Bihar Board 5th EVS Book 2026 PDF Download (पर्यावरण और हम)
Bihar Board Class 5 EVS Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 5th के छात्रों के लिए “Environmental Studies (पर्यावरण और हम)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |
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BSEB Class 5 Environmental Studies Book PDF Free Download
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❤️ 1. पटना से नथुला तक
यह पाठ पटना से सिक्किम की राजधानी गंगटोक और भारत-चीन सीमा पर स्थित नाथुला दर्रे तक की एक रोमांचक यात्रा का वर्णन करता है। यात्रा की शुरुआत पटना जंक्शन से होती है, जिसके बाद यात्री न्यू जलपाईगुड़ी पहुँचते हैं और फिर दार्जिलिंग की पहाड़ियों की ओर बढ़ते हैं। दार्जिलिंग में लेखक ने ‘टाइगर हिल’ से कंचनजंगा की सतरंगी चोटी का अद्भुत दृश्य देखा और हिमालय पर्वतारोहण संस्थान में महान पर्वतारोही तेनजिंग नोरगे के बारे में जाना।
यहाँ पर्वतारोहण के कठिन प्रशिक्षण और आवश्यक उपकरणों जैसे ऑक्सीजन सिलेंडर और स्लीपिंग बैग के महत्व को बताया गया है। इसके बाद यात्रा गंगटोक की ओर बढ़ती है, जो अपनी स्वच्छता और व्यवस्थित यातायात के लिए प्रसिद्ध है। लेखक ने यहाँ के महात्मा गांधी मार्ग की सुंदरता और लेप्चा, नेपाली एवं भूटिया समुदायों की संस्कृति का अनुभव किया।
यात्रा का अंतिम पड़ाव 14,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित नाथुला था, जहाँ बर्फ की चादरों के बीच गर्व से लहराता तिरंगा और सीमा पर तैनात वीर सैनिकों के दर्शन हुए। यह मार्ग प्राचीन ‘सिल्क मार्ग’ का हिस्सा रहा है। यह अध्याय प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यावरण संरक्षण और साहस की प्रेरणा देता है।
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❤️ 2. खेल
यह पुस्तक का अध्याय ‘खेल’ बच्चों को विभिन्न खेलों और उनके महत्व से परिचित कराता है। कहानी की शुरुआत कक्षा 5 के बच्चों से होती है, जो अपनी शिक्षिका के साथ मैदान में खो-खो खेलते हैं। खेल के माध्यम से वे टीम बनाने, टॉस करने और नियमों का पालन करने जैसी प्रक्रियाएँ सीखते हैं।
इसके बाद, सुखदा और सलमा अखाड़े में कुश्ती देखने जाती हैं, जहाँ उन्हें पता चलता है कि कुश्ती लड़ाई नहीं बल्कि एक अनुशासित खेल और व्यायाम है। अध्याय में ‘मार्शल आर्ट’ की अवधारणा को भी समझाया गया है, जिसे आत्मरक्षा और शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने के लिए सीखा जाता है। इसमें भारत की पारंपरिक कुश्ती, सिख समुदाय का ‘गतका’ और जापान के ‘सूमो’ जैसे खेलों का उल्लेख है।
पुस्तक बच्चों को घर के अंदर और बाहर खेले जाने वाले खेलों की सूची बनाने और उनके नियमों को समझने के लिए प्रेरित करती है। अंत में, स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम और योग के महत्व पर जोर दिया गया है और क्रिकेट जैसे प्रसिद्ध खेलों की चर्चा की गई है। यह पाठ खेल भावना, निरंतर अभ्यास और शारीरिक विकास के संदेश को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
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❤️ 3. बीजों का बिखरना
यह अध्याय ‘बीजों का बिखरना’ प्रकृति में पौधों के विस्तार और उनकी उत्तरजीविता की प्रक्रिया को विस्तार से समझाता है। कहानी की शुरुआत जमुई के लछुआड़ गाँव में जैन मंदिर के भ्रमण से होती है, जहाँ बच्चे दीवार पर उगे पीपल के पौधे को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं।
