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Bihar Board Books

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Bihar Board Class 7th Urdu Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb Leave a Comment

Bihar Board Class 7th Urdu Book 2026 PDF Download

Bihar Board 7th Urdu Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 7th के छात्रों के लिए “Urdu (اردو)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 7 Urdu (اردو) Textbook PDF Free Download

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❤️ preface

यह किताब ‘फ़रोज़ां हिस्सा-दोम’ सातवीं कक्षा (Class 7) के उर्दू पाठ्यक्रम के लिए बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन, पटना की एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। यह पाठ्यपुस्तक बच्चों के मानसिक स्तर और उनकी भाषाई रुचि को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। किताब में नज़्म (कविता) और नस्र (गद्य) के बेहतरीन नमूने पेश किए गए हैं जो छात्रों को उर्दू भाषा के व्याकरण, उच्चारण और शब्दावली से परिचित कराते हैं। किताब की सामग्री बहुत विविध है, जिसमें हम्द, नात, कहानियाँ, जीवनियाँ, ड्रामा और ज्ञानवर्धक लेख शामिल हैं। शुरुआत में ‘खुदा से दुआ’ और हुज़ूर (स.अ.व.) की शान में नात पेश की गई है जो बच्चों में आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्य पैदा करती है। वैज्ञानिक व्यक्तित्व डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बचपन के हालात और स्वतंत्रता सेनानी जैसे अशफ़ाक उल्ला खां और बेगम हज़रत महल के वाकयात बच्चों में हिम्मत, हौसला और देशभक्ति का जज़्बा जगाते हैं। इसमें बिहार के इतिहास और संस्कृति को दर्शाने के लिए ‘खुदा बख्श लाइब्रेरी’ और ‘हमारा बिहार’ जैसे पाठ शामिल हैं। पर्यावरणीय चेतना जगाने के लिए ‘आओ हम माहौल बचाएं’ और विश्व साहित्य की समझ के लिए टॉल्स्टॉय की कहानी का अनुवाद ‘दो गज़ ज़मीन’ दिया गया है। ड्रामा ‘दादी अम्मा मान जाओ’ बच्चों की दिलचस्पी का खास केंद्र है। कुल मिलाकर यह किताब न सिर्फ उर्दू भाषा सिखाती है बल्कि छात्रों के चरित्र निर्माण और उनकी जानकारी में इजाफा करने का बेहतरीन ज़रिया है।

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❤️ سبق 1: خدا سے دعا (نظم)

यह नज़्म ‘हम्द’ है जिसके शायर शफीउद्दीन नैयर हैं। इस नज़्म में शायर अल्लाह तआला की एकता (तौहीद) और उसकी कुदरत को स्वीकार करते हुए उसकी तारीफ बयान करता है। शायर कहता है कि यह पूरी दुनिया और इसमें होने वाले तमाम बदलाव अल्लाह के हुक्म से हैं। सूरज, चाँद, तारे, बिजली, बादल और तमाम मौसम उसी के इशारे के पाबंद हैं। ज़मीन की हर चीज़ चाहे वो मिट्टी हो, पानी हो या हवा, सब उसकी रचना के प्रमाण हैं। नज़्म में सामाजिक सद्भाव का पैगाम भी दिया गया है, जहाँ मस्जिद, मंदिर, गिरजा और गुरुद्वारा सबको अल्लाह का घर बताया गया है और तमाम इंसानों को उसका बंदा करार दिया गया है, चाहे वो गोरे हों या काले। शायर अल्लाह से दुआ करता है कि हमारे दिलों से दुश्मनी और बैर खत्म हो जाए और प्रेम व मोहब्बत की ज्योत जगे। वह अल्लाह से तौफीक मांगता है कि हम अपने कर्तव्यों को पहचानें और इंसानियत की सेवा कर सकें। यह नज़्म खुदा की नेमतों का शुक्र अदा करने और उसके आदेशों पर अमल करने की प्रेरणा देती है। इसका मकसद बंदे के दिल में अपने खालिक (रचने वाले) की महानता और मखलूक (सृष्टि) के लिए मोहब्बत पैदा करना है ताकि एक बेहतर समाज बन सके।

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❤️ سبق 2 : بہادر بچہ (کہانی)

यह कहानी ‘बहादुर बच्चा’ सतीश के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने अपनी हिम्मत और अक्लमंदी से अपने गाँव को डाकुओं से बचाया। रामनगर में एक ठंडी और अंधेरी रात को, सतीश ने अपने घर के बाहर संदिग्ध आवाज़ें सुनीं। उसे मालूम हुआ कि डाकुओं ने चाचा मान सिंह के घर का घेराव कर लिया है। उसने तुरंत अपने पिता को जगाया। सतीश के पिता ने सलाह दी कि अकेले मुकाबला करने के बजाय पूरे गाँव को इकट्ठा किया जाए। सतीश ने हिम्मत नहीं हारी और घर-घर जाकर ग्रामीणों को जगाया। हालाँकि ग्रामीण जमा हो गए, लेकिन डाकुओं के पास बंदूकें थीं, जिसकी वजह से लोग डरे हुए थे। सतीश ने चुपके से एक डाकू पर ईंट से हमला किया और उसे गिरा दिया। फिर उसने एक होशियार योजना बनाई और घास के एक बंडल को आग लगाकर आंगन में फेंक दिया। रोशनी होते ही डाकुओं के छिपने की जगहें खत्म हो गईं और गाँव वालों का हौसला बढ़ गया। सबने मिलकर लाठियों और पत्थरों से डाकुओं पर हमला किया, जिसके नतीजे में डाकू वहां से भागने पर मजबूर हो गए। यह शिक्षाप्रद कहानी हमें सिखाती है कि मुश्किल वक्त में घबराने के बजाय अक्लमंदी और आपसी सहयोग से काम लेना चाहिए ताकि बुराई का मुकाबला किया जा सके।

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❤️ سبق 2 (الف) : ایک دوڑایسی بھی (صرف پڑھنے کے لئے

