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Bihar Board Books

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Bihar Board Class 6th Science Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 17, 2026 by bseb Leave a Comment

Bihar Board 6th Science Book 2026 PDF Download (विज्ञान)

Bihar Board 6th Science Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 6th के छात्रों के लिए “Science (विज्ञान)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 6 Science Textbook PDF Free Download

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❤️ 1. भोजन कहाँ से आता है?

यह अध्याय ‘भोजन कहाँ से आता है?’ मनुष्य और विभिन्न जीव-जंतुओं के आहार और उनके विभिन्न स्रोतों पर विस्तार से प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि हम प्रतिदिन जो भोजन करते हैं, वह मुख्य रूप से दो प्रमुख स्रोतों से आता है: पौधे और जंतु। पौधों से हमें अनाज, दालें, फल और विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ प्राप्त होती हैं।

हम पौधों के विभिन्न अंगों जैसे जड़ (गाजर, मूली), तना, पत्ती (साग), फूल और बीजों (सरसों, गेहूँ) का उपयोग भोजन के रूप में करते हैं। दूसरी ओर, दूध, अंडा, मांस, मछली और शहद जैसे पौष्टिक उत्पाद हमें जंतुओं से प्राप्त होते हैं। अध्याय में जानवरों को उनके विशिष्ट खान-पान के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: शाकाहारी (जो केवल पौधे या उनके उत्पाद खाते हैं), माँसाहारी (जो केवल अन्य जंतुओं का मांस खाते हैं), और सर्वाहारी (जो पौधे और मांस दोनों का सेवन करते हैं)।

इसके अलावा, इसमें चने और मूँग के बीजों को अंकुरित करने की विधि और मधुमक्खियों द्वारा फूलों के मकरंद से शहद बनाने की रोचक प्रक्रिया का भी वर्णन है। अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि पौधे प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सूर्य की रोशनी में अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं। यह पाठ हमें भोजन की विविधता, उसके स्रोतों, अपव्यय रोकने के उपायों और प्रकृति के पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखने के महत्व को गहराई से समझने में मदद करता है।

 

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❤️ 2. भोजन में क्या क्या आता है?

यह अध्याय ‘भोजन में क्या-क्या आता है?’ हमारे दैनिक आहार के विभिन्न घटकों और उनके शारीरिक महत्व का एक विस्तृत और ज्ञानवर्धक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक स्पष्ट रूप से बताते हैं कि हम प्रतिदिन जो भोजन करते हैं, उसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज-लवण जैसे अनिवार्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट और वसा हमारे शरीर को दैनिक कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करने के मुख्य स्रोत हैं।

प्रोटीन शरीर की वृद्धि, पुरानी कोशिकाओं की मरम्मत और नई मांसपेशियों के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। विटामिन और खनिज-लवण न केवल हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं, बल्कि आँखों, हड्डियों और मसूड़ों को भी स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पाठ में विभिन्न पोषक तत्वों की उपस्थिति को समझने के लिए मंड परीक्षण जैसे सरल वैज्ञानिक क्रियाकलापों का मार्गदर्शिका के साथ वर्णन किया गया है।

संतुलित आहार की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि इसमें रुक्षांश और जल सहित सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में होने चाहिए। पोषक तत्वों की लंबे समय तक कमी से कुपोषण और रतौंधी, स्कर्वी या रिकेट्स जैसे गंभीर अभावजन्य रोग हो सकते हैं। अध्याय यह भी सुझाव देता है कि भोजन को अत्यधिक धोने या पकाने से उसके पोषक तत्व नष्ट हो सकते हैं।

निष्कर्षतः, यह पाठ संतुलित पोषण के प्रति हमें सचेत करता है।

 

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❤️ 3. तन्तु से वस्त्र तक

यह अध्याय ‘तन्तु से वस्त्र तक’ हमें कपड़ों की विविधता और उनके निर्माण की रोचक यात्रा से परिचित कराता है । हमारे पहनावे में सूती, रेशमी, ऊनी और कृत्रिम जैसे कई प्रकार के वस्त्र शामिल होते हैं, जिनका चयन हम मौसम और आवश्यकता के अनुसार करते हैं । ये सभी वस्त्र धागों के मेल से बनते हैं, और धागे स्वयं ‘तन्तुओं’ (fibres) की सूक्ष्म लड़ियों से निर्मित होते हैं ।

