Bihar Board 9th History 2026 PDF Download
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BSEB Class 9 History (इतिहास की दुनिया) Book PDF Free Download
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❤️ प्रस्तावना
यह पुस्तक ‘इतिहास की दुनिया’ बिहार राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT) द्वारा कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए विकसित की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को इतिहास के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं और वैश्विक घटनाओं से परिचित कराना है।
पुस्तक की सामग्री राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2006 के सिद्धांतों पर आधारित है, जो रटंत प्रणाली के स्थान पर समझ विकसित करने और स्कूली ज्ञान को बाहरी जीवन से जोड़ने पर बल देती है। विषय-सूची के अनुसार, इस पुस्तक में कुल आठ अध्याय शामिल हैं जो विश्व इतिहास के प्रमुख पड़ावों को कवर करते हैं।
इनमें ‘भौगोलिक खोजें’, ‘अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम’, ‘फ्रांस की क्रांति’ और ‘विश्व युद्धों का इतिहास’ जैसे महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इसके अतिरिक्त ‘नाजीवाद’, ‘वन्य समाज और उपनिवेशवाद’, ‘शान्ति के प्रयास’ तथा ‘कृषि और खेतिहर समाज’ के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
यह पाठ्यपुस्तक छात्रों में ऐतिहासिक अवयवों की सटीक समझ विकसित करने और उन्हें बुनियादी ऐतिहासिक प्रश्नों की व्याख्या करने में सक्षम बनाने का प्रयास करती है।
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❤️ अध्याय 1: भौगोलिक खोजें
यह अध्याय ‘भौगोलिक खोजें’ विश्व इतिहास की उन महत्वपूर्ण समुद्री यात्राओं और खोजों का विवरण प्रस्तुत करता है जिन्होंने आधुनिक युग की नींव रखी। मध्यकाल के अंत में यूरोप में वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक परिवर्तनों ने इन खोजों की पृष्ठभूमि तैयार की। 1453 ईस्वी में कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों के अधिकार के बाद, यूरोपियनों के लिए एशिया के साथ व्यापार हेतु नए मार्गों की तलाश अनिवार्य हो गई।
इस दिशा में पुर्तगाल और स्पेन ने अग्रणी भूमिका निभाई। प्रमुख उपलब्धियों में 1492 में कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज और 1498 में वास्कोडिगामा द्वारा भारत पहुँचने के समुद्री मार्ग की खोज शामिल है। इन यात्राओं में दिशासूचक यंत्र (कम्पास), एस्ट्रोलोब और ‘कैरावल’ जैसे तेज चलने वाले जहाजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
इन खोजों के परिणामस्वरूप विश्व के विभिन्न देशों के बीच संपर्क स्थापित हुआ और व्यापार-वाणिज्य में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। हालांकि, इसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी निकले, जैसे कि उपनिवेशवाद का उदय और अमानवीय दास-प्रथा का विस्तार। अंततः, भौगोलिक खोजों ने अंधविश्वासों को तोड़कर वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया और विश्व का यूरोपीयकरण करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
यह कालखंड वैश्विक सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान के एक नए युग का साक्षी बना।
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❤️ अध्याय 2: अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-1783) विश्व इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और युगान्तकारी घटना है। इस अध्याय में उन कारणों और परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिन्होंने अमेरिका के 13 उपनिवेशों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। इसका मुख्य कारण उपनिवेशों में राजनीतिक स्वायत्तता का अभाव, भौगोलिक दूरी, और ब्रिटिश सरकार की प्रगति विरोधी आर्थिक नीतियां थीं।
सप्तवर्षीय युद्ध के बाद फ्रांस के भय से मुक्ति और ‘स्टांप एक्ट’ जैसे दमनकारी करों ने असंतोष को और बढ़ा दिया। थॉमस पेन और जैफर्सन जैसे विचारकों ने स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित किया। ‘बोस्टन टी पार्टी’ की घटना इस संग्राम का तात्कालिक कारण बनी।
जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने ब्रिटिश सेना को पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप 1783 में पेरिस की संधि द्वारा अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। इस युद्ध के बाद 1789 में अमेरिका में विश्व का पहला लिखित संविधान लागू हुआ, जिसने शक्ति पृथक्करण, धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों को स्थापित किया। इस क्रांति ने न केवल ब्रिटेन के वर्चस्व को चुनौती दी, बल्कि फ्रांस की राज्यक्रांति और दुनिया भर के अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए एक प्रेरणा स्रोत के रूप में कार्य किया।
