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Bihar Board 9th Hindi Book 2026 PDF Download (गोधूलि भाग 1)

Last Updated on February 16, 2026 by bseb 2 Comments

Bihar Board 9th Hindi Book PDF Download (गोधूलि भाग 1)

Bihar Board 9th Hindi Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 9th के छात्रों के लिए “ Hindi (गोधूलि भाग 1)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 9 Hindi (गोधूलि भाग 1) Book PDF Free Download

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❤️ अध्याय 1: शिवपूजन सहाय (गधखंड)

शिवपूजन सहाय द्वारा लिखित ‘कहानी का प्लॉट’ ग्रामीण परिवेश और सामाजिक कुरीतियों पर आधारित एक मार्मिक कहानी है। यह कहानी मुंशीजी के उत्थान और पतन के माध्यम से तिलक-दहेज और अनमेल विवाह जैसी विसंगतियों को उजागर करती है। मुंशीजी के भाई पुलिस दारोगा थे, जिनकी कमाई और ठाठ-बाट के दिनों में मुंशीजी ने खूब ऐश की।

किंतु दारोगाजी के निधन के बाद मुंशीजी अत्यंत दरिद्रता में घिर गए। इसी गरीबी के बीच उनकी पुत्री ‘भगजोगनी’ का जन्म हुआ, जो अत्यंत सुंदर थी लेकिन गरीबी के कारण दाने-दाने को तरसती थी। उसकी सुंदरता भूख और अभावों की भेंट चढ़ गई।

मुंशीजी के पास उसकी शादी के लिए दहेज नहीं था, जिसके कारण कोई युवक उससे विवाह को तैयार नहीं हुआ। अंततः विवश होकर मुंशीजी ने उसका विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दिया। कुछ समय पश्चात मुंशीजी और उस वृद्ध पति दोनों की मृत्यु हो गई।

कहानी का अंत अत्यंत दुखद और कड़वा है, जहाँ युवती भगजोगनी अपने ही सौतेले बेटे की पत्नी बनने का दुर्भाग्य स्वीकार करती है। यह कहानी समाज में नारी की दयनीय स्थिति और गरीबी के क्रूर चेहरे को पूरी नग्नता के साथ प्रस्तुत करती है।

 

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❤️ अध्याय 2: राजेंद्र प्रसाद

यह अध्याय भारत के गौरवशाली इतिहास के एक प्रमुख केंद्र, नालंदा विश्वविद्यालय पर केंद्रित है। लेखक डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, नालंदा केवल एक शिक्षा केंद्र नहीं, बल्कि एशिया का चैतन्य-केंद्र था, जहाँ ज्ञान की खोज में जातियों और देशों के भेद मिट जाते थे।

इसकी स्थापना गुप्त काल के आसपास हुई थी और सम्राट हर्षवर्धन के समय यह अपनी उन्नति के शिखर पर था। चीनी यात्री युवानचांग और इत्सिंग के विवरणों से यहाँ के भव्य विहारों, पुस्तकालयों और उन्नत शिक्षा व्यवस्था का पता चलता है। यहाँ व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, शिल्प और दर्शन जैसे विषयों की अनिवार्य शिक्षा दी जाती थी।

विश्वविद्यालय का संचालन राजाओं और व्यापारियों द्वारा दान में दिए गए गाँवों की आय से होता था। नालंदा के विद्वानों, जैसे शीलभद्र और शांतिरक्षित, ने तिब्बत और अन्य देशों में जाकर ज्ञान का प्रसार किया। यह पाठ प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की उत्कृष्टता को दर्शाता है और हमें कला, शिल्प और साहित्य के ऐसे महान केंद्रों को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा देता है।

नालंदा की समन्वयवादी साधना और अंतरराष्ट्रीय पहचान आज भी प्रासंगिक है।

 

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❤️ अध्याय 3: लक्ष्मीनारायण सुधांशु

प्रस्तुत निबंध ‘ग्राम-गीत का मर्म’ में लक्ष्मीनारायण सुधांशु जी ने ग्राम-गीतों के स्वरूप और उनके महत्व का गहरा विश्लेषण किया है। लेखक का मानना है कि ग्राम-गीत मानव हृदय की स्वाभाविक और सरल अभिव्यक्ति हैं, जो कला-गीतों के आधार स्तंभ माने जाते हैं। जिस प्रकार जीवन का आरंभ शैशव से होता है, उसी प्रकार कला-गीतों का उद्भव ग्राम-गीतों से हुआ है।