शिक्षिका बच्चों को बताती हैं कि बीज अनुकूल परिस्थितियाँ (मिट्टी, पानी, हवा और ताप) मिलने पर कहीं भी अंकुरित हो सकते हैं। बीजों के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने को ‘बीजों का बिखरना’ कहा जाता है, जो प्रजातियों की सुरक्षा और विस्तार के लिए आवश्यक है।
बिखरने के मुख्य माध्यमों में हवा (कपास के हल्के बीज), पानी (कमल और कुमुदनी), पक्षी (जो फल खाकर बीज मल के साथ निकालते हैं), और जानवर (जैसे गोखरू जो शरीर से चिपक जाते हैं) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ बीज जैसे गुलमेंहदी सूखकर चटकने से बिखरते हैं।
यह प्रक्रिया न केवल पौधों की प्रजातियों को बचाती है, बल्कि मनुष्यों को भी विभिन्न स्थानों पर उपयोगी वनस्पतियाँ उपलब्ध कराती है।
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❤️ 4. मेरा बगीचा
यह पाठ ‘मेरा बगीचा’ एक बच्चे के अनुभव पर आधारित है जिसका परिवार राजस्थान के लक्ष्मणगढ़ में स्थानांतरित हो गया है। वहां के कॉलेज परिसर में रहते हुए, वह बच्चा अपने आसपास की प्राकृतिक विविधता को देखकर आश्चर्यचकित होता है। उसे पता चलता है कि परिसर में तितलियों की 17 और पक्षियों की 87 प्रजातियां मौजूद हैं।
जिज्ञासावश, वह विभिन्न पौधों, फूलों और पत्तियों को इकट्ठा करना शुरू करता है। उसकी माँ उसे ‘हरबेरियम’ बनाने की विधि सिखाती है, जिसमें पौधों को अखबार के बीच दबाकर सुखाया जाता है ताकि वे सिकुड़ें नहीं। बच्चा बगीचे के पौधों, पानी के पौधों और मरुस्थलीय पौधों जैसे बबूल और कैक्टस के बीच के अंतर को समझता है।
वह यह भी सीखता है कि दो एक समान दिखने वाले दूब के पौधों में भी सूक्ष्म भिन्नताएं होती हैं। अंततः, वह 40 विभिन्न पौधों की एक प्रदर्शनी लगाता है और यह निष्कर्ष निकालता है कि पेड़-पौधों की विविधता ही विभिन्न जीव-जंतुओं के अस्तित्व का आधार है। पाठ पर्यावरण संरक्षण और अवलोकन कौशल विकसित करने पर जोर देता है।
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❤️ 5. ऐतिहासिक स्मारक
यह अध्याय बिहार के ऐतिहासिक स्मारकों, मुख्य रूप से प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय पर केंद्रित है। जरताज, सना और जैनब की यात्रा के माध्यम से, यह दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में नालंदा के महत्व को रेखांकित करता है। इसकी स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त द्वारा की गई थी और यह 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच अपने चरमोत्कर्ष पर था।
यहाँ 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक थे, जो चीन, जापान और कोरिया जैसे देशों से आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहाँ शिक्षा ग्रहण की थी। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ नौ मंजिला था और तीन भागों—रत्न दधि, रत्न रंजक और रत्न सागर में विभाजित था।
पाठ में बिहार के अन्य महत्वपूर्ण स्थलों जैसे बोधगया, वैशाली, केसरिया स्तूप, पटना का गोलघर, औरंगाबाद का देव सूर्य मंदिर और पावापुरी के जल मंदिर का भी उल्लेख है। यह सम्राट अशोक के स्तंभों और बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानकारी देता है। अंत में, यह ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है और नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने के आधुनिक प्रयासों, जिसमें डॉ.
