसमें नाइट्रोजन (78.03%) सर्वाधिक है, उसके बाद ऑक्सीजन (20.99%) और सूक्ष्म मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन व अन्य गैसें मौजूद हैं। यह वायुमंडल हमें जीवनदायी ऑक्सीजन प्रदान करने के साथ-साथ सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा कवच की तरह बचाता है।

वायुमंडल को पाँच परतों में विभाजित किया गया है: क्षोभमंडल, जहाँ बादल और वर्षा जैसी मौसम संबंधी घटनाएँ होती हैं; समताप मंडल, जिसमें ओजोन परत स्थित है और जो वायुयान उड़ाने के लिए आदर्श है; मध्य मंडल, जो अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंडों को जलाकर हमारी रक्षा करता है; बाह्य मंडल या आयन मंडल, जो रेडियो तरंगों को परावर्तित कर संचार में मदद करता है; और सबसे बाहरी परत बहिर्मंडल। अध्याय में ग्रीन हाउस प्रभाव के बारे में भी बताया गया है कि कैसे कार्बन डाइऑक्साइड ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को रहने योग्य बनाती है, लेकिन इसकी अधिकता से भूमंडलीय तापन का खतरा बढ़ रहा है।

इससे ध्रुवों की बर्फ पिघलने और समुद्र के जलस्तर बढ़ने की चेतावनी दी गई है। यह अध्याय संतुलित पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करता है।

 

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❤️ 5. बिन पानी सब सून

यह अध्याय ‘बिन पानी सब सून’ जल की महत्ता, उसकी उपलब्धता और संरक्षण की अनिवार्यताओं पर विस्तृत प्रकाश डालता है। कहानी की शुरुआत एक बस यात्रा से होती है, जहाँ शिक्षिका बच्चों को भविष्य के जल संकट की चेतावनी देती हैं कि यदि जल का दुरुपयोग नहीं रुका, तो पानी भी पेट्रोल की तरह राशन कार्ड और लीटर के हिसाब से ऊँची कीमतों पर मिलेगा। पाठ में बताया गया है कि यद्यपि पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल से ढका है, परंतु अधिकांश जल खारा है।

मानव उपयोग के लिए केवल 0.3 प्रतिशत मीठा जल ही उपलब्ध है। जल-चक्र की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया गया है कि कैसे वाष्पीकरण और वर्षा के माध्यम से प्रकृति में जल का संतुलन बना रहता है। अध्याय में भूमिगत जलस्तर (वाटर टेबल) के लगातार गिरने पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है और ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ जैसे प्रभावी समाधान सुझाए गए हैं।

गुजरात के कठियावाड़ क्षेत्र में राजेंद्र सिंह (मैग्सेसे पुरस्कार विजेता) द्वारा स्थानीय लोगों के सहयोग से किए गए जल संरक्षण के कार्यों का उदाहरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पाठ में समुद्र के खारेपन के वैज्ञानिक कारणों, विभिन्न झीलों (जैसे नैनी, वुलर, पिछोला, सांभर) और महासागरों की लहरों का वर्णन है। चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल से उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटा की अवधारणा को भी स्पष्ट किया गया है।

अंततः, यह पाठ विद्यार्थियों को जल की हर बूंद बचाने और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक रहने का संदेश देता है।

 

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❤️ 6. हमारा पर्यवारण

यह अध्याय ‘हमारा पर्यावरण’ प्राकृतिक और मानव निर्मित परिवेश के महत्व और अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालता है। कहानी की शुरुआत फौजी चाचा के बगीचे से होती है, जहाँ वे बच्चों को समझाते हैं कि पेड़, पौधे, नदियाँ और जीव-जन्तु हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। पर्यावरण के मुख्य रूप से दो घटक हैं: प्राकृतिक और मानव निर्मित।

प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल और जैवमंडल आते हैं, जबकि मानव निर्मित पर्यावरण में घर, सड़क, पुल और उद्योग शामिल हैं। अध्याय में ‘पारितंत्र’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है, जो सजीवों की एक-दूसरे और उनके पर्यावरण पर निर्भरता को दर्शाता है, जैसे कि तालाब का पारितंत्र। वायुमंडल सूर्य की हानिकारक किरणों से हमारी रक्षा करता है, जबकि जलमंडल जीवन के लिए अनिवार्य है।

