Bihar Board Class 3 Urdu Book 2026 PDF Download
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BSEB Class 3 Urdu (اردو) Textbook PDF Free Download
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❤️ اپنی بات
यह किताब ‘गुलशन-ए-उर्दू’ तीसरी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए बिहार एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल द्वारा तैयार की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में उर्दू भाषा के प्रति स्वाभाविक रुचि पैदा करना और उनका नैतिक एवं बौद्धिक विकास करना है। किताब में शामिल पाठ बच्चों की उम्र, मनोविज्ञान और रुचि को ध्यान में रखकर चुने गए हैं। पाठ्यक्रम में हम्द (स्तुति), नज़्में (कविताएँ), कहानियाँ और ज्ञानवर्धक लेख शामिल हैं, जैसे ‘ईद’, ‘मीठी सारंगी’, ‘जुगनू’, और ‘कंप्यूटर’। हर पाठ के अंत में अभ्यास के प्रश्न दिए गए हैं जो बच्चों की वर्तनी, उच्चारण और समझ को बेहतर बनाने में मददगार होते हैं। शिक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे ज़ोर से पढ़ने और कहानियों के नैतिक पहलुओं पर ध्यान दें। यह किताब ‘सबके लिए शिक्षा अभियान’ के तहत मुफ्त बाँटने के लिए है और इसकी खरीद-फरोख्त कानूनी अपराध है। कुल मिलाकर यह एक ऐसी व्यापक पाठ्यपुस्तक है जो बच्चों को आसान और मनोरंजक तरीके से उर्दू भाषा के साथ-साथ सामाजिक व नैतिक मूल्यों से भी परिचित कराती है।
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❤️ سبق 1 : حمد
यह नज़्म (कविता) अल्लाह तआला की परिभाषा और उसकी महानता बताती है। शायर हफीज़ जालंधरी अल्लाह को दोनों जहानों का मालिक और सभी बगीचों का मालिक बताते हैं। दुनिया की हर चीज़ में अल्लाह की हिकमत (बुद्धिमत्ता) और ताकत ज़ाहिर है। फूलों का रंग हो या बादलों की गरज, ये सब अल्लाह की नेअमत (कृपा) का नतीजा है। शायर कहते हैं कि अल्लाह ने ही इंसान को पैदा किया और उसे सोचने-समझने की सलाहियत (क्षमता) अता की। ब्रह्मांड के कण-कण में अल्लाह के करम (उपकार) का साया नज़र आता है और हर जगह उसके निशान मौजूद हैं। वह सारी मखलूकात (सृष्टि) का खालिक (रचयिता) और मालिक है और सभी इंसान उसके ग़ुलाम हैं। इस नज़म का बुनियादी पैग़ाम यह है कि अल्लाह का नाम बहुत प्यारा है और वही इबादत (पूजा) के लायक़ है। अल्लाह तआला ने कायनात को खूबसूरत बनाया है और इंसानों पर बेशुमार एहसान किए हैं। हमें हमेशा उसकी हम्द (प्रशंसा) और सना (स्तुति) करनी चाहिए क्योंकि वही पूरी कायनात का असली रब और परवरदिगार (पालनहार) है। नज़्म के अशआर सादे मगर असरदार हैं जो अल्लाह की ताक़त की अक्स (छवि) दिखाते हैं।
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❤️ سبق 2 : نیم (نثر)
