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Bihar Board Class 7th Civics Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb 2 Comments

Bihar Board 7th Civics Book 2026 PDF Download (सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन)

Bihar Board Class 7th Civics Book 2026 PDF Download  – इस पेज पर बिहार बोर्ड 7th के छात्रों के लिए “Civics (सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 7 Civics Textbook PDF Free Download

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❤️ 1. लोकतन्त्र में समानता

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❤️ 2. राज्य सरकार

यह अध्याय ‘राज्य सरकार’ के कामकाज और उसकी लोकतांत्रिक संरचना पर प्रकाश डालता है। इसमें मुख्य रूप से यह समझाया गया है कि राज्य स्तर पर सरकार कैसे कार्य करती है और एक विधायक (एम.एल.ए.) की क्या भूमिका होती है। पाठ की शुरुआत एक ग्रामीण समस्या से होती है, जहाँ स्वास्थ्य केंद्र की कमी के कारण लोगों को इलाज में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसके माध्यम से लेखक विधायक के चुनाव की पूरी प्रक्रिया को समझाते हैं, जिसमें निर्वाचन क्षेत्र, राजनीतिक दल और ई.वी.एम. द्वारा मतदान के महत्व को दर्शाया गया है। अध्याय में सरकार बनने की प्रक्रिया, बहुमत का नियम और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष की जिम्मेदारियों का वर्णन है।

बिहार विधानसभा चुनाव के उदाहरण से गठबंधन सरकार की अवधारणा स्पष्ट की गई है। राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति और मुख्यमंत्री की नियुक्ति पर भी चर्चा की गई है। साथ ही, विधान परिषद जैसे उच्च सदन के गठन और उसकी स्थायी प्रकृति के बारे में जानकारी दी गई है।

विधानसभा बहसों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कैसे प्रतिनिधि जन-समस्याओं को सदन में उठाते हैं और मंत्री उन पर जवाबदेही तय करते हैं। अंत में, सचिवालय, विभिन्न सरकारी विभागों के उत्तरदायित्व और लोकतंत्र में जनता द्वारा अपनी मांगें रखने के माध्यमों को रेखांकित किया गया है।

 

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❤️ 3. शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की भूमिका

यह अध्याय शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका और उत्तरदायित्वों पर विस्तृत प्रकाश डालता है। लेखक के अनुसार, सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था की तरह शिक्षा और स्वास्थ्य भी नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार हैं, जिन्हें प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है। शिक्षा न केवल व्यक्तिगत विकास और आत्मविश्वास के लिए आवश्यक है, बल्कि यह समाज को बेहतर बनाने और विभिन्न आर्थिक व राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने हेतु सक्षम बनाती है।

अध्याय में बिहार की साक्षरता दर (2001 की जनगणना) का विश्लेषण किया गया है, जो विशेष रूप से महिलाओं और अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए अत्यंत दयनीय स्थिति को दर्शाता है। साक्षरता दर में सुधार के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों, जैसे लड़कियों के लिए ‘साइकिल योजना’ और ‘निःशुल्क पुस्तक वितरण’, का विशेष उल्लेख किया गया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2010) 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सरकार की जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है। स्वच्छ पेयजल, पोषण और अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी गंभीर समस्याएँ आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। शिशु और मातृ मृत्यु दर के आँकड़े दर्शाते हैं कि हमें स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

निष्कर्षतः, एक न्यायपूर्ण और समान समाज के निर्माण के लिए सरकार और समाज दोनों की साझा भागीदारी के माध्यम से शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करना अनिवार्य है।

 

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❤️ 4. समाज में लिंग भेद

यह अध्याय समाज में प्रचलित ‘लिंग भेद’ (Gender) और इससे जुड़ी विभिन्न सामाजिक अवधारणाओं पर विस्तार से प्रकाश डालता है। पाठ यह स्पष्ट करता है कि स्त्री और पुरुष की पहचान केवल शारीरिक या जैविक संरचना (Sex) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक निर्मिति है। समाज बचपन से ही बच्चों को दिए जाने वाले खिलौनों, पहनावे और अपेक्षित व्यवहार के माध्यम से यह तय कर देता है कि भविष्य में एक पुरुष या महिला के रूप में उनकी क्या भूमिका होगी।

