Bihar Board 5th Hindi Book 2026 PDF Download (कोंपल)
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BSEB Class 5 Hindi (कोंपल) Textbook PDF Free Download
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❤️ 1. हिन्द देश के निवासी
यह पुस्तक ‘सर्व शिक्षा : 2013-14’ अभियान के अंतर्गत तैयार की गई एक शिक्षण सामग्री है। इसमें मुख्य रूप से ‘हिंद देश के निवासी’ नामक कविता के माध्यम से भारत की विविधता में एकता के संदेश को प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में बताया गया है कि भारत के लोग अलग-अलग रंग, रूप, वेशभूषा और भाषा के होने के बावजूद एक ही माला के फूलों की तरह पिरोए हुए हैं। इसमें प्रकृति के विभिन्न तत्वों जैसे कोयल, पपीहे और बुलबुल के उदाहरण देकर सांस्कृतिक एकता को समझाया गया है।
साथ ही, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी विभिन्न नदियों का सागर में मिलकर एक हो जाने का उदाहरण राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। पुस्तक में विद्यार्थियों के लिए शब्दार्थ और विभिन्न गतिविधियाँ भी शामिल की गई हैं, जैसे भारत के नक्शे में राज्यों को पहचानना, उनके प्रसिद्ध पकवानों, वेशभूषा और भाषाओं के बारे में जानकारी एकत्र करना।
इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों में देशभक्ति, सद्भावना और देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता विकसित करना है। यह पुस्तक सरल हिंदी भाषा में लिखी गई है और बच्चों के मानसिक स्तर के अनुकूल है।
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❤️ 2. टिपटिपवा
यह कहानी ‘टिपटिपवा’ एक मज़ेदार लोककथा है। एक बार मूसलाधार बारिश के दौरान, एक दादी अपने पोते को बता रही थीं कि उन्हें शेर या बाघ से उतना डर नहीं लगता जितना कि छत से टपकते पानी यानी ‘टिपटिपवा’ से लगता है। झोंपड़ी के पीछे छिपा एक बाघ यह सुनकर डर गया और उसने सोचा कि टिपटिपवा कोई बहुत बड़ा भयानक जानवर है।
इसी बीच, भोला नाम का एक व्यक्ति बारिश में अपने खोए हुए गदहे को ढूँढ़ रहा था। अंधेरे में उसने घास में छिपे बाघ को ही अपना गदहा समझ लिया और उसे डंडे से मारते हुए कान पकड़कर अपने घर ले आया। बाघ भी टिपटिपवा के डर से बिना कुछ कहे उसके पीछे चल दिया।
भोला ने उसे खूँटे से बाँध दिया। सुबह जब गाँव वालों ने भोला के घर के बाहर एक बाघ को बँधा देखा, तो वे दंग रह गए। यह कहानी डर और गलतफहमी के कारण पैदा हुई हास्यास्पद स्थिति को बहुत ही रोचक ढंग से दर्शाती है।
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❤️ 3. हुआ यूं कि
यह पाठ भीष्म साहनी द्वारा लिखित एक संस्मरण है, जिसमें उन्होंने अपने बचपन के पहले नाटक ‘श्रवण कुमार’ के मंचन के अनुभवों को हास्यप्रद ढंग से साझा किया है। लेखक ने चौथी कक्षा में श्रवण कुमार की भूमिका निभाई थी।
नाटक के दौरान कई मजेदार घटनाएँ घटीं, जैसे कि अंधों की भूमिका निभा रहे लड़के बार-बार आँखें खोल देते थे, जिससे दर्शक हँसने लगते थे। जब राजा दशरथ ने तीर मारा, तो लेखक ने एक लंबा गीत गाना शुरू किया जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था, जिससे मंच पर मौजूद अन्य कलाकार असहज हो गए।
सबसे हास्यास्पद क्षण तब आया जब लेखक, मरने के अभिनय के बाद नाटक का अगला हिस्सा भूल गए और अचानक उठकर बैठ गए। जब दर्शकों ने शोर मचाया, तो वे घबराकर दोबारा लेट गए, जिसे देखकर पूरा हॉल ठहाकों और तालियों से गूँज उठा।