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और डॉ. अमर्त्य सेन की भूमिका है, का वर्णन करता है।
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❤️ 6. सिंचाई के साधन
यह पुस्तक अध्याय सिंचाई के साधनों और कृषि में उनके महत्व पर केंद्रित है। कहानी दानिश और शारा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने नानाजी के गाँव जाते हैं और खेतों में पानी की उपलब्धता में अंतर देखते हैं।
नानाजी उन्हें समझाते हैं कि पौधों के विकास के लिए पानी आवश्यक है और जब वर्षा पर्याप्त नहीं होती, तो सिंचाई के विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है। पाठ में बताया गया है कि धान जैसी फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जो मुख्य रूप से वर्षा से प्राप्त होता है, लेकिन कमी होने पर कुओं और मोटर पंपों का उपयोग किया जाता है।
अध्याय में पारंपरिक साधनों जैसे रहट, पईन, नदियों और तालाबों के साथ-साथ आधुनिक साधनों जैसे नलकूप और नहरों का भी उल्लेख किया गया है। यह छात्रों को विभिन्न मौसमों में बोई जाने वाली फसलों और उनकी जल आवश्यकताओं के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है, जिससे उन्हें ग्रामीण कृषि व्यवस्था और सिंचाई की बदलती तकनीकों की समझ मिलती है।
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❤️ 7. जितना खाओ उतना पकाओ
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❤️ 8. रॉस की जंग मलेरिया के संग
यह पुस्तक महान चिकित्सक रोनाल्ड रॉस के जीवन और मलेरिया की खोज में उनके संघर्ष पर आधारित है। रॉस का जन्म भारत के अल्मोड़ा में हुआ था। चिकित्सा की पढ़ाई के बाद वे भारत लौटे, जहाँ उस समय मलेरिया का भारी प्रकोप था।
उस समय तक लोग नहीं जानते थे कि यह बीमारी कैसे फैलती है। रॉस ने इस चुनौती को स्वीकार किया और वर्षों तक कड़ा परिश्रम किया। उन्होंने सूक्ष्मदर्शी की सहायता से मच्छरों के पेट और मनुष्यों के रक्त के नमूनों की गहन जाँच की।
इस प्रक्रिया में उनके कर्मचारी अब्दुल और मरीज हुसैन खान ने भी सहयोग दिया। अंततः 16 वर्षों के अथक प्रयास के बाद, उन्हें मादा एनॉफिल मच्छर के पेट में मलेरिया के कीटाणु मिले। इस खोज ने यह प्रमाणित कर दिया कि मलेरिया का प्रसार मच्छरों के माध्यम से होता है।
रॉस की यह खोज चिकित्सा विज्ञान में एक क्रांतिकारी मोड़ थी, जिसने मलेरिया की रोकथाम और उपचार के नए मार्ग प्रशस्त किए। पाठ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वच्छता के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है।
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❤️ 9. मैंने नक्शा बनाया
यह पाठ मुख्य रूप से मानचित्र (नक्शा) समझने और बनाने के कौशल पर केंद्रित है। कहानी सुखदा नाम की एक छात्रा से शुरू होती है, जिसे अपनी शिक्षिका से स्कूल से घर तक का नक्शा बनाने का कार्य मिला है।
पाठ के माध्यम से बच्चों को मानचित्र में दिशाओं के महत्व, प्रतीकों (Symbols) के उपयोग और संकेत सूची (Index) की आवश्यकता के बारे में सिखाया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे विभिन्न वस्तुओं जैसे दुकान, मंदिर, नदी और रेल की पटरी को संकेतों के माध्यम से दर्शाया जाता है।
पाठ का दूसरा भाग बिहार राज्य के राजनीतिक मानचित्र पर आधारित है। इसके माध्यम से छात्रों को बिहार के विभिन्न जिलों, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं (नेपाल) और पड़ोसी राज्यों (उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल) की पहचान करना सिखाया गया है।
छात्रों को नक्शा देखकर जिलों की गिनती करने, अपने जिले को खोजने और पड़ोसी जिलों की दिशाएँ समझने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। यह पाठ भौगोलिक समझ विकसित करने के लिए व्यावहारिक अभ्यास प्रदान करता है, जिससे बच्चे सीमाओं की रेखाओं और नक्शे के संकेतों को पढ़ना और समझना सीख सकें।
