Bihar Board 6th History Book 2026 PDF Download (अतीत से वर्त्तमान)
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❤️ 1. हमारा अतीत
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❤️ 2. क्या, कब कहाँ और कैसे
यह पुस्तक का अंश भारतीय इतिहास के अध्ययन की शुरुआत और उसके महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि हम हजारों साल पहले की घटनाओं के बारे में पांडुलिपियों, अभिलेखों, सिक्कों और पुरातात्विक अवशेषों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करते हैं।
लेखक ने काल निर्धारण की ‘रेडियो कार्बन (C-14)’ पद्धति और तिथियों के अंतर (ई.पू. और ई.) को स्पष्ट किया है।
भारत की भौगोलिक संरचना का वर्णन करते हुए इसे चार मुख्य भागों में बांटा गया है, और बताया गया है कि कैसे हिमालय, नदियाँ और दर्रे मानव सभ्यता के विकास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में सहायक रहे। उत्तर भारत में मगध जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय और प्राचीन काल में खेती (गेहूं, जौ, चावल) व पशुपालन की शुरुआत का विवरण भी दिया गया है।
अंत में, ‘इंडिया’, ‘हिंदुस्तान’ और ‘भारत’ जैसे नामों की उत्पत्ति के पीछे के ऐतिहासिक और भाषाई कारणों को समझाया गया है। यह अध्याय अतीत को समझने के वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।
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❤️ 3. प्रारंभिक समाज
यह पुस्तक अध्याय ‘प्रारंभिक समाज’ के माध्यम से मानव सभ्यता के शुरुआती इतिहास और विकास पर प्रकाश डालती है। इसमें बताया गया है कि लाखों वर्षों के क्रमिक विकास के बाद मनुष्य वर्तमान रूप में आया है। आरंभिक मानव शिकारी और खाद्य संग्राहक थे, जो 20-30 लोगों के समूहों में रहकर जंगली जानवरों का शिकार करते और कंद-मूल इकट्ठा करते थे।
उनका जीवन मुख्य रूप से पत्थरों पर निर्भर था, इसलिए इसे ‘पाषाण काल’ कहा जाता है। वे गुफाओं में रहते थे, पत्थर के नुकीले औजारों का उपयोग करते थे और गुफा की दीवारों पर चित्र बनाकर व नाचकर अपना मनोरंजन करते थे। बिहार का ‘पैसरा’ और मध्य प्रदेश का ‘भीमबेटका’ इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
पुस्तक में पाषाण काल को तीन चरणों—पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल में विभाजित किया गया है। मध्यपाषाण काल में जलवायु परिवर्तन के कारण घास के मैदानों और अनाजों का विकास हुआ। अंततः, यह अध्याय छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि कैसे हमारे पूर्वजों ने आग का आविष्कार किया और विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए सामूहिक जीवन की शुरुआत की।
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❤️ 4. प्रथम कृषक एवं पशुपलान
यह पाठ मानव इतिहास के उस महत्वपूर्ण काल का वर्णन करता है जब मनुष्य शिकारी और खाद्य संग्राहक से बदलकर कृषक और पशुपालक बन गया। लगभग 8000 से 10000 साल पहले ईरान और इराक की पहाड़ियों से खेती की शुरुआत हुई, जबकि भारत में यह 5-6 हजार साल पहले शुरू हुई। महिलाओं को पौधों का गहरा ज्ञान था, जिससे उन्होंने अनाज उगाना सीखा।
खेती के कारण मानव का जीवन स्थायी हो गया क्योंकि फसलों की देखभाल के लिए उन्हें एक स्थान पर रहना आवश्यक था, जिससे आरंभिक गाँवों का निर्माण हुआ। इसी समय मनुष्यों ने जानवरों को पालना भी शुरू किया। सबसे पहले कुत्ते, फिर भेड़, बकरी और गाय-बैल पाले गए, जिनसे उन्हें मांस, दूध और कृषि कार्यों में सहायता मिली।
नवपाषाण युग में पत्थर के औजार अधिक धारदार और चमकदार हो गए। पाठ में मेहरगढ़ (पाकिस्तान) और चिराँद (बिहार) जैसे प्रमुख पुरास्थलों का उल्लेख है, जहाँ से प्राचीन अनाज और हड्डियों के साक्ष्य मिले हैं। अंततः, इस युग ने मनुष्य को मिट्टी के बर्तन बनाने, बुनाई करने और एक सभ्य, स्थायी जीवन जीने की दिशा में अग्रसर किया।
