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Bihar Board Books

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Bihar Board Class 6th Urdu Book 2026 PDF Download

Last Updated on January 26, 2026 by bseb Leave a Comment

Bihar Board 6th Urdu Book 2026 PDF Download

Bihar Board Class 6th Urdu Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 6th के छात्रों के लिए “Urdu (اردو)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |

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BSEB Class 6 Urdu (اردو) Textbook PDF Free Download

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❤️ Preface


यह पुस्तक ‘फ़ुरोज़ें भाग – 1’ कक्षा छह के लिए उर्दू भाषा की एक पाठ्यपुस्तक है, जिसे राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT), बिहार, पटना द्वारा तैयार किया गया है। इस पुस्तक का मूल उद्देश्य बच्चों में उर्दू भाषा जानने का शौक पैदा करना और उनकी शब्दावली को समृद्ध करना है। पुस्तक में विभिन्न प्रकार की काव्य और गद्य रचनाओं को सावधानीपूर्वक शामिल किया गया है, जिनमें हम्द, नज़्में, कहानियाँ, निबंध और ग़ज़लें शामिल हैं। पुस्तक के महत्वपूर्ण पाठों में अल्ताफ़ हुसैन हाली की हम्द, मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैल’, अल्लामा इक़बाल की नज़्म ‘जुगनू’, और रवींद्र नाथ टैगोर का मशहूर अफ़साना ‘काबुली वाला’ शामिल हैं। इसके अलावा ऐतिहासिक और जानकारीपरक निबंध जैसे ‘हज़रत उमर बिन अब्दुलअज़ीज़’, ‘गंगा नदी’, ‘दिल्ली की जामा मस्जिद’ और नए ज़माने की ज़रूरत ‘कंप्यूटर’ पर भी पाठ मौजूद हैं। हर पाठ के अंत में विस्तृत अभ्यास दिए गए हैं जो छात्रों की विचारशीलता, भाषाई और लेखन कौशल को उभारने में कुंजी का काम करते हैं। शिक्षकों के लिए भी पुस्तक में विशेष निर्देश दर्ज हैं ताकि वे बच्चों को सही उच्चारण, स्वर और विराम चिह्नों के साथ उर्दू पढ़ना सिखा सकें। पुस्तक की तैयारी में बच्चों की मानसिक क्षमता और उनकी रुचियों का पूरा ध्यान रखा गया है ताकि वे बोझ महसूस किए बिना ज्ञान अर्जित कर सकें। यह पुस्तक केवल शैक्षिक मानकों को पूरा करने की एक संक्षिप्त कोशिश नहीं है बल्कि बच्चों को बेहतरीन नैतिक और सामाजिक मूल्यों से भी रोशनास कराती है, जो उनकी हर जीत के लिए ज़रूरी हैं।

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❤️ سبق 1 : حمد (نظم)


यह पुस्तक का पहला पाठ है जिसका शीर्षक ‘हम्द’ है। यह हम्द उर्दू के प्रसिद्ध और मान्य शायर मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली द्वारा लिखी गई है। हम्द उस नज़्म को कहते हैं जिसमें अल्लाह तआला की प्रशंसा और गुणगान व्यक्त किया जाए। इस नज़्म में शायर ने अल्लाह तआला की महानता और सामर्थ्य का बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है। हाली कहते हैं कि अल्लाह तआला ही इस पूरी कायनात, धरती, आसमान और सभी जीवों का असली मालिक है। वही हर इंसान का सहारा है और मुसीबत के समय काम आने वाला है। अल्लाह तआला की मौजूदगी का एहसास कायनात की हर चीज़ में होता है, चाहे वह फूलों की खुशबू हो या फलों का स्वाद। वही अंधेरे दिलों की रोशनी है और नाउम्मीदों की आखिरी उम्मीद है। पत्ते उसके हुक्म से हिलते हैं और कलियाँ उसके हुक्म से खिलती हैं। शायर के मुताबिक इंसान की ज़िंदगी की नाव को पार लगाने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है। यह नज़्म हमें याद दिलाती है कि ख़ुदा हर वक़्त हमारे पास होता है और हमें हर हाल में उसी की तारीफ़ करनी चाहिए। नज़्म के अंत में मुश्किल शब्दों के मायने, अभ्यास और सवाल भी दिए गए हैं ताकि छात्र इसे बेहतर तरीक़े से समझ सकें।

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❤️ سبق 2 : دو بیل (کہانی)


यह पाठ मशहूर कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैल’ पर आधारित है जो उर्दू साहित्य की एक शानदार और शिक्षाप्रद कहानी है। कहानी दो बैलों, हीरा और मोती, की दोस्ती और उनके साहसिक अनुभवों के इर्द-गिर्द घूमती है। इन दो बैलों का मालिक एक कंजूस किसान है जो उनसे ज़्यादा से ज़्यादा काम लेना चाहता है लेकिन उन्हें भरपेट खाना नहीं देता। दोनों बैल इस बुरे बर्ताव से तंग आकर खेत से भाग जाते हैं और जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। रास्ते में उन्हें कई मुसीबतों और मज़ेदार अनुभवों का सामना करना पड़ता है। वे एक सर्कस में फँस जाते हैं, एक टाइगर से भिड़ते हैं और अंत में अपने गाँव वापस लौट आते हैं। यह कहानी सिखाती है कि आज़ादी सबसे बड़ी नेमत है और मेहनत करने वाले जानवरों या इंसानों के साथ भी इंसाफ़ और दया से पेश आना चाहिए। प्रेमचंद ने इसमें साधारण जीवन की गहरी समझ और हास्य का बेहतरीन मिश्रण पेश किया है। बच्चों को यह कहानी मज़ेदार लगने के साथ-साथ जानवरों के प्रति दया और एकता का पाठ भी सिखाती है।