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❤️ अध्याय 3: फ्रांस की क्रांति
यह अध्याय 1789 की फ्रांसीसी क्रांति का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसे यूरोपीय इतिहास की एक युगान्तकारी घटना माना गया है। क्रांति के प्रमुख कारणों में लुई XVI का निरंकुश और अयोग्य शासन, अत्यधिक करों का बोझ और सामाजिक असमानता शामिल थी। फ्रांसीसी समाज तीन श्रेणियों (एस्टेट्स) में बँटा था, जिसमें पादरी और कुलीन वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त थे, जबकि मध्यम वर्ग और किसान शोषण के शिकार थे।
मांटेस्क्यू, वॉल्टेयर और रूसो जैसे दार्शनिकों के विचारों ने जनता में चेतना जगाई। क्रांति की शुरुआत 5 मई 1789 को ‘स्टेट्स जनरल’ की बैठक के साथ हुई, जिसके बाद टेनिस कोर्ट की शपथ और 14 जुलाई को बैस्टिल के पतन ने राजतंत्र की नींव हिला दी। इसके परिणामस्वरूप ‘मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा’ की गई और संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई।
रॉब्सपियर के ‘आतंक के राज्य’ और लुई XVI की फाँसी ने क्रांति को और उग्र बना दिया। अंततः, इस क्रांति ने सामंतवाद का अंत किया और ‘स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व’ के सिद्धांतों को जन्म दिया। इसका प्रभाव न केवल फ्रांस पर, बल्कि इटली, जर्मनी और इंग्लैंड जैसे देशों के एकीकरण और लोकतांत्रिक सुधारों पर भी गहरा पड़ा।
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❤️ अध्याय 4: विश्व युद्धों का इतिहास
यह अध्याय प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों, घटनाओं और परिणामों का विस्तृत विश्लेषण करता है। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के पीछे साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, उग्र राष्ट्रवाद, सैन्यवाद और गुटबंदी प्रमुख कारण थे। युद्ध की शुरुआत ऑस्ट्रिया के राजकुमार फर्डिनेण्ड की हत्या से हुई, जिसने वैश्विक शक्तियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया।
अंततः 1919 की वर्साय की संधि ने जर्मनी पर कठोर शर्तें थोपीं, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बीज बोए। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ शुरू हुआ। हिटलर और मुसोलिनी की विस्तारवादी नीतियों, राष्ट्रसंघ की विफलता और आर्थिक मंदी ने इस युद्ध को अपरिहार्य बना दिया।
यह इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध था, जिसमें परमाणु बमों का प्रयोग हुआ और करोड़ों लोग मारे गए। युद्ध के परिणामस्वरुप यूरोपीय प्रभुत्व का अंत हुआ और संयुक्त राज्य अमेरिका व सोवियत रूस महाशक्तियों के रूप में उभरे। अंततः विश्व शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई।
यह अध्याय स्पष्ट करता है कि कैसे संधियों की विसंगतियों और शक्ति के संघर्ष ने पूरी दुनिया को दो भयानक युद्धों की आग में झोंक दिया।
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❤️ अध्याय 5: नाजीवाद
यह अध्याय यूरोप में दो विश्व युद्धों के बीच उत्पन्न विनाशकारी तानाशाह विचारधारा ‘नाजीवाद’ और एडोल्फ हिटलर के उत्कर्ष का विश्लेषण करता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हार, वाइमर गणतंत्र की विफलता और वर्साय की अपमानजनक संधि ने हिटलर के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।
नाजीवाद एक उग्र राष्ट्रवादी और सर्वसत्तावादी विचारधारा थी, जिसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दमन कर राज्य की सर्वोपरिता पर बल दिया। हिटलर ने जर्मन जनता को राष्ट्र के गौरव की पुनर्स्थापना और आर्थिक संकट से मुक्ति का आश्वासन देकर सत्ता हासिल की।
सत्ता में आते ही उसने विपक्षी दलों का सफाया किया, प्रेस पर प्रतिबंध लगाया और गुप्तचर पुलिस ‘गेस्टापों’ के माध्यम से आतंक स्थापित किया। हिटलर की विदेश नीति वर्साय संधि को तोड़ने, सैन्य शक्ति बढ़ाने और साम्राज्य विस्तार पर केंद्रित थी, जिसके कारण अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई।
अध्याय यह भी स्पष्ट करता है कि कैसे नाजीवाद ने लोकतंत्र का विरोध कर एक क्रूर तानाशाही की स्थापना की, जिसका अंत 1945 में हिटलर की आत्महत्या और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के साथ हुआ।
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❤️ अध्याय 6: वन्य समाज और उपनिवेशवाद
यह अध्याय भारत के वन्य समाज और उन पर औपनिवेशिक शासन के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण करता है। भारत में वन संपदा हमेशा से एक महत्वपूर्ण संसाधन रही है, जहाँ विभिन्न जनजातियाँ जैसे भील, गोंड, संथाल और मुंडा निवास करती हैं। इन आदिवासियों का वनों के साथ एक गहरा सहजीवी और सांस्कृतिक संबंध रहा है।