ग्राम-गीतों में सामाजिक जीवन की शुद्धता, भावनाओं की सरलता और प्राथमिक मानवीय संवेदनाओं (जैसे प्रेम, उल्लास, और विषाद) का मार्मिक चित्रण मिलता है। निबंध के अनुसार, ये गीत विशेष रूप से स्त्री-प्रकृति के करीब हैं, जिनमें चक्की पीसने, धान कूटने और विवाह जैसे अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों का प्रमुख स्थान है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि जहाँ कला-गीत बौद्धिक और शास्त्रीय नियमों से बंधे होते हैं, वहीं ग्राम-गीत हृदय की वाणी होते हैं।

इनमें प्रकृति और मानव जीवन का गहरा साहचर्य दिखाई देता है। सुधांशु जी यह भी बताते हैं कि समय के साथ ग्राम-गीत ही विकसित होकर कला-गीत बने, जिनमें वैयक्तिकता के बजाय समष्टि का भाव निहित होता है। अंततः, यह पाठ लोक-संस्कृति और काव्य के अंतर्संबंधों को उजागर करता है।

 

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❤️ अध्याय 4: फणीश्वरनाथ रेणु

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❤️ अध्याय 5: अमृतलाल नागर

यह अध्याय अमृतलाल नागर द्वारा लिखित है, जिसमें उन्होंने भारतीय सिनेमा के मूक युग से सवाक् (बोलती) फिल्मों तक के विकास की ऐतिहासिक यात्रा का वर्णन किया है। भारत में सिनेमा का आगाज़ 6 जुलाई 1896 को बंबई के वाट्सन होटल में ल्युमीयेर ब्रदर्स द्वारा हुआ था, जिसे ‘जिंदा तिलस्मात’ के रूप में विज्ञापित किया गया था। लेखक ने सावे दादा के योगदान को रेखांकित किया है, जिन्होंने शुरुआती दौर में वृत्तचित्र और राष्ट्रीय नेताओं पर फिल्में बनाईं।

हालांकि, दादा साहब फालके को भारतीय सिनेमा का जनक माना जाता है क्योंकि उन्होंने 1913 में पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई और इस उद्योग की नींव रखी। उस समय फिल्मों में पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे। निबंध में ‘लंकादहन’ जैसी बॉक्स-ऑफिस हिट और बाबूराव पेंटर जैसे दिग्गजों का भी उल्लेख है।

अंततः, 1930 के आसपास ‘आलम आरा’ के साथ बोलती फिल्मों के नए युग की शुरुआत हुई। लेखक ने सिनेमा के तकनीकी क्रमिक विकास और इसके सामाजिक प्रभाव को बहुत ही रोचक और प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह लेख भारतीय फिल्म जगत के शुरुआती संघर्षों और उपलब्धियों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

 

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❤️ अध्याय 6: विष्णु प्रभाकर

विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘अष्टावक्र’ एक अत्यंत मार्मिक रेखाचित्र है, जो एक मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति के संघर्षपूर्ण जीवन को चित्रित करता है। अष्टावक्र अपने टेढ़े-मेढ़े शरीर, धीमी वाणी और निरीह स्वभाव के कारण समाज के उपहास का पात्र बनता है, परंतु उसकी माँ उसके लिए एकमात्र संबल है। वह बाजार में चाट बेचकर अपना जीवन यापन करता है, जहाँ बच्चे उसे ‘उल्लू’ कहकर चिढ़ाते हैं।

माँ-बेटे का रिश्ता अत्यंत गहरा है; माँ ही उसे खाना खिलाती है और व्यापार की बारीकियाँ सिखाती है। जीवन की विषम परिस्थितियों और गरीबी के बावजूद वे दोनों एक-दूसरे के सहारे टिके हुए हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसकी माँ बीमार पड़कर चल बसती है।

अष्टावक्र की सरल बुद्धि माँ की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पाती और वह अंत तक उसी के लौटने की प्रतीक्षा करता है। अंततः, अकेलापन और बीमारी अष्टावक्र को भी मृत्यु के द्वार तक ले जाती है। मरते समय उसके अंतिम शब्द अपनी माँ को ही पुकारते हैं।

यह कहानी सभ्य समाज की संवेदनहीनता पर प्रहार करती है और दिखाती है कि कैसे अभावग्रस्त लोगों के लिए इस दुनिया में कोई जगह नहीं है। अंत में अष्टावक्र की मृत्यु उसे इस दुनिया के दुखों से मुक्त कर देती है।

 