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❤️ 10. हमारी फसलें हमारा खान-पान
यह अध्याय ‘हमारी फसलें : हमारा खान-पान’ ग्रामीण जीवन, कृषि और खान-पान के अंतर्संबंधों को दर्शाता है। कहानी इरा और इशु के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पटना से अपने गाँव जाते हैं और वहाँ कृषि की विविध प्रक्रियाओं को समझते हैं। उनके दादाजी उन्हें बताते हैं कि गाँव ही शहरी जीवन का मुख्य आधार हैं, क्योंकि शहर की अधिकांश खाद्य सामग्री गाँवों से ही आती है।
अध्याय में धान की खेती का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसमें जुताई, बिचड़ा लगाना, मोरी तैयार करना और फसल की कटाई जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं। इसके साथ ही, मौसम के आधार पर फसलों का वर्गीकरण—खरीफ (वर्षा), रबी (सर्दी) और जायद (गर्मी)—समझाया गया है। बिहार के विभिन्न जिलों में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों जैसे मक्का, गेहूँ, केला और मखाना का भी उल्लेख है।
पाठ में खान-पान की विविधता और उस पर क्षेत्रीय प्रभाव की चर्चा की गई है, जैसे कि चेन्नई में इडली-डोसा और बिहार में लिट्टी-चोखा की लोकप्रियता। अंत में, आधुनिक फास्ट फूड (पिज्जा, बर्गर) के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के प्रति सचेत करते हुए पारंपरिक पौष्टिक आहार के महत्व पर जोर दिया गया है। अध्याय में लिट्टी-चोखा बनाने की विधि भी साझा की गई है।
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❤️ 11. जन्तु जगत सुरक्षा संरक्षण
यह पुस्तक का अध्याय ‘जन्तु-जगत : सुरक्षा और संरक्षण’ जीव-जन्तुओं के प्रति दया, उनके संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन में उनकी भूमिका पर केंद्रित है। कहानी की शुरुआत सिद्धार्थ और देवदत्त के प्रसंग से होती है, जहाँ घायल हंस की रक्षा करने वाले सिद्धार्थ को राजा द्वारा न्यायपूर्ण तरीके से उसका संरक्षक माना जाता है, क्योंकि ‘जान बचाने वाला जान लेने वाले से बड़ा होता है’।
पाठ में विभिन्न जीव-जन्तुओं पर आधारित आजीविका, जैसे सपेरे और मछुआरों के कार्यों पर विचार किया गया है। बबली और उसके पालतू तोते ‘सुगनी’ के माध्यम से जानवरों की स्वतंत्रता के महत्व को दर्शाया गया है।
पुस्तक यह भी समझाती है कि कैसे वनों की कटाई से तेंदुआ और गुलाबी सिर वाली बत्तख जैसे जीव विलुप्त हो रहे हैं। सरकार द्वारा बनाए गए ‘अभयारण्यों’ (जैसे बिहार के चम्पारण और बेगूसराय में) की चर्चा की गई है।
अंत में, राजस्थान के ‘विश्नोई समुदाय’ का उदाहरण दिया गया है, जो अपने गुरु जम्भाजी के 29 नियमों का पालन करते हुए प्रकृति और वन्यजीवों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे देते हैं। यह अध्याय हमें संदेश देता है कि जीव-जन्तुओं की सुरक्षा करना मानव जाति और प्रकृति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
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❤️ 12. मान गए लोहा
यह पुस्तक ‘मान गए लोहा’ नामक अध्याय के माध्यम से शारीरिक चुनौतियों का सामना करने वाले व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता और उनके अदम्य साहस की कहानी बयां करती है। कहानी सुखदा और संजय के इर्द-गिर्द घूमती है, जो विश्व विकलांगता दिवस के पोस्टर को देखकर इसके बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं।