यह पाठ ‘नीम’ के पेड़ के महत्व और उसके तिब्बी (औषधीय) फ़ायदों पर आधारित है। नीम का असली नाम ‘नीम्ब’ है, जिसका मतलब होता है बीमारों को दूर करने वाला। यह पेड़ हर जगह आसानी से मिल जाता है और इसका हर हिस्सा इंसानियत के लिए फ़ायदेमंद है। नीम की घनी पत्तियाँ सिर्फ़ साया ही नहीं देतीं, बल्कि इन्हें सुखाकर कपड़ों और किताबों में रखने से कीड़े और दीमक नहीं लगते। इसकी पत्तियों का धुआँ मच्छरों को भगाने के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि पत्तियों को पानी में उबालकर नहाने से त्वचा की बीमारियाँ ख़त्म होती हैं। नीम के फूल को ‘निबोली’ कहते हैं, जो पेट की बीमारियों के लिए फ़ायदेमंद है और इसकी गुठली से हासिल कर्ड तेल साबुन बनाने और फोड़े-फुंसियों के इलाज में काम आता है। इसके अलावा, नीम की टहनी ‘मिसवाक’ के तौर पर दाँतों की मज़बूती और सफ़ाई के लिए बेहतरीन है। पेड़ की छाल और जड़ भी बुखार और दूसरी तकलीफों के इलाज में दवा के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं। संक्षेप में कहें तो नीम एक कुदरती शफ़ाखाना (औषधालय) है जो माहौल को ख़ुशगवार बनाने के साथ-साथ सेहत के लिए भी निहायत ज़रूरी है।
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❤️ سبق 3 : کویل (نظم)
यह पाठ एक नज़्म (कविता) है जिसका शीर्षक ‘कोयल’ है और इसे हफ़ीज़ अलदीन शौक़ी ने लिखा है। नज़्म में कोयल की खूबसूरती और उसकी सुरीली आवाज़ का परिचय दिया गया है। शायर कहता है कि अगरचे कोयल का रंग काला है, लेकिन उसकी सूरत बहुत भोली-भाली है और वह एक डाली से दूसरी डाली पर उछलती-फाँदती है। कोयल की ‘कू कू’ की आवाज़ बहुत निराली और दिलकश है, जो सुनने वालों को एक अजीब सा लुत्फ़ देती है। जब बाग़ का माली कोयल की कूक सुनता है तो वह बहुत ख़ुश होता है। नज़्म में बताया गया है कि कोयल को आमों से बहुत रग़बत (चाव) और आशिक़ी (प्रेम) है, इसलिए वह ज़्यादातर आम के बाग़ों में पाई जाती है। उसकी आवाज़ दिल को तड़पाने वाली और मसरूर (ख़ुश) करने वाली है। नज़्म के आख़िर में कुछ मश्क़ें (अभ्यास) दी गई हैं जिनमें मुश्किल अल्फ़ाज़ के मानी (जैसे रत, लुत्फ़, अजब, रग़बत, आशिक़ी) और सवाल शामिल हैं ताकि तालिबे इल्म (विद्यार्थी) नज़्म की मफ़हूम (अवधारणा) को बेहतर तरीक़े से समझ सकें। इसके अलावा, नज़्म में इस्तेमाल हुए हमआवाज़ अल्फ़ाज़ और कोयल की ख़ासियतों पर भी तवज्जोह (ध्यान) दिलाई गई है।
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❤️ سبق 4 : عید (نثر)
यह पाठ ईद-उल-फ़ित्र के पवित्र त्योहार के बारे में है जो रमज़ान के मुकद्दस महीने के ख़ात्मे पर मनाया जाता है। ईद की तैयारियाँ कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं, जिनमें लोग नए कपड़े, जूते और मिठाइयाँ ख़रीदते हैं। ईद के दिन, सब लोग नहा-धोकर नए कपड़े पहनते हैं और इत्र लगाते हैं। मर्द हज़रात ईदगाह जाकर बाजमाअत (सामूहिक) नमाज़ अदा करते हैं और उसके बाद एक-दूसरे से गले मिलकर ईद मुबारकबाद देते हैं। बच्चे इस दिन बहुत ख़ुश होते हैं, ख़ास तौर पर ईदी और