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❤️ سبق 3 : جگنو (نظم)


अल्लामा इक़बाल की यह खूबसूरत नज़्म ‘जुगनू’ प्रकृति की एक छोटी सी लेकिन हैरतअंगेज़ मखलूक की तस्वीर पेश करती है। नज़्म की शुरुआत शायराना ख़्याल से होती है जहाँ जुगनू को बाग़ की महफ़िल में एक जलती हुई मोमबत्ती या आसमान से गिरा हुआ तारा कहा गया है। इक़बाल के नज़दीक जुगनू महज़ एक कीड़ा नहीं बल्कि खुलूत-ए-कदीम (प्राचीन चमक) की एक झलक है जिसे प्रकृति ने मेहफ़िल में ज़ाहिर किया है। नज़्म में परवाने और जुगनू का मुक़ाबला बहुत सबक़ आमोज़ है; परवाना रोशनी की तलाश में भटकता है जबकि जुगनू ख़ुद रोशनी का सरापा है। यह फ़र्क़ इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि असल कमाल दूसरों से रोशनी माँगना नहीं बल्कि ख़ुद रोशनी का स्रोत बनना है। शायर ने इसे ‘शब की सल्तनत में दिन का सफ़ीर’ कहकर इसकी अहमियत को अजागर किया है कि किस तरह वह ख़ामोशी और गुमनामी में भी चमकता रहता है। नज़्म का केंद्रीय ख़्याल यह है कि अल्लाह की पैदाइश हर चीज़ में कोई न कोई हिकमत और खूबसूरती पोशीदा है। यह नज़्म हमें पैग़ाम देती है कि चाहे हम कितने ही छोटे क्यों न हों, हम अपनी मेहनत और औसाफ़ से समाज की तारीकी को ख़त्म कर सकते हैं और ख़ैर व फ़लाह की रोशनी फैला सकते हैं। यह नज़्म फ़न्नी लहाज़ से भी सादा मगर परासर है जो बच्चों में तख़लीक़ी सोच पैदा करती है।

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❤️ سبق 4 : حضرت عمربن عبدلعزیز (مضمون)


यह पाठ मुसलमानों के मशहूर खलीफ़ा हज़रत उमर बिन अब्दुलअज़ीज़ रहमतुल्लाह अलैह की सादगी और पाकीज़ा ज़िंदगी के बारे में है। खिलाफ़त मिलने से पहले वे बड़ी शान और शौकत की ज़िंदगी गुज़ारते थे, लेकिन खिलाफ़त की ज़िम्मेदारी संभालते ही उनकी ज़िंदगी बिल्कुल बदल गई। उन्होंने शाहाना ठाठ-बाट छोड़ दिए, अपनी सारी कीमती विरासत और अपनी बीवी के ज़ेवर बैतुलमाल में जमा करा दिए और बेहद सादा तरीक़ा ज़िंदगी अपनाया। वे बैतुलमाल की अमानत के इतने हिफ़ाज़त करते थे कि सरकारी काम के दौरान जब निजी मुलाक़ातें आतीं तो सरकारी चिराग बुझाकर अपना निजी चिराग रोशन कर लेते। उन्होंने अपने बच्चों के लिए ईद पर नए कपड़े बनवाने से भी इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास इतने रक़म नहीं थी और वे बैतुलमाल से पैसे लेना ग़लत समझते थे। उन्होंने अपने दौर में उलमा की रहनुमाई में बहुत सी सुधारें कीं, जिनमें शराब पर पाबंदी, बेजा रस्मों का ख़ात्मा और ग़ुलामों की आज़ादी शामिल है। उनकी खिलाफ़त का अर्सा महज़ दो साल पाँच महीने पर था, लेकिन इस संक्षिप्त वक़्त में उन्होंने इंसाफ़ और न्याय की ऐसी मिसाल क़ायम की कि लोग ज़कात देने के लिए हाजतमंद तलाश करते थे मगर कोई मुहताज नहीं मिलता था। उनका नाम तारीख़ में हमेशा एक आदिल और परहेज़गार हाकिम के तौर पर रोशन रहेगा।

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❤️ سبق 5 : احسان کا بدلہ احسان (کہانی)


यह पाठ एक शिक्षाप्रद कहानी है जो एक अहसान के बदले अहसान करने के महत्व को दर्शाती है। कहानी एक नेक और मददगार आदमी के इर्द-गिर्द घूमती है जो हमेशा दूसरों की मदद करता है। एक दिन वह रास्ते में एक बूढ़े आदमी से मिलता है जो बहुत थका हुआ और मुसीबत में है। वह उसकी मदद करता है, उसे खाना खिलाता है और उसके घर तक छोड़ने जाता है। बूढ़ा आदमी असल में एक धनी व्यक्ति निकलता है जो उसकी नेकी से बहुत प्रभावित होता है। कुछ साल बाद, जब वह नेक आदमी आर्थिक मुश्किलों से गुज़र रहा होता है, तो वही बूढ़ा आदमी उसकी मदद के लिए आगे आता है और उसकी सारी परेशानियाँ दूर कर देता है। कहानी का सार यह है कि अच्छे कर्म कभी बेकार नहीं जाते और दूसरों की मदद करने वाले की मदद ज़रूर होती है। यह बच्चों को दयालुता, ईमानदारी और परोपकार की भावना सिखाने का एक बेहतरीन माध्यम है। कहानी सरल भाषा में लिखी गई है और बच्चों को नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाने में मददगार साबित होती है।

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❤️ سبق 6 : وطن کا راگ (نظم)