शिक्षक उन्हें बताते हैं कि शारीरिक भिन्नता के बावजूद ऐसे व्यक्ति न केवल अपने दैनिक कार्य बखूबी करते हैं, बल्कि कई बार सामान्य लोगों से भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। दादाजी बच्चों को एक राजकीय नेत्रहीन आवासीय विद्यालय ले जाते हैं, जहाँ वे देखते हैं कि छात्र आत्मनिर्भरता के साथ कपड़े धोने, संगीत सीखने और ‘ब्रेल लिपि’ के माध्यम से पढ़ाई करने जैसे कार्य कर रहे हैं।
पुस्तक में 3 दिसंबर को आयोजित खेल प्रतियोगिताओं का भी वर्णन है, जहाँ पोलियोग्रस्त इकबाल अहमद अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर देता है। इसके अतिरिक्त, पुस्तक के दूसरे भाग ‘पक्षियों से दोस्ती’ में पक्षी अवलोकन (बर्ड वाचिंग) के तरीके बताए गए हैं।
इसमें खंजन पक्षी का उदाहरण देकर समझाया गया है कि कैसे आकार, रंग, चोंच और आवाज के आधार पर पक्षियों की पहचान की जा सकती है। यह पुस्तक बच्चों को समाज के हर वर्ग के प्रति सम्मान और प्रकृति के प्रति जिज्ञासा रखने की प्रेरणा देती है।
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❤️ 13. पानी और हम
यह पुस्तक का अध्याय ‘पानी और हम’ मुख्य रूप से हमारे दैनिक जीवन में जल की महत्ता और इसके विभिन्न स्रोतों पर प्रकाश डालता है। पाठ की शुरुआत शिक्षक और बच्चों के बीच पानी की उपलब्धता को लेकर होने वाली चर्चा से होती है, जिसमें बच्चे बताते हैं कि उनके घरों में पानी नल, कुएं, हैंडपंप और नहरों जैसे अलग-अलग माध्यमों से आता है।
इस संवाद के जरिए जल संकट और सार्वजनिक नलों पर होने वाली भीड़ जैसी समस्याओं को भी दर्शाया गया है। पुस्तक में पानी के अभाव और उसकी अधिकता (बाढ़) दोनों स्थितियों का वर्णन किया गया है।
राहुल और टीना के अनुभवों के माध्यम से बताया गया है कि जहाँ पानी के बिना जीवन और खेती संभव नहीं है, वहीं अत्यधिक वर्षा और नदियों के जलस्तर बढ़ने से आने वाली बाढ़ भारी तबाही लाती है। वर्ष 2008 में उत्तर बिहार में आई भीषण बाढ़ का उदाहरण देते हुए जान-माल के नुकसान और विस्थापन की विभीषिका को समझाया गया है।
अंत में, यह अध्याय छात्रों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करता है और बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने के उपायों पर सोचने के लिए प्रेरित करता है। यह स्पष्ट करता है कि पृथ्वी पर जल की विशाल मात्रा होने के बावजूद, हमारे उपयोग योग्य मीठा पानी अत्यंत सीमित है।
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❤️ 14. सूरज एक काम अनेक
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❤️ 15. हमारा जंगल
यह अध्याय ‘हमारा जंगल’ वाल्मीकि अभयारण्य की एक शैक्षिक यात्रा का वर्णन करता है। इसमें बच्चों के एक समूह द्वारा गुरुजी के साथ किए गए भ्रमण के माध्यम से वन्यजीवों, उनके प्राकृतिक आवास और संरक्षण के महत्व को समझाया गया है।
यात्रा के दौरान बच्चे साल, शीशम और जामुन जैसे पेड़ों के साथ-साथ बाघ, हिरण और बंदर जैसे जानवरों को देखते हैं। पाठ में अभयारण्य को एक सुरक्षित क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है जहाँ जानवर बिना किसी मानवीय खतरे के रह सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, यह अध्याय भागलपुर के धरहरा गाँव की एक अनूठी परंपरा पर प्रकाश डालता है, जहाँ बेटी के जन्म पर दस पौधे लगाए जाते हैं। यह परंपरा न केवल बालिकाओं के सामाजिक महत्व को बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वनीकरण के प्रति एक अद्भुत संवेदनशीलता भी दर्शाती है।
अंत में, पाठ पाठकों को जंगलों के विनाश के परिणामों के प्रति सचेत करता है और अधिक से अधिक वृक्ष लगाने का संकल्प लेने के लिए प्रोत्साहित करता है ताकि पर्यावरण और समाज दोनों को सशक्त बनाया जा सके।
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❤️ 16. चलो सर्वे करें