तोहफ़े मिलने पर। ईदगाह के बाहर मेला लगता है जहाँ से बच्चे खिलौने ख़रीदते हैं और झूलों का लुत्फ़ उठाते हैं। घरों में ख़ास तौर पर सिवैयाँ और मुख्तलिफ़ क़िस्म के पकवान तैयार किए जाते हैं। यह त्योहार सामाजी हमआہنگی (सद्भाव) की बेहतरीन मिसाल है जहाँ दोस्त-अहबाब, जैसे मोहन और वसीम, एक-दूसरे के घर जाकर ख़ुशियों में शरीक होते हैं। पाठ में ईद-उल-फ़ित्र को ‘मीठी ईद’ के नाम से भी पुकारा गया है क्योंकि इस दिन मीठी सिवैयाँ शौक़ से खाई जाती हैं।
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❤️ سبق 5 : میٹھی سا رنگی (نثر)
यह कहानी एक सारंगी वाले और गायों के एक बेवकूफ़ लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है। जब सारंगी वाले ने गायों में आकर सारंगी बजाई, तो लोग उसकी मधुर और सुरीली आवाज़ सुनकर दंग रह गए और उसे ‘मीठी सारंगी’ कहने लगे। आख़िर ने लफ़्ज़ ‘मीठी’ का मतलब लफ़्ज़ी मानो (शाब्दिक अर्थ) में लिया और सोचा कि शायद सारंगी का ज़ाएक़ा (स्वाद) चीनी जैसा मीठा होगा। जब सब सो गए, तो उसने सारंगी चलाई, गायों को चाटा और उनके थनों को मुँह से लगाकर मीठास की तलाश की कोशिश की, मगर उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। गुस्से में आकर उसने सारंगी को गायों से बाहर फेंक दिया और लोगों को झूठ समझाने लगा। सुबह जब लोगों ने सारंगी ग़ायब पाई, तो आख़िर ने ग़ुस्से में अपनी नादानी और बेवकूफ़ी का इज़हार किया कि सारंगी बिल्कुल मीठी नहीं थी क्योंकि उसने उसे चाटा था। आख़िर की यह बात सुनकर लोग उसकी नादानी और बेवकूफ़ी पर अपना सर पीटते रह गए। यह कहानी हमें सिखाती है कि फ़न (कला) की मिठास ज़ाएक़े (स्वाद) में नहीं बल्कि एहसास और सुनने में होती है।
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❤️ سبق 6 : جگنو (نظم)
यह नज़्म ‘जुगनू’ वफ़ा फ़रख़ आबादी की लिखी हुई है जिसमें उन्होंने एक नन्हे और प्यारे जुगनू की खूबसूरती और उसकी हरकत व सकुनात (गतिविधियाँ) का बहुत खूबसूरती से ज़िक्र किया है। शायर कहता है कि जुगनू रात के अँधेरे में किसी चमकते हुए तारे की मानिंद नज़र आता है जो कभी ऊँचा और कभी नीचा उड़ता हुआ हर तरफ़ अपनी रोशनी बिखेरता है। यह नन्हा सा जानदार कभी घर की छत पर जाता है, कभी सहन (आँगन) में चमकता है और कभी पेड़ पर पहुँचकर बाग़ को अपनी रोशनी से मनोरम कर देता है, जैसे उसने हर तरफ़ नूर की अफ़शाँ (छींटे) छिड़क दी हों। बच्चे उसकी चमक से मुतास्सिर (प्रभावित) होकर उसे ताली बजाकर अपनी तरफ़ मुतवज्जह (ध्यान) कराने की कोशिश करते हैं और उसे पकड़कर अपनी टोपी में छुपा लेते हैं जहाँ वह एक सितारे की तरह टिमटिमाता हुआ नज़र आता है। शायर ने इस नज़्म में जुगनू को कुदरत की एक अनोखी और निराली तख़लीक (रचना) क़रार दिया है जो अपनी छोटी सी जान के साथ रात की तारीकी (अँधेरी) में रोशनी का एक बेहतरीन ज़रिया बनता है। नज़्म के आख़िर में जुगनू की मुख्तलिफ़ हालतें और उसकी चमक को निहायत दिलचस्प अंदाज़ में बयान किया गया है।
