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Bihar Board Books

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Bihar Board Class 4 Urdu Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 17, 2026 by bseb Leave a Comment

Bihar Board 4th Urdu Book 2026 PDF Download (اردو)

Bihar Board Class 4th Urdu Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 4th के छात्रों के लिए “Urdu (اردو)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 4 Urdu (اردو) Texbook PDF Free Download

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यह किताब ‘गुलशन-ए-उर्दू भाग-4’ चौथी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन द्वारा तैयार की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में उर्दू भाषा की समझ, पढ़ने का शौक और रचनात्मक क्षमताओं को जगाना है। किताब में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ 2005) की सिफारिशों को ध्यान में रखा गया है ताकि शिक्षा को बच्चों के लिए रोचक और ज्ञानवर्धक बनाया जा सके। इस संग्रह में कविताएँ, गद्य पाठ और सरसरी अध्ययन के लिए विभिन्न विषय शामिल हैं। महत्वपूर्ण विषयों में ‘दुआ’, ‘शेख शरफुद्दीन अहमद याहिया मनेरी’, ‘हमदर्दी’, ‘बरसात की बहारें’ और ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ’ जैसी हस्तियों और विषयों को शामिल किया गया है। इसके अलावा बच्चों की नैतिक शिक्षा के लिए ‘खाने-पीने के आदाब’ और ‘घमंड का अंजाम’ जैसे पाठ भी दिए गए हैं। किताब की तैयारी में शिक्षाविदों और शिक्षकों ने बच्चों की मानसिक स्तर और रुचि का विशेष ध्यान रखा है ताकि वे अपनी मातृभाषा में निपुणता हासिल कर सकें। यह किताब बिहार सरकार की शैक्षिक मुहिम के तहत मुफ्त वितरण के लिए प्रकाशित की गई है।

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❤️ سبق 1 : دعا (نظم)


यह किताब का पहला पाठ है जिसका शीर्षक ‘दुआ’ है। इसमें कवि अल्लाह तआला की बारगाह में बड़ी लाजवाबी के साथ हाथ फैलाकर दुआ मांग रहा है। कवि की तमन्ना है कि उसकी जिंदगी नाकामियों के गम से आजाद हो और वह हर मैदान में कामयाब रहे। वह अल्लाह से ऐसी चाह मांगता है जिससे वह अपनी कौम की खिदमत कर सके और हर दिल अजीज बनकर बड़ा नाम पैदा कर सके। कविता में हिदायत की राह पर चलने, गुनाहों से बचने और बेकसों व मजबूरों का हमदर्द बनने की दुआ की गई है। कवि अपने वतन की खुशहाली और वहाँ इंसाफ व न्याय के कायम होने के लिए भी दुआगो है। वह चाहता है कि उसकी जिंदगी दूसरों को फायदा पहुँचाने में खर्च हो। आखिर में वह दुआ करता है कि हे रब! उसकी यह मुख्तसर सी इल्तिजा कुबूल फरमा ले। इस पाठ में मुश्किल अल्फाज के मानी भी दिए गए हैं जैसे करीम (करम करने वाला), हर दिल अजीज (सबका प्यारा) और शादमाँ (खुश)। इसके अलावा तालिब-ए-इल्म की मश्क के लिए सवाल, शेर मुकम्मल करने और जुमलों में इस्तेमाल जैसी सरगर्मियाँ भी शामिल हैं ताकि वे दुआ के मफहूम को अच्छी तरह समझ सकें।

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❤️ سبق 2 : شیخ شرفالدین یحییٰ منیری (نثر)


यह पाठ हज़रत मखदूम-उल-मुल्क शेख शरफुद्दीन अहमद याहिया मनेरी की जिंदगी और उनकी तालीमात पर रोशनी डालता है। वह 1263 ई. में मनेरी शरीफ, दिल्ली में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम मखदूम कमालुद्दीन तकी मनेरी और वालिदा का नाम बी बी रजिया था। उन्होंने जाहिरी तालीम के बाद रूहानी तालीम के लिए हजरत शेख नजीबुद्दीन फिरदौसी से बैअत की। हजरत मखदूम एक निहायत सादा और फकीराना जिंदगी गुजारते थे, उनकी गुजर सादा और लिबास आमतौर पर, चादर और कुर्ता था। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोगों को भाईचारा, भलाई और दिलों को जोड़ने की तालीम देने में सर्फ की। उनकी मशहूर तसनीफ ‘मकतूबात-ए-सदी’ है और वह एक माहिर हकीम भी थे, यहाँ तक कि बादशाह फिरोज तुगलक भी उनसे इलाज करवाते थे। उनका विसाल 1380 ई. में 121 साल की उम्र में बिहार शरीफ में हुआ। आज भी उनका आस्ताना हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अज़ीम मर्कज माना जाता है, जहाँ हर साल ईद की 5 तारीख को उर्स अकीदत व एहतराम से मनाया जाता है।