तन्तु मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित हैं: प्राकृतिक और मानव-निर्मित । प्राकृतिक तन्तु पौधों, जैसे कपास (रूई) और जूट (पटसन), या जन्तुओं, जैसे भेड़ की ऊन और रेशम के कीटों से प्राप्त होते हैं । वहीं, पॉलिस्टर और नायलॉन जैसे तन्तु रासायनिक पदार्थों से तैयार किए जाते हैं ।

अध्याय में विस्तार से बताया गया है कि कपास की खेती काली मिट्टी और गर्म जलवायु में की जाती है, जहाँ पौधों से कपास चुनकर ‘ओटना’ प्रक्रिया द्वारा बीज अलग किए जाते हैं । तन्तुओं को ऐंठकर धागा बनाने की कला ‘कताई’ कहलाती है, जिसे महात्मा गाँधी ने चरखे के माध्यम से लोकप्रिय बनाया था । धागे से कपड़ा तैयार करने के लिए ‘बुनाई’ और ‘बँधाई’ (जैसे स्वेटर बुनना) की विधियों का उपयोग होता है ।

प्राचीन काल में लोग बिना सिले कपड़े जैसे वृक्षों की छाल या पत्तियाँ लपेटते थे, लेकिन सुई के आविष्कार ने सिलाई और फैशन के आधुनिक युग की नींव रखी । यह पाठ वस्त्र विज्ञान की बुनियादी समझ प्रदान करता है ।

 

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❤️ 4. विभिन्न प्रकार के पदार्थ

यह अध्याय ‘विभिन्न प्रकार के पदार्थ’ हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुओं और उनके निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न सामग्रियों की विस्तृत विवेचना करता है। लेखक इस बात पर जोर देता है कि हमारे आसपास की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी विशिष्ट पदार्थ जैसे लकड़ी, कांच, धातु, मिट्टी या प्लास्टिक से बनी होती है। अध्याय का मुख्य उद्देश्य छात्रों को पदार्थों के भौतिक गुणों के आधार पर उनका वर्गीकरण करना सिखाना है।

इसमें कई महत्वपूर्ण गुणों की चर्चा की गई है: सर्वप्रथम ‘कठोरता’, जिसके आधार पर पदार्थों को कोमल (जैसे रूई) और कठोर (जैसे लकड़ी) में बांटा गया है। दूसरा गुण ‘चमक’ है, जो प्रायः धातुओं (लोहा, तांबा, सोना) की पहचान होती है। तीसरा महत्वपूर्ण गुण ‘घुलनशीलता’ है; प्रयोगों द्वारा दिखाया गया है कि चीनी और नमक जैसे पदार्थ जल में विलेय हैं, जबकि रेत और चॉक पाउडर अविलेय।

यहीं ‘संतृप्त घोल’ की अवधारणा भी स्पष्ट की गई है, जहाँ तापमान बढ़ने पर घुलनशीलता बढ़ जाती है। अध्याय ‘पारदर्शिता’ के आधार पर वस्तुओं को पारदर्शी (कांच), अपारदर्शी (गत्ता) और पारभासी (धुंधला दिखने वाले) के रूप में वर्गीकृत करता है। साथ ही, ‘उत्प्लावकता’ के सिद्धांत को समझाते हुए बताया गया है कि हल्की वस्तुएं पानी पर तैरती हैं और भारी वस्तुएं डूब जाती हैं।

अंत में, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पदार्थों का यह समूहन न केवल हमारी सुविधा के लिए है, बल्कि उनके गुणों के व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

 

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❤️ 5. पृथककरण

यह अध्याय पदार्थों के पृथक्करण की विभिन्न विधियों और उनके वैज्ञानिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालता है। हमारे दैनिक जीवन में किसी भी पदार्थ का उपयोग करने से पहले उसमें मौजूद हानिकारक, अनुपयोगी या कभी-कभी दो उपयोगी पदार्थों को अलग करना आवश्यक होता है।

