Bihar Board 9th Political Science Books 2026 PDF (लोकतांत्रिक राजनीति)
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Class IX: Political Science/Civics (लोकतांत्रिक राजनीति) PDF Free Download
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❤️ अध्याय 1: लोकतंत्र का क्रमिक विकास
प्रस्तुत पाठ ‘लोकतंत्र का क्रमिक विकास’ विश्व स्तर पर लोकतंत्र की यात्रा, संघर्ष और विस्तार का विस्तृत विश्लेषण करता है। यह अध्याय बताता है कि किस प्रकार पिछले सौ वर्षों में लोकतंत्र विभिन्न देशों में फैला और उसे किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसमें मुख्य रूप से दो देशों, चिली और पोलैंड, के केस स्टडीज का उपयोग किया गया है।
चिली में राष्ट्रपति सल्वाडोर आयेंदे की चुनी हुई सरकार का 1973 में सैनिक तख्तापलट हुआ, लेकिन कड़े संघर्ष के बाद वहां लोकतंत्र की वापसी हुई। दूसरी ओर, पोलैंड में लेक वालेशा के नेतृत्व में मजदूरों ने साम्यवादी शासन के खिलाफ एकजुट होकर ‘सोलिडेरिटी’ संगठन बनाया और अंततः लोकतांत्रिक अधिकारों को हासिल किया। इसके अलावा, यह दस्तावेज़ लोकतंत्र के विकास के विभिन्न चरणों पर प्रकाश डालता है, जिसमें फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लेकर उपनिवेशवाद के अंत और आधुनिक दौर के संघर्ष शामिल हैं।
इसमें नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे भारत के पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की अस्थिरता और जन-आंदोलनों का भी जिक्र है। अंत में, यह पाठ वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की संभावनाओं को टटोलता है और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लोकतांत्रिक ढांचे पर चर्चा करता है। निष्कर्षतः, यह दर्शाता है कि लोकतंत्र कोई उपहार नहीं, बल्कि सतत जन-संघर्षों का परिणाम है।
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❤️ अध्याय 2: लोकतंत्र क्या और क्यों?
यह पुस्तक ‘लोकतंत्र क्या और क्यों?’ विषय पर आधारित है और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत व्याख्या करती है। इसमें लोकतंत्र की परिभाषा को सरल शब्दों में समझाया गया है, जिसके अनुसार यह एक ऐसी शासन प्रणाली है जहाँ शासकों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है।
पुस्तक में पाकिस्तान, नेपाल और चीन जैसे देशों के उदाहरण देकर लोकतांत्रिक और गैर-लोकतांत्रिक सरकारों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है। लेखक ने लोकतंत्र की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला है, जैसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का सिद्धांत, और कानून का शासन।
इसके साथ ही, लोकतंत्र के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत किए गए हैं। विपक्ष में निर्णय लेने में देरी और खर्चीली प्रक्रिया जैसे मुद्दे उठाए गए हैं, जबकि पक्ष में इसे अधिक जवाबदेह और नागरिकों की गरिमा बढ़ाने वाली व्यवस्था बताया गया है।
पुस्तक यह निष्कर्ष निकालती है कि भले ही लोकतंत्र सभी समस्याओं का समाधान न हो, फिर भी यह अन्य शासन प्रणालियों से बेहतर है क्योंकि यह अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर देता है। अंत में, लोकतंत्र के व्यापक अर्थ को भी समझाया गया है, जो केवल राजनीति तक सीमित न होकर जीवन के हर क्षेत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने पर जोर देता है।
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❤️ अध्याय 3: संविधान निर्माण
प्रस्तुत दस्तावेज ‘संविधान निर्माण’ (अध्याय-3) का सारांश है। इसमें लोकतंत्र में संविधान की अहमियत और दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में इसके निर्माण की प्रक्रिया समझाई गई है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में एक समावेशी संविधान बना, जो दुनिया के लिए मिसाल है।
यह दिखाता है कि संविधान विभिन्न समूहों में विश्वास जगाता है। भारत के संदर्भ में, विभाजन और रियासतों के विलय जैसी कठिन चुनौतियों के बीच संविधान सभा ने एक विस्तृत संविधान तैयार किया। डॉ.