यह लेख नाटक की दुनिया के शुरुआती अनुभवों, मंच के पीछे की तैयारी और बच्चों की मासूमियत को जीवंत करता है। अंत में पाठ के माध्यम से शब्दार्थ और भाषा के विभिन्न रूपों जैसे ‘गहरा’ शब्द के प्रयोग और अंग्रेजी शब्दों के शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया गया है।
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❤️ 4. चांद का कुर्ता
यह कविता ‘चाँद का कुर्ता’ प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखी गई है। इसमें चाँद और उसकी माता के बीच के एक अत्यंत सरल और मनमोहक संवाद का वर्णन है। चाँद अपनी माँ से ज़िद करता है कि उसे ऊन का एक मोटा ‘झिंगोला’ (ढीला-ढाला कुर्ता) सिलवा दिया जाए क्योंकि उसे रात भर चलने वाली ठंडी हवा के कारण बहुत जाड़ा लगता है।
वह कहता है कि ठिठुर-ठिठुर कर वह अपनी आकाश की यात्रा पूरी करता है और यदि नया कुर्ता नहीं मिल सकता, तो माँ उसे किराए पर ही कोई कुर्ता दिला दे। चाँद की माँ उसकी बात सुनकर चिंतित हो जाती है। वह अपनी परेशानी बताते हुए कहती है कि चाँद का आकार कभी एक समान नहीं रहता।
वह कभी एक उँगली भर चौड़ा हो जाता है, कभी एक फुट मोटा, तो कभी इतना छोटा हो जाता है कि दिखाई भी नहीं देता। माँ को समझ नहीं आता कि वह किस दिन उसका नाप ले, क्योंकि वह रोज़ घटता-बढ़ता रहता है। अंततः, माँ की यह दुविधा चाँद के निरंतर बदलते आकार (चाँद की कलाओं) के कारण उत्पन्न होती है, जिससे उसके लिए एक स्थायी नाप का कुर्ता सिलवाना असंभव प्रतीत होता है।
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❤️ 5. म्यान का रंग
यह कहानी दो राजाओं, खड़ग सिंह और कड़क सिंह की है, जिनके बीच पुरानी पुश्तैनी दुश्मनी थी। एक दिन उनके महामंत्रियों ने उनकी लड़ाई खत्म करने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने दोनों राज्यों की सीमा पर स्थित एक पीपल के पेड़ पर एक म्यान लटका दी।
खड़ग सिंह ने म्यान को एक तरफ से देखा और उसे लाल रंग का बताया, जबकि कड़क सिंह ने दूसरी तरफ से देखने पर उसे सफेद बताया। इस बात पर दोनों में विवाद बढ़ गया और वे युद्ध के लिए तैयार हो गए। तभी मंत्रियों ने हस्तक्षेप किया और बताया कि म्यान वास्तव में एक तरफ से लाल और दूसरी तरफ से सफेद है।
राजाओं को अपनी गलती का एहसास हुआ कि बिना पूरी सच्चाई जाने और दूसरे का दृष्टिकोण समझे लड़ना गलत है। इस सूझबूझ से उनकी वर्षों पुरानी दुश्मनी समाप्त हो गई और उन्होंने भविष्य में शांति से रहने का निर्णय लिया। यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले स्थिति के सभी पहलुओं की जाँच करना आवश्यक है।
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❤️ 6. उपकार का बदला
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❤️ 7. चतुर चित्रकार
यह कविता ‘चतुर चित्रकार’ रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित है, जिसमें एक चित्रकार की सूझ-बूझ और चतुराई का वर्णन किया गया है। कहानी तब शुरू होती है जब एक चित्रकार सुनसान जगह पर चित्र बना रहा होता है और अचानक वहाँ एक यमराज का मित्र अर्थात् भयानक शेर आ जाता है।
शेर को देख चित्रकार पहले तो घबरा गया, पर उसने हिम्मत जुटाई और शेर को शांत बैठने के लिए कहा ताकि वह उसका सुंदर चित्र बना सके। चित्रकार ने चालाकी से शेर को पीठ घुमाकर बैठने को कहा।