यह पुस्तक का अंश ‘चलो सर्वे करें’ विषय पर आधारित है, जो छात्रों को उनके गाँव या मोहल्ले में ईंधन के उपयोग और संरक्षण के बारे में शिक्षित करता है। इसमें बताया गया है कि भोजन और यातायात के लिए लकड़ी, केरोसिन, गैस, डीजल और पेट्रोल जैसे संसाधनों की आवश्यकता होती है।
पुस्तक छात्रों को टोलियाँ बनाकर घरों का सर्वे करने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसमें वे ईंधन के स्रोतों, खपत की मात्रा और उनके विकल्पों के बारे में जानकारी एकत्र करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों को बचाने के महत्व को समझाना है।
इसमें ईंधन की बचत के उपायों पर चर्चा की गई है और अंत में एक ज्ञानवर्धक शब्द पहेली भी दी गई है, जो विज्ञान, भूगोल और सामान्य ज्ञान से संबंधित है। यह अध्याय व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का बोध कराता है, जिससे वे संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को समझ सकें और संरक्षण की दिशा में कदम उठा सकें।
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❤️ 17. रामू काका की दुकान
यह कहानी ‘रामू काका की दुकान’ सुखदा नामक एक स्कूली छात्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बढ़ईगिरी की दुकान में होने वाली गतिविधियों का उत्सुकतापूर्वक अवलोकन करती है। दुकान में अकरम, नवीन, आलम और अली दादा जैसे लोग लकड़ी के पटियों को छीलने, काटने और कुर्सियां बनाने का काम करते हैं। यहाँ सुखदा को वार्निश जैसी चीजों के उपयोग और तस्वीरों के फ्रेम बनाने में कांच की भूमिका के बारे में पता चलता है।
कहानी में विभिन्न औजारों जैसे रंदा, आरी, हथौड़ा और कुल्हाड़ी का भी उल्लेख है। रामू काका बताते हैं कि वे अपनी दुकान का कच्चा माल शहर से लाते हैं या कभी-कभी गाँव के लुहार और जोसेफ की दुकान से प्राप्त करते हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि लकड़ी काटने का काम व्यापारी करते हैं और वे केवल लकड़ी खरीदते हैं।
रामू काका के लिए यह उनका पुश्तैनी व्यवसाय है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है और इसी से उनके घर का खर्च चलता है। वे अपने उत्पादों को बेहतर दाम और अधिक बिक्री के लिए शहर की बड़ी दुकानों में भी भेजते हैं। अंत में, यह कहानी छात्रों को अपने आस-पास के व्यवसायों और उनके औजारों के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
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❤️ 18. आवास
यह अध्याय ‘आवास’ के महत्व और बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालता है। सुखदा के गाँव के माध्यम से यह बताया गया है कि कैसे शहरीकरण के कारण गाँवों के पास नई कॉलोनियाँ विकसित हो रही हैं। घर हमें धूप, वर्षा, ठंड, जंगली जानवरों और चोरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
साथ ही, यह हमें निजता और आराम का अनुभव कराते हैं। अध्याय में ग्रामीण और शहरी आवासों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है। जहाँ गाँव के पुराने घर मिट्टी और फूस के होते थे, वहीं नई कॉलोनियों में सीमेंट, कंक्रीट और ईंटों से बनी बहुमंजिला इमारतें होती हैं।
शहरों में जमीन की कमी और बढ़ती जनसंख्या के कारण लोग सामूहिक जीवन की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ विभिन्न धर्मों और क्षेत्रों के लोग एक साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं। इसमें कृषि विश्वविद्यालय जैसी परियोजनाओं के लिए गाँव की जमीन के चयन और उससे होने वाले सामाजिक बदलावों पर भी चर्चा की गई है। अंत में, यह पाठ छात्रों को सामुदायिक जीवन और आधुनिक आवास व्यवस्था की सुविधाओं जैसे पानी, बिजली और पार्कों के बारे में शिक्षित करता है।
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❤️ 19. तरह तरह के व्यवसाय