अठारहवीं शताब्दी के अंत तक, ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने इनके पारंपरिक जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू किया। अंग्रेजों ने वन अधिनियमों के माध्यम से वनों पर नियंत्रण किया, झूम खेती पर रोक लगाई और भारी लगान वसूलना शुरू किया। इसके साथ ही ईसाई मिशनरियों के आगमन ने उनकी धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया।
इन शोषणकारी नीतियों, महाजनों और जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ जनजातियों ने हथियार उठाए। अध्याय में तिलका मांझी के नेतृत्व में पहाड़िया विद्रोह, सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में संथाल विद्रोह, और बिरसा मुंडा के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह जैसे प्रमुख आंदोलनों का वर्णन है। यद्यपि ये विद्रोह तत्कालीन रूप से कुचल दिए गए, लेकिन इन्होंने भविष्य के स्वतंत्रता संग्राम और जनजातीय सुधारों की नींव रखी।
अंततः, स्वतंत्र भारत में संविधान की धारा 342 के तहत उन्हें विशेष दर्जा दिया गया और उनकी मांगों के फलस्वरूप झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्यों का गठन हुआ।
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❤️ अध्याय 7: शांति के प्रयास
यह अध्याय प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व शांति स्थापित करने के लिए किए गए प्रयासों, विशेष रूप से ‘राष्ट्रसंघ’ (League of Nations) और ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ (United Nations Organization) की स्थापना, उनकी कार्यप्रणाली, सफलताओं और असफलताओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। राष्ट्रसंघ की स्थापना 1920 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन के ’14 सूत्री’ प्रस्तावों के आधार पर हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना था।
हालाँकि, अमेरिका की अनुपस्थिति, शक्तिशाली राष्ट्रों की आक्रामक नीतियां और एक प्रभावी सैन्य बल की कमी के कारण यह संस्था द्वितीय विश्व युद्ध को रोकने में असफल रही। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद, 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्रसंघ अस्तित्व में आया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रसंघ की कमियों को दूर कर एक अधिक शक्तिशाली मंच प्रदान करना था।
इसमें महासभा, सुरक्षा परिषद्, और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण अंग शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र ने कई क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किए हैं।
अध्याय यह निष्कर्ष निकालता है कि यद्यपि दोनों संस्थाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन वैश्विक सहयोग और शांति की दिशा में इनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है और आज भी प्रासंगिक है।
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❤️ अध्याय 8: कृषि और खेतीहर और समाज
यह अध्याय भारतीय और विशेष रूप से बिहार की कृषि व्यवस्था और खेतिहर समाज का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। कृषि, जो लैटिन शब्द ‘एग्रोस’ और ‘कल्चर’ से बना है, भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जहाँ लगभग 51% भूमि कृषि योग्य है और दो-तिहाई जनसंख्या इस पर निर्भर है। बिहार में तो 80% आबादी अपनी जीविका के लिए कृषि पर आश्रित है।
अध्याय में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक के कृषि विकास को दर्शाया गया है। यहाँ फसलों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है: भदई, अगहनी, रबी और गरमा। मुख्य फसलों में धान, गेहूँ और मक्का शामिल हैं, जबकि गन्ना और लीची जैसी नकदी फसलें अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती हैं।
बिहार की कृषि को ‘मानसून के साथ जुआ’ कहा जाता है क्योंकि यह अत्यधिक वर्षा पर निर्भर है। पाठ में पारंपरिक खेती, झूम खेती और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों जैसे हरित क्रांति, फसल चक्र और गहन खेती के महत्व को समझाया गया है। अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी सुधार और कृषि को उद्योग का दर्जा देकर ही किसानों की दयनीय स्थिति में सुधार और सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है।
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Hii
hey @Sunny, how can I help you?
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hlo sir kya hum isme ek book ko download nhi kr sakte
hey @Anmol, you can download every book on this page