Bihar Board 8th History Book 2026 PDF Download
Bihar Board 8th History Book 2026 PDF Download – इस पेज पर बिहार बोर्ड 8th के छात्रों के लिए “ History (अतीत से वर्तमान)” Book दिया गया है | जिसे आप अपने फ़ोन में Free Download कर सकते हैं |
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BSEB Class 8 History (अतीत से वर्तमान) Book PDF Free Download
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❤️ 1. कब, कहाँ और कैसे
यह अध्याय इतिहास के आधुनिक काल, उसकी प्रमुख विशेषताओं और उस काल को समझने के विविध ऐतिहासिक स्रोतों पर विस्तृत प्रकाश डालता है । लेखक समझाते हैं कि इतिहास कोई स्थिर विषय नहीं है; यह मानवीय क्रियाकलापों के कारण निरंतर बदलता रहता है, जिससे समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है । आधुनिक युग की नींव यूरोप में ‘पुनर्जागरण’ के साथ पड़ी, जिसने तर्क, वैज्ञानिक पद्धति और स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित किया ।
इसके बाद कोलंबस और वास्कोडिगामा जैसी भौगोलिक खोजों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच व्यापारिक संबंधों को सुदृढ़ किया । अध्याय में ‘पूंजीवाद’ के विकास और इंग्लैंड में शुरू हुई ‘औद्योगिक क्रांति’ का वर्णन है, जिसने उत्पादन की पद्धति को मशीनीकृत कर दिया । इन बदलावों ने यूरोपीय शक्तियों को कच्चे माल और नए बाजारों की तलाश में ‘उपनिवेशवाद’ की ओर धकेला, जिसके कारण भारत सहित कई देश उनके नियंत्रण में आ गए ।
इतिहास लेखन के संदर्भ में, यह पाठ जेम्स मिल द्वारा किए गए सांप्रदायिक काल-विभाजन की आलोचना करता है और तर्क देता है कि इतिहास को केवल शासकों के धर्म के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए । ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में यह सरकारी दस्तावेजों, अभिलेखागारों, जनगणना, मानचित्रण, समाचार पत्रों और यहाँ तक कि आम आदमी की आत्मकथाओं व साहित्य के महत्व को रेखांकित करता है । यह अध्याय हमें बताता है कि कैसे आधुनिक काल ने हमारे देश की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया ।
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❤️ 2. भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना
यह अध्याय भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक आगमन से लेकर एक औपनिवेशिक राजनैतिक सत्ता की स्थापना तक के ऐतिहासिक घटनाक्रम का सविस्तार वर्णन करता है। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की यह कंपनी मूलतः मसालों, मलमल और रेशम जैसे बहुमूल्य भारतीय सामानों के व्यापार के उद्देश्य से आई थी। पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा द्वारा 1498 में नए समुद्री मार्ग की खोज के बाद यूरोप की अन्य शक्तियाँ भी भारत की ओर आकर्षित हुईं।
व्यापारिक वर्चस्व की इस होड़ में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी और पुर्तगाली कंपनियों को पीछे छोड़ दिया। बंगाल की अपार धन-संपत्ति ने अंग्रेजों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को जन्म दिया। 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध ने भारत के इतिहास को बदल दिया।
इन युद्धों में जीत के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के राजस्व वसूली का ‘दीवानी’ अधिकार प्राप्त हुआ, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली बना दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने ‘सहायक संधि’ और ‘विलय नीति’ जैसी कूटनीतिक नीतियों के माध्यम से भारतीय रियासतों को हड़पना शुरू किया। यद्यपि मैसूर के टीपू सुल्तान, मराठों और सिखों ने कड़ा संघर्ष किया, किंतु आधुनिक हथियारों और अनुशासित सेना के बल पर अंग्रेजों ने उन्हें पराजित कर दिया।
1856 तक लगभग संपूर्ण भारत ब्रिटिश नियंत्रण में आ चुका था।
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❤️ 3. ग्रामीण जीवन और समाज
यह अध्याय ‘ग्रामीण जीवन और समाज’ अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय गाँवों और उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रभावों का विस्तार से वर्णन करता है। ब्रिटिश शासन से पूर्व भारतीय गाँव आत्मनिर्भर थे और राजा को लगान देकर सुखी रहते थे। अंग्रेजों ने व्यापारिक लाभ के लिए भू-राजस्व की तीन प्रणालियाँ लागू कीं: बंगाल और बिहार में ‘स्थायी बंदोबस्त’, दक्षिण भारत में ‘रैयतवारी’ और उत्तर-पश्चिम भारत में ‘महालवारी’ व्यवस्था।
