Bihar Board Class 8th Civics Book 2026 PDF Download
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BSEB Class 8 Civics (सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक जीवन) Book PDF Free Download
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❤️ 1. भारतीय संविधान
यह अध्याय ‘संविधान क्या और क्यों’ भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा और उसकी आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डालता है। लेख की शुरुआत एक विद्यालय के उदाहरण से होती है, जहाँ बताया गया है कि जिस प्रकार किसी संस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियम और कायदे आवश्यक हैं, उसी प्रकार एक देश के शासन और नागरिकों के मार्गदर्शन के लिए मूलभूत नियमों के समूह को ‘संविधान’ कहा जाता है। भारतीय संविधान न केवल शासन व्यवस्था का ढांचा तैयार करता है, बल्कि यह हमारे सामाजिक आदर्शों, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनके कर्तव्यों का भी विवरण देता है।
इसका निर्माण एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष और विभिन्न देशों के संवैधानिक अनुभवों का समावेश है। 1928 की नेहरू रिपोर्ट और 1931 के कराची अधिवेशन ने इसके बुनियादी मूल्यों जैसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्रता और समानता की नींव रखी थी। डॉ.
भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने इसे अंतिम रूप दिया। संविधान सभा ने 9 दिसंबर 1946 को अपना कार्य शुरू किया और 26 नवंबर 1949 को इसे पूरा किया, जिसे अंततः 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। इसके मुख्य स्तंभ लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता हैं।
यह सामाजिक न्याय पर विशेष बल देता है ताकि वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
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❤️ 2. धर्म निरपेक्षता और मौलिक अधिकार
यह अध्याय भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता और मौलिक अधिकारों के अंतर्संबंधों और उनके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालता है। भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है जहाँ दुनिया के आठ प्रमुख धर्मों के अनुयायी निवास करते हैं। संविधान निर्माताओं ने देश के विभाजन और धार्मिक दंगों के दर्दनाक इतिहास को ध्यान में रखते हुए ‘धर्मनिरपेक्षता’ को एक आधारभूत मूल्य के रूप में स्वीकार किया।
धर्मनिरपेक्षता का मूल अर्थ है धर्म को राज्य से अलग रखना, जिसका तात्पर्य है कि राज्य का अपना कोई राजकीय धर्म नहीं होगा और शासन की नज़रों में सभी धर्म समान होंगे। अध्याय स्पष्ट करता है कि धर्मनिरपेक्षता को केवल कागजों तक सीमित न रखकर इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया है। ‘समता का अधिकार’ यह सुनिश्चित करता है कि धर्म या जाति के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव न हो।
‘धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार’ हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की पूर्ण आज़ादी देता है। साथ ही, ‘सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार’ अल्पसंख्यकों को अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा के संरक्षण हेतु शिक्षण संस्थान स्थापित करने की छूट देते हैं। लेखक यह भी बताते हैं कि राज्य सामान्यतः धार्मिक मामलों में तटस्थ रहता है, परंतु यदि कोई धार्मिक प्रथा अमानवीय हो, तो राज्य उसमें हस्तक्षेप कर सकता है।
सरकारी संस्थानों में किसी विशेष धर्म के प्रतीकों का प्रयोग वर्जित है, ताकि शासन की निष्पक्षता बनी रहे और किसी भी संप्रदाय को दबाया न जा सके। अंततः, यह अध्याय हमें सिखाता है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की सफलता के लिए धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना अत्यंत अनिवार्य है।
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❤️ 3. संसदीय सरकार (लोग व उनके प्रतिनिधि)