यह एक बहुत ही प्रभावित करने वाली कहानी है जिसका शीर्षक ‘एक दौड़ ऐसी भी’ है। यह घटना कई साल पहले के ओलंपिक खेलों की है जहाँ सौ मीटर की एक खास दौड़ का आयोजन किया गया था। इस मुकाबले में नौ ऐसे खिलाड़ी शामिल थे जो शारीरिक रूप से विकलांग थे, लेकिन उनके हौसले बुलंद थे। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, सब खिलाड़ी पूरी हिम्मत के साथ आगे बढ़ने लगे, मगर इसी दौरान एक छोटा लड़का संतुलन खोकर ज़मीन पर गिर पड़ा और दर्द की वजह से रोने लगा। यह देखकर कि उनका साथी तकलीफ में है, बाकी आठों प्रतिभागियों ने अपनी जीत की इच्छा को पीछे छोड़ दिया और एक-एक करके उस बच्चे के पास वापस पहुँच गए। उन्होंने बड़ी मोहब्बत से उसे उठाया, उसके आंसू पोंछे और उसे दिलासा दिया। इसके बाद जो मंज़र सामने आया वह इंसानी इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा; उन तमाम बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और एक जंजीर की शक्ल में धीरे-धीरे चलते हुए फिनिश लाइन तक पहुँचे। दर्शक यह देखकर हैरान रह गए और पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा क्योंकि सभी खिलाड़ी एक साथ विजेता करार पाए थे। जजों ने इस असाधारण हमदर्दी के बदले में तमाम नौ बच्चों को गोल्ड मेडल दिए। यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि असली जीत सिर्फ पहले आने में नहीं, बल्कि दूसरों का साथ देने में है।

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❤️ سبق 3 : میرے بچپن کے دن (مضمون)

यह अध्याय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बचपन के हालात और घटनाओं पर आधारित है। कलाम साहब का जन्म तमिलनाडु के कस्बे रामेश्वरम में एक मध्यमवर्गीय लेकिन स्वाभिमानी परिवार में हुआ था। उनके पिता जैनुलआब्दीन विधिवत शिक्षित न होने के बावजूद बेहद अक्लमंद और उदार इंसान थे। कलाम साहब का बचपन धार्मिक सद्भाव के साये में गुज़रा, जहाँ उनके करीबी दोस्तों में रामानंदन शास्त्री जैसे हिंदू बच्चे शामिल थे। एक अहम वाकया उस वक्त पेश आया जब पांचवीं कक्षा में एक नए उस्ताद ने उन्हें एक हिंदू लड़के के साथ बैठने पर एतराज़ किया और पीछे भेज दिया, लेकिन रामानंदन के पिता लक्ष्मण शास्त्री ने उस्ताद को अपनी सोच बदलने पर मजबूर किया। इसी तरह, उनके विज्ञान शिक्षक शिव सुब्रमण्यम अय्यर ने अपनी रूढ़िवादी पत्नी के विरोध के बावजूद कलाम को अपने घर खाने पर बुलाया, जिससे सामाजिक बंदिशें टूट गईं। कलाम साहब ने रामनाथपुरम के हाई स्कूल में अपने शिक्षक इयादुराई सोलोमन से कामयाबी के तीन उसूल सीखे: इच्छा, यकीन और उम्मीद। गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर ने एक बार उन्हें सज़ा दी लेकिन बाद में उनकी मेहनत देखकर पूरी असेंबली में उनकी तारीफ की। यह बचपन के अनुभव और शिक्षकों की तरबियत ही थी जिसने कलाम साहब को एक महान वैज्ञानिक और देश का राष्ट्रपति बनाया।

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❤️ سبق 4 : سب سے اولیٰ و اعلی ہمارا نبی (نظم)

यह किताब का एक अध्याय है जिसका शीर्षक ‘हमारा नबी (स.अ.व.)’ है। यह दरअसल उर्दू के मशहूर शायर मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी की लिखी हुई एक नात है जिसमें रसूल अल्लाह (स.अ.व.) की महानता और उनके ऊँचे दर्जे को बयान किया गया है। शायर के मुताबिक, हमारे नबी (स.अ.व.) तमाम जहानों के दूल्हा और अपने रब के सबसे प्यारे हैं। वो कायनात की महफिल के रोशन चिराग हैं और उनका नूर हर जगह फैला हुआ है। इस नज़्म में यह भी बताया गया है कि आप (स.अ.व.) तमाम औलिया और रसूलों से अफ़ज़ल (श्रेष्ठ) हैं। आपकी ज़ात-ए-मुबारक को रहमत का दरिया कहा गया है और उनके तलवों के धोवन को आब-ए-हयात (अमृत) से उपमा दी गई है जो मसीहा की जान है। यह नात बेबसों और बेसहारा लोगों के लिए खुशखबरी है कि आप (स.अ.व.) उनका सहारा हैं। किताब के इस हिस्से में नात के साथ-साथ मुश्किल शब्दों के अर्थ, अभ्यास और सवाल भी शामिल किए गए हैं ताकि छात्र नात के अर्थ को बेहतर तौर पर समझ सकें और इसकी तिलावत व याद करने का अभ्यास कर सकें। इस अध्याय के आखिर में व्यावहारिक गतिविधियाँ भी दी गई हैं जिनमें बच्चों को नात याद करने और उसे सुर में सुनाने की प्रेरणा दी गई है।

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❤️ سبق 5 : خدا بخش لائبریری (مضمون)

खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी दुनिया की चंद चुनिंदा और प्रतिष्ठित लाइब्रेरियों में से एक है, जो पटना, बिहार में गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह इल्मी (शैक्षिक) संस्थान दरअसल मौलवी मुहम्मद बख्श के सपनों की एक खूबसूरत ताबीर है, जिसे उनके लायक बेटे खुदा बख्श खां ने 1891 में बाकायदा तौर पर जनता के लिए खोल दिया। खुदा बख्श खां 2 अगस्त 1842 को ज़िला छपरा में पैदा हुए और उन्होंने अपने पिता के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए दुर्लभ किताबों और पांडुलिपियों को जमा करने के लिए अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी। उनका यह शौक एक जुनून की शक्ल अख्तियार कर चुका था, जिसके कारण उन्होंने वैश्विक स्तर पर संपर्क करके नायाब ज़खीरा (संग्रह) इकट्ठा किया। इस लाइब्रेरी की असल शोहरत अरबी, फारसी और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियों की वजह से है, जिनमें कुरान मजीद के प्राचीन नुस्खे, यूसुफ-जुलेखा, शाहनामा और दीवान-ए-हाफ़िज़ जैसी शाहकार किताबें शामिल हैं। 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद सरकार ने इसकी इमारत की मरम्मत और विस्तार किया, और आज यह केंद्र सरकार की निगरानी में एक अहम शोध केंद्र है। यहाँ आधुनिक दौर की ज़रूरतों के मुताबिक इंटरनेट, एयर-कंडीशंड अध्ययन कक्ष और शोधकर्ताओं के लिए रहने की सुविधाएं भी मौजूद हैं। खुदा बख्श खां का मज़ार इसी लाइब्रेरी के परिसर में स्थित है, जो उनकी निस्वार्थ इल्मी सेवाओं का स्थायी सबूत है। यह लाइब्रेरी भारतीयों की एक कीमती राष्ट्रीय धरोहर है जिसे सुरक्षित रखना सबका फ़र्ज़ है।