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❤️ 5. प्रारंभिक शहर : प्रथम नगरीकरण
यह अध्याय ‘प्रांरभिक शहर: प्रथम नगरीकरण’ हड़प्पा सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता) के उद्भव, विकास और उसकी अद्वितीय विशेषताओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। पुस्तक के अनुसार, हड़प्पा सभ्यता भारत की प्राचीनतम नगरीय सभ्यता है, जिसकी खोज 1921 में दयाराम साहनी ने की थी। यह सभ्यता अपनी उत्कृष्ट नगर नियोजन प्रणाली के लिए जानी जाती है, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और जल निकासी की सुव्यवस्थित व्यवस्था थी।
नगर दो भागों में विभाजित थे: ऊँचा ‘नगर दुर्ग’ और ‘निचला नगर’ । यहाँ के लोग कृषि, पशुपालन और व्यापार में निपुण थे। वे गेहूँ, जौ और मटर जैसी फसलें उगाते थे और दूर-दराज के क्षेत्रों जैसे मेसोपोटामिया से व्यापारिक संबंध रखते थे ।
मोहनजोदड़ो का ‘महास्नानागार’ और लोथल का बंदरगाह इस सभ्यता की इंजीनियरिंग कुशलता के प्रमाण हैं। धार्मिक रूप से वे मातृदेवी और पशुपति महादेव की पूजा करते थे। लगभग 1700 ई.पू.
के आसपास बाढ़, जलवायु परिवर्तन या बाहरी आक्रमणों जैसे कारणों से इस महान सभ्यता का पतन शुरू हो गया, परंतु इसके कई सांस्कृतिक तत्व आज भी भारतीय समाज में विद्यमान हैं ।
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❤️ 6. जीवान के विभिन्न आयाम
यह पुस्तक अध्याय प्राचीन भारत के ‘वैदिक काल’ और ‘ताम्रपाषाण संस्कृति’ का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) के महत्व और वैदिक समाज के दो प्रमुख कालखंडों—ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.) और उत्तरवैदिक काल (1000-600 ई.पू.) का वर्णन है। ऋग्वैदिक काल में आर्यों का जीवन कबीलाई था, जिनका मुख्य पेशा पशुपालन था और ‘गायों’ को संपत्ति का प्रतीक माना जाता था।
समाज में ‘जन’ और ‘राजन’ की अवधारणा थी। उत्तरवैदिक काल में लोहे के प्रयोग से कृषि मुख्य पेशा बनी और छोटे कबीले ‘जनपदों’ में बदल गए। इसी समय वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और जटिल यज्ञों का उदय हुआ।
पुस्तक में ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ और आरूणि की कहानी के माध्यम से प्राचीन शिक्षा पद्धति पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन बस्ती ‘इनामगाँव’ का केस स्टडी दिया गया है, जो उस समय के आवास, कृषि और अंतिम संस्कार की विधियों को दर्शाता है। यह अध्याय साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोतों के संगम से आर्यों के प्रसार और उनकी बदलती सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करता है।
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❤️ 7. प्रारम्भिक राज्य
यह पुस्तक ‘प्रारंभिक राज्य’ के विकास और प्राचीन भारत के ‘महाजनपदों’ के इतिहास पर प्रकाश डालती है। लगभग 3000 वर्ष पहले गंगा घाटी में लोहे के उपयोग से कृषि में वृद्धि हुई, जिससे लोगों का जीवन स्थायी हुआ और ‘जन’ से ‘जनपद’ बने।
करीब 2500 वर्ष पहले, 16 महाजनपद उभरे, जिनमें मगध, अंग, और वज्जि प्रमुख थे। मगध के उत्थान में लोहे की खानों, उपजाऊ भूमि और बिम्बिसार व अजातशत्रु जैसे योग्य शासकों का बड़ा हाथ था।
यहाँ राजतंत्र के साथ-साथ ‘वज्जि’ जैसे गणराज्य भी थे, जहाँ निर्णय सभाओं द्वारा लिए जाते थे। राजा अब नियमित रूप से कर वसूलने लगे और नगरों की सुरक्षा हेतु किलाबंदी की गई।