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❤️ سبق 2(الف) : سچا انصاف (سرسری مطالعہ)


यह पाठ हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु के इंसाफ और राया परवरी का एक ईमान अफरोज़ वाकिया बयान करता है। हज़रत उमर रातों को घूम-घूम कर अपनी राया (प्रजा) के हालात मालूम किया करते थे। एक रात घूमते हुए उन्होंने एक बेवा औरत को देखा जिसके बच्चे भूख से बिलख रहे थे और वह अपने बच्चों को बुलाने के लिए खाली हांडी में कंकड़ियाँ डाल रही थी ताकि बच्चे खाना तैयार होने की उमीद में सो जाएँ। घर में खाने को कुछ न था और बैतुलमाल से भी कोई मदद नहीं पहुँची थी। जब हज़रत उमर ने उससे खलीफा को खबर न देने की वजह पूछी तो औरत ने जवाब दिया कि यह खलीफा का फर्ज है कि वह अपनी राया की खबरगीरी करे। यह सुनकर हज़रत उमर बेचैन हो गए और फौरन बैतुलमाल से आटा, घी और दूसरी चीज़ें अपनी पीठ पर लादकर लाए, खुद खाना तैयार करके बच्चों को खिलाया और उसका वज़ीफ़ा मुकर्रर किया। यह वाकिया हमें ज़िम्मेदारी के एहसास और इंसानी हमदर्दी का अज़ीम दर्श देता है।

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❤️ سبق 3 : ہمدردی (نظم)


यह किताब अल्लामा इक़बाल की मशहूर नज़्म ‘हमदर्दी’ पर मुबनी एक दरसी सबक है। नज़्म का आगाज एक उदास बुलबुल के ज़िक्र से होता है जो एक दरख्त की टहनी पर तनहा बैठा है और रात के अंधेरे की वजह से अपने घोंसले तक पहुँचने से कासिर है। बुलबुल की यह फरयाद सुनकर करीब मौजूद एक छोटा सा जुगनू उसकी मदद के लिए हाजिर होता है। जुगनू कहता है कि अगरचे वह एक छोटा सा कीड़ा है, लेकिन अल्लाह ने उसे रोशनी की मशाल अता की है जिसके ज़रिए वह अंधेरी राह में बुलबुल की रहनुमाई करेगा। सबक में मुश्किल अल्फाज के मानी जैसे शजर (दरख्त), आशियाँ (घोंसला), और आह-ओ-ज़ारी (रोना) वाजेह किए गए हैं। नज़्म का मर्कज़ी पैगाम आखिरी शेर में पोशीदा है कि ‘हैं लोग वही जहाँ में अच्छे, आते हैं जो काम दूसरों के’। यानी दुनिया में वही लोग बेहतरीन हैं जो दूसरों की जरूरत और मुश्किल में काम आते हैं। सबक में मशक्क़ात भी शामिल हैं जिनमें खाली जगहें पूर करना, अल्फाज की ज़िद्द (उलट) लिखना, और मुज़क्कर व मोअन्नस की शिनाख्त करना शामिल है। यह सबक बच्चों में हमदर्दी और दूसरों की मदद करने का जज़्बा पैदा करने के लिए निहायत मौअस्सिर है।

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❤️ سبق 4 : گیہوں بونا جو کاٹنا (نثر)


