• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
Bihar Board Books

Bihar Board Books

Download Bihar Board Textbooks

Bihar Board 9th Sanskrit Book 2026 PDF Download

Last Updated on February 16, 2026 by bseb 1 Comment

Bihar Board 9th Sanskrit Book Sanskrit 2026 PDF Download

Bihar Board 9th Sanskrit Book Sanskrit 2026 PDF Download  – इस पेज पर बिहार बोर्ड 9th के छात्रों के लिए “Class IX: Sanskrit (पीयूषम्)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

🌐 सभी विषयों की बुक्स डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें -> https://biharboardbooks.com/

🌐 बिहार बोर्ड सलूशन डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Bihar Board Solutions

सभी बुक्स का डाउनलोड लिंक नीचे पेज पर दिया गया है |

Class IX: Sanskrit (पीयूषम्) PDF Free Download

☞ बुक्स डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए डाउनलोड लिंक पर क्लिक करें | line

❤️ विषयानुक्रमणिका

‘पीयूषम् (प्रथम भाग)’ बिहार राज्य के कक्षा IX के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण संस्कृत पाठ्यपुस्तक है, जिसे राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT) द्वारा विकसित किया गया है। यह पुस्तक न केवल संस्कृत भाषा के व्याकरणिक ज्ञान पर केंद्रित है, बल्कि यह छात्रों को भारत की अमूल्य सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से भी जोड़ती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के सिद्धांतों के अनुरूप, इस पुस्तक का उद्देश्य शिक्षा को बोझ मुक्त और आनंदमयी बनाना है।

पुस्तक में संकलित 15 अध्यायों में विविधता का अद्भुत सामंजस्य है। जहाँ एक ओर ‘ईशस्तुति’, ‘यक्षयुधिष्ठिर-संवाद’ और ‘नीतिपद्यानि’ जैसे पाठ प्राचीन ज्ञान और नैतिकता का संचार करते हैं, वहीं ‘बिहारस्य सांस्कृतिकं वैभवम्’, ‘वीर कुंवर सिंह’ और ‘विश्ववन्दिता वैशाली’ जैसे पाठ क्षेत्रीय गौरव और देशभक्ति की भावना जागृत करते हैं। इसमें आधुनिक सामाजिक विषयों जैसे ‘किशोराणां मनोविज्ञानम्’ और ‘ग्राम्यजीवनम्’ को भी शामिल किया गया है, जो छात्रों के सर्वांगीण विकास में सहायक हैं।

प्रत्येक पाठ के साथ विस्तृत शब्दार्थ, व्याकरण के संदर्भ और अभ्यास प्रश्न दिए गए हैं, जो स्व-अध्ययन को सुगम बनाते हैं। ‘द्रुतवाचन’ अनुभाग के माध्यम से छात्रों में पढ़ने की रुचि और सृजनात्मकता विकसित करने का प्रयास किया गया है। कुल मिलाकर, यह पुस्तक संस्कृत को एक जीवंत भाषा के रूप में प्रस्तुत करती है, जो वर्तमान युग की आवश्यकताओं और मानवीय मूल्यों के साथ पूर्णतः प्रासंगिक है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ प्रथमः पाठः – ईशस्तुति:

‘ईशस्तुति’ शीर्षक वाला यह पाठ हमारी संस्कृत पुस्तक का पहला अध्याय है। इसमें उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के महान मंत्र तथा श्लोक संकलित हैं। ये सभी मंत्र जगत के नियंता परमेश्वर की महिमा को विविधतापूर्वक वर्णित करते हैं।

पाठ की शुरुआत तैत्तिरीय उपनिषद के एक मंत्र से होती है, जिसमें भगवान के अनंत रूप का वर्णन किया गया है, जहाँ कहा गया है कि वाणी और मन जिस आनंदरूप ब्रह्म से लौटते हैं, उस ब्रह्मवेत्ता से कोई नहीं डरता। उसके बाद प्रसिद्ध वैदिक मंत्र ‘असतो मा सद्गमय’ हमें अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाने की प्रार्थना करता है। श्वेताश्वतर उपनिषद में भगवान की सर्वव्यापकता दिखाई गई है; वही एक देव सभी प्राणियों में छिपा है, वही सबका अंतर्यामी, कर्मों का अध्यक्ष और साक्षी है।

गीता के श्लोकों में श्रीकृष्ण को आदिदेव और पुराण पुरुष कहा गया है, जो पूरे विश्व के आश्रय हैं। वह सब कुछ जानते हैं और स्वयं जानने योग्य हैं। भक्त उस भगवान को आगे, पीछे और सभी ओर से श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता है।

यह पाठ ईश्वर की अनंत शक्ति और उनकी विभूति को स्पष्ट करता है। इस स्तुति के माध्यम से छात्र ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का अनुभव करके जीवन में सत्य और प्रकाश के मार्ग को पाने के लिए प्रेरित होते हैं। ईशस्तुति केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार का एक सरल मार्ग भी है।