उदाहरण के तौर पर, लड़कों को अक्सर साहस, तकनीकी कार्यों और बाहरी दुनिया के लिए, जबकि लड़कियों को विनम्रता, सेवा और घरेलू कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता है। अध्याय में शबाना-जावेद, श्यामा और गोविन्द के जीवन की परिस्थितियों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि पालन-पोषण का अलग-अलग तरीका बच्चों के सपनों, शिक्षा और भविष्य के अवसरों को किस प्रकार प्रभावित करता है। पाठ ‘घरेलू कार्य के वास्तविक मूल्य’ पर विशेष बल देता है, जहाँ यह समझाया गया है कि महिलाओं द्वारा घर के भीतर किए जाने वाले अथक श्रम (जैसे भोजन बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल) को समाज में अक्सर ‘काम’ की श्रेणी में नहीं रखा जाता और न ही उसे उचित सम्मान या आर्थिक महत्त्व दिया जाता है।

सांख्यिकीय आंकड़ों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक श्रम करती हैं, फिर भी उनकी मेहनत को नज़रअंदाज़ किया जाता है। यह लिंग-आधारित भेदभाव अंततः लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता के मौलिक अधिकारों को बाधित करता है। यह पाठ हमें समाज में व्याप्त इन रूढ़ियों को बदलने और समानता की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

 

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❤️ 5. समानता के लिए महिला संघर्ष

यह अध्याय समाज में महिलाओं के प्रति व्याप्त रूढ़िवादी धारणाओं और उनके संघर्षों पर प्रकाश डालता है। अक्सर समाज में नर्स और शिक्षक जैसे कार्यों को महिलाओं के लिए और तकनीकी या भारी कार्यों को पुरुषों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

अध्याय गुड़िया, पूजा और शाहुबनाथ जैसी साहसी महिलाओं की कहानियों के माध्यम से इन मिथकों को तोड़ता है। शाहुबनाथ, जो एक बस चालक है, ने दिखाया कि दृढ़ निश्चय से महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, यह पाठ महिला आंदोलनों के महत्व को भी रेखांकित करता है, जिनके परिणामस्वरूप दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा (2006 कानून) के विरुद्ध कड़े कानून बने। इन आंदोलनों ने महिलाओं के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों के मार्ग प्रशस्त किए हैं।

अंततः, यह अध्याय संदेश देता है कि योग्यता किसी लिंग विशेष की जागीर नहीं है, बल्कि यह अवसर और सोच पर निर्भर करती है। महिलाओं ने अपनी स्थिति सुधारने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर कड़ा संघर्ष किया है, जो समाज में बदलाव लाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

 

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❤️ 6. मीडिया एवं लोकतन्त्र

यह अध्याय ‘मीडिया और लोकतंत्र’ संचार माध्यमों की भूमिका और समाज पर उनके गहरे प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण करता है। मीडिया को समाज में विचारों, समाचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान के सशक्त माध्यम के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें समाचार पत्र, टीवी, रेडियो और इंटरनेट जैसे जनसंचार माध्यम (मास मीडिया) शामिल हैं।

पाठ स्पष्ट करता है कि तकनीक के निरंतर विकास ने सूचना प्रसार की गति और पहुंच को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है, जिससे अब वैश्विक घटनाएँ घर बैठे तुरंत देखी जा सकती हैं। मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में कार्य करता है क्योंकि यह सरकारी नीतियों, जनहित के कार्यक्रमों और नागरिकों की समस्याओं को सरकार के समक्ष और जनता के बीच लाता है।

अध्याय में ‘खबरों की समझ’ के माध्यम से यह सिखाया गया है कि पाठकों को समाचारों का निष्पक्ष और आलोचनात्मक विश्लेषण करना चाहिए, क्योंकि व्यावसायिक हितों के कारण रिपोर्टिंग कभी-कभी असंतुलित या एकतरफा हो सकती है। यह इस बात पर भी चिंता व्यक्त करता है कि मुख्यधारा का मीडिया अक्सर गरीबी और बुनियादी सुविधाओं जैसे गंभीर मुद्दों के बजाय मनोरंजन और मशहूर हस्तियों को अधिक प्राथमिकता देता है।

बिहार के ‘अप्पन समाचार’ जैसे वैकल्पिक मीडिया नेटवर्क का उदाहरण यह दर्शाता है कि कैसे स्थानीय समुदाय अपनी आवाज़ खुद उठा सकते हैं। अंततः, यह पाठ मीडिया की शक्ति को पहचानने और एक जागरूक नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।