जैसे ही शेर ने अपनी पीठ चित्रकार की तरफ की, चित्रकार चुपके से वहाँ रखी नाव लेकर झील के पार भाग निकला। जब शेर को पता चला कि उसे धोखा दिया गया है, तो वह झुंझला उठा और चित्रकार से अपना सामान ले जाने को कहा।
चित्रकार ने दूर से ही जवाब दिया कि वह अपनी चित्रकला का अभ्यास जंगल में ही करे। यह कविता सिखाती है कि कठिन और डरावनी परिस्थितियों में घबराने के बजाय यदि हम बुद्धि और धैर्य से काम लें, तो अपनी जान बचा सकते हैं और किसी भी समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।
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❤️ 8. ननकू
यह कहानी ननकू नाम के एक साहसी बालक के इर्द-गिर्द घूमती है। ननकू को बारिश का मौसम और गुल्ली-डंडा खेलना बहुत पसंद है। एक बार भारी बारिश के कारण उसके गाँव में भीषण बाढ़ आ गई, जिससे चारों ओर अफरा-तफरी मच गई।
जब पानी गाँव के निचले हिस्सों और ननकू के घर तक पहुँच गया, तो उसने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। उसके दादाजी, जो देख नहीं सकते थे, घर में फँसे हुए थे। ननकू ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दादाजी को घर के छप्पर पर चढ़ाया।
पानी का वेग इतना तेज़ था कि छप्पर बहकर नदी की मुख्य धारा में चला गया। शहर के पास पहुँचने पर, ननकू ने छप्पर पर रखी एक रस्सी को पुल पर खड़े लोगों की ओर फेंका, जिसकी मदद से उन दोनों को सुरक्षित बचा लिया गया। ननकू की इस बहादुरी और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने न केवल उसके दादाजी की जान बचाई, बल्कि उसे पूरे गाँव का नायक बना दिया।
उसकी इस वीरता की कहानी दिल्ली तक पहुँची और उसे राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत करने की घोषणा की गई। यह कहानी संकट के समय धैर्य और साहस के महत्व को दर्शाती है।
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❤️ 9. ममता की मूर्ति
यह पाठ मदर टेरेसा के सेवाभावी जीवन पर आधारित है, जिनका जन्म 1910 में युगोस्लाविया में हुआ था। बचपन का नाम एग्नेस था और उन्होंने गरीबों की सेवा के लिए नन बनने का निर्णय लिया। 1929 में वे भारत आईं और कोलकाता के सेंट मेरी स्कूल में शिक्षिका बनीं, लेकिन दुखी और बीमार लोगों की सेवा की पुकार उन्हें सड़क पर ले आई।
उन्होंने 1948 में अध्यापन छोड़कर अपना जीवन कुष्ठ रोगियों और निराश्रितों की सेवा में समर्पित कर दिया। मदर टेरेसा ने कोलकाता में ‘निर्मल हृदय’ नामक घर बनाया, जहाँ वे लावारिस बीमारों को आश्रय और ममता देती थीं। उनके कार्यों के कारण ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़’ को वैश्विक मान्यता मिली।
वे स्वयं रोगियों के घाव साफ करती थीं, जिससे प्रभावित होकर अमेरिकी अधिकारी कैनेडी ने उनके हाथों को पवित्र बताया। उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ और विश्व ने ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। 5 सितंबर 1997 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संदेश आज भी जीवंत है कि विश्व में हर दुखी व्यक्ति प्यार और मदद का हकदार है।
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❤️ 9. ममता की मूर्ति
यह पाठ मदर टेरेसा के सेवाभावी जीवन पर आधारित है, जिनका जन्म 1910 में युगोस्लाविया में हुआ था। बचपन का नाम एग्नेस था और उन्होंने गरीबों की सेवा के लिए नन बनने का निर्णय लिया। 1929 में वे भारत आईं और कोलकाता के सेंट मेरी स्कूल में शिक्षिका बनीं, लेकिन दुखी और बीमार लोगों की सेवा की पुकार उन्हें सड़क पर ले आई।
