Bihar Board 8th Urdu Book 2026 PDF Download (اردو)
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BSEB Class 8 Urdu (اردو) Textbook PDF Free Download
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❤️ Preface
यह किताब ‘फ़रोज़ां हिस्सा-3’ बिहार राज्य के आठवीं कक्षा के छात्रों के लिए उर्दू की एक व्यापक पाठ्यपुस्तक है, जिसे राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) पटना ने तैयार किया है। इस किताब का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) और बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2008) के ठीक मुताबिक बच्चों को रटने की आदत से मुक्ति दिलाना और शिक्षा को उनके व्यावहारिक जीवन से जोड़ना है। किताब में हम्द, नात, लेख, नज़्में, ड्रामे और जीवनियों जैसे विभिन्न विषय शामिल किए गए हैं। इसमें सर सैयद अहमद खान, अल्लामा इकबाल, नज़ीर अकबराबादी और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी महान हस्तियों की रचनाएँ शामिल हैं, जो छात्रों की रुचि और मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर चुनी गई हैं। इसके अलावा किताब में उर्दू भाषा का महत्व, शैक्षिक व प्रशिक्षण संबंधी लेख, और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा जैसे ज्ञानवर्धक अध्याय भी शामिल हैं ताकि छात्रों में भाषा के बुनियादी कौशल के साथ-साथ नैतिक और सामाजिक चेतना भी जागृत हो। यह किताब शिक्षकों, शिक्षाविदों और लेखकों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है ताकि उर्दू भाषा और साहित्य के माध्यम से बच्चों की छिपी हुई रचनात्मक क्षमताओं को निखारा जा सके।
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❤️ سبق 1 : حمد (عنایت رحمان کی )
यह किताब का पहला पाठ है जिसका शीर्षक ‘बनाम खुदा हमने की इब्तिदा’ है। यह एक हम्द है जिसमें अल्लाह तआला की सिफ़ात (गुणों) और उसकी नेमतों का ज़िक्र बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में किया गया है। शायर मसूद अज़ीम आबादी ने इस नज़्म में अल्लाह को रहमान और मेहरबान बताते हुए कहा है कि उसी ने इंसान को पैदा किया, उसे बोलना सिखाया और कुरान की शिक्षा दी। नज़्म में कायनात के विभिन्न दृश्यों जैसे सूरज, चाँद, पेड़ और फूलों का ज़िक्र है जो अल्लाह की बड़ाई बयां करते हैं। शायर कहता है कि आसमान को बुलंद करने और इंसाफ के लिए तराज़ू बनाने वाला भी वही है, इसलिए हमें नाप-तौल में ईमानदारी से काम लेना चाहिए। ज़मीन पर मौजूद फल, अनाज और खुशबूदार फूल सब उसी रब की देन हैं, जिनसे हमें उसकी कुदरत का एहसास होता है। आखिर में सूरह रहमान के हवाले से इंसान को संबोधित किया गया है कि वह अपने रब की किन-किन नेमतों को झुठलाएगा। नज़्म के बाद अभ्यास में मुश्किल शब्दों के अर्थ, वस्तुनिष्ठ प्रश्न, एकवचन-बहुवचन और व्याकरण के हवाले से ‘इस्मे ज़र्फ’ की व्याख्या भी शामिल की गई है।
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❤️ سبق 2 : نعت
यह पाठ एक हम्दिया या नातिया नज़्म पर आधारित है जिसमें शायर (इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी) ने हुज़ूर (स.अ.व.) की सिफ़ात और उनकी रहमत का ज़िक्र किया है। नज़्म के मुताबिक, उनके आने और महक से दिलों की कलियाँ खिल जाती हैं और जिस रास्ते से वो गुज़रते हैं, वहां की गलियाँ महक उठती हैं। जब उनकी रहमत भरी नज़रें उठती हैं, तो वो जलते हुए ग़मों को बुझा देते हैं और रोने वालों को हंसा देते हैं। शायर अपनी कैफियत बयां करते हुए कहता है कि उनकी याद ग़मों को भुला देती है और उनकी शफ़ाअत (सिफारिश) से ही जहन्नम की आग ठंडी होगी। नज़्म में यह पैगाम दिया गया है कि इंसान अपनी ज़िन्दगी की कश्ती को उनके हवाले कर दे क्योंकि वही हकीकी मददगार हैं। नज़्म के आखिर में मुश्किल अल्फ़ाज़ के मानी भी दिए गए हैं जैसे ‘गुंचे’ का मतलब कलियाँ, ‘कूचे’ का मतलब गलियाँ और ‘आज़ार’ का मतलब तकलीफ बताया गया है। यह कलाम अकीदत और मुहब्बत-ए-रसूल का बेहतरीन नमूना है, जिसमें शायर ने अपनी बेबसी और आका की रहमत का तज़्किरा निहायत खूबसूरत अंदाज़ में किया है।