नज़्म ‘वतन का राग’ जिसके शायर अफ़सर मेरठी हैं, भारत की हुब्बे-वतनी और क़ौमी एकजुटता का एक बेहतरीन नमूना है। इस नज़्म में शायर ने बड़े दिलकश अंदाज़ में अपने वतन की तारीफ़ की है और इसे दुनिया का सबसे प्यारा और न्यारा देश क़रार दिया है। वह कहता है कि भारत का हर मौसम और हर ऋतु अपनी मिसाल आप है और यह मुल्क दुख और सुख दोनों हालतों में हमारा सबसे बड़ा सहारा है। नज़्म में भारत की अज़ीम रूहानी शख्सियतों जैसे श्री कृष्ण, महात्मा गौतम बुद्ध, हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और गुरु नानक देव जी का ज़िक्र किया गया है, जिनकी तालीमात और पैग़ाम आज भी इस मुल्क की फ़ज़ाओं में गूँज रहे हैं। इन अज़ीम हस्तियों ने हमें इंसानियत और मोहब्बत का दर्स दिया। शायर वाज़ेह करता है कि यहाँ रहने वालों का मज़हब चाहे कुछ भी हो—ख़्वाह वह हिंदू हों, मुसलमान हों, सिख हों या ईसाई—वह सब पहले ‘हिंदी’ हैं और आपस में भाई-भाई की तरह रहते हैं। प्रेम और मोहब्बत ने इन सबको एक कर दिया है और वह सब अपने वतन भारत के सच्चे आशिक़ और दीवाने हैं। यह नज़्म हमें सबक़ देती है कि भारत की बुनियाद अमन, रवादारी और कस्रत में वहदत पर क़ायम है और हमें इस अज़ीम वर्से की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।

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❤️ سبق 7 : گنگا ندی (مضمون)


गंगा नदी भारत की अज़मत, वक़ार और प्राचीन सभ्यता व संस्कृति की एक अहम निशानी है। यह हिमालय के बर्फ़ानी आबशार गंगोत्री से निकलती है और हरिद्वार के मुक़ाम पर पहाड़ों से उतरकर मैदानी इलाक़ों में शामिल हो जाती है। हरिद्वार एक मुक़द्दस मुक़ाम है जहाँ हर साल बाद कुंभ का अज़ीम-उल-शान मेला लगता है। इसके बाद यह नदी कानपुर जैसे औद्योगिक शहर से गुज़रती है जहाँ यह कारख़ानों के लिए पानी का अहम ज़रिया बनती है। प्रयाग (इलाहाबाद) में इसका संगम यमुना नदी से होता है जो कि एक ऐतिहासिक और मज़हबी अहमियत की जगह है। बनारस या काशी में गंगा के किनारे बेशुमार मंदिर और घाट मौजूद हैं जहाँ मुल्क भर से ज़ायरीन आश्नाई और इबादत के लिए आते हैं। बिहार के इलाक़े में कोसी, गंडक और सोन जैसी नदियाँ इसमें शामिल होकर इसकी वुसअत में इज़ाफ़ा करती हैं। पटना और भागलपुर से होती हुई यह बंगाल में दाख़िल होती है और सुंदरबन का अज़ीम वीराना बनाती है। गंगा ने उत्तरी भारत के मैदानों को अंतहाई ज़रखेज़ बनाया है और मुल्क की आधी आबादी अपनी मआशत के लिए इस पर मुन्हसिर है। अफ़सोसनाक पहलू यह है कि बढ़ती हुई शहरी आलूदगी और औद्योगिक फ़ज़लह इस नदी को गंदा कर रही है, जिससे बचाव निहायत ज़रूरी है।

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❤️ سبق 8 : کابلی والا (کہانی)


यह कहानी रवींद्र नाथ टैगोर की तहरीर कर्दह है, जिसका उनवान ‘काबुली वाला’ है। यह पाँच सालह मुन्नी और काबुल के मेवा फ़रोश रहमत के गिर्द घूमती है। मुन्नी शुरू में रहमत से डरती थी, लेकिन जल्द ही उनके दरमियान गहरी दोस्ती हो गई। रहमत मुन्नी को मेवे में तोहफ़े देता और वह दोनों एक दूसरे से मज़ाहिया बातें करते। रहमत अक्सर मुन्नी से ‘ससुराल’ जाने का मज़ाक़ करता। बदकिस्मती से, एक झगड़े में रहमत के हाथों एक शख्स ज़ख़्मी हो गया और उसे सात साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई। बरसों बाद जब वह रिहा होकर आया, तो वह मुन्नी की शादी का दिन था। मुन्नी अब बड़ी हो चुकी थी और उसे भूल चुकी थी। जब रहमत ने अपनी बेटी के हाथ का निशान दिखाया, तो मुन्नी के वालिद को एहसास हुआ कि वह महज़ एक सौदागर नहीं बल्कि एक मजबूर बाप है। यह कहानी बाप की अपनी औलाद के लिए बे-लुत्फ़ मोहब्बत की एक बेहतरीन मिसाल है जो सरहदों से आज़ाद है। यह हमें सिखाती है कि एक बाप का दिल हर जगह एक जैसा होता है। रहमत की ग़ुरबत और उसकी अपनी बेटी के लिए तड़प इस कहानी का सब से जज़्बाती पहलू है जो हर क़ारी को मुतास्सिर करता है।

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❤️ سبق 9 : گاندھی جی (مضمون)