 

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❤️ 7. विज्ञापन की समझ

यह अध्याय ‘विज्ञापन की समझ’ संचार माध्यमों और हमारे दैनिक जीवन में विज्ञापनों के व्यापक प्रभाव पर प्रकाश डालता है। आज हम विज्ञापनों से घिरे हुए हैं; चाहे वह टीवी, रेडियो, समाचार पत्र हों या इंटरनेट। संचार माध्यम अपनी आय के लिए पूरी तरह से विज्ञापनों पर निर्भर रहते हैं।

कंपनियाँ ‘ब्रांडिंग’ के जरिए अपने उत्पादों को दूसरों से अलग दिखाने और उपभोक्ताओं को आकर्षित करने का प्रयास करती हैं। अध्याय यह स्पष्ट करता है कि विज्ञापन केवल उत्पाद नहीं बेचते, बल्कि हमारे सामाजिक मूल्यों और सोच को भी प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, पैकेट बंद सत्तू के विज्ञापन सेहत और सुरक्षा का दावा करते हैं, जिससे बिना ब्रांड वाले स्थानीय उत्पादों की बिक्री घट जाती है और छोटे व्यापारी पिछड़ जाते हैं।

इसी तरह, गोरेपन की क्रीम के विज्ञापन सुंदरता की ‘गलत धारणाओं’ को बढ़ावा देते हैं और वैज्ञानिक तथ्यों को नजरअंदाज करते हैं। विज्ञापन निर्माण की प्रक्रिया में सेलिब्रिटीज और आकर्षक संगीत का उपयोग किया जाता है ताकि लोगों की भावनाओं से जुड़ा जा सके। लोकतंत्र की दृष्टि से देखें तो विज्ञापन असमानता पैदा करते हैं क्योंकि विज्ञापन की भारी लागत केवल बड़े व्यापारी ही उठा पाते हैं।

यह कई बार गरीब लोगों के आत्म-सम्मान को भी प्रभावित करता है। अंततः, यह अध्याय हमें विज्ञापनों के पीछे के व्यावसायिक उद्देश्यों को समझने और एक सजग एवं विवेकपूर्ण नागरिक बनने की सीख देता है ताकि हम विज्ञापनों के मायाजाल से बच सकें।

 

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❤️ 8. हमारे आसपास के बाज़ार

यह अध्याय ‘हमारे आस-पास के बाज़ार’ विभिन्न प्रकार के बाज़ारों और उनकी कार्यप्रणाली का विस्तृत विश्लेषण करता है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी दुकानों से लेकर शहरों के आधुनिक शॉपिंग मॉल्स और साप्ताहिक हाटों का वर्णन किया गया है।

पाठ यह समझाता है कि बाज़ार किस प्रकार वस्तुओं के उत्पादन और उपभोग के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। लेखक ने विभिन्न बाज़ारों की विशेषताओं को स्पष्ट किया है: गाँव की दुकानों में जहाँ व्यक्तिगत संबंध और उधार की सुविधा होती है, वहीं साप्ताहिक बाज़ारों में प्रतियोगिता के कारण वस्तुएं सस्ती मिलती हैं और मोल-भाव की गुंजाइश रहती है।

शहरी मोहल्लों की दुकानें दैनिक आवश्यकताओं के लिए सुविधाजनक होती हैं, जबकि बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मॉल ब्रांडेड उत्पादों और सुख-सुविधाओं के लिए जाने जाते हैं। अध्याय में थोक व्यापारी (जैसे मसाला व्यापारी जगनारायण) और खुदरा विक्रेताओं की श्रृंखला को भी समझाया गया है।

साथ ही, आधुनिक युग में इंटरनेट और फोन के माध्यम से होने वाली ऑनलाइन शॉपिंग और उन बाज़ारों की चर्चा की गई है जिनसे उपभोक्ता सीधे नहीं जुड़े होते। अंत में, यह पाठ बाज़ार में व्याप्त आर्थिक असमानता पर प्रकाश डालता है, जहाँ बड़े मॉल के मालिकों और छोटे साप्ताहिक विक्रेताओं के मुनाफे में भारी अंतर होता है, और ग्राहकों की क्रय शक्ति उनकी आर्थिक स्थिति से तय होती है।