इसके अतिरिक्त, अध्याय ‘सांस्कृतिक पर्यावरण’ का भी वर्णन करता है, जिसमें समाज के रीति-रिवाज, परंपराएं, त्योहार और खान-पान शामिल हैं। अंत में, यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य ने अपनी जरूरतों के लिए पर्यावरण में बदलाव किए हैं, जिससे अक्सर इसे नुकसान पहुँचता है। लेखक चेतावनी देते हैं कि पर्यावरण को नष्ट करना हमारे अपने जीवन को संकट में डालना है।

अतः, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्रदूषण पर नियंत्रण के माध्यम से हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। यह पाठ बच्चों में पर्यावरणीय चेतना जागृत करने का प्रयास करता है।

 

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❤️ 7. जीवन का आधार पर्यावरण

यह अध्याय ‘जीवन का आधार : पर्यावरण’ सीमा नामक एक लड़की की कहानी के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण और उसके संरक्षण के महत्व को समझाता है। जब सीमा अपने गाँव से पहली बार पटना शहर आती है, तो वह शहर में गाड़ियों के धुएँ से होने वाली आँखों में जलन और साँस लेने में तकलीफ का अनुभव करती है, जिसे उसके पिता ‘वायु प्रदूषण’ बताते हैं। पाठ में वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण के कारणों को विस्तार से समझाया गया है।

ध्वनि प्रदूषण को डेसीबल में मापा जाता है और 80 डेसीबल से अधिक की ध्वनि हानिकारक मानी जाती है। गंगा नदी के गंदे पानी और नालों के कचरे के माध्यम से जल प्रदूषण को दर्शाया गया है। अध्याय ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या भूमण्डलीय तापन की वैश्विक समस्या पर भी प्रकाश डालता है, जो उद्योगों, वाहनों और बिजली के उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ रही है।

इसमें डॉल्फिन (सोंस) को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव बताया गया है, जो गंगा की सफाई में सहायक है। अंत में, पॉलीथीन के दुष्प्रभावों और पर्यावरण बचाने के उपायों जैसे वृक्षारोपण, साइकिल के उपयोग और सोख्ता गड्ढा तकनीक पर जोर दिया गया है। रामू की बुद्धिमानी की कहानी यह सिखाती है कि कैसे मछलियाँ पालकर तालाब के पानी को साफ और मच्छर मुक्त रखा जा सकता है।

सीमा पर्यावरण रक्षा का संकल्प लेती है।

 

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❤️ 8. मानव पर्यावरण अन्तः क्रिया : लद्दाख में जन जीवन

यह अध्याय ‘मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया: लद्दाख प्रदेश में जन जीवन’ लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन करता है। लद्दाख, जिसे ‘खा-पा-चान’ या ‘हिम भूमि’ भी कहा जाता है, भारत के सबसे उत्तर में स्थित एक उच्च शुष्क शीत मरुस्थल है। यहाँ की सामान्य ऊँचाई लगभग 3600 मीटर है, जिसके कारण जलवायु अत्यंत ठंडी और शुष्क रहती है।

हिमालय की वृष्टि छाया में स्थित होने के कारण यहाँ वर्षा नगण्य होती है और सर्दियों में तापमान गिरने से पानी बर्फ बन जाता है। अध्याय में बताया गया है कि उच्च शुष्कता के कारण यहाँ वनस्पति विरल है, लेकिन घाटियों में सफेदा, वेद, सेब, खुबानी और अखरोट जैसे पेड़ पाए जाते हैं। द्रास घाटी में अच्छी किस्म का जीरा, जौ और आलू की खेती होती है।

यहाँ का प्रमुख जानवर ‘याक’ है, जिसका दूध पनीर और मक्खन के लिए उपयोग किया जाता है। यहाँ के निवासी ईरानी (मुसलमान) और मंगोल (बौद्ध) मूल के हैं और बौद्ध धर्म के अनुयायी ‘गोम्पा’ नामक मठों में रहते हैं। यह क्षेत्र अपनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद मानव और प्रकृति के बीच एक सुंदर सामंजस्य का प्रतीक है।

 

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❤️ 9. मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया : थार में जन जीवन