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❤️ سبق 5 (الف) : ایک چھوٹا سا لڑکا

यह नज़्म ‘एक छोटा सा लड़का’ उर्दू के मशहूर शायर इब्ने इंशा की रचना है। इसमें शायर अपने बचपन के उस दौर को याद करता है जब वह एक मेले में गया था। उस मासूम उम्र में उसका दिल मेले की हर रंगीन और खूबसूरत चीज़ को देखकर मचल रहा था, लेकिन जेब खाली होने की वजह से वह अपनी कोई भी ख्वाहिश पूरी न कर सका और निराशा व सैकड़ों हसरतें लेकर वापस लौट आया। वक्त गुज़रने के साथ-साथ हालात बदल गए और अब शायर एक कामयाब और अमीर इंसान बन चुका है। आज फिर वैसा ही मेला सजा हुआ है और शायर की जेब में इतनी रकम है कि वह चाहे तो पूरी दुकान या सारा जहान खरीद सकता है। अब उसे किसी कमी या महरूमी का डर नहीं है, लेकिन वह मासूम और अल्हड़ लड़का अब कहीं खो चुका है। वह अब जवानी की गंभीरता में अपने बचपन की उस तड़प और मासूम खुशी को तलाश कर रहा है जो अब पैसों से नहीं खरीदी जा सकती। यह नज़्म हमें इस हकीकत से रूबरू कराती है कि ज़िंदगी में जब भौतिक साधन आते हैं तो अक्सर वह वक्त और मासूमियत विदा हो चुकी होती है जो उनसे असली लुत्फ लेने के लिए दरकार होती है।

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❤️ سبق 6 : ہمارا بہار

यह पाठ ‘हमारा बिहार’ बिहार राज्य के बहुमूल्य ऐतिहासिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक महत्व का व्यापक विवरण देता है। बिहार भारत का एक ऐसा प्राचीन और ऐतिहासिक राज्य है जिसने सदियों तक ज्ञान-विज्ञान और राजनीति की दुनिया में अपनी धाक जमाए रखी। यह राज्य गंगा नदी के जरिए उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में बंटा है, जहाँ विभिन्न भाषाएं बोलने वाले लोग आपसी एकता और प्यार के साथ रहते हैं। पाठ में पटना का इतिहास बयान किया गया है, जो ‘पाटलिपुत्र’ और ‘अज़ीमाबाद’ जैसे नामों से मशहूर रहा और जहाँ मौर्य काल के अवशेषों के साथ-साथ सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ। इसके अलावा, नालंदा विश्वविद्यालय का ज़िक्र है जो प्राचीन ज़माने में पूरी दुनिया के लिए ज्ञान का केंद्र था। राजगीर और बोधगया जैसे मकाम बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र हैं, जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और महावीर ने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुज़ारा। सासाराम में शेर शाह सूरी का मकबरा और वैशाली में दुनिया के पहले लोकतंत्र के अवशेष बिहार की महानता के गवाह हैं। मखदूम शरफुद्दीन यहिया मनेरी और शाद अज़ीमाबादी जैसी इल्मी व रूहानी शख्सियतों का संबंध भी इसी धरती से है। यह पाठ बच्चों को उनके बुज़ुर्गों के महान कारनामों से परिचित कराते हुए उन्हें देश की तरक्की में हिस्सा लेने की प्रेरणा देता है।

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❤️ سبق 7 : حیرت انگیز ٹوپی (کہانی)

यह कहानी पेका (Peka) नाम के एक मेहनती और सीधे-सादे लड़के की है जो फनलैंड के एक छोटे से गाँव में अपने पिता के साथ रहता था। एक साल फसल की तबाही के कारण उन्हें अपनी एक गाय बेचने का कठिन फैसला करना पड़ा ताकि दूसरी गाय के चारे का इंतज़ाम हो सके। पेका जब गाय लेकर मंडी की तरफ निकला तो उसे रास्ते में दो चालाक और शरारती लड़के मिले जिन्होंने उसे बेवकूफ बनाने के लिए गाय को बकरी कहना शुरू कर दिया। पेका उनकी बातों में आ गया और अपनी कीमती गाय बकरी की कीमत पर उन्हें बेच दी। जल्द ही उसे एहसास हुआ कि वह धोखे का शिकार हुआ है, चुनांचे उसने उन लड़कों को सबक सिखाने की ठानी। उसने शहर के होटलों और दुकानों पर जाकर पहले से बिल चुका दिए और दुकानदारों को अपना ‘टोपी वाला’ प्लान समझा दिया। जब उन लड़कों ने पेका को ‘मुफ्त’ में खाते देखा तो उन्होंने उसकी टोपी को जादुई समझकर अपनी तमाम जमा पूंजी और घड़ियां देकर उसे खरीद लिया। बाद में जब उन्होंने होटल में खाना खाकर वही टोपी आज़माई तो होटल के मालिक ने उनकी खूब पिटाई की और उन्हें बाहर निकाल दिया। इस तरह पेका ने अपनी गाय का बदला ले लिया। यह कहानी हमें ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ का सबक देती है कि दूसरों को धोखा देने वालों का अंजाम हमेशा बुरा होता है।

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❤️ سبق 8 : ہمارا وطن (نظم)