इन प्रणालियों का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लगान वसूलना था, जिससे किसानों और पुराने जमींदारों की स्थिति दयनीय हो गई। लगान न चुका पाने पर उनकी जमीनें छीन ली जाती थीं, जिससे गाँवों में सूदखोर महाजनों का प्रभाव बढ़ा। अंग्रेजों ने किसानों को खाद्य फसलों के स्थान पर नकदी फसलें जैसे नील, पटसन, कपास और अफीम उगाने के लिए मजबूर किया ताकि वे ब्रिटिश कारखानों को कच्चा माल उपलब्ध करा सकें।
विशेष रूप से नील की खेती ने किसानों को अत्यधिक कष्ट पहुँचाया क्योंकि इससे जमीन बंजर हो जाती थी और उन्हें उचित दाम नहीं मिलता था। इस शोषण के विरुद्ध 1875 का दक्कन विद्रोह और बंगाल का नील विद्रोह हुआ। दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नील दर्पण’ किसानों की इसी दुर्दशा को दर्शाता है।
बिहार के चम्पारण में ‘तीनकठिया’ प्रथा के विरुद्ध महात्मा गाँधी द्वारा सत्याग्रह की शुरुआत इसी संघर्ष का हिस्सा थी।
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❤️ 4. उपनिवेशवाद एवं जनजातीय समाज
यह अध्याय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय जनजातीय समाज के जीवन में आए क्रांतिकारी बदलावों और उनके द्वारा किए गए साहसिक प्रतिरोध का विस्तृत विश्लेषण करता है। जनजातीय समुदाय, जिन्हें आदिवासी भी कहा जाता है, प्राचीन काल से ही वनों पर निर्भर थे और ‘झूम खेती’ व पशुपालन के माध्यम से एक स्वतंत्र जीवन जीते थे। परंतु, अंग्रेजों द्वारा लागू की गई नई लगान व्यवस्था और ‘वन अधिनियम’ (1865, 1878) ने उनकी इस जीवनशैली को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया।
वनों को सरकारी संपत्ति घोषित कर आदिवासियों के प्रवेश और संसाधनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे वे अपनी ही भूमि पर श्रमिक बनने को मजबूर हो गए। साहूकारों, महाजनों (दिकू) और बिचौलियों द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण तथा ईसाई मिशनरियों के हस्तक्षेप ने असंतोष की ज्वाला को और भड़काया। इसके विरोध में छोटानागपुर में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में ‘उलगुलान’ और उत्तर-पूर्व भारत में जादोनांग एवं रानी गिंडाल्यू के नेतृत्व में ‘जेलियांगरांग’ आंदोलन जैसे प्रखर विद्रोह हुए।
इन आंदोलनों में आदिवासी महिलाओं, जैसे सिद्धू की बहनें फूलो-झानो, ने भी वीरता का परिचय दिया। इन संघर्षों ने ब्रिटिश सरकार को झुकने पर मजबूर किया, जिसके परिणामस्वरूप ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908’ जैसे रक्षात्मक कानून बने। यह पाठ जनजातीय वीरता और अपनी पहचान बचाने के उनके निरंतर संघर्ष की गाथा प्रस्तुत करता है।
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❤️ 5. शिल्प एवं उद्योग
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❤️ 6. अंग्रेज़ी शाशन के खिलाफ संघर्ष
यह अध्याय 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है। लेखक बताते हैं कि अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने समाज के लगभग सभी वर्गों जैसे राजाओं, नवाबों, किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों के जीवन को अस्थिर कर दिया था। विद्रोह की तात्कालिक चिंगारी ‘इन्फील्ड राइफल’ के कारतूसों में लगी चर्बी की घटना से भड़की, जिसने हिंदू और मुस्लिम सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया।
विद्रोह का आरंभ मंगल पांडे के बलिदान से हुआ और जल्द ही मेरठ के सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच कर बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया। इस आंदोलन में कानपुर से नाना साहब, झांसी से रानी लक्ष्मीबाई, लखनऊ से बेगम हजरत महल और बिहार के आरा से बाबू कुँवर सिंह जैसे पराक्रमी नेतृत्वकर्ताओं ने ब्रिटिश सत्ता को कड़ी चुनौती दी। बिहार में वहाबी आंदोलन के नेताओं ने भी इस संघर्ष में अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