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❤️ سبق 3 : اردو زبان
यह पाठ ‘उर्दू ज़बान’ के इतिहास, विकास और उसकी विशेषताओं पर रोशनी डालता है। लेखक मौलवी अब्दुल हक के अनुसार, उर्दू एक आधुनिक और तेज़ी से तरक्की करती हुई भाषा है जो किसी का आविष्कार नहीं बल्कि प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत पैदा हुई है। इसकी शुरुआत उस वक़्त हुई जब हिंदुस्तान में मुसलमानों का आगमन हुआ और स्थानीय लोगों के साथ उनका मेल-जोल बढ़ा। यह भाषा हिंदी, फारसी और अरबी के हसीन संगम से वजूद में आई है। लफ्ज़ ‘उर्दू’ के मानी ‘लश्कर’ के हैं, क्योंकि शुरुआत में यह एक मिली-जुली लश्करी भाषा थी। वक़्त के साथ-साथ, खास तौर पर मुग़लिया सल्तनत के आखिरी दौर में, शायरों और साहित्यकारों ने इसे निखारा और संवारा। उर्दू की बुनियाद हिंदी प्राकृत पर है, जबकि इसके संज्ञा और विशेषणों में फारसी, अरबी और अब अंग्रेजी के शब्द भी शामिल हो चुके हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी स्पष्टता, सहजता और मिठास है, जिसकी वजह से यह आज न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि वैश्विक स्तर पर एक लोकप्रिय भाषा बन चुकी है। यह पाठ इस बात पर जोर देता है कि उर्दू अपनी लचक और विस्तार की बदौलत एक रोशन मुस्तकबिल (भविष्य) रखती है।
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❤️ سبق 4 : تعلیم و تربیت
इस पाठ में सर सैयद अहमद खान ने शिक्षा (तालीम) और परवरिश (तरबियत) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, तालीम का मतलब इंसान की अंदरूनी सलाहियतों (क्षमताओं) को जगाना और उनको निखारना है, जबकि तरबियत का मकसद इंसान को व्यावहारिक जीवन के लिए तैयार करना और उससे काम लेना है। लेखक की नज़र में सिर्फ किताबें पढ़ लेना तालीम नहीं है, बल्कि ऐसी शिक्षा की ज़रुरत है जो इंसान के दिल के दरवाजे खोल दे और उसकी रूहानी ताकतों को तरोताज़ा करे। अगर तालीम से अंदरूनी ताकतें बेदार न हों तो वह ज्ञान इंसान पर बोझ बन जाता है और उसे घमंडी बना देता है। वे कहते हैं कि हमारे समाज में खराबी की असल वजह यह है कि हमने तरबियत को ही सब कुछ समझ लिया है और अपने असली अंदरूनी सुधार (तालीम) को भुला दिया है। एक मुकम्मल इंसान बनने के लिए तालीम और तरबियत दोनों का होना लाज़िमी है। सच्ची तालीम वही है जो इंसान के अख़लाक़ और किरदार को बेहतर बनाए और उसके बातिनी (आंतरिक) चश्मों को जारी करे। सर सैयद हमें ऐसी तालीम हासिल करने की सलाह देते हैं जो हमारी ज़िन्दगी को हर लिहाज़ से हरा-भरा और खुशहाल कर दे।
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❤️ سبق 5 : دنیا (نظم)
यह पाठ नज़ीर अकबराबादी की मशहूर नज़्म ‘दुनिया’ पर आधारित है, जिसमें शायर ने दुनिया की हकीकत और इंसानी आमाल (कर्मों) के नतीजों को बहुत ही सरल और आम फहम भाषा में बयान किया है। नज़्म का केंद्रीय विचार यह है कि यह दुनिया एक ऐसी बस्ती है जहाँ हर काम का बदला तुरंत मिलता है, यानी ‘इस हाथ करो उस हाथ मिले’। अगर कोई किसी के साथ भलाई करता है या किसी का सम्मान करता है, तो उसे भी बदले में एहसान और इज़्ज़त मिलती है। इसके विपरीत, दूसरों को नुकसान पहुँचाने या किसी गरीब पर ज़ुल्म करने वाले को खुद भी वैसे ही अंजाम का सामना करना पड़ता है। नज़ीर अकबराबादी को उर्दू नज़्म का ‘बाबा-ए-आदम’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने रिवायती दरबारी शायरी से हटकर आम ज़िंदगी, मेलों, त्योहारों और आम लोगों के मुद्दों को अपनी शायरी का विषय बनाया। उनकी शायरी ख्याली उड़ान के बजाय हकीकी ज़िंदगी की सच्ची तस्वीर पेश करती है। पाठ में मुज़ाफ़, मुज़ाफ़-अलैह और काफीया जैसी व्याकरणिक शब्दावली की व्याख्या भी की गई है ताकि छात्र भाषा और बयान की बारीकियों को समझ सकें। सार यह है कि यह नज़्म इंसान को न्याय, नैतिकता और अच्छे व्यवहार की प्रेरणा देती है, यह बताते हुए कि यहाँ हर पल कुदरत की अदालत लगी हुई है।