यह नज़्म जिसका शीर्षक ‘हमारा वतन’ है, उर्दू के मशहूर और प्रतिष्ठित शायर पंडित ब्रज नारायण चकबस्त लखनवी की एक शाहकार रचना है। इस नज़्म में शायर ने अपने वतन हिंदुस्तान की बेपनाह खूबसूरती, इसके प्राकृतिक नज़ारों और वतन से अपनी बेइंतहा मोहब्बत को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में बयान किया है। चकबस्त साहब फरमाते हैं कि हमारा वतन हमारी आँखों का तारा है और हमें अपनी जान से भी ज्यादा अज़ीज़ है। नज़्म में वतन के हरे-भरे पेड़ों, रंगीन फूलों और महकती हुई फुलवारियों का ज़िक्र करके मुल्क की उपजाऊ शक्ति और हरियाली को उजागर किया गया है। हवा के झोंकों से पेड़ों का झूमना और कलियों का एक-दूसरे के करीब आना प्रकृति की रंगीनी को पेश करता है। शायर ने सावन के मौसम, काली घटाओं के आने और बरसात की नन्ही-नन्ही बूंदों यानी फुहार का तज़किरा करके वतन के बदलते मौसमों की आकर्षण को सराहा है। इसके अलावा गंगा और जमुना जैसी पवित्र और महान नदियों की लहरों का जोश और जंगलों में मोर का नृत्य वतन की महानता की गवाही देते हैं। नज़्म का सबसे अहम पहलू यह है कि शायर ने वतन की मोहब्बत को माँ की ममता के बराबर दर्जा दिया है और कहा है कि ज़िंदगी की असली खुशी और बहार इन ही दोनों जज़्बों की बदौलत है।

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❤️ سبق 9 : حضرت قطب الدین بختیار کاکی (مضمون)

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्तिया सिलसिले के एक महान और कामिल (पूर्ण) दरवेश थे। उनका जन्म ओश, बगदाद में हुआ और उनकी परवरिश उनकी नेक वालिदा ने की। बचपन से ही उन पर अल्लाह का खास फज़ल था, और महज चार साल की उम्र में उन्होंने कुरान पाक का बड़ा हिस्सा हिफ्ज़ (याद) कर लिया था। उनके रूहानी सफर में हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का बड़ा मकाम है, जिनके वे मुरीद (शिष्य) हुए और उनकी रहनुमाई में बगदाद, मक्का और मदीना का सफर किया। हज़रत बख्तियार काकी की ज़िंदगी त्याग (ज़ुहद), परहेज़गारी (तक़वा) और जनसेवा (ख़िदमत-ए-ख़ल्क) का व्यावहारिक नमूना थी। वे निहायत सादा ज़िंदगी बसर करते और नज़रानो (उपहारों) को गरीबों में बांट देते। उनकी एक मशहूर करामात ‘काक’ (रोटियों) से संबंधित है, जिसकी वजह से उन्हें ‘काकी’ कहा जाने लगा। सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश उनका बेहद सम्मान करता था, लेकिन आपने कभी दरबारी ठाठ-बाठ को पसंद नहीं किया। आपने दिल्ली को अपना केंद्र बनाया और वहीं लोगों की रूहानी प्यास बुझाई। आपकी वफ़ात 1237 ईस्वी में हुई और आपका मज़ार महरौली, दिल्ली में स्थित है जहाँ लोग बड़ी संख्या में आते हैं। आपकी शिक्षाओं का केंद्र इंसानियत से मोहब्बत और अल्लाह की बंदगी था, जिसने उपमहाद्वीप में चिश्तिया सिलसिले को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई।

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❤️ سبق 10 : سبق ایسا پڑھا دیا تو نے (غزل)

यह ग़ज़ल उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध शायर नवाब मिर्ज़ा दाग़ देहलवी की एक निहायत ही प्रभावशाली रचना है, जो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की हम्द ओ सना (तारीफ) पर आधारित है। इस ग़ज़ल में शायर ने अल्लाह की एकता, उसकी पूर्ण शक्ति और अपने बंदों पर उसके बेशुमार एहसानों का ज़िक्र बहुत ही सरल और दिलकश अंदाज़ में किया है। ग़ज़ल के शुरुआती शेरों में दाग़ कहते हैं कि ए मेरे मालिक, तूने मुझे ज्ञान (मारफत) का ऐसा अनोखा सबक पढ़ा दिया है कि अब मेरे दिल से दुनिया की तमाम नश्वर चीज़ों की मोहब्बत खत्म हो गई है और सिर्फ तेरी ही ज़ात का नक्श कायम है। शायर अल्लाह की निस्वार्थ उदारता का ज़िक्र करते हुए कहता है कि वह एक ऐसी मेहरबान ज़ात है जो इंसान को उसकी मांग के बिना और बिना किसी दुनियावी गर्ज़ के नवाज़ती है। ग़ज़ल में हज़रत इब्राहिम (अ.स.) के वाकये का ज़िक्र करते हुए शायर कहता है कि तूने ही नमरूद की दहकती आग को अपने दोस्त के लिए गुलज़ार (बाग) में बदल दिया था। शायर स्वीकार करता है कि अल्लाह ने उसे उसकी ख्वाहिशात से बढ़कर दिया है। इस कलाम का पैगाम यह है कि जब दिल में अल्लाह की मोहब्बत आती है तो तमाम झूठे खयाल खुद-ब-खुद मिट जाते हैं। मक़्ता (अंतिम शेर) में दाग़ विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि उन्हें जो कुछ भी हासिल है, वह महज़ अल्लाह का फज़ल और करम है।

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❤️ سبق 11: مجاہد آزادی شاہد اشفاق الله خان (نظم)

यह पाठ स्वतंत्रता सेनानी शहीद अशफ़ाक उल्ला खां की ज़िंदगी, उनके बुलंद हौसले और उनकी महान कुर्बानी पर आधारित एक भावुक लेख है। इस पाठ की शुरुआत हिंदुस्तान के स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त की अहमियत को उजागर करते हुए की गई है, जो उन बेशुमार देशभक्त लोगों के अथक संघर्ष और निस्वार्थ बलिदानों का फल है जिन्होंने मातृभूमि को अंग्रेजों की गुलामी से निजात दिलाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। इन जांनिसारों में एक प्रमुख नाम अशफ़ाक उल्ला खां का है जो 1 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए। वे अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे और अपनी खूबसूरती की वजह से घर में प्यार से ‘अच्छू’ पुकारे जाते थे। अशफ़ाक उल्ला खां ने बचपन ही से ब्रिटिश राज के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। वे ‘मातृवेदी संस्थान’ के सक्रिय सदस्य बने और राम प्रसाद बिस्मिल के करीबी साथी रहे। 1925 के मशहूर काकोरी ट्रेन डकैती केस में उन्हें अन्य क्रांतिकारियों के साथ गिरफ्तार किया गया और 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी गई। शहादत से पहले उन्होंने अपनी वालिदा को एक दिल को छू लेने वाला खत लिखा जिसमें उन्होंने शहादत के जज़्बे, दिल के सुकून और अल्लाह की अमानत को खुशी-खुशी लौटाने का ज़िक्र किया। यह पाठ हमें देशभक्ति और मुल्क के लिए जान देने का अमर संदेश देता है।