हालाँकि, केंद्रीय नेतृत्व के अभाव, सीमित संसाधनों और अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति के कारण विद्रोह को दबा दिया गया। इसके परिणामस्वरुप, 1858 के अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश राजमुकुट के हाथों में चला गया। यह संघर्ष भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना जगाने में मील का पत्थर साबित हुआ और आने वाले वर्षों में आजादी की लड़ाई का आधार बना।
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❤️ 7. ब्रिटिश शासन एवं शिक्षा
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❤️ 8. जातीय व्यवस्था की चुनौतियाँ
यह अध्याय भारतीय समाज में व्याप्त ‘जातीय व्यवस्था की चुनौतियाँ’ और समाज सुधारकों के संघर्षों पर केंद्रित है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था कालान्तर में कठोर जाति प्रथा में बदल गई, जिससे छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियाँ उत्पन्न हुईं। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में आधुनिक शिक्षा और नई चेतना के प्रसार के साथ इन बुराइयों के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुए।
महात्मा ज्योतिराव फूले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की और ‘गुलामी’ पुस्तक के माध्यम से निचली जातियों के शोषण को उजागर किया। दक्षिण भारत में वीरशेलिंगम ने महिला सुधार और श्री नारायण गुरु ने ‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर’ का संदेश देकर सामाजिक समानता पर बल दिया। पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के जरिए ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती दी।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अछूतों को ‘हरिजन’ नाम दिया और उनके उत्थान के लिए ‘हरिजन सेवक संघ’ बनाया। डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने दलितों के वैधानिक अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया, ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ गठित की और अंततः बौद्ध धर्म अपनाया।
इन सुधारकों का साझा उद्देश्य एक न्यायपूर्ण, समतावादी और शोषण मुक्त समाज की स्थापना करना था। यह अध्याय हमें जातिगत भेदभाव को मिटाकर मानवीय गरिमा और भाईचारे को अपनाने की प्रेरणा देता है। यह पाठ सामाजिक संरचना में बदलाव लाने और एक मानवतावादी समाज के निर्माण की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
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❤️ 9. महिलाओं की स्थिति एवं सुधार
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❤️ 10. अंग्रेज़ी शासन और शहरी बदलाव
यह अध्याय ‘अंग्रेजी शासन एवं शहरी बदलाव’ औपनिवेशिक भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया और शहरों के बदलते सामाजिक-आर्थिक स्वरूप का गहन विश्लेषण करता है। पाठ की शुरुआत पूर्व-औपनिवेशिक और औपनिवेशिक शहरों के बीच के अंतर से होती है, जहाँ मुगलकालीन प्रशासनिक केंद्रों के पतन और नए क्षेत्रीय केंद्रों के उदय का वर्णन है। ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद मद्रास, कलकत्ता और बंबई जैसे ‘प्रेसिडेंसी शहरों’ का महत्व बढ़ा, जबकि ढाका और सूरत जैसे पुराने व्यापारिक केंद्र पिछड़ गए।
अध्याय में बिहार के भागलपुर शहर का एक विस्तृत ‘केस स्टडी’ प्रस्तुत किया गया है। भागलपुर को अपनी समृद्ध व्यावसायिक विरासत के कारण ‘सिल्क सिटी’ के रूप में पहचान मिली, जहाँ तसर रेशम का उत्पादन प्रमुख उद्योग रहा है। औपनिवेशिक काल में 1862 में रेलवे के आगमन ने शहर के बुनियादी ढांचे और व्यापार को नई दिशा दी।
इस दौरान शहर की जनसांख्यिकी में भी बदलाव आए; बंगाली समुदाय ने शिक्षा और प्रशासन में योगदान दिया, जबकि मारवाड़ी समुदाय ने व्यापारिक गतिविधियों को नियंत्रित किया। यहाँ की शैक्षणिक विरासत अत्यंत गौरवशाली है, जिसमें टी.एन.बी. कॉलेज और मोक्षदा बालिका विद्यालय जैसे संस्थान शामिल हैं।
साथ ही, रवींद्रनाथ टैगोर और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे महान साहित्यकारों का इस शहर से गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। यह पाठ स्पष्ट करता है कि कैसे औपनिवेशिक नीतियों, रेल विस्तार और प्रशासनिक सुधारों ने भारतीय शहरों की पारंपरिक पहचान को बदलते हुए आधुनिक शहरी जीवन की नींव रखी।
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❤️ 11. कला क्षेत्र में परिवर्तन