यह पाठ महात्मा गांधी की मिसाली ज़िंदगी और हिंदोस्तान की आज़ादी में उनके अज़ीम करदार पर रोशनी डालता है। मोहन दास करमचंद गांधी 2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर में पैदा हुए। लंदन से वकालत की तालीम हासिल करने के बाद वह बैरिस्टर बने। दक्षिण अफ़्रीक़ा में उन्होंने हिंदोस्तानियों के साथ होने वाली ना-इंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ ‘सत्याग्रह’ की तहरीक चलाई। हिंदोस्तान वापसी पर वह तहरीके-आज़ादी के सब से बड़े लीडर बन गए। उन्होंने ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ अदम-तआवुन, नमक सत्याग्रह और ‘हिंदोस्तान छोड़ो’ जैसी अहम तहरीकों की क़यादत की। गांधी जी का फ़लसफ़ा सच्चाई, अदम-तशद्दुद और इंसानी हमदर्दी पर मुबनी था। उन्होंने समाज से छुआछूत ख़त्म करने के लिए ‘हरिजनों’ की फ़लाह व बेहबूद के लिए काम किया। उनकी अंतहा कोशिशों से 15 अगस्त 1947 को मुल्क आज़ाद हुआ। अफ़सोस कि 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में उन्हें शहीद कर दिया गया। उनकी अज़ीम ख़िदमात की बदौलत उन्हें ‘बापू’ और ‘बाबाए-क़ौम’ कहा जाता है। उनकी ज़िंदगी सादगी और अलौक इंसानी अक़ीदे का मजमूआ है। वह आज भी दुनिया भर में अमन के पैग़म्बर के तौर पर पहचाने जाते हैं और उनकी तालीमात हमें नफ़रत के ख़िलाफ़ मोहब्बत और सच्चाई का रास्ता दिखाती हैं।

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❤️ سبق 10 : کمپیوٹر (مضمون)


यह पाठ ‘कंप्यूटर’ के बारे में है जो एक जदीद और हैरतअंगेज़ मशीन है। पाठ की शुरुआत एक सादे कैलकुलेटर की मिसाल से होती है जो हिसाब किताब में आसानी पैदा करता है, लेकिन कंप्यूटर उस से कहीं ज़्यादा पेचीदा और ताक़तवर आला है। कंप्यूटर इंसानी दिमाग़ की तरह काम करता है, मालूमात को माहफ़ूज़ करता है (फ़ीडिंग) और उन्हें ख़ास मक़ासद के लिए इस्तेमाल के क़ाबिल बनाता है (प्रोग्रामिंग)। यह ग़लती नहीं करता और मालूमात का एक वसीअ ख़ज़ाना अपने अन्दर समोए रखता है। कंप्यूटर की अफ़ादित का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि यह हर शोबा ज़िंदगी में इस्तेमाल हो रहा है, चाहे वह बैंक हो, लाइब्रेरी, अस्पताल या कारख़ाना। ख़ास तौर पर ख़तरनाक जगहों पर इंसान की जगह कंप्यूटर यानी ‘रोबोट’ काम करते हैं। मौसमियात, ख़लाई तहक़ीक़, और पाइलेट्स की रहनुमाई में भी इसका अहम करदार है। वक़्त के साथ इसकी जिस्मात छोटी होती गई लेकिन काम की रफ़्तार और सलाहियत बढ़ती गई। मुसन्निफ़ का ख़्याल है कि मुस्तक़बिल में कंप्यूटर घर के काम-काज, खाना पकाने और सफ़ाई सतहराई में भी मददगार साबित होगा, जिस से इंसानी ज़िंदगी मज़ीद आसान हो जाएगी। आख़िर में अल्लामा इक़बाल के शेर के ज़रिए इस साइंसी तरक़्क़ी की हैरतअंगेज़ी को बयान किया गया है, जो दुनिया को बदल कर रख देगी।

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❤️ سبق 11 : کہنا بڑوں کا مانو (نظم)


यह नज़्म बच्चों को यह सबक़ देती है कि बड़ों की बात माननी चाहिए और उनका आदर करना चाहिए। नज़्म में कहा गया है कि बड़ों के पास ज़िंदगी का अनुभव होता है और वे हमारी भलाई के लिए सलाह देते हैं। उनकी बात मानने से हम ग़लतियों से बच सकते हैं और सही रास्ते पर चल सकते हैं। नज़्म में उदाहरण के तौर पर बताया गया है कि जब माँ कहती है कि बारिश में भीगो मत, तो उसकी बात माननी चाहिए नहीं तो बीमार पड़ सकते हैं। पिता कहते हैं कि पढ़ाई पर ध्यान दो, तो उनकी बात मानकर हम ज़िंदगी में तरक़्क़ी कर सकते हैं। नज़्म इस बात पर ज़ोर देती है कि बड़ों की नसीहतें हमारे लिए एक तोहफ़ा हैं और उन्हें क़द्र की नज़र से देखना चाहिए। यह नज़्म बच्चों में आज्ञाकारिता और सम्मान की भावना विकसित करने में मदद करती है।

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❤️ سبق 12 : نینی تال (مضمون)


यह पाठ ‘नैनीताल’ के बारे में है जो राज्य उत्तराखंड का एक अंतहाई मआरूफ़ और दिलकश पहाड़ी मुक़ाम है। अपनी फ़रहत बख़्श आब-ओ-हवा और बेमिसाल क़ुदरती खूबसूरती की बिना पर इसे ‘पहाड़ों की मलिका’ का ख़िताब दिया गया है। नैनीताल की दरयाफ़्त का सरा 1841 में पी बैरन नामी एक ताजिर के सर जाता है। यह सैयाहती मुक़ाम काठगोदाम रेलवे स्टेशन से तक़रीबन 22 मील के फ़ासले पर वाक़े है और वहाँ तक पहुँचने वाली बलखाती सड़कें अपनी बनावट में एक साँप की तरह मआरूफ़ होती हैं। नैनीताल के मर्कज़ में एक वसीअ और खूबसूरत झील मौजूद है जिसके गिर्द एक मील लंबी ‘माल रोड’ तअमीर की गई है। यहाँ ‘आयर पाटा’ और ‘चीना’ नामी दो बुलंद पहाड़ हैं, जहाँ से मुतलअ साफ़ होने पर हिमालय की बर्फ़ से ढकी चोटियाँ साफ़ दीखती हैं। नैनीताल के नवाह में भवाली का मुक़ाम है जो अपने सीने टूरिज्म और ज़ाइक़ेदार फूलों के लिए शहरत रखता है। इसके अलावा भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, नल-दमयन्ती ताल और लक्ष्मी ताल जैसी झीलें भी क़ुदरत का शाहकार हैं। सैयाहों के लिए यहाँ कश्ती रानी, घुड़सवारी और कोई पैमाइशी तफ़रीहात मयस्सर हैं। झील के किनारे वाक़े म्युनिसिपल लाइब्रेरी और ‘फ्लैट’ का मैदान भी ख़ास अहमियत रखते हैं जहाँ रोज़ाना फुटबॉल और हॉकी के मुक़ाबले होते हैं। नैनीताल में मल्लीताल और तल्लीताल के दो बाज़ार हैं, जिनमें से मल्लीताल अंग्रेज़ी तर्ज़ का है जबकि तल्लीताल में ज़रूरतात-ए-ज़िंदगी की अश्या मिलती हैं। यह मुक़ाम जून, सितंबर और अक्तूबर में सैयाहों से भर जाता है और अपनी दिलकशी की वजह से पूरी दुनिया में मुनफ़रद है।