यह सबक हकीम लुकमान की एक सबक-आमोज़ हिकायत पर मुबनी है जो एक जाहिल और गाफिल किसान के गुलाम थे। किसानों ने हकीम साहब को खेत में गेहूँ बोने का हुक्म दिया, लेकिन उन्होंने जान-बूझ कर जो बो दिए। जब फसल तैयार हुई तो किसान जो देखकर सख्त गुस्से में आ गए। हकीम लुकमान ने बड़ी दानाई से जवाब दिया कि उन्हें उमीद थी कि जो बोकर गेहूँ काटेंगे। जब किसानों ने उसे नामुमकिन करार दिया तो हकीम साहब ने उसे जिंदगी का बड़ा सबक दिया कि जिस तरह जो बोकर गेहूँ हासिल नहीं किए जा सकते, बल्कि उसी तरह गुनाहों और बुराइयों में मसरूफ रहकर खुदा से नेकी के बदले या जज़ा-ए-खैर की उमीद रखना फज़ूल है। यह हिकायत हममें ‘जैसा करोगे वैसा भरोगे’ का पैगाम देती है और समझाती है कि इंसान को अपनी आखिरत सँवारने के लिए अच्छे अमल करने चाहिएँ।

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❤️ سبق 5 : وقت بد انمول ہے بچو (نظم)


यह सबक नज़्म की सूरत में है जिसका अन्वान ‘वक़्त बड़ा अनमोल है’ है। इस नज़्म में शायर बच्चों को वक़्त की अहमियत और कद्र व कीमत से आगाह कर रहा है। शायर कहता है कि वक़्त का हर लम्हा हीरे की तरह कीमती है, इसलिए हमें वक़्त की इज़्ज़त करनी चाहिए और उसे ज़ाएँ नहीं करना चाहिए। नज़्म में गांधी जी, चाचा नेहरू और मौलाना आज़ाद जैसी अज़ीम शख्सियतों का ज़िक्र किया गया है जिन्होंने वक़्त की कद्र की और बुलंदियों तक पहुँचे। यह अज़ीम लोग अपनी इल्म व दानिश (ज्ञान की वाणी) की वजह से दुनिया भर में मशहूर हुए। शायर बच्चों को नसीहत करता है कि चाहे उस्ताद हों या भाई, सब की दिल से इज़्ज़त करें और सब के साथ मुहब्बत और प्यार से पेश आएँ। हमें नफरत के साए से दूर रहना चाहिए और अपनी जिंदगी में उन अच्छी बातों को अपनाना चाहिए। इस नज़्म का बुनियादी मकसद यह है कि बच्चे वक़्त के सही इस्तेमाल को समझें और अपनी जिंदगी में अखलाकी अकीदा और बड़ों के एहतराम को जगह दें। वक़्त गुजर जाने के बाद वापस नहीं आता, इसलिए उसकी कद्र करना कामयाबी की कुंजी है।

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❤️ سبق 6 : زبان کا رس (نثر)


यह कहानी रामू नामी एक निकम्मे शख्स के गिर्द घूमती है जो कोई काम नहीं करता था और घरवालों के तानों से तंग आकर काम की तलाश में निकल पड़ा। रास्ते में एक बुढ़िया के घर पनाह ली और उससे चावल पकाने को दिए। बातों-बातों में रामू ने बुढ़िया से एक ऐसी फ़ज़ूल और मनहूस बात कह दी कि ‘अगर तुम्हारी भी मौत हो जाए तो उस छोटे दरवाजे से कैसे निकलेगी?’ बुढ़िया को इस बात पर सख्त गुस्सा आया और उसने गर्म उबलते चावल रामू की धोती में डालकर उसे घर से निकाल दिया। जब लोगों ने धोती से टपकते पानी के बारे में पूछा तो उसने उसे ‘ज़बान का रस’ करार दिया। यह कहानी हममें सबक देती है कि इंसान को हमेशा सोच समझकर बात करनी चाहिए और अपनी ज़बान पर काबू रखना चाहिए, क्योंकि बेमौका और कड़वी बात का अंजाम हमेशा बुरा होता है। ज़बान की मिठास इंसान का वक़ार बढ़ाती है जबकि बदज़बानी रसूआई का सबब बनती है।

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❤️ سبق 7 :برسات کی بہاریں (نظم)