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❤️ अध्याय 7: रामकुमार

यह पाठ प्रख्यात चित्रकार और लेखक रामकुमार द्वारा रचित उनके यात्रा वृत्तांत ‘यूरोप के स्केच’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने रूसी साहित्य के महान हस्ताक्षर लियो टॉल्सटाय के निवास स्थान ‘यासनाया पोलयाना’ की अपनी तीर्थयात्रा का जीवंत वर्णन किया है।

लेखक अपने रूसी मित्र यूरा के साथ मॉस्को से 150 मील दूर इस ऐतिहासिक स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ टॉल्सटाय ने ‘युद्ध और शांति’ तथा ‘आना करीनिना’ जैसी कालजयी कृतियों की रचना की थी। लेखक टॉल्सटाय के घर, जो अब एक संग्रहालय है, की सादगी देखकर भावविभोर हो जाते हैं।

वहाँ उनके कपड़े, 23,000 पुस्तकों वाला पुस्तकालय, लेखन मेज और वह एकांत कमरा सुरक्षित है जहाँ वे अपनी रचनाएँ लिखते थे। लेखक ने टॉल्सटाय की सादगी, उनके प्रकृति प्रेम और उनके जीवन के अंतिम दिनों के संघर्षों को बहुत संवेदनशीलता से उभारा है।

पाठ के अंत में उनकी साधारण समाधि का वर्णन है, जो टॉल्सटाय की इच्छा के अनुरूप बिना किसी तड़क-भड़क के एक शांत स्थान पर स्थित है। लेखक के लिए यह यात्रा केवल एक पर्यटन न होकर एक महान आत्मा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होती है।

 

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❤️ अध्याय 8: अनुपम मिश्र

यह अध्याय अनुपम मिश्र द्वारा लिखित है, जो राजस्थान की जल-संस्कृति और जल-संग्रहण की अद्भुत परंपरा पर प्रकाश डालता है। लेखक बताते हैं कि यद्यपि राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा अब थार मरुस्थल है, लेकिन यहाँ का समाज अपने अतीत के ‘हाकड़ो’ (समुद्र) को भूला नहीं है।

भूगोल की किताबों में राजस्थान को वर्षा के मामले में सबसे पिछड़ा और सूखा क्षेत्र दिखाया जाता है, जहाँ औसत वर्षा देश के अन्य हिस्सों की तुलना में बहुत कम होती है। इसके बावजूद, राजस्थान के समाज ने कभी प्रकृति की इस कमी का रोना नहीं रोया, बल्कि इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।

यहाँ के लोगों ने वर्षा की हर एक बूँद को सहेजने के लिए ‘वोज’ (विवेक और युक्ति) का परिचय दिया। उन्होंने तालाबों, कुओं, कुंडियों और बावड़ियों जैसी संरचनाओं के माध्यम से जल संचय की एक भव्य परंपरा विकसित की।

लेखक के अनुसार, जहाँ आज के आधुनिक शहर पर्याप्त वर्षा के बाद भी पानी की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं राजस्थान की मरुभूमि ने अपने पारंपरिक ज्ञान और सामर्थ्य से जीवन को जीवंत बनाए रखा है। यह पाठ हमें जल संरक्षण के महत्त्व और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की शिक्षा देता है।

 

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❤️ अध्याय 9: शरद जोशी

शरद जोशी द्वारा रचित ‘रेल-यात्रा’ एक प्रखर व्यंग्य है जो भारतीय रेल की कुव्यवस्था के माध्यम से देश की राजनैतिक और सामाजिक स्थिति पर कटाक्ष करता है। लेखक बताते हैं कि भारतीय रेल में यात्रा करना किसी आध्यात्मिक अनुभव से कम नहीं है, जहाँ यात्री पूरी तरह ईश्वर के भरोसे होता है। यहाँ ‘अमुक’ प्रगति का अर्थ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना है, चाहे वह देरी से ही क्यों न हो।

रेल के डिब्बों में भारी भीड़, धक्का-मुक्की और सीटों के लिए संघर्ष को लेखक ने जीवन जीने की कला और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत से जोड़ा है। लेखक व्यंग्य करते हैं कि रेलें हमें सहिष्णुता, आत्मबल और मृत्यु का दर्शन सिखाती हैं, क्योंकि टिकट को वे ‘देह धरे को दंड’ मानते हैं। उनके अनुसार, असली यात्री वही है जो खाली हाथ चलता है, जो अंततः मोक्ष की ओर संकेत करता है।