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❤️ سبق 13 : کنجوس کی کہانی (راجستھانی کہانی)


यह कहानी राजस्थान के एक अंतहाई कंजूस शख्स के गिर्द घूमती है जिसकी ज़िंदगी का वाहिद मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ दौलत जमा करना था। एक दिन उसकी बीवी ने आम खाने की फ़रमाइश की, लेकिन वह उस पर एक पैसा भी ख़र्च करना नहीं चाहता था। वह सस्ते से सस्ता आम हासिल करने की धुन में एक दुकान से दूसरी दुकान, फिर मुन्शी, आढ़ती और आख़िरकार एक दूर दराज़ बाग़ में पहुँच गया। वहाँ बाग़बान ने उसे यह लालच दिया कि अगर वह ख़ुद दरख्त पर चढ़कर सो आम तोड़ दे तो उसे एक बेहतरीन आम मुफ़्त में मिल जाएगा। कंजूस मुफ़्त के चक्कर में दरख्त की ऊँची और कमज़ोर शाख पर चढ़ गया, जहाँ से उसका तौआज़न बिगड़ गया और वह नीचे मौजूद एक गहरी दलदल के ऊपर लटक गया। उसे बचाने के लिए बारी-बारी से एक हाथी वाला, ऊँट वाला और घोड़े वाला आगे आया। कंजूस ने अपनी जान बचाने की ख़ातिर इन तीनों को सौ-सौ रुपए देने का वअदा किया। आख़िर में जब एक गधे वाले ने उससे पूछा कि इन चारों को उतारने के बदले कुल कितने रुपए मिलेंगे, तो कंजूस ने यह बताने के लिए कहा कि उसे बहुत सा रुपया मिलेगा, जोश में आकर दोनों हाथ फैला दिए। हाथ छूटते ही वह सब के सब नीचे दलदल में जा गिरे। यह दिलचस्प कहानी हमें यह क़ीमती सबक़ सिखाती है कि बख़ीलत, कंजूसी और बेजा लालच इंसान को न सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में ज़लील करता है बल्कि उसे बड़ी मुसीबत और ख़तरे में भी डाल देता है।

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❤️ سبق 14 : غزل (مرزا غالب)


यह दस्तावेज़ी मतन मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब की एक निहायत मक़बूल और शाहकार ग़ज़ल पर मुश्तमिल है, जो तालीमी निसाब की चौदहवीं बाब के तौर पर पेश की गई है। ग़ज़ल का मत्लअ ‘अबने मरीम हो कर कोई, मिरे देखे की दुआ करे कोई’ इंसानी बेबसी और ऐसे मसीहा की तलाश की अकासी करता है जो वाक़ई देखे का इलाज कर सके। ग़ालिब ने इस ग़ज़ल में ज़िंदगी की हक़ीक़तों, इंसानी रवैयों और अख़लाक़ी अक़ीदे को बहुत ही सादा और सहल ज़बान में बयान किया है ताकि तलबा इसे आसानी से समझ सकें। ग़ज़ल के अशआर में यह पैग़ाम दिया गया है कि अगर कोई शख्स ग़लत रास्ते पर गामज़न हो तो उसे टोकना और रोकना ज़रूरी है, और अगर किसी से नादानी में ख़ता हो जाए तो दरगुज़र और माफ़ी का जज़्बा अपनाना चाहिए। मक़्तअ में ग़ालिब ने अपनी रवायती इन्फ़रादियत के साथ बयान किया है कि जब ज़िंदगी में किसी से कोई तोक़अ या उम्मीद ही बाक़ी न रहे, तो फिर किसी से गिला या शिकायत करना फ़ज़ूल है। इस सबक़ में ग़ज़ल के अलावा मुश्किल अलफ़ाज़ के मआनी, तफ़हीमी सवालात और जुमलों में इस्तेमाल जैसी मशक़्क़ात भी दी गई हैं, जो तलबा की उर्दू ज़बान पर गिरफ़्त मज़बूत करने में मददगार साबित होती हैं। यह मवाद न सिर्फ़ शेरी ज़ौक़ की तस्कीन करता है बल्कि समाजी इस्लाह और हमदर्दी का दर्स भी देता है।

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❤️ سبق 15 : دلھ کی جامع مسجد (مضمون)