इसी काल में द्वितीय नगरीकरण की शुरुआत हुई, जिसमें पाटलिपुत्र, वैशाली और वाराणसी जैसे व्यापारिक व प्रशासनिक केंद्र विकसित हुए। पुस्तक में सामाजिक संरचना, कर व्यवस्था, और बुद्ध के उपदेशों के संदर्भ में गणराज्यों के नियमों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
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❤️ 8. नए प्रश्न : नवीन विचार
यह पुस्तक का अध्याय छठी शताब्दी ईसा पूर्व के भारत में उभरे नए धार्मिक और दार्शनिक विचारों का विश्लेषण करता है। उत्तर वैदिक काल में जटिल होती वर्ण व्यवस्था, खर्चीले कर्मकांड और पशु बलि के कारण समाज में असंतोष बढ़ रहा था। ऐसी स्थिति में उपनिषदों का उदय हुआ, जिनमें आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म जैसे गहरे विषयों पर चर्चा की गई।
नचिकेता और यमराज के संवाद के माध्यम से मृत्यु के रहस्यों को समझाने का प्रयास किया गया है।इसी काल में गौतम बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की। उन्होंने दुखों का कारण तृष्णा (इच्छा) को बताया और इससे मुक्ति के लिए ‘आष्टांगिक मार्ग’ या मध्यम मार्ग का सुझाव दिया। बुद्ध ने जाति-पाति के भेदभाव को नकारा और दया, अहिंसा तथा सदाचार पर बल दिया।
उनके उपदेशों ने न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी लोगों को प्रभावित किया।दूसरी ओर, वर्द्धमान महावीर ने जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के रूप में अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह की शिक्षा दी। उन्होंने ‘त्रि-रत्न’ (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र) के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्ति की बात कही। जैन धर्म में जीवों के प्रति करुणा और त्याग को विशेष महत्व दिया गया है।
कुल मिलाकर, यह अध्याय बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं के माध्यम से एक ऐसे सरल और समावेशी समाज की कल्पना प्रस्तुत करता है जहाँ कर्मकांडों के स्थान पर नैतिकता और मानवता सर्वोपरि है।
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❤️ 9. प्रथम साम्राज्य
यह अध्याय मगध साम्राज्य के महान सम्राट अशोक के जीवन और शासन पर केंद्रित है। अशोक ने 273 ई.पू. में सत्ता संभाली और उनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।
उनके दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने इस विशाल साम्राज्य की नींव रखी थी। अध्याय में मौर्यकालीन प्रशासन का विस्तृत वर्णन है, जिसमें अमात्य, पुरोहित और राजस्व संग्रहकर्ताओं (समाहर्ता) की भूमिका प्रमुख थी। साम्राज्य को प्रांतों और जिलों में विभाजित किया गया था, जहाँ ग्रामिक और स्थानिक प्रशासनिक व्यवस्था देखते थे।
अशोक के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ कलिंग युद्ध था। युद्ध की विभीषिका और भारी जनहानि देखकर उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने युद्ध का परित्याग कर ‘धम्म’ का मार्ग अपनाया। उनके धम्म में किसी देवी-देवता की पूजा या यज्ञ के स्थान पर बड़ों का आदर, अहिंसा, जीवों पर दया और सभी धर्मों का सम्मान करने जैसे मानवीय मूल्य शामिल थे।
उन्होंने प्रजा के कल्याण के लिए चिकित्सालय खुलवाए, सड़कें बनवाईं और कुएँ खुदवाए। उनके संदेश ब्राह्मी लिपि में शिलाओं और स्तंभों पर अंकित हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ, जिसे भारत ने राष्ट्रीय चिह्न के रूप में अपनाया है, उनकी महान विरासत का प्रतीक है।
अंततः, यह पाठ अशोक को एक विजेता से कहीं अधिक एक लोक-कल्याणकारी और शांतिप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत करता है।
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❤️ 10. शहरी एवं ग्राम्य जीवन