रेल की अनिश्चितता, पटरी से उतरने का डर और आधी रात को अनजान स्टेशनों पर रुकना भारतीय जीवन की अनिश्चितता का प्रतीक है। अंत में, वे कहते हैं कि जब तक दुर्घटना न हो, यात्री को जागते रहना चाहिए। यह पाठ रेल विभाग की खामियों को उजागर करते हुए यात्रियों की लाचारी और व्यवस्था की संवेदनहीनता को हास्यपूर्ण परंतु मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

 

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❤️ अध्याय 10: जगदीश नारायण चौबे

यह पाठ जगदीश नारायण चौबे द्वारा लिखित है, जो निबंध लेखन की कला और उसकी बारीकियों पर प्रकाश डालता है। लेखक के अनुसार, निबंध मात्र पृष्ठ भरने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विचारों की एक सुनियोजित और कसी हुई अभिव्यक्ति है। उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया है कि छात्र अक्सर निबंध को रटकर या अप्रासंगिक जानकारियों से भरकर बोझिल बना देते हैं।

लेखक अच्छे निबंध के लिए तीन मुख्य तत्त्वों को अनिवार्य मानते हैं: कल्पना शक्ति, व्यक्तिगत अनुभव और प्रामाणिक आँकड़े। वे कहते हैं कि कल्पना के माध्यम से किसी भी साधारण विषय, जैसे ‘गाय’ या ‘एक प्याली चाय’, को नवीन और आकर्षक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जा सकता है। निबंध को रोचक बनाने के लिए लेखक का विषय से व्यक्तिगत रूप से जुड़ना आवश्यक है, जिसे आज ‘ललित निबंध’ के रूप में पहचान मिली है।

लेखन की तकनीक पर चर्चा करते हुए वे बताते हैं कि निबंध का प्रारंभ पाठक में उत्सुकता जगाने वाला होना चाहिए और अंत स्वाभाविक होना चाहिए। भाषा सरल, सहज और छोटे वाक्यों वाली होनी चाहिए ताकि वह पाठक से संवाद कर सके। यह पाठ छात्रों को रटने की प्रवृत्ति छोड़कर अपनी रचनात्मकता और मौलिकता का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है ताकि निबंध लेखन एक उबाऊ कार्य के बजाय एक आनंददायक सृजन बन सके।

 

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❤️ अध्याय 11: रामधारी सिंह दिवाकर

‘सूखी नदी का पुल’ रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है जो ग्रामीण जीवन के बदलते सामाजिक ताने-बाने और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती है। मुख्य पात्र लीलावती तेरह-चौदह वर्षों बाद अपने नैहर लौटती है, जहाँ वह पाती है कि आधुनिक सुख-सुविधाएँ तो आ गई हैं, लेकिन गाँव अब पहले जैसा नहीं रहा।

जातिवाद, आरक्षण और ज़मीनी विवादों ने भाइयों और समुदायों के बीच दीवारें खड़ी कर दी हैं। लीलावती के भाई उसे बताते हैं कि उसकी पाँच एकड़ ज़मीन को लेकर सहेलिया माय (लीलावती की धाय माँ) के परिवार से विवाद चल रहा है और गाँव दो गुटों में बँटा है।

तनावपूर्ण माहौल के बावजूद, लीलावती अपनी ममता और अतीत के रिश्तों को महत्व देती है। वह छिपकर सहेलिया माय के घर उसकी पोती की शादी में जाती है, जिससे दोनों परिवारों के बीच की कड़वाहट और दुश्मनी समाप्त हो जाती है।

अंत में, लीलावती एक क्रांतिकारी निर्णय लेती है और अपनी पाँच एकड़ ज़मीन सहेलिया माय को दान कर देती है, जिसे वह अपने ‘दूध का मोल’ मानती है। यह कहानी दिखाती है कि प्रेम और त्याग के माध्यम से सामाजिक दूरियों और नफरत के ‘सूखे पुल’ को फिर से मानवीय संवेदनाओं की नदी से भरा जा सकता है।

 

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❤️ अध्याय 12: रविंद्रनाथ ठाकुर

यह अध्याय रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण निबंध है, जिसमें उन्होंने आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की गंभीर विसंगतियों और खामियों पर प्रकाश डाला है। टैगोर का तर्क है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होना चाहिए।

वर्तमान प्रणाली बच्चों को केवल विदेशी भाषा (अंग्रेजी) रटने और परीक्षा पास करने के लिए मजबूर करती है, जिससे उनकी स्वाभाविक चिंतन-शक्ति और कल्पना-शक्ति कुंठित हो जाती है। लेखक के अनुसार, शिक्षा में ‘आनंद’ का अभाव है और यह हमारे वास्तविक जीवन व परिवेश से कटी हुई है।