पाठ में ठोस पदार्थों के मिश्रण को अलग करने की पारंपरिक विधियों जैसे ‘दौनी’ (थ्रेसिंग), ‘ओसाई’ (हवा की सहायता से हल्के भूसे को भारी अनाज से अलग करना), ‘चालना’ और ‘हाथ से चुनना’ का विस्तृत वर्णन किया गया है। तरल पदार्थों में मिले अघुलनशील ठोस कणों को अलग करने के लिए ‘थिराना’ (तलछटीकरण), ‘निथारना’ और ‘फिल्टर पेपर’ द्वारा छानने की सटीक तकनीकें समझाई गई हैं।

समुद्र के खारे जल से नमक प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में ‘वाष्पन’ (Evaporation) के महत्व को रेखांकित किया गया है और बताया गया है कि शोधन के बाद ही हमें साधारण नमक प्राप्त होता है। एक विशेष आकर्षण ‘क्रोमेटोग्राफी’ है, जो स्याही के रंगों या औषधीय पौधों के अर्क जैसे सूक्ष्म मिश्रणों को अलग करने की एक अत्यंत उपयोगी वैज्ञानिक विधि है।

यह तकनीक न केवल पदार्थों की पहचान करने में मदद करती है, बल्कि मिलावट की जाँच और फूलों के रंगों के विश्लेषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंततः, यह पाठ सिखाता है कि पदार्थों के विशिष्ट गुणधर्मों के आधार पर पृथक्करण की विधि चुनी जाती है, जो विज्ञान और रोजमर्रा के कार्यों के लिए अनिवार्य है।

 

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❤️ 6. पदार्थ में परिवर्तन

यह अध्याय ‘पदार्थ में परिवर्तन’ हमारे दैनिक जीवन में होने वाले विभिन्न बदलावों का विस्तार से वर्णन करता है। इसमें मुख्य रूप से दो प्रकार के परिवर्तनों – परिवर्तनीय (Reversible) और अपरिवर्तनीय (Irreversible) – पर ध्यान केंद्रित किया गया है। पाठ में कई सरल क्रियाकलापों के माध्यम से यह समझाया गया है कि कैसे कुछ वस्तुओं जैसे मुड़े हुए कागज, फुलाए हुए गुब्बारे या आटे की लोई को उनकी मूल स्थिति में वापस लाया जा सकता है, जबकि कागज काटने, रोटी पकाने या अंडे उबालने के बाद उन्हें पहले जैसा नहीं किया जा सकता।

अध्याय पदार्थ की तीन भौतिक अवस्थाओं: ठोस, द्रव और गैस की व्याख्या करता है। जल के उदाहरण से स्पष्ट किया गया है कि कैसे ऊष्मा देने या ठंडा करने पर पदार्थ एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलते हैं। इसके साथ ही, कपूर जैसे पदार्थों के ठोस से सीधे गैस में बदलने की प्रक्रिया (उर्ध्वपातन) और मोमबत्ती के जलने जैसे रासायनिक परिवर्तनों का भी उल्लेख है।

पाठ में यह भी बताया गया है कि लोहे की रिम को गर्म करके बैलगाड़ी के पहिए पर चढ़ाना प्रसार के सिद्धांत पर आधारित है। अंततः, यह पाठ विद्यार्थियों को अपने परिवेश का सूक्ष्म अवलोकन करने, प्रयोगों को करने और परिवर्तनों की प्रकृति को गहराई से समझने के लिए प्रेरित करता है। यह विज्ञान की मूल अवधारणाओं को सरल भाषा में स्पष्ट करता है।

 

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❤️ 7. पेड़-पौधों की दुनियाँ

यह अध्याय ‘पेड़-पौधों की दुनिया’ हमें हमारे चारों ओर मौजूद वनस्पतियों की अद्भुत विविधता और उनकी संरचना से विस्तृत रूप में परिचित कराता है। पाठ की शुरुआत पौधों के वर्गीकरण से होती है, जहाँ उन्हें उनकी ऊँचाई और तने की कोमलता के आधार पर तीन श्रेणियों—शाक, झाड़ी और वृक्ष—में बाँटा गया है।