यह सबक नज़ीर अकबराबादी की नज़्म ‘बरसात की बहारें’ पर मुबनी है। इस नज़्म में शायर ने बरसात के मौसम की खूबसूरती और उसके असरात को बड़े दिलकश अंदाज में बयान किया है। शायर कहते हैं कि बारिश की बूंदों और कतराओं ने हर तरफ एक सामान बाँध दिया है, सब्ज़ा लहलहा रहा है और बाग़ात में बहार आई हुई है। कुदरत ने ज़मीन पर हरे-भरे बच्चे बच्चे दिए हैं और जंगलों में भी हरियाली की वजह से रौनक बढ़ गई है। बारिश की मस्ती में मुन्ने अच्छल रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मुख्तलिफ परिंदे जैसे बगले, फाख़्ता और तीतर अपनी मखसूस आवाज़ों में अल्लाह की हम्द-ओ-सना कर रहे हैं। नज़्म के साथ-साथ इस सबक में मुश्किल अल्फाज़ के मानी, वाहिद जमा, और जुमलों की दरुस्तगी जैसी मशक्कात भी दी गई हैं। इसके अलावा एक और हिस्सा ‘हौसला-मंदी’ से मतल्लिक है जिसमें सकीना और मालती की बहादरी और आग पर काबू पाने की कहानी का ज़िक्र है, जिसके लिए उन्हें इनाम से नवाजा गया। मजमूई तौर पर यह सबक फितरत की रुनकाइयों और इंसानी हिम्मत की अकासी करता है।

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❤️ سبق 7(الف) : آؤ کھل کھیلیں (سرسری مطالعہ)


यह बाब ‘आओ खेलें खेल’ बच्चों के मुख्तलिफ खेलों और उनकी सामाजिक अहमियत पर रोशनी डालता है। कहानी का आगाज चंदनी की आवाज से होता है जो अपनी सहेली रूबी को खेलने के लिए बुलाती है। जल्द ही इदरीस, आफाक, अफरोज, अशरफ, वली, अब्दुल्लाह और दरख्शां जैसे बहुत से बच्चे मैदान में जमा हो जाते हैं। बच्चे आपस में मशवरा करते हैं कि क्या खेला जाए और फिर रस्सी कूदने, पत्थर और फुगड़ी जैसे रिवायती खेल खेलने का फैसला करते हैं। रस्सी कूदने में वली और रूबी रस्सी घुमाती हैं जबकि इदरीस और अब्दुल्लाह बारी-बारी कूदते हैं। इसके बाद पत्थर का खेल शुरू होता है जिसमें सात पत्थरों को तरतीब से लगाना और गेंद से बचना होता है। आखिर में बच्चे ‘फुगड़ी’ खेलते हैं जो कि एक जिस्मानी वर्ज़िश वाला खेल है। खेल के दौरान बच्चे न सिर्फ लत्फ अंदोज होते हैं बल्कि टीम वर्क, नज़्म व ज़ब्त और बारी का इंतज़ार करना भी सीखते हैं। शाम होने पर सब बच्चे अगले दिन दोबारा मिलने का वादा करके खुशी-खुशी अपने घरों को लौट जाते हैं। यह सबक बच्चों में खेलों के तईं दिलचस्पी और मिल-जुल कर रहने को फरोर देता है।

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❤️ سبق 8 : استاد بسماللہ خاں (نثر)


यह सबक मशहूर शहनाई नवाज़ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की जिंदगी और उनके फन पर मुबनी है। वह 1916 में बिहार के कस्बे डुमराँव में पैदा हुए और बचपन ही से अपने चचा अली बख्श से मौसिकी की तालीम हासिल की। बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को आलमी सतह पर पहचान दिलाई और वह बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब के सच्चे अलमबरदार थे। उन्होंने मौसिकी के ज़रिए इंसानियत और मुहब्बत का पैगाम पहुँचाने के लिए जाना जाता है। उनकी फन्नी खिदमात के एहतिराम में हिंदुस्तान सरकार ने उन्हें आला तरीन शहरी इज़्ज़ाज़ ‘भारत रत्न’ समेत पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा। 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान की आज़ादी के मौके पर लाल किले में सब से पहले उनकी शहनाई गूंजी थी। बेपनाह शोहरत और दौलत की पेशकश के बावजूद उन्होंने हमेशा सादगी पसंद की और बनारस को अपना मसकन बनाए रखा। 21 अगस्त 2006 को उनका इंतिकाल हुआ, जिससे मौसिकी की दुनिया में एक बड़ा खाला पैदा हो गया। यह सबक उनकी सादगी, अखलाक और फन के तईं उनकी लगन को खिराज-ए-अकीदत पेश करता है।

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❤️ سبق8(الف) : میرا وطن (نظم)