यह स्तुति हमारे मन में पवित्रता और शाश्वत शांति उत्पन्न करती है। इसमें ईश्वर के सगुण और निर्गुण स्वरूप का सुंदर समन्वय है। उपनिषदों का ज्ञान मानव कल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ये मंत्र हमें सदाचार और त्याग की शिक्षा देते हैं। ईश्वर ही हमारे रक्षक और मार्गदर्शक हैं। ईशस्तुति हमें आध्यात्मिकता के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ द्वितीयः पाठः -लोभविष्टः चक्रधरः

‘पंचतंत्र’ के ‘अपरीक्षितकारक’ खंड से लिया गया यह ‘लोभ से ग्रस्त चक्रधर’ नामक पाठ कथा के माध्यम से लोभ के भयंकर दुष्परिणाम को दिखाता है। किसी नगर में चार गरीब ब्राह्मण पुत्र धन कमाने के लिए देश भ्रमण करते हैं। वे अवंतीनगरी में भैरवानंद योगी से मिलते हैं, जो उन्हें चार ‘सिद्ध बत्तियाँ’ देता है।

वह उन्हें हिमालय की दिशा में भेजते हुए कहता है कि जहाँ-जहाँ बत्ती गिरेगी, वहाँ-वहाँ जमीन खोदकर खजाना लेना। पहला ब्राह्मण तांबा पाकर संतुष्ट हो जाता है, दूसरा चांदी और तीसरा सोना पाकर संतोष कर लेता है। लेकिन चौथा ब्राह्मण अधिक धन के लोभ में अकेला आगे बढ़ जाता है।

वह गर्मी से तपता और प्यास से व्याकुल होकर रास्ता भटक जाता है। अंत में वह एक व्यक्ति को देखता है जिसके सिर पर खून से सना एक चक्र घूम रहा था। जब वह उत्सुकता से उससे पूछता है, तो वह चक्र उसके सिर से निकलकर चौथे ब्राह्मण के सिर पर ही गिर जाता है।

वह व्यक्ति स्पष्ट करता है कि यह चक्र उसी के सिर पर घूमता है जो अत्यधिक लोभ से आकर्षित होकर यहाँ आता है। यह कथा हमें सिखाती है कि अतिलोभ विनाश का कारण बनता है, इसलिए मनुष्य को जितना मिले उसी में संतोष करना चाहिए। ‘लोभ से ग्रस्त चक्रधर’ पाठ केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक बड़ा सत्य बताता है कि लोभ मनुष्य को न केवल दुखी करता है बल्कि उसका विवेक भी नष्ट कर देता है, जिससे वह कष्ट में पड़ जाता है।

इस प्रकार पंचतंत्र की यह कथा लोभ के विषय में मानव जाति को सावधान करती है ताकि लोग सुखी जीवन व्यतीत कर सकें।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ तृतीयः पाठः -यक्ष-युधिष्ठिर संवाद

यह पाठ महाकवि व्यास द्वारा रचित महाभारत के वनपर्व के 313वें अध्याय से संकलित है। महाभारत विश्व का विशालतम प्राचीन महाकाव्य है, जिसमें अठारह पर्व हैं। उनमें वनपर्व एक है जहाँ पांडव अपने वनवास काल में विचर रहे थे।

एक बार वे अत्यंत प्यासे हो गए। पानी पीने के लिए वे एक सुंदर सरोवर पर पहुँचे। उस सरोवर का रक्षक एक यक्ष था।

यक्ष ने पहले ही सरोवर पर घोषणा कर दी थी कि जो सरोवर से पानी पीना चाहते हैं, उन्हें मेरे प्रश्नों का उचित उत्तर देना होगा। लेकिन युधिष्ठिर के भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव उसकी आज्ञा के बिना पानी पीकर बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। अंत में धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ पहुँचे।

उन्होंने अपने भाइयों को बेहोश देखकर दुखी हुए, लेकिन यक्ष की आवाज सुनकर सचेत हो गए। यक्ष ने उनसे भी अनेक प्रकार के गंभीर और नीतिपरक प्रश्न किए। युधिष्ठिर ने अत्यंत धैर्य, शांतचित्त और बुद्धिमत्ता से सभी प्रश्नों के उत्तर दिए।

यक्ष ने पूछा कि संसार किससे ढका हुआ है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि संसार ‘अज्ञान’ से ढका हुआ है। उन्होंने लोभ को ‘अनंत रोग’ और क्रोध को ‘सबसे कठिनाई से जीते जाने वाला शत्रु’ बताया।

युधिष्ठिर के अनुसार इंद्रियों को नियंत्रित करना ही वास्तविक धैर्य है, ‘अपने धर्म में स्थिर रहना’ ही स्थैर्य है और मन की मलिनता का त्याग ही श्रेष्ठ और पवित्र स्नान है। युधिष्ठिर के विवेकपूर्ण उत्तरों से यक्ष अत्यंत प्रसन्न हो गया। उसने न केवल युधिष्ठिर को पानी पीने का अधिकार दिया, बल्कि उनके सभी भाइयों को भी पुनर्जीवित कर दिया।

यह संवाद केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी शाश्वत नीति संदेश है। यह पाठ हमें विपत्ति में भी धैर्य से काम करना सिखाता है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ चतुर्थः पाठः -चत्वारो वेदाः

भारतीय प्राचीन संस्कृति में वेदों का स्थान सबसे ऊपर और अनन्य है। संसार के उपलब्ध ग्रंथों में वेद सबसे प्राचीन हैं, जो ज्ञान के अक्षय भंडार माने जाते हैं। वास्तव में ज्ञान का पर्याय ही वेद है।