यह पाठ दिल्ली की मशहूर जामा मस्जिद के बारे में है, जो न सिर्फ़ हिंदोस्तान बल्कि पूरी दुनिया में अपनी खूबसूरती और फ़न्न-ए-तामीर के लिए जानी जाती है। इस अज़ीम-उल-शान मस्जिद को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने तक़रीबन तीन सौ साल पहले तामीर करवाया था। इसकी तामीर की निगरानी बादशाह के वज़ीर सअदुल्लाह ख़ाँ और ख़ानसामाँ फ़ज़ल ख़ाँ ने की। मस्जिद एक छोटी पहाड़ी पर वाक़े है जिसे ‘भोजला पहाड़ी’ कहा जाता था। इसकी तामीर में छ हज़ार कारीगरों और मज़दूरों ने छ साल तक काम किया और लाखों रुपए ख़र्च हुए। मस्जिद में ज़्यादातर लाल पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि सफ़े में सफ़ेद और काले पत्थर का फ़र्श बचाया गया है जो मुसल्लियों का मन्ज़र पेश करता है। मस्जिद के तीन बड़े गुंबद और दो बुलंद मीनार हैं जिन पर चढ़कर पूरी दिल्ली का नज़ारा किया जा सकता है। मस्जिद की कर्सी बहुत ऊँची है, और इसके तीन बड़े दरवाज़े हैं जिन तक पहुँचने के लिए बहुत सी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। ख़ास तौर पर जुमअतुल-विदा और ईदैन के मुक़ाम पर यहाँ हज़ारों लोग नमाज़ के लिए जमा होते हैं, जिस से एक रूह-परोर मन्ज़र पैदा होता है। यह मस्जिद मुग़ल दौर की बेहतरीन फ़न्न-ए-तामीर का शाहकार है।

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❤️ سبق 16 : غریب بچہ اور جادوگر (تبّت کی کہانی)


यह कहानी एक ग़रीब बच्चे और एक जादूगर के गिर्द घूमती है। एक तिब्बती गाँव में कुछ ग़रीब बच्चे सड़क के किनारे मिट्टी के घरौंदों से खेल रहे थे। इन के वालिदीन इतने ग़रीब थे कि वह इन्हें खिलौने या अच्छा खाना फ़राहम नहीं कर सकते थे। इन बच्चों में एक बच्चा सब से ज़्यादा मुफ़लिस था, जिस के पास अक्सर खाने को कुछ नहीं होता था और वह भूखा ही रह जाता था। एक दिन एक अंधा फ़क़ीर, जो हक़ीक़त में एक जादूगर था, वहाँ से गुज़रा। दूसरे बच्चों ने अपने हिस्से की रोटी में से कुछ लक़मे उसे दिए, लेकिन ग़रीब बच्चा अपनी ख़ाली झोली की वजह से कुछ न दे सका और बहुत अदब से हुआ। जादूगर ने उस की क़ीफ़ियत भाँप ली और उस से कहा कि जो तुम्हारी झोली में हाथ में है वही दे दो। बच्चे के हाथ में मिट्टी की एक गेंद थी जिसे उसने जादूगर को थमा दी। जादूगर के छूते ही वह मिट्टी सोने की गेंद में बदल गई। इस मोअजिज़ाती तोहफ़े ने उस बच्चे और उस की माँ की ज़िंदगी बदल दी। वह गेंद जो चीज़ छूती वह सोना बन जाती। इस तरह वह बच्चा न सिर्फ़ ख़ुद ख़ुशहाल हुआ बल्कि अपने दोस्तों के लिए भी बेहतरीन खाने और खिलौनों का सबब बना। यह कहानी हमें सिखाती है कि ख़ुलूस-ए-नीयत और दूसरों की मदद करने की तड़प कभी राईगाँ नहीं जाती और अल्लाह इस का अजर ज़रूर देता है।

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❤️ سبق 17 : برسات (نظم)


यह नज़्म ‘बरसात’ उर्दू के नामवर शायर इस्माइल मेरठी की एक खूबसूरत तख़लीक़ है, जिस में उन्होंने बारिश के मौसम की दिलकशी और फ़ितरत पर उस के गहरे असरात को निहायत अमदगी से बयान किया है। नज़्म का आग़ाज़ आसमान पर छाए वाले काले बादलों के ज़िक्र से होता है, जिन की सनसनाहट और आहट बारिश की आमद की नुबैर सुनाती है। जैसे ही मेह बरसता है, गर्मी से ज्हलसी हुई बेजान मिट्टी में नई जान पड़ जाती है और हर तरफ़ ज़िंदगी के आसार नुमायदार होने लगते हैं। किसानों की ख़ुशी देखने लायक़ होती है क्योंकि उन की सख़्त मेहनत थकाने लगती है और ख़ेत लहलहाने लगते हैं। शायर कहता है कि बरसात के बाइस ज़मीन से जड़ी बूटियाँ और हरे-भरे पौधे निकल आते हैं जिन पर अजब बेल बूटे और रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं। क़ुदरत का यह करिश्मा है कि सिर्फ़ दो दिन के अंदर वह मैदान जो कल तक चटीला और बंजर नज़र आता था, आज वहाँ घास का एक वसीअ बन खड़ा है और जंगल का जंगल हरा हो गया है। जानवर भी इस ख़ुशगवार तबदीली से मसरूर होकर अधर-अधर फुदकने लगते हैं, ऐसा मअलूम होता है जैसे ज़मीन के पर निकल आए हों। यह नज़्म बच्चों को क़ुदरत के मनाज़िर से रोशनास कराने और बरसात की बरकतों को समझने का एक बेहतरीन ज़रिया है, जो ज़मीन की शादाबी और हरियाली का खूबसूरत मुरक़अ पेश करती है। इस के अलावा, नज़्म में बारिश के बाद की ताज़गी और ख़ुशबू का एहसास भी नमाया है जो रूह को बालिदगी बख़्शता है। इस्माइल मेरठी ने सादा मगर परासर अलफ़ाज़ के ज़रिए यह पैग़ाम दिया है कि बरसात सिर्फ़ एक मौसम नहीं बल्कि ज़मीन के लिए रहमत और नई ज़िंदगी की अलामत है। यह नज़्म न सिर्फ़ बच्चों की दिलचस्पी का बाइस है बल्कि बड़ों को भी क़ुदरत के उन हसीन मनाज़िर की याद दिलाती है जो अक्सर हमारी मसरूफ़ ज़िंदगियों में नज़र-अंदाज़ हो जाते हैं।