लेख में पत्तियों के महत्व पर विशेष जोर दिया गया है, जिसमें उनकी जमावट और शिरा-विन्यास को वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है। अध्याय जड़ों के दो प्रमुख प्रकारों, ‘मूसला जड़’ और ‘रेशेदार जड़’, के बीच के अंतर और उनके कार्यों जैसे जल अवशोषण और पौधों को मजबूती प्रदान करने पर प्रकाश डालता है।

क्रियाकलापों के माध्यम से यह प्रदर्शित किया गया है कि तना किस प्रकार जल और खनिज लवणों के संवहन का कार्य करता है। बीजों के खंड में मक्का और चने के उदाहरणों से एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों की संरचना और उनके अंकुरण की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है।

अंत में, यह एक रोचक वैज्ञानिक संबंध स्थापित करता है कि कैसे पत्तियों के बाहरी विन्यास को देखकर उसकी जड़ों के प्रकार और बीज की प्रकृति का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। यह पाठ छात्रों को प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन करने और प्रयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

 

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❤️ 8. फूलों से जान-पहचान

यह अध्याय ‘फूलों से जान-पहचान’ पौधों के जनन अंगों यानी फूलों की विस्तृत संरचना और उनके महत्व पर केंद्रित है। अध्याय की शुरुआत में यह बताया गया है कि प्रकृति में फूलों की विविधता बहुत अधिक है और सभी फूल एक समान आकर्षक या सुगंधित नहीं होते। मुख्य रूप से फूल के चार प्रमुख अंगों – अंखुड़ी (बाह्य दल), पंखुड़ी (दल), पुंकेसर और स्त्रीकेसर का विस्तार से वर्णन किया गया है।

पुंकेसर को फूल का नर भाग माना जाता है, जिसमें परागकोश और परागकण होते हैं, जबकि स्त्रीकेसर मादा भाग है, जिसके अंतर्गत अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र जैसे अंग आते हैं। अध्याय में फूलों को उनके अंगों की उपस्थिति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। ‘पूर्ण फूल’ वे कहलाते हैं जिनमें चारों अंग मौजूद होते हैं, जबकि ‘अपूर्ण फूल’ में इनमें से कोई भी एक अंग अनुपस्थित हो सकता है।

इसी प्रकार, पुंकेसर और स्त्रीकेसर की मौजूदगी के आधार पर फूलों को एकलिंगी, द्विलिंगी और अलिंगी श्रेणियों में बांटा गया है। नर फूल में केवल पुंकेसर और मादा फूल में केवल स्त्रीकेसर होता है। पाठ में विद्यार्थियों के लिए प्रयोगात्मक गतिविधियाँ भी दी गई हैं, जैसे अंडाशय की आड़ी और लम्ब काट का अध्ययन करना तथा विभिन्न फूलों का संग्रह कर एक सुंदर एलबम तैयार करना।

अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि फूल न केवल प्रकृति की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि ये पौधों के जीवन चक्र के लिए अनिवार्य जनन अंग हैं जो भविष्य में बीजों और फलों का निर्माण करते हैं।

 

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❤️ 9. जंतुओं में गति

अध्याय-9 ‘जन्तुओं में गति’ मानव और विभिन्न जन्तुओं के शरीर में होने वाली हलचल और गमन की प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि मानव शरीर में गति अस्थियों और संधियों के कारण संभव होती है । अध्याय विभिन्न प्रकार की संधियों जैसे कंदुक-खल्लिका संधि (कंधे), कब्जा संधि (कोहनी और घुटने), धुराग्र संधि (गर्दन) और अचल संधियों (खोपड़ी) की व्याख्या करता है ।

यह स्पष्ट करता है कि कंकाल तंत्र शरीर को एक निश्चित ढाँचा और सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि पेशियों के संकुचन और शिथिलन से अस्थियाँ गति करती हैं । इसके अतिरिक्त, पाठ में विभिन्न जन्तुओं के गमन की विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला गया है। केंचुआ अपनी पेशियों और ‘शूक’ की सहायता से मिट्टी पर चलता है, जबकि घोंघा अपने मांसल ‘पाद’ का उपयोग करता है ।