हमारी भारतीय प्राचीन संस्कृति वेदों में ही सुरक्षित है। विशेष रूप से यज्ञ संचालन के लिए एक ही वेद के चार रूप बनाए गए, जिससे चार वेदों की परंपरा चली। वे हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

ऋग्वेद विश्व के प्राचीनतम मंत्रों को धारण करता है, यह दस मंडलों में विभक्त है। इसमें 1028 सूक्त और 10552 ऋचाएँ हैं। यजुर्वेद मुख्य रूप से ‘यज्ञ का वेद’ कहलाता है, जिसमें विभिन्न कर्मकांडों के विधान दर्शाए गए हैं।

इसके दो भाग हैं- शुक्ल और कृष्ण। सामवेद गेयात्मक है। इसमें देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गाने योग्य मंत्र हैं।

भारतीय संगीत की उत्पत्ति सामवेद से ही हुई। अथर्ववेद में लौकिक, औषधि संबंधी और वैज्ञानिक विषयों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसके बारहवें कांड में प्रसिद्ध ‘भूमिसूक्त’ है।

इन चारों वेदों की व्याख्या रूप ब्राह्मण ग्रंथ, दार्शनिक चिंतन पर आरण्यक और शुद्ध दर्शन युक्त उपनिषद विकसित हुए। वेदों के अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ये छह हैं। यह सारा विशाल वैदिक साहित्य भारतीयों के लिए परम गौरव है।

वेद न केवल भारतीयों के लिए बल्कि संपूर्ण विश्व के मानव कल्याण के लिए मार्गदर्शक हैं। ऋषियों ने तपस्या से इन मंत्रों को प्राप्त किया, इसलिए वे ‘मंत्रद्रष्टा’ कहलाते हैं। वेदों के ज्ञान के बिना भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप जाना नहीं जा सकता।

वेद हमें सत्य और धर्म के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वेदों की रक्षा करें और उसमें निहित ज्ञान को जीवन में अपनाएँ।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ पंचमः पाठः -संस्कृतस्य महिमा

इस ‘संस्कृत की महिमा’ शीर्षक वाले पाठ में गुरु और शिष्य के बीच संस्कृत भाषा के अनंत वैशिष्ट्य के विषय में अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद संवाद प्रस्तुत किया गया है। इस पाठ की शुरुआत में गुरु शिष्यों को समझाते हैं कि संस्कृत के बिना भारतीय संस्कृति संभव नहीं है, क्योंकि संस्कृत में ही हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ आचार, उदात्त विचार और पवित्र भावनाएँ निहित हैं। संस्कृत भाषा के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि यह मृत भाषा है, लेकिन गुरु इसका खंडन करते हुए कहते हैं कि यह तो अजरा और अमर है।

सभी भारतीय भाषाएँ इसी से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए इसे ‘भाषाओं की जननी’ कहकर गौरवान्वित किया जाता है। पाठ में व्याकरणश्रेष्ठ पाणिनि के महत्व को प्रतिपादित किया गया है। संस्कृत का व्याकरण अद्वितीय और वैज्ञानिक है।

इसमें धातुओं की संख्या दो हजार से अधिक है और दस लकारों में उनके रूप बनते हैं। आधुनिक प्रौद्योगिकी के युग में कंप्यूटर के लिए भी संस्कृत भाषा अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुई है। संस्कृत केवल पूजा-पाठ की भाषा नहीं है, बल्कि इसमें विज्ञानों का भंडार है।

भूगोल, खगोल, बीजगणित, चिकित्सा, वास्तुशास्त्र आदि का वर्णन आर्यभटीय, बृहत्संहिता आदि ग्रंथों में मिलता है। यह भाषा लोक व्यवहार में सरल है, लेकिन गंभीर विषयों के निरूपण में जटिल भी है। प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भी संस्कृत का महत्व है।

अंत में छात्र प्रतिज्ञा करते हैं कि हम सभी मन लगाकर इस धन्य भाषा को पढ़ेंगे। यह भाषा न केवल प्राचीन ज्ञान की वाहिका है, बल्कि आधुनिक विज्ञान के साथ संतुलन स्थापित करने में सक्षम है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ षष्टः पाठः -संस्कृतसाहित्ये पर्यावरणम्

इस पाठ में ‘संस्कृत साहित्य में पर्यावरण’ शीर्षक से संस्कृत वाङ्मय में प्रकृति का महत्व और पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन परंपरा का वर्णन किया गया है। वर्तमान वैज्ञानिक युग में प्रकृति का असंतुलन एक गंभीर समस्या है, जिसका समाधान हमारे प्राचीन साहित्य में मिलता है। वैदिक काल से ही भारतीय प्रकृति के विभिन्न तत्वों को देवरूप में पूजते रहे हैं।

ऋग्वेद में वर्षा, पृथ्वी और वनस्पतियों की स्तुति की गई है। मेघ जल बरसाकर धरती की रक्षा करता है, जिससे सभी प्राणियों के लिए अन्न उत्पन्न होता है। संस्कृत काव्यों में महाकवियों ने प्रकृति वर्णन को अनिवार्य रूप से किया है।