यह नज़्म शफीउद्दीन नीर की तखलीक है जिसमें उन्होंने अपने वतन की खूबसूरती और कुदरती मनाजिर को निहायत दिलकश अंदाज में बयान किया है। शायर वतन के परिंदों जैसे चिड़िया, तोता, मैना, मोर, कोयल, बुलबुल और चकोर का ज़िक्र करते हुए उसकी फितरी रौनक को अजागर करता है। नज़्म में दरियाओं के जोर, झीलों की लहरों, झरनों के गिरने और पानी के शोर का तज़करा है जो वतन के पहाड़ों और जंगलों की हरियाली के साथ मिलकर एक सहर-अंगेज़ समाँ पैदा करते हैं। शायर कहता है कि यहाँ के गले, मेवे, तरकारियाँ और खुश रंग फूलों के बाग़ात ज़मीन की ज़रखेज़ी और खूबसूरती का सुबूत हैं। पहाड़ों और जंगलों में बहुत हजारों चश्मे इस सरज़मीन को जन्नत का नमूना बनाते हैं। शायर के नज़दीक इस वतन की खूबियाँ इस कदर ज़्यादा हैं कि उसे ‘बाग़-ए-इरम’ और ‘बाग़-ए-अदन’ यानी जन्नत के बाग़ों से तश्बीह दी जा सकती है। यह नज़्म हुब्ब-उल-वतनी के जज़्बे से सरशार है और कारिंदों को अपने वतन की कुदरती नेमतों की तारीफ करने पर अभारती है। मजमूई तौर पर यह एक खूबसूरत मंज़ूमा खिराज-ए-तहसीन है जो वतन की मिट्टी, पानी, परिंदों और नबातात से मुहब्बत का इज़हार करती है।

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❤️ سبق 9 : ناگا ارجن ساگر (نثر)


यह सबक ‘नागा अर्जुन सागर’ के बारे में है जो आंध्र प्रदेश में दरिया कृष्णा पर तामीर किया गया एक अज़ीम-उल-शान बाँध है। ज़राअत की तरक्की के लिए सिंचाई की अहमियत को वाजेह करते हुए बताया गया है कि किस तरह इस बाँध के ज़रिए लाखों एकड़ बंजर ज़मीन को सैराब किया जा रहा है। इसका सांग-बुनियाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने रखा था और यह दुनिया के बुलंद तरीन बाँधों में से एक है। इसकी दीवार से एक मसनूई झील बन गई है जो एक छोटे समंदर की तरह नज़र आती है। 1967 में इंदिरा गांधी ने इसका पानी नहरों में छोड़ा, जिससे रियासत की ज़राअत को नई जिंदगी मिली। यह मकाम न सिर्फ मआशी तौर पर अहम है बल्कि एक बेहतरीन तफरीहगाह भी है, जहाँ सयाह कश्ती रानी से लत्फ अंदोज होते हैं। झील के वसत में एक टापू पर अजाब घर वाकिअ है जिसमें बौद्ध मजहब की कदीम यादगारें महफूज़ हैं। यह बाँध हिंदुस्तानी इंजीनियरों की महारत और इंसानी मेहनत व तआवुन का एक बेहतरीन नमूना है, जो मुल्क की तरक्की में कलैदी करदार अदा कर रहा है।

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❤️ سبق 10 : سورج (نظم)


यह सबक एक नज़्म की सूरत में है जिसका अन्वान ‘सूरज’ है। इस नज़्म में शायर ने कायनात में सूरज की अहमियत और उसकी अफादीयत को बड़ी खूबसूरती से बयान किया है। शायर कहता है कि अगर दुनिया में सूरज न होता तो दिन कभी न निकलता और हर तरफ अंधेरा छाया रहता। सूरज की गैर मौजूदगी में बादल न बनते और बारिश का खूबसूरत मौसम भी न होता जिसकी वजह से कोयल के गाने की आवाज सुनाई न देती। पौधों की नश्व-ओ-नुमा और फूलों खासतौर पर आम के फूल का खिलना भी सूरज की तपश और गर्मी ही का मरहूम नतीजा है। चाँद की रोशनी भी सूरज ही की वजह से है और मौसमों का बदलना भी उसी नज़ाम से जुड़ा हुआ है। नज़्म के इख्तिताम पर यह बताया गया है कि सूरज के बगैर जिंदगी का तसव्वुर नामुमकिन है क्योंकि न दरियाओं में पानी होता और न ही ज़मीन से अनाज उगता। मुख्तसर यह कि सूरज के बगैर दुनिया का सारा नज़ाम दरहम-बरहम हो जाता और जिंदगी की चल-पहल खत्म हो जाती। इस सबक में तालिब-ए-इल्म को सूरज के फ़वाइद के साथ-साथ मुतज़ाद अल्फाज और जुम्लह-साज़ी जैसी मशक्कात भी सिखाई गई हैं।