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❤️ سبق 18 : شکّر کا چکّر (انشایہ)


यह एक मज़ाहिया इनशाइयह है जिस में मुसन्निफ़ ने राशन की दुकान से शक्कर हासिल करने की जद्दोजहद को तंज़ीही और मज़ाहिया अंदाज़ में बयान किया है। कहानी का आग़ाज़ तब होता है जब वालिद साहिब मुसन्निफ़ को शक्कर लाने की ज़िम्मेदारी देते हैं, जिस पर घर के तमाम अफ़राद उसे ऐसे विदा करते हैं जैसे वह किसी ख़तरनाक मैदान-ए-जंग में जा रहा हो। दुकान पर पहुँचकर मुसन्निफ़ को एक ऐसी तवील क़तार का सामना करना पड़ता है जहाँ लोग चींटियों की तरह जमा हैं और पुलिस वाले बंदरों से अनतज़ाम संभाल रहे हैं। लाइन में धक्का-पेल, लड़ाई-झगड़ा, जेब तराशी और सियासी बहसें आम हैं। मुसन्निफ़ बड़ी मुश्किल से क़तार में जगह बनाता है लेकिन एक रेल के बाइस लाइन से बाहर निकल जाता है। वहाँ एक सियासी लीडर भी मिलता है जो ‘सोशलिज़्म’ और ‘इंक़लाब’ के दावे तो करता है लेकिन क़तार में घुसने के लिए हर क़िस्म के हथियार इस्तेमाल करता है। यह पाठ दरअसल सरकारी तक़्सीम के निज़ाम की ख़राबियों और आम आदमी की बेबसी को मज़ाहिया रंग में पेश करता है। आख़िर में जब मुसन्निफ़ दोबारा क़तार में शामिल होने में कामयाब होता है, तो अचानक दुकानदार शक्कर ख़त्म होने का एलान करके दुकान बंद कर देता है, जो एक तंज़ीही इख़्तिताम है। यह तहरीर मआशरे के सलगते हुए मसाइल को हल्के-फुल्के अंदाज़ में बयान करने की एक बेहतरीन मिसाल है और उर्दू अदब में इनशाइयह निगारी का एक बेहतरीन नमूना है।

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❤️ سبق 19 : غزل (شاد عظیم آبادی)


शाद अज़ीमाबादी की इस शाहकार ग़ज़ल में इंसानी ज़िंदगी की गहराई, उस की बे-सबाती और दुनियावी तअल्लुक़ात की आरज़ी हक़ीक़त को निहायत परासर और फलसफ़ियाना पैराए में बयान किया गया है। शायर इस बुनियादी हक़ीक़त का इज़हार करता है कि इंसान इस दुनिया में अपनी मरज़ी या ख़्वाहिश से नहीं रखता बल्कि उसे अल्लाह तआला के हुक्म और मशीयत से यहाँ लाया गया है। यहाँ आकर वह अपनी ही उन गिनत तमन्नाओं और लाहासिल दुनियावी ख़्वाहिशात के एक ऐसे पेचीदा जाल में उलझ जाता है कि अपनी असल पहचान और मक़सद-ए-हयात को मुकम्मल तौर पर फ़रामोश कर बैठता है। शायर ने इस दुनिया की परकश्श और फ़ानी चीज़ों को रंगीन खिलौनों से तशबीह दी है, जिस तरह एक मअसूम बच्चा नए खिलौनों में मगन होकर अपनी हर फ़िक्र भूल जाता है, वैसे ही इंसान भी दुनियावी आसाइशों और वक़ती लज़्ज़तों में खोकर अपनी अबदी मंज़िल से ग़ाफ़िल हो गया है। इस ग़ज़ल के अशआर में दुनिया को एक ऐसी आरज़ी महफ़िल क़रार दिया गया है जहाँ से एक न एक दिन हर ज़े-रूह को लाज़िमी उठाना है। शायर कहता है कि वह इस ज़िंदगी के हर नसीब व फ़राज़ और हर ज़र्रे की हक़ीक़त से बखूबी वाक़िफ़ हो चुका है और उसे मालूम है कि यहाँ की हर रौनक़ फ़ानी है। वह अपनी क़ब्र यानी लहद में जाने को इस दुनिया की भरी महफ़िल से उठ जाने पर फ़ौक़ियत देता है, जो उस की दुनियावी बेज़ारी और आख़िरत की तलब की अलामत है। ग़ज़ल का बुनियादी पैग़ाम यह है कि इंसान को इस फ़ानी दुनिया की ज़ाहिरी चमक-दमक और धूएँ में अलजह न होकर हमेशा अपने ख़ालिक़ को याद रखना चाहिए और अपनी अबदी ज़िंदगी की तैयारी करनी चाहिए। यह कलाम इंसान को मादा परस्ती के अंधेरों से निकालकर रूहानियत, बेदारी और हक़ीक़त पसंदी की रोशन राहों की तरफ़ राग़िब करता है और उसे ज़िंदगी की असल क़दर व क़ीमत समझाता है।

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❤️ سبق 20 : شہید پیر علی (سوانح)