उन्होंने 1948 में अध्यापन छोड़कर अपना जीवन कुष्ठ रोगियों और निराश्रितों की सेवा में समर्पित कर दिया। मदर टेरेसा ने कोलकाता में ‘निर्मल हृदय’ नामक घर बनाया, जहाँ वे लावारिस बीमारों को आश्रय और ममता देती थीं। उनके कार्यों के कारण ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़’ को वैश्विक मान्यता मिली।
वे स्वयं रोगियों के घाव साफ करती थीं, जिससे प्रभावित होकर अमेरिकी अधिकारी कैनेडी ने उनके हाथों को पवित्र बताया। उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ और विश्व ने ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। 5 सितंबर 1997 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संदेश आज भी जीवंत है कि विश्व में हर दुखी व्यक्ति प्यार और मदद का हकदार है।
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❤️ 11. एक पत्र की आत्मकथा
यह अध्याय ‘एक पत्र की आत्मकथा’ शीर्षक से है, जिसमें एक पत्र स्वयं अपनी यात्रा का वर्णन करता है। पत्र का जन्म 3 अगस्त 2011 को बिहार के गया जिले के धरमपुर गाँव में हुआ, जहाँ शांति नाम की एक छात्रा ने अपने भाई रमेश के लिए राखी और पत्र एक पीले लिफाफे में बंद किया। शांति की माँ ने इस पत्र को बिशनपुर की पत्र-पेटी में डाला।
वहाँ से डाकिया इसे निकालकर डाकघर ले गया, जहाँ इस पर सील लगाई गई। इसके बाद इसे गया के आर.एम.एस. (रेलवे मेल सर्विस) कार्यालय भेजा गया, जहाँ पते के आधार पर इसकी छँटाई हुई और इसे दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी में डाल दिया गया।
लगभग 18 घंटे की यात्रा के बाद पत्र दिल्ली पहुँचा। दिल्ली के मुख्य डाकघर से एक डाकिया इसे रमेश के घर ले गया। रमेश अपनी बहन का पत्र और राखी पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ।
अंत में, पत्र बताता है कि अब वह अन्य पत्रों के साथ आलमारी में सुरक्षित है और एक शांत जीवन व्यतीत कर रहा है। यह पाठ बच्चों को डाक व्यवस्था, छँटाई की प्रक्रिया और संचार के पारंपरिक माध्यमों की जानकारी अत्यंत सरल और रोचक ढंग से प्रदान करता है।
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❤️ 12. कविता का कमाल
यह कहानी मदन नाम के एक गरीब लड़के की है, जो अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। एक दिन उसकी माँ ने उसे पैसे कमाने के लिए घर से बाहर भेजा। रास्ते में उसे राजदरबार में होने वाले कवि सम्मेलन के बारे में पता चला, जहाँ सबसे अच्छी कविता सुनाने वाले को सौ अशर्फियाँ इनाम में मिलनी थीं।
मदन ने कभी कविता नहीं लिखी थी, लेकिन रास्ते में उसने जो कुछ देखा, उसे पंक्तियों में पिरो लिया। उसने जमीन खोदते कुत्ते को देखकर ‘खुदुर-खुदुर का खोदत है?’, पानी पीती भैंस को देखकर ‘सुरुर-सुरुर का पीबत है?’, झाँकती चिड़िया को देखकर ‘ताक-झाँक का खोजत है?’ और रेंगते साँप को देखकर ‘सरक-सरक कहाँ भागत है?’ जैसी पंक्तियाँ बनाईं। संयोग से, जिस रात राजा यह कविता गुनगुना रहे थे, उसी समय धन्नूशाह नाम का चोर अपने साथियों के साथ खजाने में सेंध लगा रहा था।
राजा के शब्दों को सुनकर चोरों को लगा कि वे पकड़े गए हैं। डर के मारे धन्नूशाह ने राजा के पैर पकड़ लिए और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इस प्रकार, मदन की विचित्र कविता ने राजा का खजाना लुटने से बचा लिया।