वाल्मीकि ने पम्पा सरोवर का, बाणभट्ट ने ज्येष्ठ मास की गर्मी का और कालिदास ने वसंत का मनोहर वर्णन किया है। कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ नाटक में पेड़ों के साथ मनुष्य का आत्मीय संबंध देखने को मिलता है। शकुंतला पेड़ों को पानी देना अपना कर्तव्य मानती थी।

नीति वचनों में भी पेड़ों के परोपकारी स्वभाव का वर्णन किया गया है। योग्यता विस्तार में वृक्षारोपण के पुण्य को प्रतिपादित किया गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार ‘दस पुत्रों के समान एक वृक्ष’ कहकर वृक्षों की श्रेष्ठता दिखाई गई है।

तुलसी के पौधे के औषधीय गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जहाँ तुलसी का वन होता है, वहाँ यमदूत नहीं आते। तुलसी न केवल वायु को शुद्ध करती है, बल्कि विषम ज्वर आदि से भी रक्षा करती है। इसलिए हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, ताकि मानव कल्याण हो।

संस्कृत साहित्य पर्यावरण के स्वास्थ्य के प्रति सदैव जागरूक रहा है, यह इस पाठ में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ सप्तमः पाठः -ज्ञानं भारः क्रियां विना

यह पाठ ‘ज्ञान बिना क्रिया के बोझ है’ सुप्रसिद्ध ‘पंचतंत्र’ नामक नीति ग्रंथ के अंतिम तंत्र से संपादित अंश है। इस कथा में व्यवहार के बिना सूखे ज्ञान की निरर्थकता अत्यंत मनोरंजक ढंग से दर्शाई गई है। कथा के वर्णनानुसार एक नगर में चार युवक आपस में मित्रभाव से रहते थे।

उनमें से तीन मित्र सभी शास्त्रों में निपुण और पारंगत थे, लेकिन उनकी बुद्धि और व्यावहारिक ज्ञान बिल्कुल नहीं था। चौथा सुबुद्धि केवल बुद्धिमान था, लेकिन शास्त्रों से दूर और अधूरा पढ़ा हुआ था। एक बार उन्होंने विचार किया कि विद्या के बिना देशाटन करके धन कमाना संभव नहीं है।

इसलिए वे पूर्व देश की ओर चल पड़े। रास्ते में चलते हुए उन्होंने जंगल में किसी मरे हुए प्राणी की हड्डियाँ देखीं। अपनी विद्या के प्रभाव को देखने के लिए पहले युवक ने हड्डियों का संचय किया।

दूसरे ने वहाँ चमड़ा, मांस और रक्त जोड़ा। जब तीसरा उस शरीर में प्राण फूंकने के लिए तैयार हुआ, तब चौथा सुबुद्धि उसे रोकते हुए बोला – ‘भाई ठहरो, यह शेर बन रहा है। यदि यह जीवित हो गया तो हम सबको मार डालेगा।’ लेकिन विद्या के गर्व में चूर वे उसकी हित की बात नहीं माने।

तब सुबुद्धि अपने प्राण बचाने के लिए पास के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। जैसे ही शेर में प्राण फूंके गए, वह जीवित होकर उन तीनों मूर्ख पंडितों को मार डाला। सुबुद्धि तो फिर पेड़ से उतरकर सुरक्षित घर पहुँच गया।

इस कथा का यही मुख्य उपदेश है कि व्यवहार ज्ञान विद्या से भी अधिक श्रेष्ठ होता है। जो मनुष्य शास्त्र पढ़कर भी व्यवहार कुशल नहीं होता, उसका ज्ञान केवल बोझ ही रह जाता है। जैसे हाथी नहाना निरर्थक होता है, वैसे ही व्यवहार से रहित ज्ञान व्यर्थ और बोझ बन जाता है।

इसलिए हमें हमेशा अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ अष्टमः पाठः -नीतिपधानिः

‘अष्टम पाठ नीतिपद्यानि’ शीर्षक वाले इस पाठ में संस्कृत साहित्य के नीति विषयक पद्यों का संग्रह है। इसमें मुख्य रूप से भर्तृहरि रचित नीतिशतक से श्लोक संकलित हैं। पाठ की शुरुआत में ज्ञान के महत्व को प्रतिपादित किया गया है।

पहले श्लोक में कहा गया है कि अज्ञानी सुखी रहता है, विशेषज्ञ और अधिक सुखी रहता है, लेकिन थोड़े ज्ञान से गर्वित मनुष्य ब्रह्मा को भी संतुष्ट नहीं कर सकता। दूसरे श्लोक में विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म से रहित मनुष्य पृथ्वी पर बोझ रूप हैं और मनुष्य रूपी हिरण की तरह विचरते हैं। उनका जीवन निरर्थक होता है।

सत्संगति की महिमा तीसरे श्लोक में है, कि सत्संगति मनुष्य की बुद्धि की जड़ता हर लेती है, वाणी में सत्य बोस देती है, मान और उन्नति की ओर ले जाती है, पाप को दूर करती है और कीर्ति फैलाती है। चौथे पद्य में कार्य प्रारंभ करने के तीन प्रकार वर्णित हैं—नीच, मध्यम और उत्तम। उत्तम लोग बार-बार विघ्नों से प्रतिहत होने पर भी आरंभ किए कार्य को नहीं छोड़ते।