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❤️ سبق 12 : عقلمند لڑکا (بہار کی کہانی)

यह कहानी एक कंजूस ज़मींदार फोकट दास के बारे में है, जो अपनी कंजूसी की वजह से ‘जोंक’ के नाम से मशहूर था। वह मज़दूरों से काम करवाता लेकिन विभिन्न बहानों और नामुमकिन शर्तों के ज़रिए उनकी मज़दूरी हड़प कर लेता था। एक गरीब आदमी कल्लू उसके झांसे में आ गया और छह महीने सख्त मेहनत की। जब मज़दूरी का वक्त आया तो जोंक ने उसे एक बड़े बर्तन को छोटे बर्तन में रखने और अपने सिर का वज़न बताने जैसे नामुमकिन काम कहे। कल्लू यह न कर सका और खाली हाथ लौट गया। कल्लू के भाई लल्लू ने ज़मींदार को सबक सिखाने का फैसला किया। जब जोंक ने लल्लू से वही नामुमकिन काम कहे तो लल्लू ने अपनी अक्लमंदी से उसे लाजवाब कर दिया। उसने बड़ा बर्तन तोड़कर छोटे में डाल दिया और गोदाम के फर्श को धूप दिखाने के लिए छत में सुराख कर दिया। जब जोंक ने सिर के वज़न का सवाल किया तो लल्लू तलवार ले आया ताकि सिर काटकर तोल सके। ज़मींदार डर गया और उसने लल्लू को दोगुनी मज़दूरी के साथ कल्लू का हिस्सा भी अदा कर दिया। यह कहानी हमें सिखाती है कि ज़ुल्म और बेईमानी का अंजाम हमेशा बुरा होता है और अक्लमंदी से किसी भी ज़ालिम का मुकाबला किया जा सकता है।

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❤️ سبق 12 (الف) : جنگلی ہاتھی (صرف پڑھنے کے لئے)

यह कहानी एक बेहद दिलचस्प और मज़ाहिया (हास्य) घटना पर आधारित है जिसका शीर्षक ‘जंगली हाथी’ है। इस कहानी की पृष्ठभूमि एक सिनेमा हॉल है जहाँ ‘जंगली हाथी’ नाम की एक फिल्म दिखाई जा रही होती है। फिल्म के एक सनसनीखेज मंज़र में दिखाया जाता है कि एक हाथी अचानक बिफर जाता है और पागल होकर हर तरफ तबाही मचाना और तोड़-फोड़ करना शुरू कर देता है। सिनेमा हॉल की अगली सीट पर बैठे हुए नजमन मियां, इस मंज़र को हकीकत समझकर इस कदर डर जाते हैं कि वे अपनी जान बचाने के लिए फौरन अपनी सीट छोड़कर बाहर की तरफ भागते हैं। गेट पर खड़ा दरबान उन्हें बदहवासी में भागते हुए देखकर हैरान होता है और उन्हें रोककर पूछता है कि फिल्म तो अभी शुरू हुई है, वे इतनी जल्दी क्यों भाग रहे हैं। नजमन मियां कांपती हुई आवाज़ में जवाब देते हैं कि सामने देखो, हाथी पागल हो चुका है और अगर उसने एक पांव भी पर्दे से बाहर निकाल दिया तो मेरी चटनी बन जाएगी। दरबान मुस्कुराते हुए उन्हें यकीन दिलाने की कोशिश करता है कि यह महज़ एक फिल्म है और पर्दे पर नज़र आने वाला हाथी कभी सिनेमा से बाहर नहीं आ सकता। इस पर नजमन मियां एक बेहद मज़ाहिया और मासूम जवाब देते हैं कि ‘भाई मेरे, यह तो मैं भी जानता हूँ कि यह सिनेमा का हाथी है, मगर इस हाथी को यह बात थोड़ी मालूम है कि वह एक फिल्म का हिस्सा है’। यह छोटी कहानी इंसानी डर और उसके नतीजे में पैदा होने वाली दिलचस्प तर्क को बड़ी खूबसूरती से पेश करती है।

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❤️ سبق 13 : گرمی کا سماں (نظم)

यह नज़्म मशहूर शायर इस्माइल मेरठी की एक बेहतरीन रचना है, जिसका शीर्षक ‘गर्मी का समां’ है। इस नज़्म में शायर ने मई के महीने में पड़ने वाली भीषण गर्मी का नक्शा बड़ी महारत से खींचा है। वे बताते हैं कि जब मई का महीना आता है तो सूरज आग बरसाने लगता है और दोपहर के वक्त तपिश इतनी बढ़ जाती है कि इंसान सिर से पांव तक पसीने में शराबोर हो जाता है। सूरज ठीक सिर पर होने की वजह से साया भी पैरों तले छिप जाता है, जिससे गर्मी की शिद्दत का अंदाज़ा होता है। लू और कड़कती धूप की वजह से ज़मीन किसी दहकते हुए अंगारे की तरह महसूस होती है। इंसानों की हालत मछली जैसी हो जाती है जो पानी के बिना तड़पती है। पशु-पक्षी भी इस मौसम से बेहद परेशान होते हैं; परिंदे पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसते हैं जबकि जंगली जानवर और दरिंदे अपनी जान बचाने के लिए झाड़ियों और खाड़ियों में पनाह लेते हैं। शायर ने अमीरों और गरीबों के रहन-सहन के फर्क को भी स्पष्ट किया है। अमीर अपनी खुली हवेलियों में सुरक्षित हैं, जबकि गरीब अपनी छोटी सी झोपड़ियों में बिना किसी पंखे या कमरे के गर्मी का मुकाबला करने पर मजबूर हैं। नज़्म के आखिर में शायर इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसे मुश्किल वक्त में गरीबों का असली मददगार और रक्षक सिर्फ अल्लाह ही है।

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❤️ سبق 14 :آؤ ہم ماحول بچاہیں (مضمون)

यह अध्याय ‘आओ! हम माहौल बचाएं’ मानव जीवन और पर्यावरण के आपसी संबंध पर रोशनी डालता है। लेखक इस गलतफहमी को दूर करता है कि पर्यावरणीय मुद्दे सिर्फ वैज्ञानिकों के सोचने का विषय हैं। आज कैंसर, दिल के रोगों और सांस की तकलीफ में इजाफा, मौसमों का बदलता मिज़ाज और पानी का बढ़ता प्रदूषण सीधे तौर पर हमारे बिगड़ते हुए पर्यावरण का नतीजा हैं।