खुश होकर राजा ने मदन को सोने-चाँदी से मालामाल कर दिया।
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❤️ 13. कदंब का पेड़
‘कदम्ब का पेड़’ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित एक अत्यंत भावुक और मनोरम कविता है। इस कविता में एक बालक की कल्पना का वर्णन है जो यमुना के किनारे कदम्ब के पेड़ पर बैठकर कन्हैया (कृष्ण) बनना चाहता है।
वह कल्पना करता है कि यदि उसकी माँ उसे एक सस्ती सी बाँसुरी दिला दे, तो वह उस पेड़ की नीची डाली पर बैठकर बाँसुरी बजाएगा। बालक अपनी माँ के साथ लुका-छिपी का खेल खेलना चाहता है; वह पत्तों में छिप जाएगा और जब उसकी माँ उसे ढूँढते हुए व्याकुल हो जाएँगी, तो वह चुपके से उनके आँचल के नीचे आ जाएगा।
माँ उसे नीचे उतारने के लिए मिठाई, खिलौने, माखन, मिश्री और मलाई का लालच देती हैं। यह कविता माँ और बच्चे के निश्छल प्रेम और शरारतों को बहुत ही सुंदरता से दर्शाती है।
अंत में, बालक की माँ जब ईश्वर से प्रार्थना करने बैठती हैं, तो वह उनकी गोदी में छिपकर उन्हें सुखद आश्चर्य देता है। पूरी कविता वात्सल्य रस से ओत-प्रोत है और पाठक को बचपन की यादों में ले जाती है।
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❤️ 14. दोहे
प्रस्तुत पाठ ‘दोहावली’ में हिंदी साहित्य के महान कवियों—तुलसीदास, रहीम और कबीरदास के नीतिपरक दोहों का संकलन किया गया है। ये दोहे मनुष्य को जीवन के व्यावहारिक सत्यों, नैतिक मूल्यों और उत्तम व्यवहार की शिक्षा देते हैं। तुलसीदास जी ने प्रेम और मिल-जुलकर रहने की महत्ता पर बल दिया है, वहीं रहीम जी ने धैर्य, स्वाभिमान और संकट के समय सच्चे मित्र की पहचान जैसे विषयों पर प्रकाश डाला है।
कबीरदास जी के माध्यम से निरंतर अभ्यास की शक्ति और अहंकार के त्याग का संदेश दिया गया है। पाठ में बताया गया है कि परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना सबसे बड़ा पाप है। समय के महत्व को रेखांकित करते हुए कवि कहते हैं कि अवसर निकल जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं होता।
इसी प्रकार, अति के बोलने या अति के चुप रहने को भी अनुचित बताया गया है। सरल भाषा और उदाहरणों के माध्यम से ये दोहे जड़मति (मूर्ख) को भी सुजान (बुद्धिमान) बनाने और जीवन पथ पर सही दिशा में चलने की प्रेरणा देते हैं। यह पाठ समग्र शिक्षा के अंतर्गत विद्यार्थियों में सदाचार और समझ विकसित करने का एक सराहनीय प्रयास है।
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❤️ 15 . चिठ्ठी आई है_
यह पाठ बिहार के प्रसिद्ध लोक पर्व ‘छठ’ के महत्व और उसकी परंपराओं पर आधारित है। कहानी एक पत्र के माध्यम से आगे बढ़ती है, जिसे सलोनी अपनी सहेली बेबी को लिखती है। इसमें बताया गया है कि छठ पूजा कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।
यह त्योहार चार दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है, जिसके बाद ‘खरना’ आता है। तीसरे दिन डूबते सूर्य को और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस व्रत में स्वच्छता, पवित्रता और जात-पात के भेदभाव को भूलकर सभी की भागीदारी का विशेष महत्व है।
छठ के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक गीत और घाटों की सजावट पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है। पाठ में न केवल पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया गया है, बल्कि संचार के माध्यम के रूप में ‘चिट्ठी’ और ‘पिनकोड’ जैसी जानकारियों पर भी प्रकाश डाला गया है। अंततः सलोनी अपनी सहेली को अगले साल छठ में गाँव आने का निमंत्रण देती है।