शहीद पीर अली हिंदोस्तान की जद्दोजहद-ए-आज़ादी के एक अज़ीम और नूर मजाहिद थे। वह पटना के रहने वाले थे और पटना सिटी में उन की एक किताबों की दुकान थी जो इंक़लाबियों और आज़ादी के मुतावल्लों का मर्कज़ थी। पीर अली ने हर तबक़े के लोगों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया सरगर्मियाँ चलाईं और वतन को ग़ुलामी से नजात दिलाने के मनसूबे बनाए। जब 30 जुलाई 1857 को अंग्रेज़ अफ़सर विलियम टेलर ने धोखे से मआज़िज़ बुज़ुर्गों को गिरफ़्तार किया, तो आवामी ग़म व ग़ुस्सा भड़क उठा और पीर अली की क़यादत में इहतिजाजी जलूस निकाला गया। अंग्रेज़ों की वहशियाना काररवाइयों के जवाब में पीर अली ने एक अंग्रेज़ अफ़सर वॉकटर लेन को हलाक कर दिया। इस वाक़े के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। जज ने उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई, लेकिन वह ज़रा भी न घबराए और निहायत सकून के साथ शहादत के लिए तैयार हो गए। 8 जुलाई 1857 को उन्हें पटना के गांधी मैदान में फाँसी दे दी गई। अपनी शहादत से पहले उन्होंने अंग्रेज़ों को ललकारते हुए कहा कि आज तुम हमें फाँसी तो दे सकते हो लेकिन हमारे ख़ून से ऐसे मजाहिद पैदा होंगे जो तुम्हारी हुकूमत को निस्त-ओ-नाबूद कर देंगे।

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❤️ سبق 21 : غزل (کلیم عاجز)


यह ग़ज़ल कलीम आजिज़ की एक निहायत परासर और खूबसूरत तख़लीक़ है जिस में उन्होंने दौरे-हाज़िर के समाजी बग़ावत, अख़लाक़ी गिरावट और इंसानी रिश्तों में बढ़ती हुई सर्द मेहरी पर गहरी चोट की है। शायर के बकौल, अगरचे इस मादी दुनिया के हुजूम में हर उम्र के लोग कस्रत से मिल जाते हैं, लेकिन वह बा-अख़लाक़ लोग मफ़क़ूद हैं जो सच्ची मोहब्बत और ख़ुलूस-ए-दिल के साथ पेश आएँ। आज के परफ़ेक्शन दौर में दोस्ती का लिबास अक्सर लोग दुश्मन ही जाँ साबित होते हैं, जो कि समाज की ज़बूँ हाली और मुनाफ़क़त का मुँह बोलता सबूत है। शायर ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़त बयान करते हुए कहता है कि यहाँ आराम व आसाइश बग़ैर किसी मशक़्क़त और कड़ी जद्दोजहद के हासिल नहीं हो सकती, जिस तरह हसीन फूल हमेशा नुकीले काँटों के दरमियान छपे होते हैं, वैसे ही सच्ची ख़ुशी और क़लबी राहत भी सख़्त मेहनत के बाद ही नसीब होती है। ग़ज़ल के आख़िरी अशआर में शायर ने वतन से दूरी के करब और दियार-ए-ग़ैर में अपनों की याद का तज़किरा निहायत दर्दमंद और सोज़-ओ-गुदाज़ के साथ किया है। यह कलाम हमें यह अज़ीम सबक़ देता है कि दुनिया के हुजूम में सच्चे और खरे इंसान की पहचान वक़्त की अहम ज़रूरत है और वतन की मिट्टी से वाबस्तगी इंसान की रूह का नागज़ीर हिस्सा होती है। कलीम आजिज़ ने मोहब्बत, मेहनत, ख़ुलूस और हुब्ब-ए-वतनी जैसे आफ़ाक़ी मौज़ूआत को निहायत सादगी और सलासत के साथ अशआर में परोया है, जो हर क़ारी को इस बात पर ग़ौर व फ़िक्र की दावत देते हैं कि मादा तरक़्क़ी के इस दौर में इंसानियत, अख़लाक़ी अक़ीदे और बाहमी हमदर्दी के जज़बात को ज़िंदा रखना कितना नागज़ीर है।

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❤️ سبق 22 : بہادر شاہ کا ہاتھی (مضمون)


यह पाठ ‘बहादुर शाह का हाथी’ मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर के एक ग़ैर मआमूली और क़द आवर हाथी ‘मुल्ला बख़्श’ की दास्तान है। यह हाथी इतना बुलंद क़ामत था कि दिल्ली के किसी भी दरवाज़े से गुज़रते वक़्त उसे घुटने टेकने पड़ते थे, यहाँ तक कि बादशाह ने उस के लिए लाहौरी दरवाज़े को ख़ुसूसी तौर पर तआला कर उँचा करवाया। मुल्ला बख़्श का फ़ील बान बख़ारा का एक मआज़िज़ सैय्यद था, जिसे बादशाह ने ‘मोहब्बत ख़ाँ’ का ख़िताब और जागीर अता की थी। एक हादिसे में मुल्ला बख़्श ने मसीहा के आलिम में सैय्यद साहिब को हलाक कर दिया, लेकिन जब उन की बीवी ने अपने नन्हे बच्चे को बदले में हाथी के सामने वाला, तो हाथी की ममता या वफ़ादारी जाग उठी और उस ने बच्चे को नुक़सान पहुँचाने के बजाए अपनी सूँड़ से उठाकर गर्दन पर बिठा लिया। उस दिन से हाथी और उस बच्चे, रहमत अली, के दरमियान एक गहरा याराना क़ायम हो गया। मुल्ला बख़्श मुहल्ले के बच्चों के साथ खेलता, उन्हें अपनी सूँड़ से सवारी करवाता और अपनी ख़ुराक यानी गन्ने और मोटी रोटियाँ उन में बाँटकर खाता। जब हुकूमती हुक्म पर बच्चों का फ़ील ख़ाना आना बंद हुआ तो हाथी ने तीन दिन तक कुछ नहीं खाया, जिस पर बादशाह ने पहले ही हुक्म दिया। मीर बाक़र अली दिल्लोवी ने इस कहानी में जानवरों की नफ़सियात और उन की इंसान दोस्ती को निहायत दिलचस्प पैराए में बयान किया है।

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