तिलचट्टे में बाह्य-कंकाल और उड़ने व चलने के लिए विशिष्ट पेशियाँ होती हैं । पक्षियों की खोखली हड्डियाँ और शक्तिशाली पंख उन्हें उड़ने के लिए अनुकूल बनाते हैं । मछलियों का धारारेखीय शरीर और उनके पक्ष उन्हें जल में तैरने में मदद करते हैं, वहीं सर्प अपने शरीर के वलयों और मांसपेशियों की सहायता से वलयाकार गति करते हैं ।

अंततः, यह अध्याय यह समझने में मदद करता है कि अलग-अलग शारीरिक संरचनाएं विभिन्न जीवों को उनके वातावरण में गति करने में कैसे सक्षम बनाती हैं ।

 

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❤️ 10. सजीव और निर्जीव

यह अध्याय सजीव और निर्जीव वस्तुओं के मूलभूत अंतरों पर प्रकाश डालता है। हमारे आसपास की वस्तुओं को उनके लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे सजीव हैं, जबकि कुर्सी, मेज और पत्थर निर्जीव हैं।

सजीवों की सबसे बड़ी पहचान उनकी ‘वृद्धि’ है, जहाँ वे समय के साथ विकसित होते हैं। सभी सजीवों को जीवित रहने और ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ‘भोजन’ की आवश्यकता होती है। ‘श्वसन’ प्रक्रिया द्वारा वे ऑक्सीजन लेते हैं, जो शरीर में ऊर्जा उत्पादन के लिए ‘ईंधन’ का काम करती है।

सजीवों में बाहरी वातावरण के बदलावों या ‘उद्दीपन’ के प्रति अनुक्रिया करने की क्षमता होती है, जैसे किसी काँटे के चुभने पर प्रतिक्रिया देना। ‘उत्सर्जन’ के माध्यम से वे शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालते हैं। अपनी प्रजाति को निरंतर बनाए रखने के लिए वे ‘प्रजनन’ करते हैं और अपने समान संतान उत्पन्न करते हैं।

अंततः, प्रत्येक सजीव की ‘मृत्यु’ होती है। हालांकि कुछ निर्जीव वस्तुएं जैसे कार या बादल गति या आकार में वृद्धि दिखाते हैं, लेकिन उनमें ये सभी जैविक लक्षण एक साथ नहीं पाए जाते। अध्याय यह भी समझाता है कि बीज जैसी वस्तुएं सुषुप्तावस्था में हो सकती हैं, जो अनुकूल वातावरण मिलने पर जीवन के लक्षण प्रकट करती हैं।

संक्षेप में, जीवन एक सुंदर और जटिल प्रक्रिया है जो प्रकृति की विविधता को दर्शाती है।

 

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❤️ 11. सजीवों में अनुकूलन

यह अध्याय ‘सजीवों में अनुकूलन’ विस्तार से समझाता है कि कैसे विभिन्न सजीव अपने विशिष्ट प्राकृतिक परिवेश में जीवित रहने के लिए आवश्यक शारीरिक और व्यवहारिक परिवर्तन विकसित करते हैं। पाठ की शुरुआत ऊँट और घोड़े के बीच एक रोचक संवाद से होती है, जहाँ ऊँट की शारीरिक विशेषताएँ जैसे चौड़े पैर, लम्बी पलकें और भोजन संचय के लिए कूबड़ उसे रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों के अनुकूल बनाती हैं।

इसके विपरीत, घोड़ा उन रेतीले टीलों पर संघर्ष करता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि अनुकूलन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जीव अपने वासस्थान में सफलतापूर्वक जीवित रहता है।

अध्याय में मरुस्थल, पर्वत, घास स्थल और जलीय क्षेत्रों जैसे विभिन्न आवासों का वर्णन किया गया है। उदाहरण के तौर पर, मछलियों का धारारेखीय शरीर और गलफड़े उन्हें जल में रहने योग्य बनाते हैं, जबकि पहाड़ों पर पाए जाने वाले याक के लंबे बाल और शंक्वाकार वृक्ष उन्हें अत्यधिक ठंड और बर्फबारी से बचाते हैं।