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❤️ سبق 11 : غرور کا انجام (نثر)


यह कहानी एक जामुन के पेड़ और एक बाँस के पौधे के गिर्द घूमती है। जामुन का पेड़ अपनी मजबूती और पहले हुए शाखों पर बहुत फख्र करता था और बाँस को अपनी लचक और हवा के सामने झुक जाने की वजह से कमजोर समझता था। जामुन ने बाँस को नसीहत की कि वह भी उसकी तरह अकड़ कर खड़ा रहे और हवा के सामने न झुके। बाँस ने माजुराना जवाब दिया कि तेज़ हवा के सामने झुक जाना ही बेहतर है वरना नुकसान हो सकता है, लेकिन जामुन ने अपने घमंड में उसकी एक न सुनी। जल्द ही एक शदीद तूफान आया। बाँस हवा के रुख पर झुक गया और महफूज़ रहा, जबकि जामुन का पेड़ हवा का मुकाबला करने की कोशिश में अपनी जड़ें खो बैठा और ज़मीन पर गिर गया। यह देखकर बाँस बहुत उदास हुआ और सोचने लगा कि काश जामुन ने घमंड न किया होता। यह कहानी हममें यह सबक मिलता है कि घमंड का अंजाम हमेशा बुरा होता है और माजुरी इंसान को बड़ी मुसीबतों से बचा लेती है। ताकतवर होने का मतलब यह नहीं कि इंसान दूसरों को हकीर समझे क्योंकि वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

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❤️ سبق 12 : میلہ (نظم)


यह नज़्म ‘मेला’ घर के करीब लगने वाले एक मेले की मंज़रकशी करती है। शायर कहता है कि घर के पास मेला लगा हुआ था जिसमें चाट का ठेला और छोले बेचने वाले आए हुए थे। बच्चों ने वहाँ जाकर चाट और छोले खाए जिनसे वे बहुत लत्फ अंदोज हुए और उनकी खुशी का कोई अंत न था। मेले में खिलौने बेचने वाला भी मौजूद था जहाँ से खूबसूरत और रंग-बिरंगे चार खिलौने खरीदे गए। नज़्म में मेले की रौनक का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि गड़रिया और गुन-गुन एक दूसरे का हाथ पकड़कर साथ-साथ मेला घूम रहे थे। मेले का ठाट बहुत शानदार था जिसमें झूले, ठेले और सुंदर हाट (बाजार) शामिल थे। यह नज़्म मेले की गर्मा-गर्मी, लज़ीज़ पकवानों और बच्चों के लिए तफरीह व कश्श के पहलुओं को खूबसूरत अंदाज में बयान करती है। नज़्म के आखिर में मुश्किल अल्फाज के मानी जैसे चाट, ठाट, सुंदर, हाट और सलोने भी दिए गए हैं ताकि बच्चे उनके मतलब समझ सकें। मजमूई तौर पर यह सबक बच्चों को मेले की सकाफत और खुशी से रोशनास करवाता है।

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❤️ سبق 13 : ایک دنیا ان کی بھی (نثر)


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❤️ سبق 14 : یکتا (نظم)


यह सबक एक नज़्म है जिसका अन्वान ‘यकता’ है, जिसे शाद तमकनत ने लिखा है। इस नज़्म में शायर ने इत्तिहाद और यकजहती का दर्स दिया है। शायर कहता है कि चाहे कोई मशरिक (पूरब) से हो या मगरिब (पच्छिम), फूलों की खुशबू हर जगह एक जैसी होती है। इसी तरह दुनिया के तमाम इंसान, चाहे वह किसी भी सिम्त या ख़िते में रहते हों, एक ही आसमान के नीचे परिंद चढ़ाते हैं और एक ही ज़मीन से रिज़्क हासिल करते हैं। नज़्म में बताया गया है कि सूरज की किरनें और चाँद की रोशनी सब के लिए बराबर है। देख और सुन के एहसासात भी आलमगीर हैं; जब खुशी होती है तो दिल खुल उठते हैं और ग़म में आँखें नम हो जाती हैं। शायर ने यह पैगाम दिया है कि इंसानियत के दरमियान कोई तफरीक नहीं होनी चाहिए क्योंकि हम सब कुदरत के उसूलों के तहत एक ही लड़ी में पिरोए हुए हैं। मिट्टी, बीज, सागर और सेब की मिसालों के ज़रिए कायनात की यकसानियत को अजागर किया गया है, जो इंसानों को मिल-जुल कर रहने की तरगीब देती है।