हम जो स्कूलों में पढ़ते हैं और जो जीवन में अनुभव करते हैं, उनके बीच एक गहरा अंतराल है। वे इस बात पर बल देते हैं कि बाल्यकाल से ही शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए ताकि भाव और भाषा का सही सामंजस्य बना रहे।

टैगोर प्राकृतिक परिवेश और स्वाधीनता के साथ शिक्षा देने की वकालत करते हैं, ताकि बालक केवल ‘गुलाम’ या ‘नकलची’ न बनकर एक प्रबुद्ध मनुष्य के रूप में विकसित हो सके। अंततः, वे शिक्षा और जीवन के बीच के इस ‘हेर-फेर’ को दूर करने का आह्वान करते हैं ताकि शिक्षा हमारे आंतरिक जीवन का अभिन्न अंग बन सके।

 

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❤️ अध्याय 1: रैदास (काव्यखंड)

यह अध्याय मध्यकालीन संत कवि रैदास के जीवन और उनकी भक्ति भावना पर केंद्रित है। रैदास, जो बनारस के निवासी थे, कबीर की भांति ही बाह्य आडंबरों, मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा के कट्टर विरोधी थे।

वे आंतरिक पवित्रता और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। प्रस्तुत पदों में उनकी सहज और दीन भाव वाली भक्ति का दर्शन होता है।

पहले पद ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ में वे ईश्वर की व्यापकता को अपने भीतर महसूस करते हैं और स्वयं को प्रभु के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ बताते हैं। दूसरे पद में वे मूर्तिपूजा और कर्मकांडों की निरर्थकता सिद्ध करते हुए बताते हैं कि संसार की वस्तुएं अशुद्ध हैं, इसलिए वे मन के भीतर ही ईश्वर की आराधना करते हैं।

उनकी भाषा सरल ब्रज है जिसमें अवधी, राजस्थानी और उर्दू-फारसी के शब्द समाहित हैं। रैदास की भक्ति मुख्य रूप से निर्गुण और निराकार ईश्वर के प्रति समर्पित है, जहाँ भक्त और भगवान का संबंध अटूट और आत्मिक है।

 

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❤️ अध्याय 2: मंझन

प्रस्तुत पाठ हिंदी के प्रसिद्ध सूफी कवि ‘मंझन’ और उनके द्वारा रचित काव्य ‘मधुमालती’ के अंशों पर आधारित है। मंझन सोलहवीं शताब्दी के एक सिद्ध सूफी कवि थे, जिन्होंने प्रेम की महत्ता को प्रतिपादित किया है। उनके अनुसार, प्रेम इस संसार की सबसे अमूल्य निधि है, जो एक अनमोल रत्न के समान है।

वे मानते हैं कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना प्रेम के वशीभूत होकर ही की है और संपूर्ण जगत प्रेम की ज्योति से ही आलोकित है। पाठ में संकलित कड़बकों के माध्यम से कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम का मार्ग त्याग और समर्पण का मार्ग है; जो इस पथ पर अपना सर्वस्व न्योछावर करता है, वही वास्तविक आनंद प्राप्त करता है। मंझन के अनुसार, जो व्यक्ति प्रेम की अग्नि में तपकर स्वयं को शुद्ध कर लेता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त होकर अमर हो जाता है।

उनके लिए प्रेम ही वह साधन है जिससे परमात्मा को पाया जा सकता है। प्रेम की शरण में जाने वाला व्यक्ति काल के चक्र से बच जाता है और उसका जीवन अमृत के समान शाश्वत हो जाता है। कवि ने प्रेम को एक व्यापक हाट (बाजार) के रूप में चित्रित किया है, जहाँ से हर कोई लाभ प्राप्त कर सकता है।

 

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❤️ अध्याय 03: गुरुगोविंद सिंह

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❤️ अध्याय 4: हरिऔध

यह अध्याय अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता ‘पलक पाँवड़े’ पर आधारित है। कविता में प्रकृति के अत्यंत मनोहारी और व्यापक रूप का चित्रण किया गया है। कवि भोर के समय प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को देखकर विस्मित और आनंदित है।

वह प्रश्न करता है कि आज सुबह इतनी सुहावनी क्यों है, आसमान में लाली क्यों छाई है और सूरज रोली भरी थाली लेकर क्यों निकल रहा है। ओस की बूंदें मोतियों जैसी लग रही हैं, चिड़ियाँ चहक रही हैं, और झील-नदियों में सुनहरी चादरें बिछ गई हैं। प्रकृति का प्रत्येक अंग जैसे किसी विशेष अतिथि के स्वागत के लिए सज-धजकर स्वर्ग की बराबरी कर रहा है।