यह अध्याय औपनिवेशिक काल के दौरान भारत में कला, स्थापत्य और साहित्य के क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी परिवर्तनों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। अठारहवीं सदी के राजनीतिक विघटन के दौर में पारंपरिक कलाकारों का राजकीय संरक्षण समाप्त हो गया, जिससे सांस्कृतिक पतन की स्थिति उत्पन्न हुई। इसी समय ब्रिटिश प्रभाव से यूरोपीय शैलियाँ भारत आईं, जिनमें यथार्थवाद और तैलचित्रण प्रमुख थे।
थॉमस डेनियल जैसे चित्रकारों ने ब्रिटिश सत्ता की भव्यता और भारतीय पतन को दर्शाने वाले चित्र बनाए। दूसरी ओर, ‘कम्पनी पेंटिंग’ और बिहार की प्रसिद्ध ‘मधुबनी पेंटिंग’ जैसी स्थानीय शैलियों ने भी अपनी अनूठी पहचान बनाई। राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान राजा रवि वर्मा ने पौराणिक कथाओं को जन-जन तक पहुँचाया, जबकि अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘मॉडर्न स्कूल ऑफ आर्ट’ के माध्यम से स्वदेशी कला को प्रोत्साहित किया।
स्थापत्य के क्षेत्र में अंग्रेजों ने ग्रीको-रोमन, गॉथिक और इंडो-सारासेनिक शैलियों के मेल से कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे शहरों में भव्य इमारतों का निर्माण किया। साहित्य के क्षेत्र में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, प्रेमचंद और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे महान रचनाकारों ने अपनी लेखनी से राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उर्दू साहित्य और शायरी ने भी जनसाधारण में देशभक्ति, एकता और बलिदान की भावना का गहरा संचार किया।
संक्षेप में, यह अध्याय उपनिवेशवाद के प्रभाव और राष्ट्रवाद के उदय के बीच कलात्मक एवं सांस्कृतिक विकास की प्रेरक यात्रा को रेखांकित करता है।
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❤️ 12. राष्ट्रीय आंदोलन
यह अध्याय ‘राष्ट्रीय आन्दोलन 1885-1947’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास और उसके विभिन्न चरणों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसकी शुरुआत 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से होती है, जिसने देश को एक संगठित राजनैतिक मंच प्रदान किया।
पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार अंग्रेजों की आर्थिक शोषणकारी नीतियों और विभेदकारी शासन ने भारतीयों में गहरा असंतोष पैदा किया, जिसने अंततः राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया। इसमें पश्चिमी शिक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और प्रशासनिक एकरूपता के महत्व को भी बखूबी दर्शाया गया है।
अध्याय में 1905 के बंगाल विभाजन, गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह (1917), असहयोग आंदोलन (1920), और सविनय अवज्ञा आंदोलन (दांडी मार्च 1930) जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ावों का सजीव चित्रण है। यह भगत सिंह और खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारी वीरों के बलिदानों के साथ-साथ सुभाष चंद्र बोस और उनकी ‘आजाद हिन्द फौज’ के शौर्यपूर्ण योगदान को भी रेखांकित करता है।
विशेष रूप से बिहार के क्षेत्रीय योगदानों, जैसे सचिवालय गोलीकांड और स्थानीय जन-आंदोलनों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। अंततः, यह पाठ 1947 के विभाजन की त्रासदी और स्वाधीनता प्राप्ति के साथ समाप्त होता है, जो विद्यार्थियों को भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों और आजादी की कीमत समझाने में सहायता करता है।
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❤️ 13. स्वतंत्रता के पश्चात विभाजित भारत का जन्म
यह अध्याय ‘स्वतंत्रता के बाद विभाजित भारत का जन्म’ 1947 में भारत की आजादी के बाद की चुनौतियों और विकास यात्रा का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। आजादी के समय देश के सामने लगभग 1 करोड़ शरणार्थियों का पुनर्वास, 500 से अधिक देशी रियासतों का विलय और एक नई राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण जैसी अत्यंत गंभीर समस्याएँ थीं। पंडित नेहरू के ऐतिहासिक भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ के साथ भारत ने लोकतंत्र की दिशा में कदम बढ़ाया।