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❤️ سبق 6 (الف) : چھپا ہوا خزانہ (براے مطالعہ)
यह कहानी एक बूढ़े किसान और उसके चार आलसी बेटों के बारे में है जो मेहनत करने से जी चुराते थे। जब किसान बूढ़ा हुआ और फ़सल की आमदनी कम हो गई, तो उसने अपने बेटों को नसीहत करने का एक तरीक़ा सोचा। उसने बेटों से कहा कि खेत में एक ख़ज़ाना गड़ा हुआ है, लेकिन उसे हासिल करने की एक निशानी यह है कि पहले ज़मीन में हल चलाकर बीज बोने होंगे। ख़ज़ाने के लालच में चारों बेटों ने खेत में सख़्त मेहनत की और बीज बो दिए। कुछ अरसे बाद जब फ़सल तैयार हुई तो किसान ने उन्हें वह फ़सल काटकर बाज़ार में बेचने को कहा। फ़सल बेचने से जो रकम हासिल हुई, किसान ने बेटों को समझाया कि असल ‘ख़ज़ाना’ यही है जो उनकी अपनी मेहनत का नतीजा है। बेटों को मेहनत की अज़मत (महत्ता) का एहसास हुआ और उन्होंने वादा किया कि अब हमेशा जी लगाकर काम करेंगे ताकि यह ख़ज़ाना हर साल हासिल होता रहे। यह पाठ आमोज कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत में ही बरकत और असल कामयाबी पोशीदा (छिपी) है। किसान की दानिशमंदी (बुद्धिमत्ता) ने न सिर्फ़ बेटों को काम पर लगाया बल्कि उनकी ज़िंदगी बदल दी।
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❤️ سبق 7 : تندرستی اور غذا (نثر)
यह पाठ तंदुरुस्ती और ग़िज़ा (भोजन) के अहमियत पर रोशनी डालता है। इंसान के लिए ग़िज़ा निहायत ज़रूरी है, जिसमें अनाज, सब्ज़ियाँ, फल, दूध और गोश्त शामिल हैं। ग़िज़ा के दो अहम ज़राए (स्रोत) जानवर और पेड़-पौधे हैं। अनाज से जिस्म और हड्डियों को ताक़त मिलती है, जबकि सब्ज़ियाँ बदन में हरारत (गर्मी) पैदा करती हैं जो हाज़मे (पाचन) में मददगार होती हैं। दूध को एक मुकम्मल और बेहतरीन ग़िज़ा क़रार दिया गया है जो हर उम्र के फ़र्द (व्यक्ति) के लिए मुफ़ीद है। हमारे जिस्म में ग़िज़ा हज़म होकर ख़ून बनती है, इसलिए हमें हमेशा ताज़ा और साफ़ ग़िज़ा का इस्तेमाल करना चाहिए। पाठ में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ज़रूरत से ज़्यादा खाने से परहेज़ करना चाहिए क्योंकि इससे हाज़मा ख़राब और इंसान बीमार हो जाता है। पानी का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि यह हाज़मे के लिए नाग़ज़ीर (अत्यावश्यक) है, लेकिन हमेशा साफ़ पानी पीना चाहिए। आख़िर में अच्छी सेहत के लिए ख़ुराक के साथ-साथ मुनासिब आराम को भी ज़रूरी क़रार दिया गया है ताकि जिस्म तरो-ताज़ा रह सके।
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❤️ سبق 8 : گننا (نثر)