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❤️ سبق 6 : نصیحت (کہانی)
यह पाठ ‘नसीहत’, अज़हर नाम के एक होनहार लड़के की कहानी है जिसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। वह अक्सर स्कूल से गायब रहता और गलत संगत में पड़कर खेल-कूद और बगीचों से फल चुराने में वक़्त बर्बाद करता था। एक दिन लीची चुराते हुए वह पकड़ा गया और माली से मार खाई। ज़ख्मी हालत में उसे अपना पुराना और मेहनती दोस्त शिबली मिला, जो उसे अपने घर ले गया। शिबली की नेक दिल माँ ने अज़हर को प्यार से समझाया कि बुरी संगत और चोरी गुनाह है और शिक्षा के बिना इंसान कामयाब नहीं हो सकता। उन्होंने उसे नसीहत की कि अगर वह मेहनत करेगा तो एक इज़्ज़तदार इंसान बनेगा। अज़हर पर उनकी बातों का गहरा असर हुआ और उसने अपने सुधार का वादा किया। उसने जी लगाकर पढ़ाई शुरू की और आखिरकार एक बड़ा डॉक्टर बनकर अपने माता-पिता का नाम रोशन किया। यह कहानी हमें यह सबक देती है कि अच्छी संगत और बड़ों की नसीहत पर अमल करके ही इंसान ज़िंदगी में कामयाबी हासिल कर सकता है और मुल्क व कौम की सेवा कर सकता है।
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❤️ سبق 7 : مجاہد آزادی ڈاکٹر سید محمود (مضمون
यह अध्याय स्वतंत्रता सेनानी डॉ. सैयद महमूद के जीवन और उनकी राजनीतिक व शैक्षिक सेवाओं को कवर करता है। डॉ. सैयद महमूद 1889 में ग़ाज़ीपुर में पैदा हुए और जौनपुर, बनारस व अलीगढ़ से शिक्षा हासिल की। अलीगढ़ में रहने के दौरान उनमें राजनीतिक चेतना जागी और उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्होंने इंग्लैंड और जर्मनी से उच्च शिक्षा और पीएचडी की डिग्री हासिल की। वतन वापसी पर उन्होंने पटना हाई कोर्ट में वकालत शुरू की और मौलाना मजहरुल हक़ के मार्गदर्शन में राजनीतिक मैदान में कदम रखा। वे ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी रहे और ख़िलाफ़त आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई। 1937 में वे बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए और शिक्षा मंत्री के तौर पर बहुमूल्य सेवाएँ दीं, जिनमें प्राथमिक शिक्षा का विकास और उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति शामिल है। वे एक बेहतरीन इतिहासकार और लेखक भी थे, जिनकी रचनाओं में ‘ख़िलाफ़त और हिंदुस्तान’ प्रमुख है। आधुनिक भारत के निर्माण में उनका योगदान कभी न भुलाने योग्य है। उनका निधन 1971 में दिल्ली में हुआ।
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❤️ سبق 8 : نواے جرس (نظم)
यह पाठ अल्लामा जमील मज़हरी की एक जोश दिलाने वाली नज़्म ‘बढ़े चलो’ पर आधारित है, जो देशभक्ति और दृढ़ संकल्प के जज़्बे से भरपूर है। शायर इस नज़्म में खास तौर पर नौजवानों को संबोधित करते हुए उन्हें मुल्क और कौम की खातिर आगे बढ़ने और हिम्मत न हारने की प्रेरणा देता है। वह नौजवानों को ‘बुज़ुर्ग दुनिया’ के लिए ‘हमेशा रहने वाली जवानी’ करार देता है और उनके बुलंद हौसलों की तारीफ करता है। नज़्म में आज़ादी के मुजाहिदों की कुर्बानियों का ज़िक्र करते हुए यह पैगाम दिया गया है कि वफ़ा की राह में कितनी ही मुश्किलें, कांटे या सूली ही क्यों न हों, कदम पीछे नहीं हटने चाहिए। अल्लामा जमील मज़हरी बिहार के एक नामचीन शायर थे जिनकी शायरी में विषयगत नज़्में, हम्द, नात और कसीदे बहुतायत में मिलते हैं। उनके शायरी संग्रह जैसे ‘फिक्र-ए-जमील’ और ‘अक्स-ए-जमील’ उर्दू साहित्य का अहम हिस्सा हैं। यह सबक छात्रों में देशभक्ति का जज़्बा पैदा करने और उन्हें ज़िंदगी की चुनौतियों का डटकर मुकाबला करने के लिए तैयार करने की एक बेहतरीन कोशिश है। नज़्म के साथ मुश्किल शब्दों के अर्थ, वस्तुनिष्ठ और संक्षिप्त प्रश्न और व्याकरण (मिश्रित क्रिया) के अभ्यास भी दिए गए हैं ताकि पाठ को समझने में आसानी हो।