कुदरत ने कायनात की हर चीज़ को एक संतुलित निज़ाम में जोड़ा है, लेकिन इंसानी आबादी के दबाव और औद्योगिक क्रांति ने इस संतुलन को तहस-नहस कर दिया है। कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाली गैसों, जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड, ने न सिर्फ हवा को ज़हरीला किया बल्कि तेज़ाबी बारिश (acid rain) जैसे मुद्दे भी पैदा किए। जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने ज़मीन का हरा आवरण उतार दिया है, जिससे प्रदूषण सोखने का कुदरती निज़ाम बेकार हो गया है। यह पाठ हमें चेतावनी देता है कि अगर हमने अपनी बेहिसी नहीं छोड़ी और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत स्तर पर कदम नहीं उठाए, तो हम अपनी और आने वाली पीढ़ियों की सेहत और खुशहाली खो देंगे। हमें अपनी फज़ा को सेहतमंद रखने के लिए जागना होगा।

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❤️ سبق 14 (الف) : ہم بادل کہلاتے ہیں (صرف پڑھنے کے لئے)

यह नज़्म ‘हम बादल कहलाते हैं’ उर्दू के प्रतिष्ठित शायर जगन नाथ आज़ाद की एक बेहद खूबसूरत और शिक्षाप्रद नज़्म है जो प्रकृति के एक अहम पहलू यानी बारिश और बादलों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस नज़्म में बादल अपनी आपबीती सुनाते हुए कहते हैं कि जब ज़मीन पर सूरज की तपिश बढ़ जाती है और लोग गर्मी से बेहाल होते हैं, तो वे हिंद महासागर (बहर-ए-हिंद) से भाप बनकर उठते हैं और पूरे मुल्क पर छा जाते हैं। वे अपने ठंडे ‘पंखों’ यानी हवाओं के ज़रिए गर्मी का जोर तोड़ते हैं और पूरे मौसम को पूरी तरह बदल देते हैं।

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नज़्म में बादल बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी सरल शब्दों में बयान किया गया है कि किस तरह पानी पर सूरज की किरणें पड़ने से वह बादल का रूप लेता है। बादल जब उड़ते हुए पहाड़ों की चोटियों से टकराते हैं तो जल-थल कर देते हैं और प्यासी धरती को सींचते हैं। हिंदुस्तान की उपजाऊ ज़मीन पर इन बादलों का बरसना किसानों के लिए किसी नेमत से कम नहीं, जो बादलों को देखकर खुशी-खुशी अपने खेतों का रुख करते हैं और हल चलाते हैं। बादलों की इसी मेहरबानी से अनाज उगता है और इंसानियत का पेट भरता है। यह नज़्म न सिर्फ बादलों की अहमियत बताती है बल्कि इंसान और कुदरत के गहरे रिश्ते को भी उजागर करती है।

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❤️ سبق 15 : دو گز زمین (ترجمہ)

यह कहानी ‘दो गज़ ज़मीन’ रूसी लेखक लियो टॉल्स्टॉय की एक मशहूर नैतिक कहानी है। इसका मुख्य पात्र नचूम (पाखोम) नाम का किसान है जो ज़मीन के मालिकाना हक़ का बेहद लालची है। वह हमेशा ज़्यादा से ज़्यादा ज़मीन हासिल करने की फिक्र में रहता है। एक बार उसे मालूम होता है कि बाशकिरों के इलाके में बहुत सस्ती ज़मीन मिल रही है। वहां का सरदार एक अजीब शर्त रखता है कि एक हज़ार रूबल के बदले नचूम दिन भर में जितनी ज़मीन के गिर्द चक्कर लगा लेगा, वह उसकी हो जाएगी, बशर्ते वह सूरज डूबने से पहले वहीं वापस पहुँच जाए जहाँ से सफर शुरू किया था। नचूम लालच में आकर बहुत दूर निकल जाता है ताकि ज़्यादा ज़मीन घेर सके। वापसी पर सूरज ढलने लगता है और वह बदहवासी में दौड़ना शुरू करता है। वह ऐन वक्त पर टीले पर पहुँच तो जाता है लेकिन भयानक थकान और दिल की धड़कन बंद होने की वजह से वहीं दम तोड़ देता है। अंत में उसे उसी जगह दफना दिया जाता है, जहाँ उसे सिर्फ दो गज़ ज़मीन ही नसीब होती है। यह कहानी हमें सबक देती है कि इंसान के लालच की कोई सीमा नहीं, लेकिन अंत में उसे सिर्फ इतनी ही ज़मीन मिलती है जितनी उसकी कब्र के लिए काफी हो।

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❤️ سبق 15 (الف) : ہماری خواہش (صرف پڑھنے کے لئے)

यह नज़्म जिसका शीर्षक ‘हमारी ख्वाहिश’ है, बिस्मिल अज़ीमाबादी की मशहूर ग़ज़ल ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के चुनिंदा शेरों पर आधारित है। यह कलाम उर्दू साहित्य में देशभक्ति और त्याग की भावना की एक रोशन मिसाल है। शायर इसमें अपने ईमानी स्वाभिमान और वतन की आज़ादी के लिए मर-मिटने के पक्के इरादे का इज़हार करता है। नज़्म के शुरुआती शेरों में शायर दुश्मन को ललकारते हुए कहता है कि हमारे सीनों में अब वतन की खातिर जान कुर्बान करने की तीव्र इच्छा अंगड़ाइयां ले रही है और अब यह देखने का वक्त है कि ज़ालिम के हाथों में कितनी ताकत है। वह आसमान को संबोधित करके कहता है कि अभी से हम अपने इरादों का प्रचार नहीं करना चाहते बल्कि वक्त आने पर हमारा काम खुद बताएगा कि हम कितने बड़े सरफरोश हैं। शायर बताता है कि जंग के मैदान में कातिल भी हैरान है कि जान देने वालों के जज़्बे कम होने के बजाय और बढ़ते जा रहे हैं। अब दिलों में न तो धन-दौलत की हवस है और न ही दुनियावी शान-ओ-शौकत की कोई ख्वाहिश, बस एक ही तमन्ना बाकी है कि अपने प्यारे वतन की आज़ादी की खातिर अपनी जान का नज़राना पेश कर दें। यह नज़्म भारत की आज़ादी की लड़ाई का एक अमर हिस्सा है जिसने करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिलों में आज़ादी की शमा रोशन की।