यह पाठ ‘गन्ने’ के बारे में है, जो शक्कर हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रीआ (साधन) है। गन्ना कई अक़्साम (प्रकार) का होता है, जिनमें सफ़ेद गन्ना नरम और रसदार होता है जबकि सुर्ख़ और काला गन्ना सख़्त होता है। गन्ने की साख़्त बाँस की तरह होती है जिसमें पोरियाँ और गाँठें होती हैं, और इसके ऊपरी पत्तों को ‘अगौला’ कहा जाता है जो जानवरों के चारे के काम आता है। इसकी काश्त के लिए गन्ने के छोटे टुकड़े ज़मीन में दबाए जाते हैं। गन्ने की खेती चैत और बैसाख के महीनों में शुरू होती है और बरसात के पानी से यह तेज़ी से बढ़ता है। फ़सल पकने पर इसे काटकर मिलों में भेजा जाता है जहाँ इसके रस से शक्कर बनाई जाती है। दीहातों (गाँवों) में रस को कड़ाहियों में पकाकर गुड़, राब और खाँड तैयार की जाती है। इसके अलावा गन्ने के रस से सिरका भी बनाया जाता है। पाठ के आख़िर में मश्क़ी सवालात और अल्फ़ाज़ के मानी भी दिए गए हैं।
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❤️ سبق 9 : بچوں کا گیت (نظم)
यह पाठ एक नज़्म ‘बच्चों का गीत’ पर मबनी (आधारित) है जिसमें बच्चों को भारत के राज-दुलारे और आँखों के तारे क़रार दिया गया है। शायर राम किशन मुअत्तर के मुताबिक़ बच्चे मुल्क की माया, दौलत और दिल की राहत हैं। नज़्म में बयान किया गया है कि बच्चों की मौजूदगी से ही मैले, डंगल और वीरान मक़ामात (जंगल में मंगल) में चहल-पहल और रौनक़ होती है। बच्चे मुल्क की हर चीज़ बशमूल (गिन) भरते हैं, खेतों और नज़ारों से मुहब्बत का इज़हार करते हैं और मुल्क की ज़िम्मेदारी (बोझ) उठाने और उसकी शान बढ़ाने का अज़्म रखते हैं। मश्क़ी हिस्से में बच्चों से सवाल पूछे गए हैं ताकि वे नज़्म की मफ़हूम को समझ सकें, जैसे शायर ने उन्हें राज-दुलारे क्यों कहा और वे मुल्क के लिए क्या करने को तैयार हैं। इसके अलावा ग्रामर की मश्क़ें जैसे जुमला साज़ी, हमआवाज़ अल्फ़ाज़ की तलाश और हरूफ़ से नए अल्फ़ाज़ बनाना भी शामिल हैं ताकि तालिबे इल्म की लिसानी महारतों में इज़ाफ़ा हो सके। यह पाठ बच्चों में हुब्बे-वतनी (देश-प्रेम) का जज़्बा और अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास पैदा करता है।
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❤️ سبق 10 : ٹپ تپوا (نثر)
यह कहानी एक बूढ़ी और उसके पोते के इर्द-गिर्द घूमती है जो बरसात की रात दादी से कहानी सुनने की ज़िद करता है। दादी छत से टपकते पानी (टप टीवा) से परेशान होकर कहती है कि उसे शेर या शेरनी से ज़्यादा ‘टप टीवा’ का डर है। इत्तिफ़ाक़ से एक शेर बरसात से बचने के लिए झोंपड़ी के पीछे छुपा हुआ था और यह सुनकर डर जाता है कि शायद ‘टप टीवा’ कोई बहुत बड़ा बला या जानवर है। दूसरी तरफ़, गाँव का एक धोबी अपने गुमशुदा गधे को तलाश करते हुए अँधेरे में उसी शेर को अपना गधा समझ लेता है। वह आऊ देखा न ताऊ शेर को डंडों से पीटता है और उसे कान से पकड़कर अपने घर ले आता है और खूँटे से बाँध देता है। शेर भी ‘टप टीवा’ के ख़ौफ़ से ख़ामोशी से धोबी के पीछे चला जाता है। सुबह जब गाँव वाले धोबी के घर के बाहर गधे की जगह शेर को बँधा हुआ देखते हैं तो उनकी आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। यह कहानी ग़लतफ़हमी और डर के दिलचस्प पहलू को उजागर करती है।