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❤️ سبق 9 : جہانگیر کا انصاف (ڈرامہ
यह पाठ एक ड्रामे (नाटक) के रूप में है जिसमें मुग़ल बादशाह जहाँगीर के न्याय-प्रेम को पेश किया गया है। नाटक की शुरुआत शाही दरबार से होती है जहाँ एक परेशान फ़रियादी औरत इंसाफ के लिए हाज़िर होती है। वह बताती है कि महल से चलाए गए एक तीर ने उसके पति की जान ले ली है। जाँच करने पर मालूम होता है कि वह तीर मलिका नूरजहाँ ने चलाया था। जहाँगीर, जो अपने न्याय के लिए मशहूर थे, मलिका को एक आम अपराधी की तरह दरबार में पेश करने का हुक्म देते हैं। जब नूरजहाँ अपने जुर्म का इकरार करती है, तो बादशाह इंसाफ का तकाज़ा पूरा करने के लिए फ़रियादी औरत को तलवार देते हुए अपना सर पेश कर देते हैं ताकि वह अपने सुहाग का बदला ले सके। हालाँकि, वह औरत बादशाह की न्याय-प्रियता से प्रभावित होकर मलिका को माफ़ कर देती है। जहाँगीर उस औरत को अपनी बहन करार देते हैं और उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाते हैं। यह ड्रामा सबक देता है कि इंसाफ की नज़र में बादशाह और प्रजा बराबर हैं और एक सच्चा न्यायधीश कभी भी निजी रिश्तों को न्याय की राह में नहीं आने देता। इसमें भारतीय नारी के त्याग और माफ़ी के जज़्बे को भी सराहा गया है।
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❤️ سبق 10 : جاوید کے نام (ڈرامہ)
यह नज़्म ‘जावेद के नाम’ डॉ. सर मुहम्मद इकबाल की एक मशहूर रचना है जो उनके काव्य संग्रह ‘ज़र्ब-ए-कलीम’ से ली गई है। इस नज़्म में अल्लामा इकबाल अपने बेटे जावेद इकबाल के ज़रिए नई पीढ़ी को खुद-आगाही (Self-realization), स्वाभिमान और खुद्दारी का पैगाम देते हैं। वह नौजवानों को नसीहत करते हैं कि वे इश्क की दुनिया में अपना एक अलग मकाम बनाएँ और पुरानी रवायतों के बजाय नए ज़माने और नई सुबह-ओ-शाम का निर्माण करें। इकबाल प्रकृति को समझने पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि अगर इंसान के पास अंतर्दृष्टि हो तो वह कायनात के खामोश नज़ारों जैसे फूल और कलियों से भी गुफ्तगू कर सकता है। वह पश्चिमी सभ्यता की नक़ल और उनके एहसान तले दबने के बजाय अपनी पहचान खुद बनाने का पाठ पढ़ाते हैं। नज़्म के आखिरी शेरों में इकबाल अपने जीवन के तरीके को अमीरी के बजाय फकीरी (सादगी) करार देते हैं और सलाह देते हैं कि गरीबी में भी अपनी खुद्दारी (आत्मसम्मान) को कभी नहीं बेचना चाहिए, बल्कि उसी हाल में रहकर इज़्ज़त और नाम पैदा करना चाहिए। यह कलाम नौजवानों में हरकत, अमल और आत्मनिर्भरता का जज़्बा पैदा करने के लिए एक बेहतरीन शाहकार है।
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❤️ سبق 11 : عاصم بہاری اور انکے کارنامے (سوانح)