धीर पुरुष न्याय के मार्ग से कभी नहीं डिगते, चाहे उनकी निंदा हो या स्तुति। छठे श्लोक में शेर के बच्चे के उदाहरण से स्पष्ट किया गया है कि तेजस्वियों के लिए आयु कारण नहीं होती, बल्कि पराक्रम ही उनकी प्रकृति होती है। दुष्ट और सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्ध और अपराह्न की छाया की तरह भिन्न होती है।

सज्जनों की मित्रता क्रमशः बढ़ती रहती है। अंतिम श्लोक में महात्माओं के आठ स्वाभाविक गुण जैसे विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में रुचि और श्रवण में लगन का वर्णन किया गया है। ये श्लोक मनुष्य के नैतिक विकास और समाज हित के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

इनके पढ़ने से मनुष्य अपना मार्ग निश्चित करके उन्नति प्राप्त कर सकता है। नीति वचन हमें सत्पथ की ओर प्रेरित करते हैं।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ नवमः पाठः -बिहारस्य संस्कृतिकं वैभवम्

‘बिहार का सांस्कृतिक वैभव’ पाठ बिहार राज्य की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा को प्रस्तुत करता है। बिहार अति प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान, धर्म और दर्शन का केंद्र रहा है, लेकिन कलाओं के क्षेत्र में भी इसका महत्व अद्वितीय है। संगीत को कलाओं में शिरोमणि माना जाता है, जिसमें गायन, वादन और नृत्य ये तीनों भाव सम्मिलित हैं।

बिहार का लोकजीवन संस्कार गीतों से ओतप्रोत है; मुंडन, विवाह, सोहर आदि गीत आज भी जनमानस में जीवित हैं। पंडित रामचतुर मल्लिक, सियाराम तिवारी जैसे महान कलाकार इस प्रांत में पैदा हुए। नृत्यकला के विवेचन में लास्य और तांडव भेद वर्णित हैं, जट-जटिन, झिझिया, सामाचकेवा आदि लोकनृत्य मिथिला, मगध और भोजपुर के अंचलों में प्रसिद्ध हैं।

नाट्यकला में भिखारी ठाकुर का ‘विदेशिया’ लोकनाट्य अत्यंत लोकप्रिय है, जो सामाजिक विषयों को प्रस्तुत करता है। चित्रकला के क्षेत्र में ‘मिथिला चित्रकला’ अब वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पा चुकी है। पद्मश्री सम्मानित जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी इस कला की प्रमुख हस्ताक्षर हैं।

मूर्तिकला में मिट्टी के बर्तनों पर हाथियों और घोड़ों का निर्माण विवाह आदि मंगल अवसरों पर अनिवार्य माना जाता है। यहाँ का समाज सभी धर्मों के समभाव से युक्त है, जहाँ विभिन्न जातियों का योगदान सांस्कृतिक समृद्धि में दिखता है। यह भूमि न केवल शुष्क ज्ञान की बल्कि सरस कलाओं की भी आश्रयस्थली है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि बिहार की कलात्मक संपदा अत्यंत विशाल है, जो हमारे राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाती है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ दशमः पाठः -ईद-महोत्सवः

यह पाठ ‘ईद महोत्सव’ विषय पर आधारित है। ईद महोत्सव मुसलमानों का सर्वोत्तम और पवित्रतम उत्सव माना जाता है। इस उत्सव में सामाजिक-मानवीय सद्भावना का अतिसुंदर दृश्य देखने को मिलता है।

भारत देश एक धर्मप्रधान देश है, जहाँ विभिन्न धर्म और विभिन्न उत्सव हैं। जैसे हिंदुओं के लिए दीपावली, रक्षाबंधन और दुर्गापूजा मुख्य उत्सव हैं, वैसे ही मुस्लिम जनों के लिए ‘ईद’ प्रधान पर्व है। मूलतः यह उत्सव कठिन तपस्या और उपासना का पर्व है।

पवित्र रमजान महीने में आकाश में चाँद देखकर लोग ‘रोजा’ यानी उपवास व्रत शुरू करते हैं। पूरा दिन वे कुछ नहीं खाते, शाम को परिवार के साथ ‘इफ्तार’ करके उपवास तोड़ते हैं। एक महीने तक यह भक्तिमय प्रक्रिया चलती है।

महीने के अंत में फिर चाँद देखकर अगले दिन सुबह ‘ईदगाह’ नामक स्थान पर सामूहिक रूप से ‘नमाज़’ यानी प्रार्थना करते हैं। ईद महोत्सव के दिन सभी छोटे-बड़े नए कपड़े पहनते हैं। लोग एक-दूसरे से गले मिलते हैं और आनंद प्रकट करते हैं।

‘सेवई’ नामक मीठा पकवान इस दिन विशेष रूप से खाया जाता है। इस पवित्र अवसर पर धनी लोग गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए ‘जकात’ और ‘फितरा’ नामक दान देते हैं। यह दान अनिवार्य माना जाता है।