यह अध्याय ‘तरह-तरह के व्यवसाय’ समाज में विभिन्न पेशों और उनके महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें मुख्य रूप से किसान, बुनकर, लुहार, मोची, कुम्हार, डाकिया और शिक्षक जैसे व्यवसायों का वर्णन किया गया है। किसान हमारे लिए अनाज उगाता है, जबकि राजमिस्त्री घर बनाता है।
कुम्हार मिट्टी से बर्तन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करता है, जिसमें मिट्टी चुनना, उसे साफ करना और आग में पकाना शामिल है। डाकिया संदेश पहुँचाने का कार्य करता है और शिक्षक समाज को शिक्षित कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। पुस्तक यह समझाने का प्रयास करती है कि समाज का हर व्यक्ति एक-दूसरे पर निर्भर है।
उदाहरण के लिए, शिक्षक और किसान को डॉक्टर की आवश्यकता होती है, और डॉक्टर को भोजन के लिए किसान की। यदि लोग एक-दूसरे की मदद करना बंद कर दें, तो सामाजिक संतुलन बिगड़ जाएगा। यह पाठ विद्यार्थियों को विभिन्न कार्यों के प्रति सम्मान रखने और उनके श्रम के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करता है।
इसमें बच्चों से यह भी पूछा गया है कि यदि ये पेशेवर न होते तो जीवन कैसा होता, ताकि वे हर व्यवसाय की उपयोगिता समझ सकें।
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❤️ 20. रायपुर वाले चाचा की शादी
यह अध्याय सुखदा के परिवार की रायपुर यात्रा और उसके चाचा रवि की शादी के अनुभवों पर आधारित है। कहानी की शुरुआत दादाजी द्वारा रायपुर जाने की घोषणा से होती है, जहाँ पूरा परिवार बड़े दादाजी के घर शादी में शामिल होने की तैयारी करता है।
यात्रा के दौरान, दादाजी बच्चों को परिवार के इतिहास के बारे में बताते हैं कि कैसे उनके भाई नौकरी के सिलसिले में रायपुर जाकर बस गए, जबकि वे स्वयं गाँव में रहकर खेती-बाड़ी सँभालने लगे। रायपुर पहुँचने पर सुखदा विभिन्न सांस्कृतिक भिन्नताओं को देखती है, जैसे कि बंगाली रीति-रिवाजों में शंख ध्वनि और ‘उलू-उलू’ की आवाज़, तथा शादी के मंडप की सजावट में अंतर।
वह यह भी गौर करती है कि शहरों में महिलाएँ भी बारात में शामिल होती हैं। रवि चाचा और उनकी पत्नी सुरोचिता (जो एक बंगाली परिवार से हैं) के साथ बिताए गए पल और अंत में पूरे परिवार का एक साथ फोटो खिंचवाना, पारिवारिक एकता और खुशी को दर्शाता है।
यह पाठ न केवल एक उत्सव का वर्णन करता है, बल्कि बच्चों को पारिवारिक रिश्तों, जिम्मेदारियों और सांस्कृतिक विविधता की समझ भी देता है।
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❤️ 21. लकी जब बीमार पड़ा
यह अध्याय ‘लकी जब बीमार पड़ा’ शीर्षक के अंतर्गत संक्रामक रोगों, विशेषकर मलेरिया के बारे में जानकारी प्रदान करता है। कहानी लकी नाम के एक छात्र के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कई दिनों की बीमारी के बाद स्कूल लौटता है।
वह अपने सहपाठियों और शिक्षक को बताता है कि उसे मलेरिया हुआ था, जिसके लक्षणों में ठंड लगना, कँपकँपी, सिरदर्द और पसीने के साथ तेज बुखार शामिल थे। शिक्षक छात्रों को समझाते हैं कि संक्रामक रोग क्या होते हैं और वे दूषित भोजन, जल, वायु या कीटों के माध्यम से कैसे फैलते हैं।
पाठ में मच्छरों के प्रजनन को रोकने के महत्व पर जोर दिया गया है, जैसे कि गड्ढों में पानी जमा न होने देना और मच्छरदानी का उपयोग करना। इसके अलावा, डेंगू, चिकनगुनिया और फाइलेरिया जैसी बीमारियों का भी उल्लेख किया गया है।
अंत में, छात्रों को व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखने, ताजा भोजन करने और उबला हुआ पानी पीने की सलाह दी गई है ताकि डायरिया और हैजा जैसी बीमारियों से बचा जा सके। यह पाठ बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का एक सरल माध्यम है।
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