यह पाठ महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक मौलवी अली हुसैन ‘आसिम बिहारी’ के जीवन और उनकी सामाजिक व राजनीतिक सेवाओं पर आधारित है। आसिम बिहारी 1889 में बिहार शरीफ के एक गरीब बुनकर परिवार में पैदा हुए। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा पिछड़े वर्गों, विशेषकर बुनकरों (मोमिन अंसार) की आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक चेतना जगाने के लिए वक़्फ़ (समर्पित) कर दिया। उन्होंने ‘तारीख-उल-मिनवाल’ नाम का अखबार निकाला और ‘ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस’ जैसा मज़बूत संगठन कायम किया जिसने आज़ादी के आंदोलन को आम लोगों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। आसिम बिहारी महात्मा गांधी के आंदोलनों से प्रभावित थे और उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा करके गरीब जनता में आज़ादी का जज़्बा पैदा किया। उनका मानना था कि शिक्षा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे पिछड़े तबके की तकदीर बदल सकती है, इसी लिए उन्होंने कई स्कूल और मदरसे कायम किए। आर्थिक तंगी और बीमारी के बावजूद वे मरते दम तक कौम की रहनुमाई करते रहे। उनका इंतकाल 1953 में इलाहाबाद में हुआ। यह पाठ हमें उनकी निस्वार्थ कुर्बानियों और देशप्रेम से परिचित कराता है।
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❤️ سبق 12 : حاجی بیگم (مضمون)
यह किताब प्राथमिक स्कूल के छात्रों के लिए कंप्यूटर विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के मूल सिद्धांतों को समझने के लिए एक व्यापक गाइड के रूप में कार्य करती है। यह कंप्यूटर के इतिहास को पेश करते हुए शुरू होती है, जिसमें वैक्यूम ट्यूब से लेकर आधुनिक माइक्रोप्रोसेसरों तक की विभिन्न पीढ़ियों का विवरण दिया गया है।
पाठ एक कंप्यूटर सिस्टम के आवश्यक घटकों की व्याख्या करता है, जिसमें हार्डवेयर (जैसे सीपीयू, मॉनिटर और कीबोर्ड) और सॉफ्टवेयर (ऑपरेटिंग सिस्टम और एप्लिकेशन प्रोग्राम सहित) के बीच अंतर बताया गया है। छात्रों को विंडोज वातावरण से परिचित कराया जाता है, जिससे वे फाइल, फोल्डर और डेस्कटॉप आइकन को प्रबंधित करना सीखते हैं।
किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माइक्रोसॉफ्ट वर्ड को समर्पित है, जहाँ बच्चे टाइपिंग, टेक्स्ट को फॉर्मेट करना और चित्र डालने जैसे वर्ड प्रोसेसिंग कौशल सीखते हैं। इसमें इंटरनेट की मूल बातें भी शामिल हैं, जो बताती हैं कि वेबसाइटों को सुरक्षित रूप से कैसे ब्राउज़ किया जाए और ईमेल का क्या महत्व है।
इसके अलावा, यह किताब कंप्यूटर नैतिकता और लंबे समय तक कंप्यूटर के उपयोग के स्वास्थ्य प्रभावों, जैसे कि सही बैठने की मुद्रा (posture), पर जोर देती है। व्यावहारिक अभ्यासों और स्पष्ट चित्रों के साथ, इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य डिजिटल साक्षरता का निर्माण करना है, जो छात्रों को अधिक उन्नत तकनीकी अध्ययन के लिए तैयार करता है और उनके दैनिक जीवन में प्रौद्योगिकी के प्रति एक जिम्मेदार दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
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❤️ سبق 13 : شہسوار کربلا (نظم)
यह पाठ ‘شہسوارِ کربلا’ (करबला के घुड़सवार) हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की वीरता और दृढ़ता के बारे में एक खूबसूरत नज़्म है। अल्लामा हफ़ीज़ जालंधरी की इस नज़्म में मैदान-ए-करबला के उस मंज़र को बयान किया गया है जहाँ इमाम हुसैन अकेले हज़ारों ज़ालिमों के सामने डटे हुए हैं। आपका लिबास फटा हुआ और जिस्म ज़ख्मी है, लेकिन आपके संकल्प और दबदबे में कोई कमी नहीं आई। दुश्मनों की हज़ारों की फौज आपकी एक चोट और युद्ध कौशल के सामने बेबस नज़र आती है। आपकी तलवार के वार से बातिल ताकतें ‘अल-अमान’ (पंनाह) मांगती हैं। नज़्म में इस बात पर जोर दिया गया है कि आप हक़ के सच्चे पुजारी हैं और अल्लाह की रज़ा में मगन हैं। एक तरफ पूरी शाम (सीरिया) की सेना है और दूसरी तरफ सिर्फ़ इमाम हुसैन हैं, लेकिन आपके सब्र और बहादुरी ने दुश्मनों के हौसले पस्त कर दिए हैं। यह कलाम आपकी कुर्बानी और हक़-परस्ती की लाज़वाल दास्तान पेश करता है, जिसमें आपको नबी का नूर-ए-ऐन (आँखों का नूर) और खुदा का मुजाहिद करार दिया गया है।