यह पुस्तक अध्याय मौर्योत्तर कालीन भारत (लगभग 200 ई.पू. से 300 ई.) में कृषि, व्यापार और शहरी जीवन के विकास पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि लोहे के औजारों के बढ़ते प्रयोग ने खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाए, जिससे उत्पादन बढ़ा और साम्राज्यों में समृद्धि आई।
सिंचाई के लिए सुदर्शन झील जैसे महत्वपूर्ण निर्माणों का उल्लेख मिलता है, जिसे चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाया और बाद में रुद्रदामन ने मरम्मत कराई। व्यापार के क्षेत्र में ‘रेशम मार्ग’ और रोमन साम्राज्य के साथ होने वाले विनिमय का विशेष महत्व था। दक्षिण भारत के संगम काल के दौरान चोल, पांड्य और चेर राजाओं के संरक्षण में पुहार जैसे बंदरगाह प्रमुख व्यापारिक केंद्र बने।
समाज में ‘ग्रामभोजक’ (मुखिया) और ‘गृहपति’ (स्वतंत्र किसान) जैसे वर्गों का अस्तित्व था, जबकि शिल्पकारों ने अपने संगठन या ‘श्रेणी’ बना रखे थे, जो बैंक की तरह भी कार्य करते थे। पाटलिपुत्र जैसे शहर प्रशासनिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र थे। जातक कथाओं के माध्यम से यह भी दर्शाया गया है कि उस समय बुद्धिमत्ता और व्यापारिक कुशलता से निर्धन व्यक्ति भी धनी बन सकता था।
कुल मिलाकर, यह पाठ प्राचीन भारतीय आर्थिक और सामाजिक संरचना का विस्तृत विवरण प्रदान करता है।
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❤️ 11. सुदूर प्रदेशों से संपर्क
यह अध्याय मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत के विदेशी संबंधों और विभिन्न शासक वंशों के उदय का विस्तृत विश्लेषण करता है। मौर्यों के बाद मगध में शुंग वंश की स्थापना पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई। इसके उपरांत, भारत में इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण जैसे विदेशी आक्रमणकारियों का आगमन हुआ।
यूनानी शासक मिनान्डर (मिलिन्द) ने बौद्ध धर्म अपनाया, जिससे भारत में विज्ञान और कला के नए आयाम खुले। कुषाण वंश के महान राजा कनिष्क ने एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया और बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजकीय संरक्षण दिया। कनिष्क के काल में ‘रेशम मार्ग’ पर नियंत्रण के कारण भारत का व्यापार यूरोप और पश्चिम एशिया तक फैल गया।
इस काल में कला के क्षेत्र में गांधार, मथुरा और अमरावती शैलियों का विकास हुआ, जिनमें भगवान बुद्ध की भव्य मूर्तियाँ बनाई गईं। व्यापार और भिक्षुओं के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रसार श्रीलंका, म्यांमार, मध्य एशिया और चीन जैसे सुदूर क्षेत्रों में हुआ। अंततः, यह पाठ दर्शाता है कि कैसे विदेशी शासक भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए और भारतीय सभ्यता का प्रभाव विश्व स्तर पर विस्तृत हुआ।
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❤️ 12. नए साम्राज्य एवं राज्य
यह पुस्तक अध्याय चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक के भारतीय इतिहास के प्रमुख साम्राज्यों और राज्यों का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है। मुख्य रूप से इसमें गुप्त वंश के उदय और विस्तार पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) जैसे प्रतापी राजाओं की उपलब्धियों, सैन्य अभियानों और प्रशासनिक नीतियों की चर्चा है।
समुद्रगुप्त की ‘प्रयाग प्रशस्ति’ और चंद्रगुप्त द्वितीय के समय के सांस्कृतिक स्वर्ण युग का विशेष उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में पुष्यभूति वंश के शासक हर्षवर्धन के शासनकाल और उनके समय के सामाजिक-धार्मिक जीवन, विशेषकर चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों का वर्णन है।
दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशों, जैसे वातापी के चालुक्य (पुलकेशिन द्वितीय) और काँची के पल्लवों की राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों, विशेषकर उनकी अद्वितीय मंदिर वास्तुकला (द्रविड़ शैली) को भी रेखांकित किया गया है। अंत में, प्राचीन भारत के प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र नालंदा महाविहार की स्थापना, इसकी कार्यप्रणाली और इसके गौरवशाली इतिहास का वर्णन किया गया है, जो तत्कालीन भारत की शैक्षणिक समृद्धि को दर्शाता है।
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❤️ 13. संस्कृति और विज्ञान
यह पुस्तक ‘संस्कृति और विज्ञान’ (अध्याय-13) चौथी से सातवीं सदी के बीच भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रगति का विस्तृत वर्णन करती है। इस काल को ‘महाकाव्य काल’ भी कहा जाता है क्योंकि इसी दौरान रामायण, महाभारत और पुराणों को अंतिम रूप दिया गया। साहित्य के क्षेत्र में कालिदास की रचनाएँ जैसे ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ और ‘मेघदूतम्’ प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त, शूद्रक की ‘मृच्छकटिकम्’ और विशाखादत्त के नाटकों ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है। दक्षिण भारत में संगम साहित्य, विशेषकर ‘सिलप्पदिकारम्’ की रचना हुई। स्थापत्य कला में देवगढ़ का दशावतार मंदिर और अजंता-बाघ की गुफाएँ इस युग की कलात्मक श्रेष्ठता को दर्शाती हैं।
विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट ने शून्य का उपयोग और पृथ्वी के गोल होने की पुष्टि की। चिकित्सा में धनवन्तरी और रसायन विज्ञान में नागार्जुन का योगदान अतुलनीय रहा। मेहरौली का लौह स्तंभ उस समय की उन्नत धातु विज्ञान तकनीक का साक्ष्य है, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा है।
यह पुस्तक प्राचीन भारत के स्वर्ण युग की कला, साहित्य और विज्ञान के सामंजस्यपूर्ण विकास को रेखांकित करती है।
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❤️ 14. हमारे इतिहासकार
यह अध्याय बिहार के दो महान इतिहासकारों, काशी प्रसाद जयसवाल और डॉ. अनंत सदाशिव अल्तेकर के जीवन और भारतीय इतिहास में उनके योगदान पर प्रकाश डालता है। के.
पी. जयसवाल, जो पेशे से वकील थे, ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू पॉलिटी’ के माध्यम से यह सिद्ध किया कि प्राचीन भारत में निरंकुश शासन नहीं बल्कि संवैधानिक राजतंत्र और प्रजातांत्रिक व्यवस्था मौजूद थी। उन्होंने खारवेल के अभिलेखों जैसे विवादों को सुलझाया और पटना संग्रहालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दूसरी ओर, डॉ. ए. एस.
अल्तेकर एक प्रख्यात पुरातत्वविद् और मुद्राशास्त्री थे। उन्होंने वैशाली में खुदाई कर भगवान बुद्ध के शरीरावशेष स्तूप को खोज निकाला और पटना विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहे। अल्तेकर ने ‘प्राचीन भारतीय शासन पद्धति’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं और वे महिलाओं एवं शूद्रों के वेदाध्ययन के अधिकार के प्रबल समर्थक थे।
दोनों ही विद्वान देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे, जहाँ जयसवाल के कार्यों में राष्ट्रीय स्वाभिमान झलकता है, वहीं अल्तेकर ने स्वदेशी के संकल्प के कारण अपनी रचनाएँ भारत में ही प्रकाशित करवाईं। इन दोनों विद्वानों ने साक्ष्यों और वैज्ञानिक दृष्टि के आधार पर भारतीय इतिहास लेखन को एक नई दिशा प्रदान की।
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Book download nahin ho rahi hai
hey @Tanu, डाउनलोड पेज पर कई alternative links दिए गये हैं, आप किसी से भी बुक डाउनलोड कर सकती हैं (नीचे दिया गया screenshot देखें)
Thanks!
english medium books pdf available hain??