वास्तव में यह उत्सव मानवीय एकता, भाईचारे, प्रसन्नता और उदारता का श्रेष्ठ प्रतीक है। यह महोत्सव सभी लोगों को आनंद सागर में डुबो देता है। भारत में सभी धर्मों का समान रूप से आदर किया जाता है, इसलिए ईद महोत्सव राष्ट्रीय एकता और भाईचारे का मजबूत आधार है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ एकादशः पाठः -ग्राम्यजीवनम्

ग्यारहवाँ पाठ ‘ग्राम्यजीवन’ आधुनिक जीवन की विषमता और विडंबना को स्पष्ट रूप से दिखाता है। इस पाठ में ग्राम्यजीवन के प्राचीन गौरव और वर्तमान समस्याओं का गहरा चित्रण किया गया है। पहले सभी जगह ग्राम्यजीवन की प्रशंसा में विपुल साहित्य रचा गया था, क्योंकि उस समय गाँव शांति और सुख के केंद्र थे।

वहाँ शुद्ध हवा, निर्मल जल और समाज में सामंजस्य सुलभ था। लेकिन वर्तमान समय में भौतिक विकास के साथ ग्राम्यजीवन की समस्याओं में बहुत वृद्धि हुई है। लेखक के अनुसार ‘प्रकृति ने गाँव बनाया, शहर तो मनुष्य की रचना है।’

गाँव का विकास प्राकृतिक है, लेकिन शहर कृत्रिम हैं। मनुष्यों ने अपने भौतिक सुख के लिए शहर बनाए। गाँवों में भोजन, वस्त्र और आवास की न्यूनतम आवश्यकताएँ हैं, इसलिए वहाँ के लोग संतोष प्रधान होते हैं।

लेकिन धन कमाने और उद्योग-व्यापार के अभाव में ग्रामीण लोग शहर की ओर पलायन करते दिख रहे हैं। विदेशों के गाँवों में वैज्ञानिक समृद्धि (बिजली, आधुनिक संचार, मशीनें आदि) पहुँच गई है, लेकिन भारतीय गाँवों में इसका अभाव है। अनावृष्टि, अतिवृष्टि, बाढ़, जातिवाद और जमीन के झगड़े ग्राम्यजीवन को अभिशाप बना देते हैं।

इसलिए पाठ में संदेश दिया गया है कि मानवतावाद के विकास और समताभाव से इन समस्याओं को दूर किया जाना चाहिए। शहरी जीवन की सुख-समृद्धि गाँवों में भी लानी चाहिए, ताकि पलायन रुके। गाँव की पर्यावरणीय निर्मलता को बचाकर वहाँ आधुनिक सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए।

युवक व्यक्ति-व्यक्ति में समताभाव दिखाएँ, ताकि कृत्रिम वैरभाव नष्ट हो। गाँव में भौतिक समृद्धि न भी हो, लेकिन पर्यावरण की निर्मलता वहाँ बहुतायत में है। शहर की समृद्धि गाँव में लाने से ही ग्राम्यजीवन सुखद बनेगा।

इसी प्रकार गाँवों के विकास से राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है। ग्राम्यजीवन की उन्नति में ही देश की समृद्धि निहित है, इसलिए हमें गाँवों की ओर ध्यान देना चाहिए।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ द्वादशः पाठः -वीर कूँवर सिंहः

यह पाठ भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक वीर कुंवर सिंह की जीवन गाथा को गौरवपूर्ण ढंग से वर्णित करता है। वीर कुंवर सिंह शौर्य, धैर्य और पराक्रम का अनुपम समन्वय थे। उनका जन्म बिहार राज्य के भोजपुर जिले के अंतर्गत जगदीशपुर गाँव में हुआ था।

उनके पिता साहबजादा सिंह एक तेजस्वी और प्रभावशाली व्यक्ति थे। कुंवर सिंह बचपन से ही शिकार और युद्ध कला में निपुण थे। वे केवल वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि उदार हृदय और प्रजावत्सल शासक भी थे।

उन्होंने अपने राज्य में न्याय व्यवस्था में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व दिया और अनेक जनकल्याण के मार्ग दिखाए। 1857 ईस्वी में जब पूरे भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध महान विद्रोह का संग्राम शुरू हुआ, तब यह वृद्ध वीर भी युवकों से अधिक उत्साह के साथ रणक्षेत्र में उतरा। उन्होंने दानापुर और आरा की ओर सैनिकों का नेतृत्व किया।

उन्होंने अंग्रेज सेनापति डनवर को युद्ध में हराया। उनका विजय अभियान आजमगढ़ और गाजीपुर में सफल रहा। 1858 में गंगा पार करते समय वे अंग्रेज सेना की बंदूक की गोली से घायल हो गए।

उस क्षण उन्होंने अपना दाहिना हाथ काटकर गंगा माता को समर्पित कर दिया। यह उनके त्याग का चरमोत्कर्ष था। अंततः 26 अप्रैल 1858 को वे स्वर्गवासी हो गए।

इस वीर का चरित्र भारतीयों के लिए राष्ट्रप्रेम, साहस और त्याग का महान आदर्श है। उन्होंने सिद्ध किया कि देश रक्षा के लिए आयु बाधा नहीं होती। उनकी अमर कीर्ति युगों तक जीवित रहेगी।