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❤️ سبق 16 : بیگم حضرت محل (مضمون)

यह अध्याय बेगम हज़रत महल की बहादुरी और देशभक्ति पर आधारित है जो हिंदुस्तान की पहली जंग-ए-आज़ादी 1857 की एक नामवर वीरांगना थीं। वे अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की चहेती बेगम थीं जिनका पैदाइशी नाम ‘उमराव’ था। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने धोखे से अवध का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और नवाब वाजिद अली शाह को हटाकर कलकत्ता में नज़रबंद कर दिया, तो बेगम हज़रत महल ने अंग्रेजों की गुलामी कुबूल करने के बजाय मैदान-ए-जंग में उतरने का फैसला किया। उन्होंने अपने बेटे बिरजिस कद्र को अवध का वली-अहद (उत्तराधिकारी) नियुक्त किया और अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का झंडा बुलंद किया। उन्होंने नाना साहब, बहादुर शाह जफर और मौलवी अहमद उल्ला शाह के साथ मिलकर रणनीति तैयार की और ग्यारह दिन के अंदर अवध को आज़ाद करा लिया। बेगम हज़रत महल ने महिलाओं का एक संगठित फौजी दस्ता और जासूसों की जमात तैयार की जो मर्दाना लिबास पहनकर दुश्मन का मुकाबला करती थीं। उन्होंने पौने दो साल तक अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। मलिका विक्टोरिया के माफीनामे और अंग्रेजी रियायतों को अपनी गैरत और खुद्दारी की खातिर ठुकरा दिया। आखिरकार हालात खराब होने पर उन्होंने नेपाल में पनाह ली जहाँ गुमनामी की हालत में इंतकाल किया। काठमांडू में उनकी कब्र आज भी उनके मज़बूत इरादे और हिम्मत की दास्तान सुनाती है।

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❤️ سبق 17 : دادی اماں مان جاؤ (ڈرامہ)

यह अनीस आज़मी का लिखा हुआ एक शिक्षाप्रद नाटक है जिसका शीर्षक ‘दादी अम्मा मान जाओ’ है। इस ड्रामे का केंद्रीय विचार लड़कियों की शिक्षा की अहमियत को उजागर करना है। कहानी एक घरेलू माहौल के इर्द-गिर्द घूमती है जहाँ दादी अम्मा अपनी पोतियों की शिक्षा की सख्त विरोधी हैं और चाहती हैं कि वे स्कूल जाने के बजाय घर के काम-काज सीखें। वे हर वक्त बच्चियों को पढ़ाई पर डांटती रहती हैं। हालाँकि, जब उनकी बेटी मुहम्मदी (फूफी) घर आती हैं और उन्हें अपनी एक सहेली अकीला की दर्दनाक कहानी सुनाती हैं, जो विधवा होने के बाद अनपढ़ होने की वजह से बहुत बेसहारा हो गई थी, तो दादी का नज़रिया बदल जाता है। मुहम्मदी समझाती हैं कि शिक्षा न सिर्फ लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा करती है बल्कि मुश्किल वक्त में उनका सहारा भी बनती है। दादी अपनी गलती का एहसास करते हुए न सिर्फ बच्चियों को उच्च शिक्षा दिलाने का वादा करती हैं बल्कि खुद भी पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर करती हैं और अपनी छोटी पोती रोबीना से रोज़ाना एक घंटा पढ़ाने की शर्त रखती हैं। यह ड्रामा समाज में महिलाओं की आत्मनिर्भरता और शिक्षा के लिए एक सकारात्मक संदेश देता है।

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❤️ سبق 18 : علم اور عقل (نظم)

अल्लामा शफ़क़ इमादपुरी की यह नज़्म ‘इल्म और अक्ल’ (ज्ञान और बुद्धि) ज्ञान की अपार अहमियत और उसकी फज़ीलत पर आधारित है। शायर की नज़र में इल्म एक ऐसी अनमोल दौलत है जो खर्च करने से कम होने के बजाय और बढ़ती है, और इसे दुनिया का कोई भी लुटेरा या चोर नहीं चुरा सकता। नज़्म में अक्ल और इल्म की तुलना करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि हालाँकि बुद्धि जानवरों में भी मौजूद होती है जो उन्हें ज़िंदगी गुज़ारने में मदद देती है, लेकिन इंसान को ‘अशरफ़-उल-मखलूकात’ (सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ) का दर्जा सिर्फ इल्म की बदौलत ही मिला है। अक्ल अपने आप में एक औज़ार है, लेकिन उसे अच्छे-बुरे और खरे-खोटे की पहचान सिर्फ इल्म ही सिखाता है। जब इंसानी अक्ल किसी मुश्किल में फंस जाती है या उसे सच्चाई का सुराग नहीं मिलता, तो इल्म ही वह रोशन चिराग है जो उसे मंज़िल का रास्ता दिखाता है। इल्म के ज़रिए ही इंसान दुनिया में ऊँचा मकाम हासिल करता है और अपनी आखिरत (परलोक) को भी रोशन बनाता है। इल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह इंसान को अपने रब की पहचान करवाता है। इल्म ही वह नूर है जो अज्ञानता के अंधेरों को मिटाकर इंसानियत को चेतना और जागरूकता की नई मंज़िलों से परिचित करवाता है। यह नज़्म यह पैगाम देती है कि अक्ल की कामयाबी की कुंजी इल्म है और इल्म के बिना इंसानी तरक्की नामुमकिन है।

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❤️ سبق 19 : فضول خرچی (کہانی)

यह पाठ ‘फ़िज़ूल खर्ची’ की बुराइयों और उसके बुरे नतीजों पर रोशनी डालता है। लेखक के मुताबिक फ़िज़ूल खर्ची दुनिया की सबसे बुरी आदत है क्योंकि यह इंसान को आर्थिक रूप से कंगाल और समाज में अपमानित कर देती है। वह शख्स जो अपनी हैसियत से ज़्यादा खर्च करता है, वह जल्द ही परेशानियों में घिर जाता है। बड़े-बड़े खानदान और महान सल्तनतें सिर्फ इसी एक आदत की वजह से तबाह हो गईं। कहानी में एक बनिया और एक सौदागर की मिसाल के ज़रिए बचत की अहमियत समझाई गई है। सौदागर को दिखावे और फ़िज़ूल खर्ची का शौक था, जबकि बनिया ज़रूरत के मुताबिक खर्च करने का कायल था। शादी के मौके पर सौदागर ने झूठी शोहरत के लिए अपनी तमाम जमा पूंजी लुटा दी और कर्ज़ लेकर भी खर्च किया, जिसका अंजाम यह हुआ कि वह जल्द ही पूरी तरह बर्बाद हो गया। इसके विपरीत बनिये ने सादगी अपनाई और बेकार रस्मों से बचकर अपना सरमाया (पूंजी) सुरक्षित रखा। इस पाठ का संदेश यह है कि अक्लमंदी सिर्फ पैसा कमाने में नहीं बल्कि उसे सही जगह और सही वक्त पर खर्च करने में है। फ़िज़ूल खर्ची अल्लाह को भी नापसंद है और इंसान को अपमान की तरफ ले जाती है। हमें चाहिए कि हम कम खर्च करने की आदत डालें ताकि दूसरों के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आए।