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❤️ سبق 14 : ایشیا اور یورپ
यह पाठ पंडित जवाहरलाल नेहरू के एक खत पर आधारित है जो उन्होंने 8 जनवरी 1931 को अपनी बेटी इंदिरा गांधी को लिखा था। इसमें नेहरू जी इतिहास के महत्व और बदलाव की प्रक्रिया पर रोशनी डालते हैं। वे बताते हैं कि स्कूलों में इतिहास अक्सर अधूरा या गलत तरीके से पढ़ाया जाता है। खत का मुख्य उद्देश्य एशिया की प्राचीन महानता और यूरोप के साथ उसकी तुलना को स्पष्ट करना है। नेहरू जी लिखते हैं कि हालाँकि आज यूरोप विज्ञान, तकनीक और आधुनिक आविष्कारों की वजह से दुनिया पर हावी है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एशिया ही वह महाद्वीप है जहाँ से दुनिया के बड़े धर्मों और महान सभ्यताओं ने जन्म लिया। आर्य, अरब, मुग़ल और तुर्क सब एशिया से ही निकलकर यूरोप तक फैले। वे इस बात पर जोर देते हैं कि आकार बड़प्पन का पैमाना नहीं है, बल्कि ज्ञान और वैचारिक कारनामे असली महानता हैं। आखिर में वे एशिया की जागृति का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि यह प्राचीन महाद्वीप अब दोबारा जाग रहा है और भविष्य के निर्माण में इसकी अहम भूमिका होगी। यह खत न सिर्फ ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करता है बल्कि एशियाई निवासियों में आत्मविश्वास भी पैदा करता है।
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❤️ سبق 15 : سراۓ فانی (نظم)
यह नज़्म ‘सराय-ए-फानी’ (नश्वर सराय) मिर्ज़ा शौक लखनवी की रचना है, जिसमें दुनिया की नश्वरता और मौत की हकीकत को बड़े प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया गया है। शायर कहता है कि यह दुनिया एक फानी घर और सबक सीखने की जगह है, जहाँ किसी को भी अमरता हासिल नहीं। वे लोग जो कभी ऊँचे और विशाल मकानों के मालिक थे, आज तंग कब्रों में दफ़न हैं। जहाँ कभी रौनकें और फूल थे, वहां अब कांटे और वीरानी है। नज़्म में बड़े-बड़े बादशाहों जैसे कैसर, फगफूर, बहराम, रुस्तम और साम का ज़िक्र किया गया है, जो अपनी ताकत और शान-ओ-शौकत के लिए मशहूर थे, मगर वक़्त के चक्र ने उन्हें मिट्टी में मिला दिया। शायर कहता है कि जो लोग कभी इत्र (perfume) के बिना मिट्टी को छूना पसंद नहीं करते थे, आज उनकी हड्डियाँ भी खाक हो चुकी हैं। दुनिया का निज़ाम लगातार बदल रहा है और हर सुबह परिंदे भी यही पैगाम देते हैं कि ‘हर चीज़ मिटने वाली है’। संक्षेप में यह कि मौत से किसी को छुटकारा नहीं, जो आज दूसरों के लिए फातिहा पढ़ रहे हैं, कल उनकी बारी होगी। यह नज़्म इंसान को घमंड छोड़ने और ज़िंदगी की सच्चाई को समझने की दावत देती है।
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❤️ سبق 16 : قدرتی آفات سے حفاظت (مضمون)
यह अध्याय प्राकृतिक आपदाओं की परिभाषा, उनके प्रकार और उनसे बचाव के सुरक्षा उपायों पर आधारित है। प्राकृतिक आपदाओं से मतलब वे दुर्घटनाएँ हैं जो कुदरती तौर पर बड़े पैमाने पर तबाही लाती हैं, जैसे भूकंप, बाढ़ और तूफ़ान। भूकंप की स्थिति में लेखक सलाह देते हैं कि खुली जगह पनाह लें या किसी मज़बूत मेज़ के नीचे छिप जाएँ। बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ एक स्थायी समस्या है, जिससे बचने के लिए घरों को ऊँची जगह पर बनाने और पानी की निकासी का बेहतर इंतज़ाम करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, तूफ़ान और आग लगने जैसी घटनाओं के लिए भी तुरंत उपाय बताए गए हैं। मिसाल के तौर पर, तूफ़ान के वक़्त घर के अंदर रहना और आग लगने की सूरत में बिजली काट देना या रेत का इस्तेमाल करना ज़रूरी है। किताब में घायलों की प्राथमिक चिकित्सा (First Aid), जैसे जले हुए हिस्से को पानी में डुबोना और सूती कपड़े का इस्तेमाल, पर भी रोशनी डाली गई है। अंत में, यह सबक हमें यह सिखाता है कि हालाँकि प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते सावधानी और सही जानकारी के ज़रिए जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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❤️ سبق 17 : ماں کا خواب (نظم)