उनका अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति सदैव भारतीयों को प्रेरित करती रहेगी।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ त्रयोदशः पाठः -किशोराणां मनोविज्ञानम्

‘किशोरों का मनोविज्ञान’ शीर्षक वाला यह पाठ किशोरावस्था के शारीरिक-मानसिक परिवर्तनों को अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णित करता है। प्रकृति के शाश्वत नियम के अनुसार मानव जीवन में निरंतर परिवर्तन होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में बचपन, यौवन और बुढ़ापे की अवस्थाओं का स्पष्ट उल्लेख किया है।

बाल्यावस्था और युवावस्था के बीच की यह किशोरावस्था मनुष्यों के लिए अत्यंत संवेदनशील होती है। इस विशेष समय में शरीर में यौवन के लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होते हैं और मन में नए विचार और मनोवृत्तियाँ जन्म लेती हैं। छात्र इस समय प्रायः अनुशासन को बंधन मानते हैं और अपनी इच्छा व स्वच्छंदता से विचरना चाहते हैं।

इस पाठ में प्रतिपादित किया गया है कि शिक्षकों और अभिभावकों की इस विषय में बहुत बड़ी उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका है। वे किशोरों की गंभीर मानसिक स्थिति को समझकर उन्हें स्नेहपूर्वक उचित मार्गदर्शन दें। विशेष रूप से एकल परिवारों में रहने वाले किशोर कभी-कभी अकेले या दिशाहीन हो जाते हैं, इसलिए उनके विकास के लिए संवाद अनिवार्य है।

किशोर अपने जीवन के प्रति सदा अनुबंधशाली और आशावादी बनें, उपलब्ध साधनों का पूरा सदुपयोग करते हुए अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें। नारी जागरण के इस आधुनिक युग में किशोरियाँ भी अपनी प्रतिभा दिखाने में सक्षम हैं और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर काम करती हैं। पाठ हमें दृढ़तापूर्वक सिखाता है कि भाग्य पर केवल निर्भर न रहकर अपनी शक्ति और पुरुषार्थ से लक्ष्य साधना चाहिए।

यदि बहुत यत्न करने पर भी सफलता न मिले, तो निराश न होकर अपने प्रयास में क्या त्रुटि रह गई, इसकी खोज करनी चाहिए। वर्तमान समय का सदुपयोग और संकल्प की दृढ़ता किशोर जीवन की सफलता के दो परम मंत्र हैं। इन विचारों से किशोर अपने जीवन को समृद्ध बना सकते हैं।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ चतुर्दशः पाठः -राष्ट्रबोधः

यह ‘राष्ट्रबोध’ पाठ संवेदनशील किशोरों के गुणों के विकास और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरक लघुकथा है। इस कथा में विवेक और धनंजय दो छात्र विद्यालय जा रहे थे। धनंजय ने रास्ते में पानी पीकर खाली कुप्पी वहीं सिकोड़कर फेंक दी।

तभी विजय नाम का एक गरीब घुमक्कड़ बालक ने वह कुप्पी उठाकर अपने झोले में छिपा ली। विवेक ने उसका यह कार्य समाज विरोधी मानकर उसे डाँटा। तब विजय ने अपनी गरीबी प्रकट करते हुए देशद्रोहियों का वह स्थान दिखाया, जहाँ नकली वस्तुओं का निर्माण चल रहा था।

इस वृत्तांत को जानकर विवेक और धनंजय विद्यालय जाकर अपने कक्षाध्यापक को सूचित किया। फिर प्राचार्य की सहायता से पुलिस को सूचना दी। पुलिस वहाँ जाकर विकृत दवाओं और खाद्य पदार्थों के निर्माण में लगे राष्ट्रद्रोहियों को पकड़ लाई।

इस प्रकार बच्चों की सजगता के कारण देश की बड़ी हानि टल गई। पुलिस प्रशासन ने बच्चों को पुरस्कृत किया। अंत में राजकीय शिक्षक दिवस समारोह में मुख्यमंत्री ने विवेक, धनंजय और विजय को सम्मानित किया।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्र विरोधी कार्यों का विरोध करे। राष्ट्रबोध केवल सैनिकों में ही नहीं, बल्कि आम लोगों के व्यवहार में भी दिखता है। जो समाज और देश की रक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है, उसी का राष्ट्रबोध प्रशंसनीय है।

इस पाठ में राष्ट्रभक्ति और नागरिक धर्म को मुख्य रूप से वर्णित किया गया है। यह कथा हमें राष्ट्रभक्त बनने की प्रेरणा देती है और नागरिक जागरूकता का महत्व बताती है। राष्ट्रहित सदैव व्यक्तिगत हित से ऊपर होता है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


❤️ पंचदशः पाठः -विश्ववन्दिता वैशाली

‘विश्ववंदिता वैशाली’ शीर्षक यह पद्य आधुनिक संस्कृत साहित्य का एक रमणीय अंश है। इसमें वैशाली नगरी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक महत्व को अत्यंत सरलता से वर्णित किया गया है। वैशाली वह नगरी है, जिसके दक्षिण में गंगा और पश्चिम में गंडकी नदी बहती है।