यह अध्याय ‘मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया: थार प्रदेश में जन जीवन’ भारत के पश्चिमी भाग में स्थित थार मरुस्थल की भौगोलिक परिस्थितियों और वहाँ के जनजीवन का वर्णन करता है। थार का रेगिस्तान मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात में फैला है, जहाँ का वातावरण शुष्क और अत्यधिक गर्म है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा मात्र 25 सेंटीमीटर होती है, जिसके कारण वनस्पति विरल है और केवल कँटीली झाड़ियाँ, बबूल, खजूर और नागफनी जैसे पौधे ही पाए जाते हैं जो कम पानी में जीवित रह सकते हैं।

यहाँ के लोग गर्मी और रेतीली आँधियों से बचने के लिए सिर पर ‘साफा’ (पगड़ी) बाँधते हैं और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनते हैं। ऊँट यहाँ के परिवहन का मुख्य साधन है, जिसे ‘रेगिस्तान का जहाज’ कहा जाता है। पशुपालन यहाँ का मुख्य व्यवसाय है, जिससे दूध, मांस और चमड़ा प्राप्त होता है।

कृषि के लिए बाजरा और जौ जैसे मोटे अनाज उगाए जाते हैं। पानी की कमी को दूर करने के लिए सतलज नदी पर निर्मित इंदिरा गांधी नहर (राजस्थान नहर) एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा साबित हुई है, जिससे बीकानेर और जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में हरियाली और कृषि बढ़ी है। यहाँ जिप्सम और संगमरमर जैसे खनिजों का भी भंडार है।

 

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❤️ 10. मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया : अपना प्रदेश बिहार

यह अध्याय ‘मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया: अपना प्रदेश बिहार’ बिहार राज्य की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का एक अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक विवरण प्रस्तुत करता है। इसकी रूपरेखा 22 मार्च को पटना के गाँधी मैदान में आयोजित ‘बिहार दिवस’ समारोह के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जहाँ छात्र भाषणों के माध्यम से अपने प्रदेश की गौरवगाथा सुनाते हैं। भौगोलिक दृष्टि से, बिहार मध्य गंगा के विशाल मैदान में स्थित है, जिसके उत्तर में नेपाल की पहाड़ियाँ और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार की सीमाएँ हैं।

यहाँ की जलवायु उपोष्ण है, जहाँ गर्मियों में ‘लू’ चलती है और मानसूनी वर्षा खेती का मुख्य आधार है। बिहार मूलतः एक कृषि प्रधान राज्य है, जिसकी तीन-चौथाई भूमि खेती के लिए उपयुक्त है। यहाँ धान प्रमुख फसल है, जबकि उत्तर बिहार में लीची, केला और मखाना की प्रचुर पैदावार होती है।

भागलपुर का सिल्क और मधुबनी की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग यहाँ की समृद्ध हस्तशिल्प और कलात्मक विरासत के प्रतीक हैं। राज्य की जीवनशैली सादगीपूर्ण है, जहाँ लिट्टी-चोखा, सत्तू और चूड़ा-दही जैसे पारंपरिक व्यंजन बेहद लोकप्रिय हैं। छठ महापर्व यहाँ के लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और स्वच्छता के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

बाढ़ जैसी प्राकृतिक विभीषिकाओं को झेलते हुए भी बिहार के लोग अपनी बौद्धिक क्षमता और अटूट जीवटता के कारण विकास के पथ पर अग्रसर हैं।

 

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❤️ 11. मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया : तटीय प्रदेश केरल में जन जीवन

यह अध्याय ‘मानव पर्यावरण अन्तःक्रिया: तटीय प्रदेश केरल में जनजीवन’ केरल राज्य की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं का एक विस्तृत और रोचक परिचय प्रस्तुत करता है। पाठ की रूपरेखा एक विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम पर आधारित है, जहाँ केरल से आए अतिथि पी. वेल्लूसुंदरम् बच्चों को अपने प्रदेश की जीवनशैली के बारे में बताते हैं।

भौगोलिक दृष्टि से, केरल भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर स्थित एक संकरी पट्टी है, जो पूर्व में नीलगिरि की पहाड़ियों और पश्चिम में अरब सागर से घिरी है। यहाँ की जलवायु उष्ण-आर्द्र मानसूनी है, जहाँ साल भर सम तापमान रहता है और भारी वर्षा होती है। इस कारण यहाँ सघन सदाबहार वन पाए जाते हैं।