अल्लामा इकबाल की नज़्म ‘माँ का ख्वाब’ एक जज़्बाती और सबक सिखाने वाली नज़्म है जिसमें एक माँ के ख्वाब का हाल बयान किया गया है। माँ सपने में खुद को एक अंधेरे रास्ते पर चलते हुए देखती है जहाँ वह डरी हुई है। वहां वह लड़कों की एक कतार देखती है जिन्होंने पन्ने के रंग (हरा) का लिबास पहना हुआ है और उनके हाथों में जलते हुए चिराग (दीये) हैं। इस कतार में उसे अपना मृत बेटा भी नज़र आता है जो सबसे पीछे है और उसका दिया बुझा हुआ है। माँ जब अपने बेटे से उसकी जुदाई और अपनी बेचैनी का ज़िक्र करती है, तो बच्चा जवाब देता है कि माँ के लगातार रोने और आंसू बहाने की वजह से ही उसका चिराग बुझ गया है। यह नज़्म माता-पिता को यह संदेश देती है कि मरने वालों के लिए हद से ज़्यादा रोना-धोना उनकी रूह के लिए तकलीफ का कारण बनता है। शायर ने माँ की ममता और बच्चे की मासूमियत को बहुत खूबसूरती से बयान किया है।
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❤️ سبق 18 : بیراگی (تلخیص)
यह पाठ ‘बैरागी’ अवध के आखिरी बादशाह वाजिद अली शाह और महाराजा बाल किशन के इर्द-गिर्द घूमता है। महाराजा बाल किशन, जो बादशाह के दीवान (मंत्री) थे, हर साल लखनऊ के ऐश-बाग में साधुओं की एक शानदार दावत करते थे जो चार महीने तक जारी रहती थी। जब वज़ीर-ए-आज़म नवाब अली नक़ी खान ने बादशाह के कान भरने की कोशिश की कि यह शाही खज़ाने का नुकसान है, तो वाजिद अली शाह ने खुद भेष बदल कर मेले का मुआयना किया। वहां वे एक नौजवान साधु ‘किशन दास बैरागी’ से मिले और उसके ज्ञान व आस्था से प्रभावित हुए। बादशाह ने न सिर्फ़ इस काम की तारीफ की बल्कि ऐलान किया कि आगे से सारे खर्चे शाही खज़ाना उठाएगा। कहानी का दूसरा हिस्सा बादशाह के पद से हटाए जाने के बाद कलकत्ता का है, जहाँ वे निर्वासन (Jilawatni) की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। बरसों बाद, किशन दास बैरागी कलकत्ता पहुँचा और बादशाह ने उसे पहचान लिया। वाजिद अली शाह ने अपनी गरीबी के बावजूद उसे मोतियों का एक कीमती हार तोहफे में दिया। बादशाह के इंतकाल की खबर सुनकर बैरागी सदमे से निढाल हो गया और तीन दिन बाद उसकी भी मौत हो गई। यह कहानी वाजिद अली शाह की उदारता, धार्मिक सद्भाव और उनके चाहने वालों की वफ़ादारी की एक भावुक तस्वीर पेश करती है।
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❤️ سبق 19 : ماہر طیور سالم علی (مضمون)
यह अध्याय मशहूर भारतीय पक्षी विज्ञानी (Ornithologist) सालिम अली के जीवन और उनके कारनामों पर रोशनी डालता है। सालिम अली, जिन्हें ‘बर्ड मैन ऑफ़ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है, 12 नवंबर 1896 को मुंबई में पैदा हुए। बचपन में एक गौरैया के शिकार ने उनके दिल में परिंदों के प्रति जिज्ञासा पैदा की, जिसका मार्गदर्शन मिलार्ड साहब ने किया। उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी पक्षियों के अध्ययन और शोध में बिता दी। सालिम अली पहले भारतीय थे जिन्होंने पक्षियों के बारे में व्यवस्थित वैज्ञानिक शोध किया और उनकी आदतों और व्यवहार को किताबी शक्ल में पेश किया। उनकी मेहनत ने ‘पक्षी विज्ञान’ को भारत में एक नई पहचान दी। उन्होंने जर्मनी जाकर इस विज्ञान में महारत हासिल की और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में अहम सेवाएं दीं। उनकी किताब ‘हमारे दोस्त जानवर’ और अन्य लेख आज भी पक्षी प्रेमियों के लिए मार्गदर्शक हैं। सालिम अली का निधन 91 वर्ष की उम्र में 20 जून 1987 को हुआ। यह अध्याय हमें सिखाता है कि किस तरह एक छोटी सी रुचि इंसान को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बना सकती है।