यह नगरी प्राचीन काल से ही विशाल, रमणीक और शस्यश्यामला थी। राम-लक्ष्मण द्वारा देखी गई यह भूमि आज भी अपना गौरव धारण करती है। वैशाली सीता की माता के समान मान्य है, जैन धर्म के तीर्थंकर महावीर की जन्मभूमि है और भगवान बुद्ध की प्रिय उपदेश स्थली है।

यहीं अशोक द्वारा निर्मित स्तूप आज भी बुद्ध के संदेश का प्रसार कर रहा है। वैशाली का सबसे अधिक महत्व ‘गणतंत्र की जननी’ के रूप में है। यहीं सबसे पहले लिच्छवी संघों के माध्यम से प्रजातंत्र का उदय हुआ, जहाँ जनों का शासन जनों द्वारा चलता था।

इस धरा का दिव्य प्रकाश संपूर्ण विश्व में लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त कर गया। विदेह जनक आदि महानुभावों द्वारा सेवित यह नगरी आज भी हमारे लिए आदर्श बनी हुई है। इसका भौगोलिक स्थान अब बिहार राज्य के वैशाली जिले में है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि वैशाली न केवल भारत की, बल्कि विश्व की वंदनीय नगरी है। यहाँ आम्रपालिका की कला साधना भी स्मरणीय है। वैशाली नगरी का वर्णन बाल्मीकि रामायण में भी मिलता है, जहाँ विशाला और मिथिला दो अलग राज्य थे।

आधुनिक समय में वैशाली बिहार के तिरहुत प्रमंडल का एक भाग है। इसका मुख्यालय हाजीपुर नगर में स्थित है। भगवान बुद्ध ने वैशाली में कई बार भ्रमण किया और आम्रपालिका के घर भोजन स्वीकार किया।

यहाँ के लोग गुणी और गणनिष्ठ थे। वैशाली के प्रजापालन में प्रसिद्धि अद्वितीय थी। यहाँ का संविधान सहित गणतंत्र आधुनिक लोकतंत्र की प्रेरणा है।

इस प्रकार का ऐतिहासिक महत्व वैशाली को विश्ववंदित बनाता है।

 

📗 बुक डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯


⚠️ अगर उपर दी गयी कोई भी बुक डाउनलोड करने में किसी प्रकार की समस्या हो रही हो तो कमेंट करके हमें बताएं | line

🌐 सभी विषयों की बुक्स डाउनलोड करने के लिए -> यहाँ क्लिक करें

🌐 बिहार बोर्ड सलूशन डाउनलोड करने के लिए -> यहाँ क्लिक करें

Thanks! 🙏🏽

⚠️ इस पेज पर दी गयी बुक्स “Bihar Education Project” द्वारा पब्लिश की गई हैं | ऑफिसियल साईट से इन बुक्स को डाउनलोड करने के लिए – यहाँ क्लिक करें

Share this:

  • Click to share on X (Opens in new window) X
  • Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • More
  • Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
  • Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Click to print (Opens in new window) Print
  • Click to email a link to a friend (Opens in new window) Email

Related

Filed Under: Class 9th Books

Reader Interactions

Comments

  1. AMIT KUMAR says

    November 4, 2023 at 12:06 pm

    Class 6 to 8 sanskrit books not available here.so please provide here.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Primary Sidebar

Search

लेटेस्ट अपडेट पायें

Telegram Telegram Channel Join Now
Facebook FaceBook Page Follow Us
YouTube Youtube Channel Subscribe
WhatsApp WhatsApp Channel Join Now

Bihar Board Textbooks

  • 📗 Bihar Board NCERT Books
  • 📙 Bihar Board Books Class 12
  • 📙 Bihar Board Books Class 11
  • 📙 Bihar Board Books Class 10
  • 📙 Bihar Board Books Class 9
  • 📙 Bihar Board Books Class 8
  • 📙 Bihar Board Books Class 7
  • 📙 Bihar Board Books Class 6
  • 📙 Bihar Board Books Class 5
  • 📙 Bihar Board Books Class 4
  • 📙 Bihar Board Books Class 3
  • 📙 Bihar Board Books Class 2
  • 📙 Bihar Board Books Class 1

Bihar Board Solutions PDF

  • ✅ Bihar Board Solutions Class 12
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 11
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 10
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 9
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 8
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 7
  • ✅ Bihar Board Solutions Class 6

Latest Updates

  • Bihar Board Class 12 Model Paper 2026 PDF with Answers
  • Bihar Board Class 10 Model Paper 2026 PDF with Answers
  • Bihar Board 12th Model Papers 2025 PDF
  • Bihar Board 10th Model Papers 2025 PDF
  • Bihar Board 11th Previous Year Question Papers PDF

Categories

  • Class 10th Books
  • Class 10th Objective
  • Class 10th Solutions
  • Class 11th Books
  • Class 12th Books
  • Class 1st Books
  • Class 2nd Books
  • Class 3rd Books
  • Class 4th Books
  • Class 5th Books
  • Class 6th Books
  • Class 7th Books
  • Class 8th Books
  • Class 9th Books
  • D.El.Ed
  • Question Papers
  • Uncategorized

Bihar Board Online Test (Quiz)

  • ✅ Bihar Board Online Quiz

Copyright © 2026 · BiharBoardBooks.Com . This is not a Government Site.