इसी तरह, शेर का मटमैला रंग उसे घास के मैदानों में छिपने में मदद करता है, जबकि हिरण की तेज गति और सुनने की क्षमता उसे शिकारियों से बचाती है। पाठ ‘पर्यानुकूलन’ (अल्पकालिक) और ‘अनुकूलन’ (दीर्घकालिक) के अंतर को भी स्पष्ट करता है, और यह बताता है कि प्रकाश, ताप और जल जैसे अजैव घटक सजीवों के अस्तित्व के लिए कितने अनिवार्य हैं।

 

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❤️ 12. दूरी मापन एवं गति

यह अध्याय ‘दूरी मापन एवं गति’ विज्ञान के मूलभूत विषयों मापन और गति पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि प्राचीन समय में लोग शरीर के अंगों जैसे बित्ता, हाथ और कदमों का उपयोग लंबाई मापने के लिए करते थे, लेकिन सटीकता की कमी के कारण वैश्विक स्तर पर मानक इकाइयों की आवश्यकता हुई। इसके परिणामस्वरूप ‘मीटर’ को मानक अंतर्राष्ट्रीय इकाई (SI) माना गया।

पाठ में सेंटीमीटर, मिलीमीटर और किलोमीटर के बीच संबंधों के साथ-साथ पैमाने से लंबाई मापने के सही तरीके और संभावित त्रुटियों को समझाया गया है। वक्र रेखाओं को धागे की सहायता से मापने की विधि भी रोचक ढंग से दी गई है। अध्याय गति के विभिन्न प्रकारों को भी विस्तार से परिभाषित करता है।

सरलरेखीय गति, वर्तुल या घूर्णन गति और आवर्त गति के माध्यम से वस्तुओं के व्यवहार को समझाया गया है। पाठ यह भी स्पष्ट करता है कि फर्श पर लुढ़कती गेंद जैसी वस्तुएं एक साथ सरलरेखीय और घूर्णन गति का प्रदर्शन कर सकती हैं। अंततः, चाल की अवधारणा पेश की गई है, जो यह निर्धारित करती है कि कोई वस्तु कितनी तीव्र या मंद गति कर रही है।

यह अध्याय छात्रों को मापन की परिशुद्धता और गति की विविधता समझने में मदद करता है।

 

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❤️ 13. प्रकाश

यह अध्याय ‘प्रकाश’ के मौलिक सिद्धांतों और उसके दैनिक जीवन में महत्व की विस्तृत व्याख्या करता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि किसी भी वस्तु को देखने के लिए प्रकाश अनिवार्य है; जब प्रकाश किरणें किसी वस्तु से टकराकर हमारी आँखों तक पहुँचती हैं, तभी हम उसे देख पाते हैं। वस्तुओं को प्रकाश के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के आधार पर पारदर्शी, अपारदर्शी और पारभासी श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

एक प्रमुख तथ्य यह है कि ‘प्रकाश हमेशा एक सीधी रेखा में गमन करता है’। इसे प्रमाणित करने के लिए पाइप और पिनहोल कैमरा के प्रयोग दिए गए हैं। पिनहोल कैमरा में बनने वाला प्रतिबिंब हमेशा उल्टा होता है, जो प्रकाश की सरल रेखीय गति की पुष्टि करता है।

इसके अलावा, पाठ में ‘परावर्तन’ को समझाया गया है, जिसमें दर्पण जैसी सतह से टकराकर प्रकाश अपना मार्ग बदल लेता है। इसमें आपतित और परावर्तित किरणों की विस्तृत चर्चा की गई है। अंत में, ‘छाया’ के बनने की प्रक्रिया बताई गई है।

जब कोई अपारदर्शी वस्तु प्रकाश के मार्ग में बाधा डालती है, तो पर्दे पर उसकी छाया बनती है। छाया का आकार प्रकाश स्रोत की दिशा एवं दूरी पर निर्भर करता है। यह अध्याय छात्रों को प्रकाश के सरल व्यवहार और उसके पीछे के विज्ञान को समझने में मदद करता है।