वास्तव में, यह कविता भारतीय नवजागरण और स्वतंत्रता संग्राम के दौर की नई चेतना का प्रतीक है। कवि को किसी महान शक्ति या देश की स्वतंत्रता रूपी सुबह की उत्कंठित प्रतीक्षा है। अंत में कवि कहता है कि जिसकी प्रतीक्षा में आँखें थक गई हैं, यदि वह आज आ रहा है, तो हम उसके स्वागत में अपनी पलकें बिछाने (पलक पाँवड़े) को तैयार हैं।

यह कविता प्रकृति सौंदर्य, प्रेम और देशानुराग के भावों का एक सुंदर संगम है।

 

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❤️ अध्याय 5: महादेवी वर्मा

यह पाठ्यपुस्तक हिंदी साहित्य के दो महान कवियों, महादेवी वर्मा और हरिवंशराय बच्चन के जीवन एवं उनकी सुप्रसिद्ध कविताओं का विवरण प्रस्तुत करती है। महादेवी वर्मा की कविता ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ उनके काव्य संग्रह ‘यामा’ से ली गई है। इसमें कवयित्री ने अपने जीवन की तुलना एक बदली से की है।

जिस प्रकार बदली स्वयं मिटकर सृष्टि को नवजीवन देती है, उसी प्रकार कवयित्री का जीवन भी करुणा और दूसरों के प्रति समर्पित है। उनकी भाषा तत्सम प्रधान और शैली लाक्षणिक है। दूसरे भाग में हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आ रही रवि की सवारी’ का वर्णन है, जो उनके संग्रह ‘निशा-निमंत्रण’ से संकलित है।

यह कविता सूर्योदय के माध्यम से जीवन में नई आशा और विजय के आगमन को दर्शाती है। कवि ने प्रकृति का मानवीकरण करते हुए बताया है कि सूर्य के आने पर तारों की फौज भाग जाती है और चंद्रमा एक भिखारी के समान राह में खड़ा प्रतीत होता है। यह रचना संघर्ष के बाद मिलने वाली सफलता और परिवर्तनशील समय का प्रतीक है।

दोनों ही रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और दार्शनिक विचारों को गहराई से प्रकट करती हैं।

 

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❤️ अध्याय 6: हरिवंश राय बच्चन

यह कविता प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित है, जो उनके कविता संकलन ‘निशा-निमंत्रण’ से ली गई है। इस कविता में कवि ने सूर्योदय के मनोहारी दृश्य का अत्यंत सुंदर और सजीव चित्रण किया है। कवि सूर्य को एक राजा के रूप में देखते हैं जिसकी सवारी निकल रही है।

सूर्य का रथ नई किरणों से सजा हुआ है और मार्ग कलियों एवं फूलों से सुशोभित है। बादलों को राजा के अनुचरों के रूप में दर्शाया गया है जिन्होंने सुनहरी पोशाक धारण कर रखी है। पक्षी, बंदी और चारण की भाँति सूर्य का कीर्ति-गान कर रहे हैं।

जैसे ही रवि की सवारी आती है, तारों की फौज मैदान छोड़कर भाग जाती है, जिसका अर्थ है कि सूर्य के प्रकाश में तारे लुप्त हो जाते हैं। कवि विजय की खुशी में उछलना चाहता है, परंतु वह चंद्रमा की दशा देखकर ठिठक जाता है। रात का राजा चंद्रमा अब सूर्य के सामने एक भिखारी की तरह मार्ग में खड़ा प्रतीत होता है क्योंकि उसका प्रकाश क्षीण हो चुका है।

यह कविता न केवल प्रकृति के परिवर्तन को दर्शाती है, बल्कि जीवन में आशा के संचार और दुखों के अंत का भी प्रतीक है।

 

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❤️ अध्याय 07: केदारनाथ अग्रवाल

यह कविता प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत के भविष्य के प्रति एक अत्यंत आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। कवि का विश्वास है कि आने वाले समय में हर नागरिक को मान-सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

जहाँ आज क्लेश और दुख व्याप्त है, वहाँ खुशियों के फूल खिलेंगे और सबको शोषण से मुक्ति (त्राण) मिलेगी। कवि केवल भौतिक संपन्नता की बात नहीं करते, बल्कि वे बौद्धिक जागृति पर भी बल देते हैं।