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❤️ سبق 11 : بھائی بھلکڑ (نظم)
यह पाठ एक नज़्म की सूरत में है जिसका उनवान (शीर्षक) ‘भाई भुलक्कड़’ है और इसे शान-उल-हक़ हक़ी ने लिखा है। नज़्म में एक ऐसे शख़्स की तस्वीर कशी की गई है जो बहुत ज़्यादा भूलने वाला है, इसलिए उसे ‘भाई भुलक्कड़’ कहा गया है। वह जहाँ भी जाता है, कुछ न कुछ भूल जाता है; अगर वह बस में सफ़र करता है तो अपना बिस्तर भूल जाता है, और अगर रेल में बैठता है तो अपने स्टेशन से चार स्टेशन आगे निकल जाता है। उसकी हालत यह है कि अगर टोपी पास होती है तो जूता ग़ायब होता है, और अगर जूता मिल जाए तो मोज़ा नहीं मिलता। वह प्याली में चमचा अलटा रखता है और कँगवी भी अलटी ही फेंकता है। यहाँ तक कि वह अपना पाजामा भी अलटा पहन लेता है। सोदा (सामान) ख़रीदते वक्त या तो वह पैसे देना भूल जाता है या फिर पैसे देकर चीज़ लेना भूल जाता है। नज़्म के आख़िर में मश्क़ें दी गई हैं जिनमें अल्फ़ाज़ के मानी, सवाल-जवाब और ख़ाली जगहें भरने की सरगर्मियाँ शामिल हैं। इसके साथ ही एक कहानी ‘किस दिन आएँ?’ भी दी गई है, जिसमें एक समझदार रंगरेज़ अदनान एक हासिद सीठ को अपनी ज़हानत (बुद्धि) से सबक सिखाता है जब वह उसे रंगाई के लिए नामुमकिन शर्त देता है।
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❤️ سبق 12 : بری صحبت (نظم)
यह कहानी फ़रहान नामी एक होनहार और ज़हीन लड़के के बारे में है जो अपने वालिदीन का फ़रमानबरदार था और बाक़ायदगी से स्कूल जाता था। ताहिम, एज़हर नामी एक लड़के की बुरी सोहबत (संगत) की वजह से उसके रवैये में तब्दीली आ गई और वह पढ़ाई में लापरवाह हो गया। उसके मास्टर साहिब ने इस तब्दीली को महसूस किया और उसके वालिद को मुत्तलिअ (सूचित) किया। फ़रहान की इस्लाह के लिए मास्टर साहिब ने एक अमली मिसाल का सहारा लिया। उन्होंने फ़रहान से कहा कि वह कुछ अच्छे आमों के साथ एक सड़ा हुआ आम अलमारी में रख दे। अगले दिन जब फ़रहान ने देखा तो सड़े हुए आम की वजह से दूसरे अच्छे आम भी ख़राब होना शुरू हो गए थे। इस मिसाल से मास्टर साहिब ने फ़रहान को समझाया कि जिस तरह एक ख़राब आम दूसरों को ख़राब कर देता है, उसी तरह बुरे लोगों की सोहबत इंसान को बगाड़ देती है। फ़रहान को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उसने बुरी सोहबत छोड़कर दोबारा एक अच्छा बच्चा बनने का वादा किया।
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❤️ سبق 13 : ابّو جان جب بچے تھے (نثر)
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❤️ سبق 14 : گاجر کی شادی (نظم)