 

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❤️ 14. बल्ब जलाओ जगमग-जगमग

यह अध्याय ‘बल्ब जलाओ जगमग-जगमग’ विद्युत और उसके परिपथ की बुनियादी समझ पर आधारित है। इसमें अत्यंत सरल और रोचक ढंग से समझाया गया है कि एक टॉर्च या बल्ब किस प्रकार कार्य करता है। अध्याय की शुरुआत एक व्यावहारिक उदाहरण से होती है जहाँ सबीहा अपनी टॉर्च की मरम्मत करती है, जिससे पाठकों को विद्युत सेल के धन (+) और ऋण (-) सिरों के सही संयोजन का महत्व समझ आता है।

विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से छात्रों को विद्युत परिपथ (सर्किट) बनाना, बल्ब की आंतरिक बनावट (फिलामेंट) और होल्डर के उपयोग के बारे में जानकारी दी गई है। अध्याय में ‘विद्युत चालक’ और ‘कुचालक’ पदार्थों के बीच अंतर को प्रयोगात्मक रूप से स्पष्ट किया गया है। लोहा, ताँबा और एल्युमिनियम जैसे धातु चालक हैं, जबकि लकड़ी, रबर, प्लास्टिक और यहाँ तक कि हवा भी विद्युत की कुचालक है।

पाठ का एक प्रमुख आकर्षण थॉमस अल्वा एडीसन द्वारा बल्ब के आविष्कार की संघर्षपूर्ण कहानी है। उन्होंने हजारों असफल प्रयासों के बाद अंततः एक ऐसा फिलामेंट खोजा जो लंबे समय तक प्रकाश दे सके। आज के समय में हम टंगस्टन के फिलामेंट वाले बल्बों का उपयोग करते हैं।

यह अध्याय न केवल वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझाता है, बल्कि विद्यार्थियों में खोजी प्रवृत्ति और प्रयोग करने की ललक भी पैदा करता है।

 

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❤️ 15. चुंबक

यह अध्याय ‘चुंबक’ के विभिन्न गुणों और उसके व्यावहारिक उपयोगों का विस्तार से वर्णन करता है। पाठ की शुरुआत चुंबक की खोज की रोचक लोककथा से होती है, जिसमें यूनान के क्रीट द्वीप के एक चरवाहे मैगनस द्वारा ‘लोडस्टोन’ की खोज का विवरण है। यह प्राकृतिक चुंबक लोहे के टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति रखता था।

अध्याय में विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि पदार्थ दो प्रकार के होते हैं: चुंबकीय (जैसे लोहा, निकेल, कोबाल्ट) और अचुंबकीय (जैसे लकड़ी, प्लास्टिक, कागज़)। चुंबक के मुख्य गुणों में इसके दो ध्रुव—उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव—अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लोहे का बुरादा चुंबक के इन ध्रुवों पर सबसे अधिक चिपकता है, जो वहाँ चुंबकीय बल की प्रबलता को दर्शाता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण गुण दिशा निर्धारण है; स्वतंत्र रूप से लटका हुआ चुंबक हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही ठहरता है। इसी सिद्धांत पर ‘दिक्सूचक’ (कम्पास) यंत्र कार्य करता है, जिसका उपयोग सदियों से नाविकों द्वारा समुद्र में दिशा खोजने के लिए किया जाता रहा है। पाठ में चुंबकों के बीच आकर्षण और विकर्षण के नियमों को भी समझाया गया है, जिसके अनुसार समान ध्रुव एक-दूसरे को विकर्षित करते हैं, जबकि असमान ध्रुव आकर्षित करते हैं।

अंत में, लोहे की पट्टी या साइकिल के स्पोक को रगड़कर कृत्रिम चुंबक बनाने की विधि और चुंबकीय प्रभाव क्षेत्र के बारे में जानकारी दी गई है। यह अध्याय चुंबकत्व के मूलभूत सिद्धांतों को सरल प्रयोगात्मक ढंग से समझाने में सहायक है।