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❤️ سبق 15 : سندباد جہازی (نثر)


यह सबक सिंदबाद नामी एक सौदागर के बारे में है जो बगदाद का रहने वाला था। एक बार तिजारत के सफर के दौरान वह एक गैर आबाद जज़ीरे पर अपने साथियों से बचकर तनहा रह गया। जज़ीरे की सैर के दौरान उसने एक बहुत बड़ा सफेद अंडा देखा जो ‘रुख’ नामी एक दैवी हिकल परिंदे का था। सिंदबाद ने एक तरकीब सोची और अपनी पगड़ी के ज़रिए खुद को परिंदे के तंग से बाँध लिया। परिंदा उसे उठाकर एक गहरी घाटी में ले गया, जहाँ हर तरफ कीमती हीरे बिखरे हुए थे। इस घाटी में शिकारियों ने हीरे हासिल करने के लिए गोश्त के टुकड़े फेंकने का तरीका अपना रखा था ताकि अकाबा उनसे चिपटे हीरों को ऊपर ले आएँ। सिंदबाद ने अपनी जेबें हीरों से भर लीं और गोश्त का एक बड़ा टुकड़ा अपनी पीठ पर बाँधकर लेट गया। एक अकाबा उसे गोश्त समेत उठाकर अपने घोंसले तक ले गया। इस तरह वह उस खतरनाक घाटी से निकलने में कामयाब हुआ और दूसरे ताजिरों की मदद से बहफ़ीज़त अपने वतन बगदाद पहुँच गया। यह कहानी सिंदबाद की हिम्मत, ज़हानत और मुश्किल हालात में इस्तिकामत की अकासी करती है।

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❤️ سبق 15(الف) : پہیلیاں (سرسری مطالعہ)


यह किताबचा मुख्तलिफ दिलचस्प और मालूमाती पहेलियों पर मुश्तमिल है जो कारिंदों की ज़हनी आज़माइश और तफरीह के लिए तरतीब दी गई हैं। इसमें रोज़मर्रा की जिंदगी, जानवरों, इंसानी अज़ा और कुदरत की चीज़ों से मतल्लिक सवाल शामिल किए गए हैं। मिसाल के तौर पर, ‘एक वी में बीस दाँत’ के ज़रिए दाँतों की तरफ इशारा किया गया है, और ‘मोतियों से भरा एक थाल’ के ज़रिए आसमान और सितारों का ज़िक्र किया गया है। किताब में वक़्त की तकसीम, जैसे बारह महीने, हफ्ते के दिन और महीने के दिनों को भी पहेलियों की शक्ल में पेश किया गया है। इसके अलावा कुछ जानवरों जैसे कछुआ और जोंक, और फूलों जैसे सूरजमुखी और खीरे के बारे में भी सवाल मौजूद हैं। हर पहेली के साथ उसका जवाब भी फराहम किया गया है ताकि पढ़ने वाले अपनी समझ-बूझ की तसदीक कर सकें। यह मजमूआ बच्चों और बड़ों दोनों के लिए यकसाँ मुफीद है जो उर्दू अदब में पहेलियों के ज़रिए अपनी अक्ल को जिला-बख्शना चाहते हैं। किताब का अंदाज सादा और दिलकश है जो कारी को सोचने पर मजबूर करता है।

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❤️ سبق 16 : ہمارے تیوہار (نظم)