यह नज़्म ‘गाजर की शादी’ के बारे में है जिसमें मुख़्तलिफ़ सब्ज़ियों को इंसानी रिश्तों और करदारों (किरदारों) के तौर पर पेश किया गया है। नज़्म में बताया गया है कि छोटी सी गाजर सुर्ख़ रंग के खूबसूरत कपड़े पहनकर अपने ससुराल जा रही है। इस शादी में आलू को भाई का साला, मूली को ख़ाला (मौसी), टमाटर को भाई, और भिंडी को मामानी (मौसी) के तौर पर दिखाया गया है। शलजम और टीठी कमर वाली लोकी नानी का करदार अदा कर रही हैं और सब गाजर की रुख़सती (विदाई) पर ग़मज़दा हैं। दूसरी तरफ़, काला कलौटा बैंगन दुल्हा बना हुआ है जिसके गले में फूलों का गजरा है। करेला ख़ुशी से नहीं समा रहा है और सबको शादी की मुबारकबाद दे रहा है। कद्दू मियाँ इनठे (फूले) हुए हैं और गोभी के सर पर बर्फ़ी का थाल है, जो शादी की ख़ुशियों को दोबाला कर रहा है। यह नज़्म बच्चों के लिए सब्ज़ियों के नाम और रिश्तों की पहचान का एक दिलचस्प ज़रिया है। नज़्म के आख़िर में मश्क़ी सवाल भी दिए गए हैं ताकि बच्चों की समझ-बूझ का अंदाज़ा लगाया जा सके।
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❤️ سبق 15 : مولانا مظہرالحق (نثر)
यह पाठ मौलाना मज़हर-उल-हक़ की ज़िंदगी और उनकी क़ौमी ख़िदमात पर मबनी है। उनकी पैदाइश 22 दिसंबर 1866 को बिहार के जिला पटना के गाँव बहपुरा में हुई। उन्होंने बैरिस्टरी की तालीम लंदन से हासिल की और वहीं ‘अंजुमन इस्लामिया’ की बुनियाद डालने वाले थे। वतन वापसी पर उन्होंने मुल्क की आज़ादी की तहरीक में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और गांधी जी के साथ मिलकर काम किया। मौलाना मज़हर-उल-हक़ हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद के अलमबरदार थे और उन्होंने सीवान में अपना घर ‘आशियाना’ तमीर कराया, जो गांधी जी और पंडित नेहरू जैसे बड़े रहनुमाओं का मर्कज़ रहा। उन्होंने पटना में ‘सदाकत आश्रम’ की बुनियाद डालने वाले और ‘दि मदरलैंड’ नामी अख़बार निकाला। उन्होंने बिहार नेशनल कॉलेज और बिहार विद्यापीठ के क़ियाम में अहम करदार अदा किया। उनकी ज़िंदगी सादगी, सदाक़त और ईसार (त्याग) का नमूना थी। 2 जनवरी 1930 को उनका इंतक़ाल हुआ, जो मुल्क के लिए एक बड़ा नुक़सान था। मौलाना मज़हर-उल-हक़ का नाम हिंदुस्तान की आज़ादी के सफ़-ए-अव्वल के मुजाहिदीन में हमेशा याद रखा जाएगा।
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❤️ سبق 16 : چوہے کی مزدوری (نثر)
यह कहानी एक ऐसे वक़्त की है जब ज़मीन पर धान आम नहीं था। एक शख़्स ने तालाब के दरमियान धान का पौधा देखा, लेकिन गहरे पानी की वजह से वहाँ तक पहुँचना नामुमकिन था। उसने एक चूहे से मदद माँगी और उससे धान की बालियाँ लाने के बदले मज़दूरी देने का वादा किया। चूहा तैरकर गया और सारी बालियाँ किनारे पर ले आया। जब आदमी ने उसे मज़दूरी लेने को कहा, तो चूहे ने अपनी छोटी जिस्मत और छोटे सर का हवाला देते हुए कहा कि वह यह बोझ उठाकर नहीं ले जा सकता। उसने मशविरा दिया कि आदमी सारा धान अपने घर ले जाए और चूहा वहीं आकर अपने हिस्से का धान खा लिया करेगा। तभी से चूहा इंसानों के घरों में रहकर अपना हिस्सा खाता आ रहा है। यह पाठ मेहनत और बाहमी तआवुन (सहयोग) की एक दिलचस्प लोक कहानी है जो बच्चों को आसान ज़बान में समझाई गई है।