यह अध्याय भारतीय संसदीय शासन प्रणाली में आम नागरिकों की भागीदारी और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका का विस्तृत वर्णन करता है। भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहाँ 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी नागरिकों को अपने मताधिकार का प्रयोग कर प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार प्राप्त है। ये प्रतिनिधि स्थानीय स्तर (ग्राम पंचायत), राज्य स्तर (विधानसभा) और राष्ट्रीय स्तर (संसद) पर कार्य करते हैं।
इनका मुख्य उत्तरदायित्व अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सुनना और उन्हें हल करने का प्रयास करना है। भारतीय संसद के तीन प्रमुख अंग हैं: राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा। लोकसभा, जिसे ‘निचला सदन’ कहा जाता है, के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से होता है।
इसके विपरीत, राज्यसभा या ‘ऊपरी सदन’ के सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से राज्य विधानसभाओं के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। चुनाव के पश्चात जिस राजनैतिक दल को बहुमत प्राप्त होता है, वह सरकार का गठन करता है। यदि किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता, तो गठबंधन सरकार बनाई जाती है।
संसद के कार्यों में विधायी कामकाज, वित्तीय नियंत्रण और कार्यपालिका पर निगरानी रखना शामिल है। प्रश्नकाल और अविश्वास प्रस्ताव जैसे उपकरणों के माध्यम से संसद सरकार को जवाबदेह बनाए रखती है। यदि सरकार संसद का विश्वास खो देती है, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है।
यह अध्याय स्पष्ट करता है कि संसदीय लोकतंत्र में जनता ही सर्वशक्तिमान है, जो चुनाव के माध्यम से यह तय करती है कि देश का शासन कौन और कैसे चलाएगा। यह शिक्षा देता है कि प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं और उन्हें जनहित में कार्य करना अनिवार्य है।
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❤️ 4. कानून की समझ
यह अध्याय ‘कानून की समझ’ भारतीय कानूनी व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों, इसके विभिन्न प्रकारों और कानून निर्माण की जटिल प्रक्रिया पर विस्तृत प्रकाश डालता है। कानून किसी भी सभ्य और व्यवस्थित समाज के सुचारू संचालन के लिए अनिवार्य नियम होते हैं, जो देश के सभी नागरिकों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू होते हैं। चाहे कोई व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह कानून से ऊपर नहीं है।
अध्याय में कानूनों को संवैधानिक, सामान्य, व्यक्तिगत और सार्वजनिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, जिसमें दीवानी और फौजदारी कानूनों के अंतर को भी स्पष्ट किया गया है। भारत में कानून बनाने की सर्वोच्च शक्ति संसद के पास है। यहाँ कानून निर्माण की प्रक्रिया जनता की समस्याओं और माँगों से शुरू होकर विधेयक के रूप में संसद के दोनों सदनों में चर्चा और अंततः राष्ट्रपति की स्वीकृति के साथ पूर्ण होती है।
शिक्षा के अधिकार पर संसदीय बहस का उदाहरण इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, यह पाठ अलोकप्रिय और दमनकारी कानूनों जैसे बिहार प्रेस बिल और आपातकाल के उदाहरणों द्वारा नागरिकों के विरोध करने के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को भी रेखांकित करता है। अंत में, जन्म-मृत्यु पंजीकरण की कानूनी अनिवार्यता और इसके विभिन्न लाभों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई है, जो एक जागरूक नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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❤️ 6. न्यायिक प्रक्रिया
यह अध्याय भारत में न्यायिक प्रक्रिया और उसमें शामिल विभिन्न अंगों जैसे पुलिस, वकील, तथा न्यायाधीश की भूमिकाओं को एक सजीव उदाहरण (विनोद और अवधेश के भूमि विवाद) के माध्यम से विस्तार से समझाता है। कहानी एक मामूली ज़मीन के विवाद से शुरू होती है जो देखते ही देखते हिंसक मारपीट में बदल जाती है। इसके पश्चात, थाने में एफ.आई.आर.