उनका मानना है कि जिन आँखों में अज्ञानता का अंधकार है, उन्हें ज्ञान की ज्योति मिलेगी और पूरे देश में ‘विद्या की खेती’ होगी, जिससे समाज साक्षर और जागरूक बनेगा। ‘गीतों की खेती’ और ‘मोरों-सा नर्तन’ जैसे बिंबों के माध्यम से कवि एक ऐसे उल्लासपूर्ण वातावरण की कल्पना करते हैं जहाँ जन-जन का मन आनंदित होगा।

यह कविता संबोधन शैली में लिखी गई है, जो जनता के भीतर आत्मविश्वास और नई स्फूर्ति जगाने का प्रयास करती है। संक्षेप में, यह रचना एक ऐसे अखंड और समृद्ध हिंदुस्तान का सपना है जहाँ समानता, शिक्षा और खुशहाली का साम्राज्य होगा और हर व्यक्ति को अपने विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त होंगे।

 

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❤️ अध्याय 8: लीलाधर जगूड़ी

प्रस्तुत पाठ ‘मेरा ईश्वर’ सुप्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी द्वारा रचित है, जो उनके कविता संग्रह ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’ से संकलित है। यह कविता समकालीन समाज में प्रचलित ईश्वर की उस अवधारणा पर प्रहार करती है, जहाँ दुख और परेशानियों को ही भक्ति का आधार मान लिया गया है। कवि का मानना है कि सत्ता और प्रभु वर्ग मनुष्य को भय और विवशता के चक्र में फंसाकर उसे कठपुतली की तरह नियंत्रित करते हैं।

कविता में कवि यह घोषणा करता है कि उसका ईश्वर उससे नाराज है क्योंकि उसने अब और दुखी न रहने का संकल्प ले लिया है। वह अनावश्यक वस्तुओं और बंधनों को त्यागने की कसम खाता है। कवि प्रश्न उठाता है कि आखिर मनुष्य की लाचारी और कष्ट ही ईश्वर के अस्तित्व का आधार क्यों होने चाहिए?

उसके पास सुख के नाम पर केवल यही दृढ़ निश्चय है कि वह अब दुखी नहीं रहेगा। यह कविता मनुष्य की आत्मनिर्भरता, मानसिक स्वतंत्रता और पारंपरिक धार्मिक रूढ़ियों के प्रति एक तार्किक विद्रोह को दर्शाती है। कवि ‘दुख के कारोबार’ और ‘सुख के व्यसन’ दोनों से मुक्त होकर एक जागरूक अस्तित्व की तलाश करता है।

 

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❤️ अध्याय 9: राजेश जोशी

यह पाठ राजेश जोशी द्वारा रचित कविता ‘रुको बच्चो’ पर आधारित है। कवि इस कविता के माध्यम से आधुनिक शासन व्यवस्था, न्यायपालिका और कार्यपालिका की संवेदनहीनता और ढुलमुल कार्यशैली पर तीखा प्रहार करते हैं। कविता में बच्चों को सड़क पार करने से पहले रुकने की सलाह दी गई है, क्योंकि व्यवस्था के प्रतीक जैसे अफसर, न्यायाधीश, पुलिस और मंत्री अपनी गाड़ियों में अंधी रफ्तार से भाग रहे हैं।

विडंबना यह है कि इतनी तेजी के बावजूद वे अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर नहीं हैं। अफसर दफ्तर देरी से पहुँचते हैं और फाइलें सालों तक दबी रहती हैं। अदालतों में तारीख पर तारीख मिलती है और न्याय में देरी होती है।

पुलिस घटनास्थल पर सबसे बाद में पहुँचती है और मंत्रियों का काफिला केवल असुरक्षा के डर से तेज भागता है। कवि बच्चों को आगाह करते हैं कि वे इस व्यवस्था की अंधी और उद्देश्यहीन दौड़ का हिस्सा न बनें। वे चाहते हैं कि भविष्य की पीढ़ी रुककर, सोच-समझकर और सँभलकर आगे बढ़े ताकि वे इस भ्रष्ट और गतिहीन व्यवस्था के नीचे न कुचले जाएँ।

यह कविता समाज में व्याप्त जिम्मेदारी की कमी और खोखलेपन को उजागर करती है।

 

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❤️ अध्याय 10: विजय कुमार

यह अध्याय विजय कुमार द्वारा रचित कविता ‘निम्मो की मौत पर’ पर आधारित है। कवि ने इस कविता के माध्यम से महानगरीय समाज में रहने वाली एक घरेलू नौकरानी, निम्मो के अत्यंत कष्टकारी और उपेक्षित जीवन का चित्रण किया है।