अंबेडकर और अन्य नेताओं ने लंबी चर्चा के बाद इसे अंतिम रूप दिया। भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्य इसकी उद्देशिका में निहित हैं, जैसे- प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य। यह नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देता है।
संविधान सरकार के गठन, उसकी शक्तियों की सीमा और नागरिकों के अधिकारों को स्पष्ट करता है। यह एक जीवंत दस्तावेज है जो समय के साथ बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधनों की अनुमति भी देता है। अंततः, यह अध्याय हमें बताता है कि संविधान केवल नियमों की किताब नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन का आधार है।
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❤️ अध्याय 4: चुनावी राजनीति
प्रस्तुत पाठ ‘चुनावी राजनीति’ लोकतंत्र में चुनाव की आवश्यकता और उसकी प्रक्रिया का गहन अध्ययन है। यह स्पष्ट करता है कि बड़े समाजों में सीधे शासन संभव नहीं है, इसलिए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाने के लिए नियमित अंतराल पर चुनाव अनिवार्य हैं।
पाठ में लोकतांत्रिक और गैर-लोकतांत्रिक चुनावों के बीच अंतर को समझाया गया है और भारत की चुनाव प्रणाली का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन, मतदाता सूची का निर्माण, उम्मीदवारों का नामांकन, चुनाव प्रचार, मतदान और मतगणना जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
विशेष रूप से, कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने में निर्वाचन आयोग की शक्तिशाली भूमिका पर जोर दिया गया है। यह पाठ चुनावों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को जनमत निर्माण के लिए आवश्यक मानता है, हालांकि यह धनबल और बाहुबल जैसी चुनौतियों को भी स्वीकार करता है।
अंततः, यह भारतीय चुनावों में जनता की बढ़ती भागीदारी और चुनावी नतीजों की स्वीकार्यता को भारतीय लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण बताता है।
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❤️ अध्याय 5: संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएं
यह दस्तावेज़ ‘संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएँ’ शीर्षक वाला एक अध्याय है जो भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के तीन प्रमुख अंगों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – की संरचना और कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। पाठ की शुरुआत मंडल आयोग और आरक्षण के आदेश के उदाहरण से होती है, जिससे यह समझाया गया है कि सरकारी निर्णय कैसे लिए जाते हैं और उनमें विभिन्न संस्थाओं की क्या भूमिका होती है।
इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की भूमिकाओं, उनके चुनाव और शक्तियों पर चर्चा की गई है। संसद (लोकसभा और राज्यसभा) की कानून बनाने की प्रक्रिया और उनके बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है।
राज्य स्तर पर राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधानमंडल (विशेषकर बिहार के संदर्भ में) की कार्यप्रणाली समझाई गई है। अंत में, यह भारतीय न्यायपालिका की एकीकृत संरचना, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार, और उनकी स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डालता है।
यह बताता है कि लोकतंत्र की सफलता इन संस्थाओं के आपसी तालमेल और प्रभावी कार्यसंचालन पर निर्भर करती है।
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❤️ अध्याय 6: लोकतांत्रिक अधिकार
यह अध्याय ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ लोकतंत्र में अधिकारों की अनिवार्यता और भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का गहन विश्लेषण करता है। पाठ की शुरुआत अधिकारों के बिना जीवन की भयावहता को दर्शाने वाले उदाहरणों (जैसे गुआंतानामो बे और कोसोवो) से होती है, जो सिद्ध करते हैं कि अधिकार नागरिकों की सुरक्षा और गरिमा के लिए अपरिहार्य हैं।
भारतीय संविधान नागरिकों को छह प्रमुख मौलिक अधिकार प्रदान करता है: समानता का अधिकार (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध), स्वतंत्रता का अधिकार (अभिव्यक्ति और भ्रमण की आज़ादी), शोषण के विरुद्ध अधिकार (मानव तस्करी और बाल श्रम पर रोक), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा), और संवैधानिक उपचारों का अधिकार (न्यायालय द्वारा अधिकारों का संरक्षण)। अध्याय में डॉ.
भीमराव अंबेडकर द्वारा संवैधानिक उपचारों के अधिकार को ‘संविधान की आत्मा’ बताने के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका, सूचना का अधिकार, और मौलिक कर्तव्यों पर भी प्रकाश डाला गया है।
निष्कर्षतः, यह पाठ स्पष्ट करता है कि जागरूक नागरिक और स्वतंत्र न्यायपालिका ही लोकतंत्र में अधिकारों की वास्तविक प्रहरी हैं।
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Thanks! 🙏🏽
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Koi bhi bokk bahi download ho rahi hai
hey @Abhinav, Sorry for the inconvenience.
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Step 1
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thanks!
mujhe class ninth ka Book download karna tha par nahi ho raha hai
hey @Nilam, Sorry for the inconvenience.
Can you please tell me where you’re facing the problem? I would love to help you.