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❤️ 16. मरता क्या न करता
यह कहानी ‘मरता क्या न करता’ केरल की एक रोचक लोककथा है। इसका मुख्य पात्र विष्णु पोट्टि एक गरीब व्यक्ति है, जिसे दानी कहलाने का बहुत शौक है। वह अपनी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना हर रोज अनजान मेहमानों को घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करता था।
उसकी पत्नी लक्ष्मी इस आदत से परेशान थी क्योंकि मेहमानों को खिलाने के कारण उसे अक्सर भूखा रहना पड़ता था। एक दिन जब विष्णु दो अजनबियों को घर लाया, तो लक्ष्मी ने उन्हें भगाने के लिए एक चतुराई भरी योजना बनाई। उसने मेहमानों के सामने एक मूसल की पूजा शुरू कर दी और उन्हें डरा दिया कि विष्णु भोजन के बाद मेहमानों को इसी मूसल से पीटता है।
डर के मारे अतिथि वहां से भाग निकले। जब विष्णु ने पूछा तो लक्ष्मी ने कह दिया कि वे मूसल मांग रहे थे। विष्णु मूसल लेकर उनके पीछे दौड़ा, जिसे देखकर मेहमानों को यकीन हो गया कि वह उन्हें मारने आ रहा है।
यह बात पूरे गाँव में फैल गई और विष्णु की मेहमानों को बुलाने की आदत छूट गई। इस प्रकार लक्ष्मी की सूझबूझ से उसकी समस्या का समाधान हो गया।
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❤️ 17. बिना जड़ का पेड़
यह कहानी चतुर गोनू झा की बुद्धिमानी पर आधारित है। एक बार राजा के दरबार में एक अहंकारी व्यापारी एक संदूक लेकर आया और उसने चुनौती दी कि कोई बताए कि उसमें क्या है। उसने दावा किया कि वह बिना बीज और पानी के पेड़ उगाता है।
दरबार के सभी विद्वान चुप रहे, लेकिन गोनू झा ने चुनौती स्वीकार की। उन्होंने व्यापारी को एक रात अपने घर ठहराया और बातों-बातों में यह जान लिया कि व्यापारी के ‘पेड़’ केवल रात में खिलते हैं और रंग-बिरंगे होते हैं। अगले दिन दरबार में गोनू झा ने आतिशबाजी (पटाखे) छोड़ी, जिससे राजा और दरबारी हैरान रह गए।
गोनू झा ने समझाया कि यही व्यापारी का रहस्य है—आतिशबाजी, जो बिना जड़, बीज या पानी के आकाश में रंग-बिरंगे फूलों की तरह खिलती है। व्यापारी ने अपनी हार मान ली और गोनू झा की चतुराई की प्रशंसा हुई। राजा ने गोनू झा को पुरस्कृत किया।
पुस्तक के अगले भाग में कागज से गुलाब के फूल बनाने की विधि भी विस्तार से समझाई गई है, जो बच्चों के लिए एक रचनात्मक गतिविधि है। यह पाठ न केवल मनोरंजन करता है बल्कि तार्किक सोच को भी बढ़ावा देता है।
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❤️ 18. आजादी में जीवन
यह पुस्तक ‘मैना-सुग्गा’ प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए स्वतंत्रता के महत्व को दर्शाने वाली एक शिक्षाप्रद रचना है। इसमें भगवती प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित कविता ‘आजादी में जीवन’ के माध्यम से यह समझाया गया है कि किसी भी जीव के लिए स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ नहीं है। पिंजरे में बंद पक्षी को चाहे सभी सुख-सुविधाएँ और मनचाहा भोजन मिले, फिर भी वह अपनी स्वाभाविक खुशी और चहक खो देता है।