 

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❤️ 16. जल

यह अध्याय ‘जल’ हमारे जीवन में पानी के अपरिहार्य महत्व और इसकी दैनिक उपयोगिता पर केंद्रित है। हम अपनी दिनचर्या के हर कार्य, जैसे स्वच्छता, भोजन पकाना और कृषि, में जल पर पूर्णतः निर्भर हैं। पाठ में छात्रों को अपनी दैनिक जल खपत का आकलन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

जल के मुख्य स्रोतों में नदियाँ, तालाब, कुएँ और चापानल शामिल हैं। यद्यपि पृथ्वी का दो-तिहाई भाग जल से आच्छादित है, परंतु इसका 97.5 प्रतिशत हिस्सा समुद्रों में खारा है। मानव उपयोग के लिए उपलब्ध मीठा जल बहुत ही कम मात्रा (लगभग 0.003%) में है।

अध्याय में जल चक्र की वैज्ञानिक प्रक्रिया—वाष्पन, वाष्पोत्सर्जन और संघनन—को विस्तार से समझाया गया है। सूर्य की गर्मी से जल वाष्प बनकर ऊपर उठता है और ऊँचाई पर संघनित होकर बादलों का रूप लेता है, जो पुनः वर्षा के रूप में धरती पर गिरते हैं। पाठ में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों का भी वर्णन है; जैसे अत्यधिक वर्षा से आने वाली ‘बाढ़’ जो जान-माल की हानि करती है, और लंबे समय तक वर्षा न होने से उत्पन्न ‘सूखा’ जो अकाल का कारण बनता है।

अंत में, भविष्य के जल संकट से बचने के लिए ‘वर्षा जल संग्रहण’ की ग्रामीण और शहरी तकनीकों और जल के विवेकपूर्ण व सीमित उपयोग पर विशेष बल दिया गया है। यह अध्याय संदेश देता है कि जल ही जीवन का आधार है और इसका संरक्षण हमारी साझा जिम्मेदारी है।

 

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❤️ 17. वायु

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❤️ 18. ठोस कचरा प्रबंधन

अध्याय 18, ‘ठोस कचरा प्रबंधन’, हमें हमारे दैनिक जीवन से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों के वैज्ञानिक और सही निपटान के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा के बारे में जानकारी प्रदान करता है । अध्याय की शुरुआत अंजलि और उत्कर्ष नामक बच्चों के एक पार्क भ्रमण की कहानी से होती है, जहाँ वे गीले और सूखे कचरे के लिए क्रमशः हरे और नीले कूड़ेदानों का महत्व सीखते हैं ।

कचरे को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: जैव विघटनीय पदार्थ, जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा गल जाते हैं (जैसे फलों-सब्जियों के छिलके, कागज और गत्ता), और जैव अविघटनीय पदार्थ, जिनका प्राकृतिक अपघटन नहीं होता (जैसे प्लास्टिक, धातु और काँच) । पाठ में पर्यावरण प्रदूषण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कचरे के गंभीर दुष्प्रभावों की चर्चा की गई है ।

कचरा प्रबंधन के लिए ‘4R’ सिद्धांत—Refuse (मना करना), Reduce (कम उपयोग), Reuse (पुनः उपयोग) और Recycle (पुनःचक्रण)—को अपनाने की सलाह दी गई है । विशेष रूप से प्लास्टिक और पॉलिथीन के हानिकारक प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है, जैसे कि नालियों का अवरुद्ध होना, पशुओं द्वारा निगलने पर उनकी मृत्यु और मिट्टी की उर्वरक शक्ति का ह्रास ।

गीले कचरे से खाद बनाने के लिए ‘कम्पोस्टिंग’ और केंचुओं के माध्यम से ‘वर्मी-कम्पोस्ट’ तैयार करने की विधि समझाई गई है । अंततः, यह अध्याय संदेश देता है कि सचेत प्रयासों और जागरूकता से हम न केवल कचरे की समस्या को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि संसाधनों का रचनात्मक पुनः उपयोग कर ‘कबाड़ से जुगाड़’ भी कर सकते हैं ।

 

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