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❤️ سبق 17 : کمپیوٹر (نثر)
इस पाठ में कंप्यूटर की अहमियत और उसके बुनियादी हिस्सों के बारे में बताया गया है। कहानी का आगाज़ स्कूल के प्रिंसिपल साहिब की एक ख़ुशख़बरी से होता है, जिन्होंने बच्चों को स्कूल में तैयार किए गए नए कंप्यूटर रूम के बारे में बताया। बच्चे अपनी टीचर के साथ कंप्यूटर लैब गए, जहाँ उन्हें मालूम हुआ कि कंप्यूटर के चार अहम हिस्से होते हैं: मॉनिटर, सी॰पी॰यू॰, की-बोर्ड और माउस। टीचर ने वज़ाहत (स्पष्टता) की कि सी॰पी॰यू॰ (C.P.U.) कंप्यूटर का दिमाग़ कहलाता है। यह भी बताया गया कि कंप्यूटर ख़ुद कुछ नहीं कर सकता जब तक कि उसमें मालूमात (जानकारी) दाख़िल न की जाएँ। कंप्यूटर के ज़रीए उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी, हिसाब और साइंस जैसे मज़ामीन (विषय) आसानी से पढ़े जा सकते हैं। इसके अलावा बच्चे इस पर मुख़्तलिफ़ खेल भी खेल सकते हैं और दुनिया भर की मालूमात हासिल कर सकते हैं। कंप्यूटर लैब का दौरा करने और इस नई तकनीक के बारे में जानकर तालिबे इल्म बहुत ख़ुश और पुरसुकून नज़र आए। यह पाठ बच्चों को जदीद तालीमी वसाइल (शिक्षा साधन) से मुत्ताअरिफ़ कराने की एक बेहतरीन कोशिश है।
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❤️ سبق 18 : اٹھ باندھ کمر کیوں ڈرتا ہے (نثر)
यह किताब उर्दू ज़बान की दरसी किताब ‘गुलशन-ए-उर्दू’ का हिस्सा मालूम होती है जिसका आगाज़ नज़्म ‘उठ बाँध कमर क्यों डरता है?’ से होता है। इस नज़्म के शायर मुहम्मद फ़ारूक़ दीवाना हैं जिन्होंने इसके ज़रीए बच्चों को हिम्मत, मेहनत और वक़्त की क़द्र करने का दर्स दिया है। शायर का कहना है कि जो शख़्स वक़्त ज़ाए करता है वह आख़िरकार पछताता है, जबकि कोशिश करने वाले ही कामयाबी हासिल करते हैं। नज़्म में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि इंसान को ग़फ़लत (लापरवाही) की नींद से बेदार होकर अपने मक़ासिद (लक्ष्य) के लिए कमर बाँध लेना चाहिए क्योंकि हिम्मत और अज़्मे-सँगीन (दृढ़ संकल्प) से मुश्किल तरीन काम (पत्थर को पानी करना) भी आसान हो जाता है। किताब में मुज़ीद मश्क़ें दी गई हैं जिनमें अल्फ़ाज़ के मानी और सवाल व जवाब शामिल हैं ताकि तालिबे इल्म नज़्म के पैग़ाम को बेहतर तरीक़े से समझ सकें। इसके अलावा इस हिस्से में अलामा इक़बाल का मशहूर ‘तराना-ए-हिंदी’ (सारे जहाँ से अच्छा), ‘वंदे मातरम’ और भारत का ‘क़ौमी तराना’ भी शामिल है जो बच्चों में हुब्बे-वतनी और क़ौमी यकजहती का जज़्बा पैदा करने के लिए मुन्तख़ब किए गए हैं। यह मवाद (सामग्री) तीसरी जमाअत (कक्षा) के तालिबे इल्म के लिए तालीमी और अख़लाक़ी लिहाज़ से निहायत मौज़ूँ (उपयुक्त) हैं।
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