चिड़ियाघर में कैद शेर भी गुलामी के जीवन से परेशान रहता है और निरंतर दहाड़कर अपनी मुक्ति की इच्छा व्यक्त करता है। जल के बिना मछली का और डाली से टूटने के बाद कलियों का मुरझाना भी उनकी अपनी प्रकृति और परिवेश के प्रति लगाव को दर्शाता है। पुस्तक में अभ्यास के माध्यम से बच्चों को पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनाने और आजादी के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए प्रेरित किया गया है।
यह स्पष्ट किया गया है कि सच्ची खुशी केवल स्वतंत्र रहकर ही प्राप्त की जा सकती है। पाठ के अंत में शब्दार्थ, भाषा के नियम और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए विद्यार्थियों के भाषाई कौशल को विकसित करने का प्रयास किया गया है। कुल मिलाकर यह पाठ स्वतंत्रता, सहानुभूति और प्राकृतिक जीवन के प्रति प्रेम का संदेश देता है।
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❤️ 19. अंधेर नगरी
यह प्रसिद्ध एकांकी ‘अँधेर नगरी’ भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित है। कहानी एक ऐसे राज्य की है जहाँ न्याय और व्यवस्था पूरी तरह से ठप है। यहाँ का राजा ‘चौपट राजा’ विवेकहीन है और नगर में हर वस्तु, चाहे वह कीमती मिठाई हो या साधारण सब्जी, ‘टके सेर’ (समान दाम) पर बिकती है।
एक महंत अपने शिष्यों के साथ यहाँ आते हैं और अव्यवस्था देखकर तुरंत लौटने का निर्णय लेते हैं, परंतु उनका एक शिष्य गोवर्धनदास लालचवश वहीं रुक जाता है। एक दिन एक बकरी की मौत के न्याय के नाम पर राजा कोतवाल को फाँसी की सजा सुनाता है, लेकिन कोतवाल के दुबले होने के कारण फंदा ढीला पड़ता है। तब राजा किसी ‘मोटे’ आदमी को फाँसी देने का आदेश देता है और सिपाही मिठाई खाकर मोटे हुए गोवर्धनदास को पकड़ लेते हैं।
अंत में, महंत जी अपनी चतुराई से गोवर्धनदास को बचाते हैं। वे राजा को विश्वास दिलाते हैं कि इस शुभ मुहूर्त में जो मरेगा वह सीधा स्वर्ग जाएगा। राजा स्वयं स्वर्ग जाने के लालच में फाँसी पर चढ़ जाता है।
यह नाटक मूर्ख सत्ता और विवेकहीन न्याय प्रणाली पर तीखा व्यंग्य करता है।
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❤️ 20 क्यों
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❤️ 21 ईद
यह कहानी एक दस वर्षीय बालक असलम की है, जो रमज़ान के महीने में रोज़े रखने की ज़िद करता है। असलम की अम्मी चिकन के कपड़ों पर कढ़ाई का काम करके बड़ी मुश्किल से घर चलाती हैं। असलम ईद पर नए कपड़े, विशेषकर रहीम चाचा की दुकान का रँगा कुर्ता-पायजामा और ज़री की सदरी पहनना चाहता है।
उसकी अम्मी दिन-रात मेहनत करके दो सौ रुपये जुटाती हैं ताकि असलम की इच्छा पूरी हो सके। जब असलम कपड़े खरीदने जा रहा होता है, तो उसे अपने मित्र मोहन की याद आती है। मोहन के पिता बहुत बीमार थे और उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे।
असलम एक साहसी निर्णय लेता है और अपने नए कपड़ों के पैसे मोहन को उसके पिता के इलाज के लिए दे देता है। खाली हाथ लौटने पर जब वह अपनी अम्मी को यह बात बताता है, तो वे भावुक होकर उसे गले लगा लेती हैं। रात में असलम सपने में अल्लाह की आवाज़ सुनता है कि उसने ही ‘सच्ची ईद’ मनाई है।
यह कहानी त्याग, मित्रता और परोपकार की भावना को खूबसूरती से दर्शाती है, जहाँ दूसरों की मदद करना व्यक्तिगत खुशी से कहीं बढ़कर है।
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❤️ 22 परीक्षा