यह सबक ‘हमारे त्योहार’ के अन्वान से है जो मुख्तलिफ हिंदुस्तानी त्योहारों और उनसे जुड़ी खुशियों की अकासी करता है। इसमें बताया गया है कि किस तरह बदलते हुए मौसमों के साथ-साथ अलग-अलग त्योहार आते हैं। जैसे सर्दी के आगाज के साथ दशहरा और दिवाली मनाई जाती है, जहाँ बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर रावण का पुतला जलाया जाता है और दीये रोशन किए जाते हैं। इसी तरह ईद के मौके पर लोग सेवइयाँ और मिठाइयाँ खाते हैं और कुरबानी पर किक तकसीम की जाती है। होली का त्योहार रंगों और पिचकारियों के साथ फागुन के महीने में खुशियाँ लाता है, जबकि सावन के मौसम में रक्षाबंधन का त्योहार भी बहनों के प्यार की अलामत बनकर आता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रंगीली राखियाँ बाँधती हैं। यह सबक हममें सिखाता है कि त्योहार हमारी जिंदगी में रंग और इत्तिहाद पैदा करते हैं और हर मौसम अपने साथ एक नया जश्न लेकर आता है। इसमें तालिब-ए-इल्म के लिए मुख्तलिफ सरगर्मियाँ भी दी गई हैं ताकि वे त्योहारों की पहचान कर सकें और उनकी अहमियत को समझ सकें।

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❤️ سبق 17 : کھانے پینے کے آداب


यह बाब ‘खाने-पीने के आदाब’ के मौज़ू पर मुबनी है, जिसमें एक उस्ताद अपने तुलबा को खाने और पीने के अखलाकी और सहीह-मंद तरीकों की तालीम देता है। सबक का आगाज स्कूल से वापसी पर बुज़ुर्गों को सलाम करने की अहमियत से होता है। उस्ताद बताते हैं कि खाने से पहले हाथ धोना और कुल्ली करना वाजिब है। खाने के लिए हमेशा साफ स्थिरा दस्तर-ख्वान और बरतन इस्तेमाल करने चाहिएँ। सबक में सहीह के उसूलों पर जोर देते हुए बताया गया है कि खाना सिर्फ भूख लगने पर ही खाना चाहिए और पेट भरने से थोड़ा पहले हाथ रोक लेना तंदुरुस्ती की अलामत है। लक़मा छोटा लेना और उसे अच्छी तरह चबाकर खाना हज़म में मददगार होता है। उस्ताद मज़ीद हिदायत करते हैं कि खाने में ऐब नहीं निकालना चाहिए और हमेशा अपने सामने से ही खाना चाहिए। पानी पीने के लिए दाएँ हाथ का इस्तेमाल और बैठकर पीना सुन्नत और बेहतर तरीक़ा है। गर्म खाने में फूँक मारने से मना किया गया है। आखिर में, दस्तर-ख्वान से गिरे हुए रीज़ों को समेटने और खाने के बाद हाथ-मुँह साफ करने की ताकीद की गई है ताकि इंसान मुहज़िब और तंदुरुस्त रहे।

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❤️ سبق 17(الف) : آسان نسخے (سرسری مطالعہ)


यह नज़्म सहीह-ओ-सफाई और घरेलू इलाज के मतल्लिक अहम उसूलों पर मुबनी है। शायर इस बात पर जोर देता है कि जब तक ग़ज़ा के ज़रिए बीमारी का इलाज मुमकिन हो, तब तक दवाइयों से परहेज करना चाहिए। नज़्म में मुख्तलिफ आम जिस्मानी तकलीफों के लिए सादा और कुदरती चीज़ों के इस्तेमाल का मशवरा दिया गया है। मिसलन सर्दी लगने की सूरत में अनार की ज़र्दी का इस्तेमाल, मइदे में गुरानी महसूस होने पर सौंफ या अदरक का पानी का इस्तेमाल, और खून की कमी या बलगम की ज़्यादती की सूरत में गाजर, चने और शलगम खाने की तलकीन की गई है। इसी तरह बदहज़मी से निजात के लिए फाक़ा करने और पेशाब की सूरत में दूध में लीमू का रस मिलाकर पीने का मशवरा दिया गया है। मुख्तसरन यह कि यह नज़्म हममें अपनी रोज़मर्रा की खुराक के ज़रिए सहीह-मंद रहने और छोटी मोटी बीमारियों का इलाज बावर्ची खाने में मौजूद चीज़ों से करने का सबक देती है। यह आसान नुस्खे न सिर्फ मौसिर हैं बल्कि दवाइयों के मुज़िर असरात से भी महफूज़ रखते हैं।

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