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❤️ سبق 20 : غزلیات
यह अध्याय उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय विधा ‘ग़ज़ल’ के परिचय और प्रमुख शायरों के कलाम पर आधारित है। शुरुआत में गज़ल की तकनीकी विशेषताओं जैसे मतला, मक्ता, रदीफ़ और काफीया की परिभाषा दी गई है। पाठ में बताया गया है कि क्लासिक उर्दू गज़ल के विषय हुस्न-ओ-इश्क और तसव्वुफ (सूफीवाद) तक सीमित थे, लेकिन आधुनिक दौर में इसमें विस्तार आया है। इस पाठ में दो अहम शायरों, हसन नईम और नावक हमज़ापुरी की गज़लें शामिल हैं। हसन नईम की गज़ल हिम्मत, हौसले और खुदा पर भरोसे का पैगाम देती है, जिसमें वे ज़िक्र करते हैं कि कठिन हालात (पतझड़ और भंवर) इंसान को निखारने का जरिया बनते हैं। दूसरी तरफ, नावक हमज़ापुरी की गज़ल इंसानी महरूमियों, नैतिक गिरावट और शिक्षा व हुनर की अहमियत पर रोशनी डालती है। वे समाज में इंसान से इंसान को होने वाले खतरों और खुदा के खौफ की कमी पर अफ़सोस जताते हैं। किताब में इन पाठों के साथ मुश्किल शब्दों के अर्थ, वस्तुनिष्ठ प्रश्न, और व्याकरण के अभ्यास (पर्यायवाची, विलोम, स्त्रीलिंग-पुल्लिंग) भी दिए गए हैं ताकि छात्रों की भाषाई क्षमताओं में इज़ाफ़ा हो सके।
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❤️ سبق 21 : محنت سونا سے بہتر ہے (غیر ملکی کہانی)
यह कहानी दो भाइयों के इर्द-गिर्द घूमती है जो दौलत की तलाश में एक सफर पर निकलते हैं। छोटा भाई लालच में पड़कर सोना तलाश करने निकल जाता है, जबकि बड़ा भाई जो कि दूरदर्शी और मेहनती है, अपने साथ खेती-बाड़ी का सामान और बीज ले जाता है। छोटा भाई सोने की खान तक पहुँच कर ढेर सारा सोना तो जमा कर लेता है, लेकिन जल्द ही उनका खाना ख़त्म हो जाता है। भूख से बेहाल होकर उसे अपने बड़े भाई से सोने के बदले महंगे दामों पर अनाज खरीदना पड़ता है, यहाँ तक कि उसका सारा सोना ख़त्म हो जाता है। जब वह मायूस हो जाता है, तो बड़ा भाई उसे उसका सारा सोना वापस कर देता है और समझाता है कि उसने यह सब उसे सबक सिखाने के लिए किया था। वह उसे बताता है कि मेहनत से हासिल की गई चीज़ टिकाऊ होती है और ‘मेहनत सोने से बेहतर है’। छोटे भाई को अपनी गलती का एहसास होता है और वह समझ जाता है कि लालच का अंजाम बुरा होता है जबकि मेहनत और सच्चाई ही असली कामयाबी की कुंजी है। यह शिक्षाप्रद कहानी हमें मेहनत की महानता और लालच से बचने की सलाह देती है।
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❤️ سبق 22 : رباعیات
यह पाठ ‘रुबाई’ की परिभाषा और उर्दू के चार अहम शायरों की रुबाइयों पर आधारित है। रुबाई अरबी लफ्ज़ ‘रुबा’ से निकला है, जिसके मानी चार के हैं, और यह चार पंक्तियों वाली काव्य विधा है जिसमें एक मुकम्मल ख्याल या नसीहत पेश की जाती है। पहली रुबाई में अल्ताफ हुसैन हाली ने दुनिया की नश्वरता और मौत की हकीकत को बयान करते हुए नसीहत की है कि वक़्त बर्बाद किए बिना नेक काम कर लेने चाहिए। शौक नीमवी ने दूसरी रुबाई में खुदा के वजूद पर दलील पेश की है कि जिस तरह हवा नज़र नहीं आती मगर महसूस होती है, उसी तरह खुदा भी नज़र न आने के बावजूद अपनी निशानियों से पहचाना जाता है। अमजद हैदराबादी ने तीसरी रुबाई में संतोष (कनाअत) और गरीबी की अहमियत बताई है कि गरीबी इंसान के लिए मौत को आसान बना देती है। चौथी रुबाई में जमील मज़हरी ने इंसानी बेबसी और खुदा की ज़रुरत पर जोर दिया है। यह पाठ न सिर्फ़ साहित्यिक रुचि पैदा करता है बल्कि नैतिक व रूहानी कद्रों की तरफ भी रहनुमाई करता है और मुश्किल शब्दों के अर्थ और व्याख्याओं के ज़रिए छात्रों को इन गहरे अर्थों को समझने में मदद करता है।
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