निम्मो समाज के उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जिसका कोई अपना अस्तित्व नहीं समझा जाता। वह एक ‘भीगी हुई चिड़िया’ की तरह डरी-सहमी रहती थी और उसे भरपेट भोजन तक नसीब नहीं था; वह अक्सर बासी और जूठा खाना चोरों की तरह छिपकर खाती थी।

उसे अपने परिवार से संपर्क करने की मनाही थी और वह निरंतर शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना, जैसे गालियाँ और मारपीट सहती थी। तीस वर्ष की अल्पायु में ही उसकी मृत्यु हो जाती है, जो किसी ‘रेत की दीवार’ के ढहने के समान अचानक और चुपचाप होती है।

कवि दर्शाते हैं कि उसकी मौत पर समाज में कोई हलचल नहीं होती और न ही कोई सवाल उठाए जाते हैं। यह कविता मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है और समाज की उस क्रूर वास्तविकता को उजागर करती है जहाँ गरीबों का शोषण और उनकी पीड़ा को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है।

 

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❤️ अध्याय 11: सीताकांत महापात्र

यह संकलन दो प्रमुख कवियों, सीताकांत महापात्र और पाब्लो नेरुदा की रचनाओं पर आधारित है। पहले भाग में सीताकांत महापात्र का परिचय और उनकी कविता ‘समुद्र’ दी गई है। महापात्र उड़ीसा के एक प्रतिष्ठित कवि और प्रशासक रहे हैं।

उनकी कविता ‘समुद्र’ प्रकृति की उदारता और मनुष्य की स्वार्थी, उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है। समुद्र निरंतर देने की इच्छा रखता है, जबकि मनुष्य उसे केवल वस्तुओं या फ्रेम में कैद तस्वीरों तक सीमित रखना चाहता है। यह कविता समाज और प्रकृति के गहरे संबंधों को रेखांकित करती है।

दूसरे भाग में नोबेल पुरस्कार विजेता चिली के कवि पाब्लो नेरुदा की कविता ‘कुछ सवाल’ प्रस्तुत है। नेरुदा को जनता का कवि माना जाता है। उनकी यह कविता प्रकृति की रहस्यमयी और परिवर्तनशील कार्यप्रणाली पर आधारित है।

वे जिज्ञासावश पूछते हैं कि समुद्र में नमक कहाँ से आता है या जड़ों को उजाले की ओर बढ़ने का ज्ञान कैसे होता है। यह कविता विनाश और निर्माण की निरंतर प्रक्रिया तथा जीवन की अदम्य जिजीविषा में विश्वास प्रकट करती है। कुल मिलाकर, दोनों रचनाएँ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का गहन विश्लेषण करती हैं।

 

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❤️ अध्याय 12: पाब्लो नेरुदा

यह अध्याय प्रसिद्ध चिली के कवि पाब्लो नेरुदा की कविता ‘कुछ सवाल’ पर केंद्रित है। नेरुदा का जन्म 1904 में हुआ था और उन्हें 1973 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। वे अपनी राजनीतिक सक्रियता और मानवीय गरिमा से ओत-प्रोत कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

इस पाठ में कवि प्रकृति की रहस्यमय कार्यप्रणाली पर जिज्ञासा व्यक्त करते हैं। वे पूछते हैं कि यदि नदियाँ मीठी हैं, तो समुद्र खारा कैसे हो जाता है? वे ऋतुओं के परिवर्तन, जाड़े की धीमी गति और वसंत के आगमन जैसे प्राकृतिक चक्रों पर सवाल उठाते हैं।

कविता का मुख्य भाव प्रकृति में विध्वंस और निर्माण की दो विपरीत प्रक्रियाओं को एक साथ प्रदर्शित करना है। नेरुदा जड़ों के अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने के माध्यम से मनुष्य की अदम्य जिजीविषा और जीवंतता में अपना अटूट विश्वास प्रकट करते हैं। यह कविता पाठकों को प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और उसके रहस्यों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करती है।

अंततः, यह संदेश देती है कि परिवर्तन शाश्वत है और जीवन हमेशा विकास की ओर अग्रसर रहता है।

 

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Comments

  1. Ashutosh Yadav says

    June 9, 2023 at 7:07 pm

    There is no option after book download option

    Reply
    • bseb says

      September 10, 2023 at 10:08 am

      hey @Ashutosh, sorry for the inconvenience.

      Check out these step-by-step guides to understand how to download these books.

      Step 1

      step 1

      Step 2

      step 2

      thanks!

      Reply

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