संविधान सभा ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में एक न्यायपूर्ण संविधान तैयार किया, जिसमें सभी नागरिकों को समानता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और सामाजिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं और 1950 में ‘योजना आयोग’ का गठन किया, जिससे कृषि और भारी उद्योगों (जैसे भिलाई और बोकारो) को बढ़ावा मिला।
भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की तीव्र मांग के बाद 1953 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ और 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं। राजनीतिक रूप से, अध्याय में आपातकाल के काले दौर और जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ का भी उल्लेख है। यद्यपि भारत ने पिछले दशकों में तकनीकी और संचार क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन गरीबी, अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई और जातिगत भेदभाव आज भी हमारे लोकतंत्र के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं।
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❤️ 14. हमारे इतिहासकार कालीकिंकर दत्त
यह अध्याय महान भारतीय इतिहासकार डॉ. कालीकिंकर दत्त (1905-1982) के प्रेरणादायक जीवन और उनके ऐतिहासिक योगदानों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। डॉ.
दत्त का जन्म पाकुर जिले के झिकरहाटी गाँव में हुआ था, जहाँ उनके पिता एक शिक्षक थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और डॉ.
एस. सी. सरकार के मार्गदर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया।
उनके शोध का मुख्य केंद्र आधुनिक बिहार और बंगाल का आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास रहा। उन्होंने ‘अलीवर्दी एण्ड हिज टाइम्स’ विषय पर अपना शोध-प्रबंध लिखकर ख्याति प्राप्त की। डॉ.
दत्त ने बिहार में इतिहास विषयक शोध की आधुनिक परंपरा को सुदृढ़ किया। उन्होंने शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें पटना कॉलेज के प्राचार्य, मगध विश्वविद्यालय के संस्थापक उप-कुलपति और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति रहने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने काशीप्रसाद जयसवाल शोध संस्थान और बिहार राज्य अभिलेखागार के निदेशक के रूप में भी सेवाएँ दीं।
उनके साहित्यिक योगदान अत्यंत विशाल हैं; उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकों का लेखन और संपादन किया। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन बिहार’, ‘एडवांस्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ और ‘कॉम्प्रेहेंसिव हिस्ट्री ऑफ बिहार’ प्रमुख हैं। बिहार के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को संकलित करने में उनकी भूमिका अद्वितीय रही है।
डॉ. दत्त को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए मोआर्ट स्वर्ण पदक और डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
उनकी मेहनत और समर्पण का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनका मानना था कि यदि प्रतिदिन केवल एक पृष्ठ भी लिखा जाए, तो वर्ष में एक पूरी पुस्तक तैयार की जा सकती है। 24 मार्च 1982 को उनका देहावसान हुआ, परंतु उनका लेखन आज भी आधुनिक भारतीय इतिहास के शोधार्थियों के लिए एक आधारस्तंभ बना हुआ है।
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❤️ 15. राष्ट्रीय एकता एवं सौहार्द के प्रतीक: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
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Bro, books are not being downloaded.
Mujhe sbhi book ka solution wala app chahiye Bihar board ka
hey @Shashank, you can download Solutions on this site – https://biharboard-ac.in/
History
hey @Ibrar, History books are already given on this page.
Check out these step-by-step guides to understand how to download these books.
Step 1
Step 2
thanks!
There is a lesson work in it. The new version has up to lesson 15.
hey @Prakash, you can download Chapter 15 from this link – https://www.gkpad.com/download.php?id=1KsQA2qcmm0kMHu48HZ5CwgYGORLLRK-N
Thanks! for informing me.
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