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❤️ سبق 19 (الف) : مکھی چوس (صرف پڑھنے کے لئے)

यह एक दिलचस्प और व्यंग्यात्मक छोटी कहानी है जिसका शीर्षक ‘मक्खी चूस’ है, जो कि एक बेहद कंजूस आदमी की ज़िंदगी के एक हास्यास्पद पहलू को उजागर करती है। इस कहानी का मुख्य पात्र अख्तर नाम का एक शख्स है जो अपनी कंजूसी के लिए मशहूर है। एक बार बाज़ार में घी की कीमत सौ रुपये से कम होकर अस्सी रुपये हो जाती है। यह खबर सुनकर जहाँ पूरा शहर खुशी मना रहा होता है कि महंगाई में कुछ कमी आई है, वहीं अख्तर इस खबर को सुनकर गहरे सदमे और उदासी का शिकार हो जाता है। जब उसका दोस्त असलम उससे इस परेशानी की वजह पूछता है तो अख्तर एक बेहद अजीब दलील पेश करता है। वह कहता है कि चूंकि वह घी इस्तेमाल नहीं करता था, इसलिए वह हर माह एक सौ रुपये बचा लिया करता था। अब कीमत कम होने की वजह से उसकी मासिक बचत सौ रुपये के बजाय सिर्फ अस्सी रुपये रह जाएगी, जिसका मतलब है कि उसे माहवार बीस रुपये का ‘नुकसान’ हो रहा है। यह कहानी इंसान के इस बेजा लालच और कंजूसी की तस्वीर पेश करती है जहाँ वह फायदे को भी नुकसान की शक्ल में देखता है। अख्तर की यह सोच उसके व्यक्तित्व के उस अंधेरे और हास्यास्पद पहलू को ज़ाहिर करती है जहाँ बचत का जुनून उसे आम खुशियों से दूर कर देता है। यह छोटी मगर शिक्षाप्रद कहानी इंसानी फितरत की एक अजीबोगरीब आदत को बहुत खूबसूरती से बयान करती है।

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❤️ سبق 20 : میرا بچپن (ترجمہ)

इस लेख में लेखिका कृष्णा सोबती अपने बचपन की यादें ताज़ा करती हैं। वे बताती हैं कि उनका बचपन आज के दौर से कितना अलग था। वे अपने बचपन के पहनावे, जैसे रंग-बिरंगी फ्रॉकें, स्कर्ट और लहंगे वगैरह का ज़िक्र करती हैं। उन्होंने बताया कि रविवार की सुबह वे अपने मोज़े खुद धोती थीं और जूते पॉलिश करती थीं। उन्हें हर हफ्ते कैस्टर ऑयल या ऑलिव ऑयल पीना पड़ता था जो एक मुश्किल काम था। वे शिमला की ज़िंदगी का ज़िक्र करती हैं जहाँ वे ग्रामोफोन पर गाने सुनती थीं और शिमला मॉल से ब्राउन ब्रेड लाती थीं। खाने-पीने में भी बहुत बदलाव आया है, पहले की कुल्फी अब आइसक्रीम बन गई है और कचौरी-समोसे बर्गर में बदल गए हैं। लेखिका ने अपने पहले चश्मे का किस्सा भी सुनाया कि जब उन्हें पहली बार ऐनक लगी तो उनके कज़न उन्हें ‘लंगूर की सूरत’ कहकर चिढ़ाते थे। वे शिमला की पहाड़ियों, घोड़ों की सवारी और शाम के खूबसूरत मंज़र को बहुत याद करती हैं। यह लेख हमें पुराने वक्त की सादा और मज़ेदार ज़िंदगी की झलक दिखाता है और आज के बदलते हुए वक्त के साथ तुलना करने पर मजबूर करता है। यह तहरीर उनके शिमला में गुज़ारे गए बचपन के दिनों की एक खूबसूरत आपबीती है।

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❤️ سبق 21 : صبر کی اہمیت (نظم)

उर्दू भाषा के महान मर्सिया निगार मीर अनीस की यह नज़्म ‘सब्र की अहमियत’ इंसानी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई यानी मौत और उसके नतीजे में पैदा होने वाले दुखों पर सब्र करने की सीख देती है। शायर ने दुनिया को एक ऐसे बाग से उपमा दी है जहाँ बहार और पतझड़ का आना-जाना लगा रहता है। वे कहते हैं कि जिस तरह फूल खिलते हैं और मुरझा जाते हैं, उसी तरह इंसान भी इस दुनिया में आकर विदा हो जाता है। नज़्म का केंद्रीय विचार यह है कि मौत से किसी को छुटकारा नहीं और सबसे ज़्यादा तकलीफदेह चरण माता-पिता के सामने उनकी जवान औलाद का रुखसत होना है। ऐसे कठिन वक्त में जब कोई उपाय काम नहीं आता, तो सिर्फ सब्र ही वह एकमात्र रास्ता है जो इंसान को बिखरने से बचाता है। मीर अनीस के मुताबिक ‘सब्र की सिल छाती पर धरना’ एक निहायत मुश्किल काम है लेकिन यही वह ताकत है जो इंसान को तकदीर के सामने सिर झुकाने का हौसला देती है। यह नज़्म ‘मुसद्दस’ (छह मिसरों वाला बंद) की शक्ल में है और इसकी भाषा बेहद सरल मगर प्रभावशाली है। इस पाठ का मकसद छात्रों को यह सिखाना है कि ज़िंदगी की कड़वाहटों और सदमों को हिम्मत और गरिमा के साथ बर्दाश्त करना ही असली इंसानियत है, क्योंकि बेसब्री से तकदीर नहीं बदली जा सकती।

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