यह अध्याय आयुर्वेद के महान विद्वान आचार्य चरक और उनके शिष्यों की एक प्रेरणादायक कहानी है। आचार्य चरक अपने शिष्यों को वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों का गहन ज्ञान देते थे। वे अक्सर चाँदनी रातों में शिष्यों को जंगल ले जाते थे ताकि वे उन विशिष्ट बूटियों को पहचान सकें जो केवल रात में ही दिखती हैं।
एक बार उन्होंने अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा ली और उन्हें तीस दिनों के भीतर जंगल से ऐसी जड़ी-बूटी लाने को कहा जिसका चिकित्सा में कोई उपयोग न हो। निर्धारित समय के बाद, लगभग सभी शिष्य कुछ न कुछ लेकर आए—जैसे कँटीली झाड़ियाँ, छालें या ज़हरीले फल, जिन्हें वे व्यर्थ समझते थे। लेकिन एक शिष्य तीसवें दिन खाली हाथ लौटा और विनम्रतापूर्वक कहा कि उसे पूरे जंगल में ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसका आयुर्वेद में कोई महत्व न हो।
आचार्य चरक ने केवल उसी शिष्य को उत्तीर्ण घोषित किया। उन्होंने समझाया कि प्रकृति में कोई भी चीज़ बेकार नहीं है; यदि हमें उसका उपयोग नहीं पता, तो इसका अर्थ है कि हमारा ज्ञान अधूरा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति की हर रचना अमूल्य है और ज्ञान की पूर्णता उसे सही ढंग से समझने में निहित है।
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❤️ 23 मिथिला चित्रकला
यह पुस्तक मिथिला या मधुबनी चित्रकला के समृद्ध इतिहास और विशेषताओं पर प्रकाश डालती है। बिहार के दरभंगा, मधुबनी और नेपाल के क्षेत्रों में प्रचलित यह कला मूल रूप से महिलाओं द्वारा दीवारों और आंगन में बनाई जाती थी। माना जाता है कि इसकी शुरुआत राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के अवसर पर की थी।
मधुबनी चित्रकला के दो मुख्य रूप हैं: भित्ति चित्र और अरिपन (अल्पना)। इसमें देवी-देवताओं जैसे दुर्गा, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती और प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया जाता है। कलाकार पारंपरिक रूप से हल्दी, केले के पत्ते और दूध जैसी घरेलू वस्तुओं से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते थे, हालांकि अब एक्रिलिक रंगों का प्रयोग भी होने लगा है।
ब्रिटिश अधिकारी डब्लू. जी. आर्चर ने 1930 के दशक में इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
गंगा देवी और सीता देवी जैसे कलाकारों ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध किया। वर्तमान में मिथिला कला संस्थान जैसी संस्थाएं इस पारंपरिक कला को संरक्षित करने और नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य कर रही हैं। यह कला आज भी मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान और मिट्टी की खुशबू को जीवंत रखे हुए है।
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Sir ham bihar primary ki sabhi book online chahate hai kripa karke link uplabdh karane ki kripa kare 97*******42 WhatsApp &contactno
hey @Dhirendra, It’s already given on this website, check out the home page.
Class 5th ka hindi books download nahi ho raha ha
hey @Ankit, बुक कैसे डाउनलोड करना है, नीचे दिया गया स्क्रीनशॉट देखें –
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Sir , i cannot find S.ST book of class 5. please help me to find it. I am preparing for Simultala Awasiya Vidyalya. please help me .Plzzzz help me someone.I will be ever grateful to you for that.
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