 

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❤️ 9. बाज़ार शृंखला : खरीदने और बेचने की कड़ियाँ

यह अध्याय मखाना उत्पादन के उदाहरण के माध्यम से बाज़ार की जटिल शृंखला और उसमें होने वाले लाभ के वितरण को विस्तार से समझाता है। बिहार के दरभंगा, मधुबनी और पूर्णिया जैसे जिलों में होने वाली मखाना की खेती एक अत्यंत कठिन और श्रमसाध्य प्रक्रिया है, जिसमें मुख्य रूप से मछुआरा समुदाय के लोग शामिल होते हैं। सलमा जैसी छोटी किसान, जिसके पास अपना तालाब नहीं है, वह तालाब को किराये पर लेकर और कर्ज लेकर मखाना उपजाती है।

इस प्रक्रिया में तालाब की गहराई से मखाने के बीज (गुड़ी) निकालना, उन्हें साफ करना, भूनना और फिर सावधानीपूर्वक पीटकर ‘लावा’ तैयार करना शामिल है। बाज़ार की इस शृंखला में कई कड़ियाँ जुड़ी हुई हैं, जैसे उत्पादक किसान, स्थानीय आढ़तिया, बड़े शहरों के थोक विक्रेता, खुदरा दुकानदार और अंततः उपभोक्ता। सलमा जैसे छोटे किसानों को अपनी उपज तुरंत स्थानीय आढ़तिया को कम कीमत पर बेचने की मजबूरी होती है क्योंकि उनके पास भंडारण की जगह नहीं होती और उन्हें साहूकारों का ऋण चुकाना होता है।

जैसे-जैसे मखाना शहरों की थोक मंडियों और बड़े आधुनिक मॉलों तक पहुँचता है, उसकी कीमत बहुत अधिक बढ़ जाती है। इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बाज़ार में सभी को समान लाभ नहीं मिलता। सबसे अधिक शारीरिक श्रम करने वाले किसानों और मजदूरों को बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है, जबकि पूँजीपति व्यापारी और बड़े मॉल मालिक बिना अधिक श्रम के भारी मुनाफा कमाते हैं।

यह लोकतंत्र में बाज़ार के भीतर मौजूद गहरी असमानता और शोषणकारी प्रवृत्तियों को उजागर करता है।

 

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❤️ 10. चलें मंडी घूमने

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❤️ 11. समानता के लिए संघर्ष

अध्याय ‘समानता के लिए संघर्ष’ भारतीय समाज में मौजूद समानता की आकांक्षा और असमानता की कड़वी वास्तविकता के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है। पाठ की शुरुआत लोकतंत्र में मतदान की सार्वभौमिक समानता से होती है, जहाँ सभी श्रेणियों के लोग एक ही कतार में खड़े होते हैं। हालांकि, अध्याय यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक जीवन में स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और आर्थिक लाभ के वितरण में गहरा भेदभाव आज भी कायम है।

इस अध्याय का मुख्य केंद्र ‘गंगा बचाओ आंदोलन’ है, जो शोषित मछुआरों के हक की एक ऐतिहासिक लड़ाई थी। फरक्का बांध के निर्माण और बढ़ते प्रदूषण ने मल्लाहों के जीवन और आजीविका को संकट में डाल दिया था। इसके साथ ही, ठेकेदारी प्रथा ने उनके आर्थिक शोषण को चरम पर पहुँचा दिया था।

1982 में कहलगांव से शुरू हुए इस संघर्ष ने अंततः 1991 में ऐतिहासिक विजय प्राप्त की, जिससे जलकर की समाप्ति हुई और मछुआरों को अपनी आजीविका का अधिकार मिला। पाठ में ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फूले और डॉ. अंबेडकर जैसे महान सुधारकों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है, जिन्होंने जातिगत और लैंगिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई।

यह अध्याय हमें यह महत्वपूर्ण संदेश देता है कि जब समाज के वंचित वर्ग संगठित होकर शांतिपूर्ण और दृढ़ संकल्प के साथ अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो दमनकारी व्यवस्थाओं में बदलाव लाना संभव है।

 

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Comments

  1. Asif Raza says

    November 20, 2023 at 4:12 pm

    Yes download book plz

    Reply
    • bseb says

      November 25, 2023 at 4:30 am

      hey @Asif, how can I help you?

      Reply

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