आर्थिक रूप से, केरल एक कृषि प्रधान प्रदेश है जहाँ चावल, नारियल, मसाले (काली मिर्च, इलायची), रबड़ और चाय की खेती प्रमुखता से होती है। मछली पकड़ना यहाँ के लोगों का मुख्य आहार और व्यवसाय है। केरल की साक्षरता दर पूरे भारत में सर्वाधिक है, जो यहाँ के जागरूक समाज को दर्शाती है।

सांस्कृतिक विरासत के रूप में यह राज्य कथककली नृत्य, नौका दौड़, मार्शल आर्ट (कलारीपयट्ट) और आयुर्वेद के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ की लैगून झीलें, हाउस बोट और प्राकृतिक सुंदरता इसे ‘ईश्वर का अपना देश’ (God’s Own Country) बनाती हैं। संक्षेप में, यह पाठ विद्यार्थियों को केरल की विविधतापूर्ण संस्कृति और पर्यावरण के बीच के संतुलन से अवगत कराता है।

 

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❤️ 12. मौसम और जलवायु

यह अध्याय ‘मौसम और जलवायु’ भूगोल के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है। कहानी सलमा और सलीम के माध्यम से शुरू होती है, जो टीवी पर मौसम समाचार देख रहे हैं। इसमें स्पष्ट किया गया है कि मौसम किसी निश्चित स्थान और समय की वायुमंडलीय दशा (तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा) को कहते हैं, जबकि जलवायु किसी स्थान पर लंबे समय (लगभग 33 वर्ष) के मौसम की औसत स्थिति होती है।

जलवायु को अक्षांश, समुद्र से दूरी, ऊँचाई और पवन की दिशा जैसे कारक प्रभावित करते हैं। अध्याय में वायुदाब और पवन के संबंधों की भी चर्चा की गई है, जहाँ हवा हमेशा उच्च दबाव से निम्न दबाव की ओर चलती है। पवनों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है: स्थायी पवनें, मौसमी पवनें और स्थानीय पवनें (जैसे बिहार में चलने वाली ‘लू’)।

इसके अतिरिक्त, चक्रवात और प्रतिचक्रवात की प्रक्रिया और उनके प्रभावों को समझाया गया है। वर्षा के तीन प्रमुख प्रकार—संवाहनीय, पर्वतीय और चक्रवातीय वर्षा—का सचित्र वर्णन किया गया है। अंत में, यह जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन के महत्व पर जोर देता है, ताकि भविष्य के लिए जल सुरक्षित रहे।

 

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❤️ 13. मौसम संबंधी उपकरण

यह अध्याय जिसका शीर्षक ‘मौसम संबंधी उपकरण’ है, स्कूली बच्चों को मौसम विज्ञान के मूलभूत उपकरणों और उनके महत्व के बारे में जानकारी प्रदान करता है। पाठ की शुरुआत कुछ मित्रों—पवन, राजू, मीना, इकबाल और रेहाना—के बीच भीषण गर्मी और समाचारों में बताए गए तापमान पर चर्चा से होती है। बच्चे यह महत्वपूर्ण अंतर समझते हैं कि मौसम के तापमान को सेल्सियस (°C) में मापा जाता है, जबकि मानव शरीर के तापमान के लिए क्लिनिकल थर्मामीटर में फारेनहाइट (°F) का उपयोग होता है।

अपनी शिक्षिका के मार्गदर्शन में वे एक मौसम वेधशाला का दौरा करते हैं, जहाँ वे प्रत्यक्ष रूप से ‘सिक्स का अधिकतम-न्यूनतम थर्मामीटर’ देखते हैं। इसमें प्रयुक्त पारा और अल्कोहल दिनभर के उच्चतम और निम्नतम तापमान को रिकॉर्ड करते हैं। इसके अलावा, पाठ ‘वायु दिशा दर्शक’ (विंड वेन) की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करता है, जो हवा की दिशा बताने के लिए तीर के निशान का उपयोग करता है।

बच्चे ‘वर्षा मापक यंत्र’ या रेनगेज के बारे में भी सीखते हैं, जो एक साधारण बेलनाकार बर्तन और कीप की मदद से वर्षा की मात्रा को मिलीमीटर में मापता है। इस भ्रमण के माध्यम से बच्चे न केवल उपकरणों के नाम बल्कि उनके वैज्ञानिक आधार और उपयोग की विधि भी सीखते हैं। अंत में दिए गए अभ्यास कार्य बच्चों को इन उपकरणों का मॉडल बनाने और स्वयं मौसम के आंकड़ों का अवलोकन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

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