(प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कराने की विस्तृत प्रक्रिया और उसके महत्व पर प्रकाश डाला गया है। पाठ में नागरिकों के कानूनी अधिकारों का उल्लेख है, जैसे गिरफ्तारी के कारण जानना, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होना और ज़मानत प्राप्त करना। यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि पुलिस का मुख्य उत्तरदायित्व मामले की निष्पक्ष जांच करना है, जबकि अंतिम न्याय प्रदान करना केवल न्यायाधीश का विशेषाधिकार है।
प्रत्येक अभियुक्त को अपने बचाव हेतु वकील नियुक्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालती कार्यवाही के दौरान गवाहों के बयानों और साक्ष्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है। अध्याय यह भी जानकारी देता है कि यदि कोई पक्ष निचली अदालत के निर्णय से असंतुष्ट है, तो वह सत्र न्यायालय और तत्पश्चात उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
अंततः, यह दीवानी और फौजदारी मुकदमों के अंतर को समझाते हुए सामाजिक न्याय और कानून के शासन की स्थापना पर ज़ोर देता है।
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❤️ 7. सहकारिता
यह अध्याय ‘सहकारिता’ के सिद्धांत और उसके महत्व को अत्यंत सरल और रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। सहकारिता का शाब्दिक अर्थ है ‘साथ मिलकर कार्य करना’। इसका मुख्य उद्देश्य उन कार्यों को सामूहिक प्रयासों से संपन्न करना है जिन्हें व्यक्ति अकेले सफलतापूर्वक नहीं कर पाता।
पाठ में वैशाली जिले के ‘मधुरापुर’ गाँव का उदाहरण दिया गया है, जहाँ महिलाओं ने एक दुग्ध सहकारी समिति बनाकर बिचौलियों के शोषण का अंत किया और पटना डेयरी के साथ जुड़कर आत्मनिर्भरता हासिल की। अध्याय ‘प्राथमिक कृषि साख समितियों’ के योगदान को भी रेखांकित करता है, जो किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण, उत्तम बीज और उर्वरक उपलब्ध कराकर उन्हें महाजनों के चंगुल से बचाती हैं। साथ ही, उपभोक्ता सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली समझाई गई है, जो सीधे थोक विक्रेताओं से माल खरीदकर सदस्यों को बाजार से कम मूल्य पर वस्तुएँ प्रदान करती हैं।
सहकारिता की मुख्य विशेषताओं में स्वैच्छिक सदस्यता, लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया और लाभ का पारदर्शी बँटवारा शामिल है। हालाँकि, लेखक ने समितियों के भीतर स्वार्थी तत्वों के प्रवेश और अकुशल प्रबंधन जैसी समस्याओं की ओर भी आगाह किया है, जिससे बिहार की कुछ समितियाँ विफल रही हैं। अंततः, यह अध्याय स्पष्ट करता है कि सामूहिक एकता और सहकारिता समाज के आर्थिक उत्थान का एक प्रभावी माध्यम है।
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❤️ 8. खाध सुरक्षा
यह अध्याय ‘खाद्य सुरक्षा’ भारत में कुपोषण और गरीबी की गंभीर समस्या पर प्रकाश डालता है। कहानी के माध्यम से रामू और उसके परिवार की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया है, जहाँ अपर्याप्त भोजन और काम की कमी के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण व्याप्त है। कुपोषण के लक्षणों, जैसे शरीर की वृद्धि रुकना और बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता, को विस्तार से समझाया गया है।
अध्याय बताता है कि भारत के संविधान में हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है, जिसके लिए पर्याप्त भोजन अनिवार्य है। समस्या के समाधान के रूप में सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों की चर्चा की गई है। इसमें ‘मनरेगा’ जैसी रोजगार गारंटी योजनाएं शामिल हैं जो लोगों की आय बढ़ाती हैं।
खाद्य सुरक्षा के तीन प्रमुख आयाम बताए गए हैं: उपलब्धता, पहुँच और सामर्थ्य। भारतीय खाद्य निगम (FCI) किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अनाज खरीदकर ‘बफर स्टॉक’ बनाता है। इस अनाज को राशन की दुकानों या ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ (PDS) के माध्यम से रियायती दरों पर गरीबों तक पहुँचाया जाता है।
इसके अतिरिक्त, बच्चों के स्वास्थ्य के लिए स्कूलों में ‘मध्याह्न भोजन योजना’ का महत्व भी रेखांकित किया गया है। अंत में, यह अध्याय समाज के कमजोर वर्गों, जैसे अनुसूचित जाति और जनजाति, के लिए खाद्य सुरक्षा की अनिवार्यता पर जोर देता है।
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Thanks! 🙏🏽
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Chapter 5 is missing
sir, english medium me book ke chapters mil skte hain kya?
hey @Anand, abhi to hamare pass only Hindi language me hi book available hai